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Aug 15
तो कहाँ है वह संगच्छध्वम् ?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 12 

चौदह के पन्द्रह अगस्त और पन्द्रह के पन्द्रह अगस्त में क्या फ़र्क़ है? चौदह में 'सहमति' का शंखनाद था, पन्द्रह में टकराव की अड़! याद कीजिए चौदह में लाल क़िले से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पहला भाषण. संगच्छध्वम्! अब एक साल बाद कहाँ है वह संगच्छध्वम्?


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चौदह के पन्द्रह अगस्त और पन्द्रह के पन्द्रह अगस्त में क्या फ़र्क़ है? चौदह में 'सहमति' का शंखनाद था, पन्द्रह में टकराव की अड़! याद कीजिए चौदह में लाल क़िले से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पहला भाषण. संगच्छध्वम्! मोदी देश को बता रहे थे कि हम बहुमत के बल पर नहीं बल्कि सहमति के मज़बूत धरातल पर आगे बढ़ना चाहते हैं. उस साल एक दिन पहले ही नयी सरकार के पहले संसद सत्र का सफल समापन हुआ था. मोदी इसका यश सिर्फ़ सरकार को ही नहीं, पूरे विपक्ष दे रहे थे! संगच्छध्वम्!

सहमति और राजनीति

और अब एक साल बाद! दो दिन पहले ही संसद का मानसून सत्र बिना किसी कामकाज के बीत गया! लोग सहमति को ढूँढते रहे, लेकिन वह कहीं मिली नहीं! सहमति को राजनीति खा गयी! मोदी अड़ गये तो अड़ गये! अड़ना ज़रूरी था! राजनीति का तक़ाज़ा था. और राजनीति में मोदी के रणवीर आख़िर भारी पड़ गये और काँग्रेस पूरे विपक्ष में अन्तत: अलग-थलग पड़ गयी. एक तरह से संसद नहीं चलने का ठीकरा भी काँग्रेस के सिर फूटा. देश का कारपोरेट जगत विह्वल हो उठा कि आख़िर काँग्रेस क्यों संसद नहीं चलने दे रही है? और मोदी के रणवीर इसमें भी सफल रहे कि वह सवाल ही बहस से ग़ायब हो गया, जिस पर संसद ठप्प रही! क्या सुषमा स्वराज और वसुन्धरा राजे ने कुछ भी ग़लत नहीं किया था? यूपीए-2 में अश्विनी कुमार और पवन बंसल पर लगे आरोपों के मुक़ाबले क्या सुषमा और वसुन्धरा पर लगे आरोप ज़्यादा गम्भीर नहीं थे? पवन बंसल पर तो सीधे कोई आरोप मिला भी नहीं. जबकि सुषमा और वसुन्धरा के मामले में सब सामने है. कुछ साबित होना बाक़ी नहीं है. अब यह अलग बात है कि सुषमा और वसुन्धरा के मामले में आप सही और ग़लत के पैमाने अपनी सुविधा से बदल दें.

क्या मिला अध्यादेशों से?

लेकिन मोदी सरकार ने तय कर लिया कि सुषमा और वसुन्धरा का इस्तीफ़ा नहीं होना है तो नहीं होना है. बात ख़त्म! संसद चले, न चले! और यही एक मामला क्यों? सहमति और कहाँ बनी या बनाने की कोशिश की गयी? भूमि अधिग्रहण क़ानून पर मोदी सरकार अड़ी रही तो अड़ी रही! शिव सेना और अकाली दल जैसे उसके सहयोगी भी उसका विरोध करते रहे तो करते रहे. तीन बार अध्यादेश जारी हो गया. लेकिन पूरे एक साल में अध्यादेश के तहत एक इंच ज़मीन भी अधिग्रहीत नहीं की गयी! और जब संसद की संयुक्त समिति की बैठकों में साबित हो गया कि मोदी सरकार जो संशोधन सुझा रही है, उनके पक्ष में इक्का-दुक्का समर्थन के अलावा और कोई है ही नहीं, तब जा कर सरकार झुकी. एक साल बर्बाद हो गया तो हो गया!

गजेन्द्र चौहान पर क्यों अड़े?

पुणे फ़िल्म संस्थान का मामला ले लीजिए. गजेन्द्र चौहान को उसका अध्यक्ष बनाये जाने का चौतरफ़ा विरोध हुआ. फ़िल्म जगत की जानी-मानी हस्तियों से लेकर देश के सारे अख़बारों, पत्रिकाओं, टीवी चैनलों तक में से शायद ही किसी को गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति सही लगी हो, लेकिन मोदी सरकार को जाने उनमें कैसी विशिष्ट योग्यता नज़र आती है कि सरकार टस से मस नहीं होना चाहती है. फ़िल्म संस्थान चले, न चले, उसकी बला से.

कहानी तीस्ता और केजरीवाल की

तीस्ता सीतलवाड का मामला लीजिए. देश में अब तक हुए तमाम बड़े दंगों में असर और पहुँच वाले अपराधी कभी पकड़ में नहीं आते. गुजरात के दंगों में पहली बार अगर ऐसे कुछ लोगों तक क़ानून का हाथ पहुँच सका तो उसका श्रेय केवल तीस्ता और उनके पति जावेद आनन्द की अथक लड़ाई को जाता है. इसके बदले में पहले गुजरात पुलिस और फिर सीबीआइ के ज़रिये तीस्ता को पकड़ कर अन्दर करने की बड़ी कोशिशें की गयीं. कहा गया कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा है. इसके चौतरफ़ा विरोध पर भी सरकार बहरी बनी बैठी रही. आख़िर मुम्बई हाइकोर्ट ने जब सीबीआइ को फटकार लगायी, तब जा कर सरकार के होश ठिकाने आये. हाइकोर्ट ने साफ़-साफ़ कहा कि तीस्ता के ख़िलाफ़ ऐसा कोई आरोप नहीं है कि उसे गिरफ़्तार करके पूछताछ की जाये.
और सहमति का एक और नमूना हम आये दिन दिल्ली में देखते हैं कि दिल्ली पुलिस किस बेशर्मी से आम आदमी पार्टी के पीछे पड़ी हुई है! नजीब जंग और केजरीवाल सरकार में चल रही जंग को क़ानूनी तरह से निबटने दीजिए या फिर बैठ कर साफ़-साफ़ बात कीजिए और सहमति का रास्ता निकालिए. राजनीतिक गतिरोध अपनी जगह है, लेकिन उसमें दिल्ली पुलिस क्यों पार्टी बने?

जजों की अटकी नियुक्तियाँ

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजीएसी) पर सरकार और न्यायपालिका में सहमति नहीं बन पायी. मामला फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट में है. और इस बीच ख़बर आयी है कि देश के 24 हाईकोर्टों में क़रीब सवा सौ जजों की नियुक्तियाँ अटकी हुई हैं, जिनके नामों की सिफ़ारिश कालेजियम सिस्टम के तहत की गयी है. अब जब तक सुप्रीम कोर्ट में यह मामला नहीं सुलझता, हाईकोर्टों में काम रुका रहेगा.
तो कहाँ है वह 'संगच्छध्वम्', जिसका एलान नरेन्द्र मोदी ने पन्द्रह अगस्त के अपने पिछले भाषण में किया था? 'संगच्छध्वम् संवदध्वम् सं वो मनांसि जानताम्'—हम साथ चलें, मिल कर चलें, मिल कर सोचें, यह बात तो वाक़ई बहुत सुन्दर है मोदी जी! लेकिन सहमति का मतलब क्या है? जो आप कहें, बस वही सही, या फिर सहमति में दूसरों की बात सुनना और समझना शामिल नहीं है?
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'राग देश' के सभी पाठकों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई!

हम स्वतंत्र हैं. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं. बड़ी आर्थिक ताक़त बनने की ओर बढ़ रहे हैं. पीढ़ियों के संघर्ष से आज यह मुक़ाम हमें हासिल हुआ है.

लेकिन मुक्ति की कई लड़ाइयाँ अभी बाक़ी हैं. ग़रीबी से मुक्ति, अशिक्षा से मुक्ति, जातीय भेदभाव से मुक्ति, लैंगिक विषमता से मुक्ति, साम्प्रदायिक सोच से मुक्ति, धार्मिक कट्टरपंथ और पुरातनपंथी तम्बुओं से मुक्ति, धर्मों पर आधारित तमाम पर्सनल क़ानूनों से मुक्ति, मनुष्य-विरोधी सामाजिक रूढ़ियों से मुक्ति, भ्रष्ट राजनीति से मुक्ति.

संगच्छध्वम् संवदध्वम् सं वो मनांसि जानताम्—हम साथ चलें, मिल कर चलें, मिल कर सोचें और मिल कर संकल्प करें इन सभी बुराइयों से लड़ने का.

जय हिन्द!

 
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  • UPENDRA SWAMI

    जब मोदी इस पर अड़ जाएं, जिसका ऐलान राजनाथ सिंह भरी प्रेस कांफ्रेंस में कर दें कि- यह कोई यूपीए सरकार नहीं है, हमारे यहां मंत्री इस्तीफा नहीं देते, तो फिर भला क्या उम्मीद बाकी रह जाती है। जान जाएं कि पाला किससे पड़ा है। आखिर सुषमा स्वराज ने देश की संसद में यही तो कहा, ‘तुम भी तो झूठे थे बरखुरदार, हम भी हैं तो क्या ग़म है!’ लोकतंत्र के लिए भारी संकट यही है कि इस बार के झूठे बड़े बहुमत और फासिस्ट मानसिकता के साथ मैदान में है। वरना क्यों भला मोदी सरकार पूरे देश को यह साबित करने पर अड़ी है कि इस समय देश में दो सबसे बड़े मुजरिम केवल तीस्ता सीतलवाड़ और अरविंद केजरीवाल हैं।

    • qwn

      आपकी बात से सहमत हूँ उपेन्द्र जी और सच यह है कि सबसे बड़ी चिन्ता इसी फ़ासिस्ट मानसिकता और झूठ के प्रचार की है. झूठ भी फ़ासिस्ज़्म का एक बड़ा हथियार होता है. छोटी-छोटी बातों में अगर झूठ बोला जाता है तो उसका भी एक निश्चित ध्येय होता है.
      जैसे आज के भाषण में ही नरेन्द्र मोदी ने कहा कि नीम की कोटिंग करके यूरिया की अवैध बिक्री रोकी गयी. सच यह है कि यूरिया की कोटिंग का काम देश में कम से कम तीन साल पहले से तो चल ही रहा है. हो सकता है कि अब शत-प्रतिशत कोटिंग का लक्ष्य पा लिया गया हो, लेकिन मोदी ने आज साफ़ झूठ बोला. यही बात वह अपनी सरकार का एक साल पूरा होने पर बोल चुके थे और तब बिज़नेस स्टैंडर्ड ने उनके झूठ की क़लई खोल दी थी. इसलिए आज उन्होंने वह झूठ चतुराई से अर्द्धसत्य की तरह बोला.
      इसी तरह प्राविडेंट फ़ंड के ‘यूनीक नम्बर’ की योजना मार्च 2014 में ही लाँच हो चुकी थी, जब मोदी लोकसभा चुनाव के लिए अपना प्रचार कर रहे थे और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे.

  • Loved the cartoon. It says it all 🙂

    • qwn

      Thank you Kalpana for your appreciation. I will convey it to the Cartoonist Sudhir Goswami, who lives in Jaipur and gives me a lovely cartoon every week for Raag Desh.

  • aaku srivastava

    कौन गलत और कौन सही , इसके विश्लेषण तो होते रहेंगे लेकिन यह सच है की मोदी यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि देश को कैसे चलाया जाये , गुजरात कि तरीके से अब तक उन्होंने ऐसा किया है . लेकिन देश गुजरात ही नहीं है, यह उन्हें पता लग गया होगा . दूसरे स्वतंत्रता दिवस पर ही उनकी साँसे फूल गयी . देश को चलाने में सुनना भी पड़ता है और झुकना भी पड़ता है और साथ ही साथ दृढ़ता के साथ निर्णय भी लेने पड़ते हैं . लेकिन वो इस लायक तो हों.. सवाल है कि क्या मोदी कोई सबक लेंगे या यह साबित करेंगे कि देश ने उनसे उम्मीदें यों ही पाल ली थीं.

    • qwn

      सही कहा आपने अकु. मोदी की एक बड़ी समस्या यह है कि वह गुजरात के मुख्यमंत्री और भारत के प्रधानमंत्री के बीच अन्तर को समझ नहीं पा रहे हैं. पिछले दिनों यही बात मोदी के एक जीवनीकार निलंजन मुखोपाध्याय ने विस्तार से विश्लेषित की थी और मैं उनकी स्थापनाओं से सहमत हूँ.
      एक dictate पर गुजरात को चलाना आसान था क्योंकि वहाँ किसी दूसरी राय की कोई गुंजाइश नहीं थी, विपक्ष मरघिल्ला था और जनता में उसकी कोई साख नहीं थी, जनता के बहुत बड़े तबक़े में मोदी के प्रति असीम आस्था थी और मोदी के हर क़दम को वह सही मानता था, मीडिया और बुद्धिजीवियों की कोई आवाज़ थी ही नहीं, इसलिए मोदी को वहाँ ‘यस बाॅस’ के अलावा कभी कुछ सुनना ही नहीं पड़ा.
      लेकिन यही स्थिति भारत पर लागू नहीं की जा सकती. मोदी को इस बात को समझना होगा और इसकी आदत डालनी होगी.

  • qwn

    MKS, आपने अहंकार का मुद्दा सही उठाया. नरेन्द्र मोदी तो स्वभाव से इसके लिए जाने ही जाते हैं. लेकिन जहाँ तक संघ की बात है, कुछ महीने पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान आया था कि सत्ता में कुछ अहंकार तो होना ही चाहिए, वरना उसकी बात कौन सुनेगा. इसलिए, इस विषय में मोदी और संघ के विचारों में कोई भिन्नता नहीं है.

  • modi confuse nazar aate hain aur ek bade tabke ko bhi apni bhashasheli se manmughd kar confuse kar rakha hai, ummeed karunga is saal nare ko alawa kuch karye hote hue dikhein

    • qwn

      हाँ, अब ऐसा लग रहा है कि उन्हें बहुत-सी समस्याओं और उनके तमाम पहलुओं के बारे में कुछ ज़्यादा अंदाज़ा नहीं था. जैसे बांग्लादेश के साथ सीमा समझौते की बात हो या आधार कार्ड की, इन दोनों मुद्दों पर मोदी ने इसीलिए यू टर्न लिया कि प्रधानमंत्री बनने के बाद ही उन्हें समझ में आया कि ये क्यों देशहित में हैं.
      हालाँकि वह चुनाव प्रचार के दौरान जैसा आभास दे रहे थे कि तमाम समस्याओं को किस तरह हल किया जा सकता है, उससे लग रहा था कि उन्होंने ज़रूर कोई प्लान तैयार कर रखा है, लेकिन अब ये साफ़ हो गया है कि उनके पास ऐसा कोई प्लान या तो था नहीं, और अगर था भी तो वह वास्तविक स्थितियों के निकट नहीं था.

  • बिना चर्चा और सहमति के भारत जैसा देश तो क्या, एक कुटुम्ब भी एक नहीं रह सकता.

    • qwn

      जब पिछले साल नरेंद्र मोदी ने यह बात कही थी, तभी आश्चर्य हुआ था कि वह ऐसा कह कैसे रहे हैं और अगर कह रहे हैं तो अपने स्वभाव के विपरीत जा कर वह ऐसा कर भी पायेंगे क्या?

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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