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Aug 20
‘सिन्धु-साक्षी’ पॉवर से सुपरपॉवर!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 2 

दीपा करमाकर और साक्षी मलिक के परिवारों ने अपनी बेटियों की तैयारी के लिए ख़ुद अपना घर-बार सब कुछ दाँव पर न लगा दिया होता, तो उनकी कहानियाँ आज किसी के सामने न होती. इनके और गोपीचन्द जैसों के लिए 'ईज़ ऑफ़ प्लेयिंग' जैसी कोई योजना बननी चाहिए न! 'ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस' के लिए तो हम बहुत काम कर रहे हैं, कुछ थोड़ा-सा काम 'ईज़ ऑफ़ प्लेयिंग' के लिए भी हो जाये!


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नाचो, गाओ, ढोल बजाओ, जश्न मनाओ! बैडमिंटन में पी वी सिन्धु का शानदार कमाल! बेमिसाल. सोना नहीं जीत पायीं, लेकिन चाँदी भी कम नहीं. सिन्धु हारीं, तो अपने से कहीं बेहतर और दुनिया की नम्बर एक खिलाड़ी कैरोलिना मरीन से. और कुश्ती में साक्षी मलिक की दमदार जीत. हार से लौट कर भी जीत की कहानी लिख देना, मामूली बात नहीं और किसी गोल्ड मेडल से कम नहीं! और त्रिपुरा की जिमनास्ट दीपा करमाकर के बिना तो रियो की कहानी कभी पूरी ही नहीं हो सकती. वह मेडल नहीं जीत पायीं, लेकिन देश का दिल उन्होंने ज़रूर जीता. ऐसा अदम्य हौसला, ऐसी लगन, ऐसी मेहनत, ऐसा समर्पण अद्भुत है.

Olympics 2016 : PV Sindhu, Sakshi Malik & Deepa Karmakar - 3 stories of National Pride

रियो से ये विश्वविजय की, गौरव की, प्रेरणा की तीन लाजवाब कहानियाँ हैं, जिनकी चर्चा बहुत दिनों तक होती रहेगी. होनी भी चाहिए. इन पर सारे देश में ख़ूब धूमधाम हो, इतनी कि देश के बच्चे-बच्चे में ललक उठे कि एक दिन उसे भी ओलिम्पिक जीत कर दिखाना है, उसे भी विश्वविजयी बनना है, उसे भी राष्ट्रीय गौरव की कोई बेमिसाल कहानी लिखनी है, ऐसी कोई छाप छोड़नी है कि सदियों तक पीढ़ियाँ उसके नाम पर गर्व से इतराती रहें. लेकिन रियो से इसके अलावा भी कुछ अच्छी और कुछ बुरी कहानियाँ हैं, जिन्हें हम भारतीय अपनी सुविधा से भूल जायेंगे! और बस हमसे सारी गड़बड़ यहीं होती है. और इसीलिए हम सिर्फ़ कभी-कभार ही गिनती की कुछ बड़ी कहानियाँ लिख पाते हैं.

56 Years Long Journey between 2 Bronze Medals

कुश्ती : एक पदक के बाद दूसरा दाँव छप्पन साल बाद!

1952 के हेलसिंकी ओलिम्पिक में खशाबा दादासाहेब जाधव ने पुरुष कुश्ती में कांस्य पदक जीता था. वह हमारी पैदाइश के पहले की बात है. शायद तब भी बड़ी ख़ुशी मनी होगी. मननी भी चाहिए. लेकिन कुश्ती में अगला पदक जीतने के लिए हमको 56 साल का लम्बा इन्तज़ार करना पड़ा. हाँ, यह ज़रूर है कि 2008 में सुशील कुमार के कुश्ती कांस्य पदक के बाद से हम हर ओलिम्पिक में इस स्पर्धा में कुछ न कुछ जीत रहे हैं. लेकिन दूसरे खेलों में ऐसा नहीं है. 1996 में लिएंडर पेस ने टेनिस में कांस्य पदक जीता, तब भी बड़ी ख़ुशी मनी थी, लेकिन टेनिस में वह हमारा पहला और आख़िरी पदक है! निशानेबाज़ी (शूटिंग) में ज़रूर 2004 में राज्यवर्द्धन राठौर ने रजत पदक जीत कर जो सिलसिला शुरू किया था, उसे 2008 में अभिनव बिन्द्रा (स्वर्ण) और 2012 में गगन नारंग (कांस्य) ने जारी रखा. लेकिन इस साल हम वहाँ खाता नहीं खोल पाये. ऐसा ही कुछ बाक्सिंग में भी हुआ. बैडमिंटन में 2012 में सायना नेहवाल के कांस्य पदक के सिलसिले को सिन्धु ने इस साल ज़रूर बेहद शानदार तरीक़े से आगे बढ़ाया है.

Olympics 2016 : जश्न भी, तो कुछ सवाल भी!

तो कुल मिला कर अभी हम कुश्ती, निशानेबाज़ी और बैडमिंटन से ही अगले ओलिम्पिक में सफलता की कुछ कहानियों की उम्मीद कर सकते हैं. इतने बड़े देश में हम सफलता की बड़ी कहानियाँ लगातार क्यों नहीं लिख पाते, क्या यह सोचने की ज़रूरत नहीं? क्या इस पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए? वैसे सवाल उठाना आजकल बड़े जोखिम का काम हो चुका है. ऊपर से नीचे तक लोग हाथ धो कर पिल पड़ते हैं. फिर भी यह जोखिम मैं उठा रहा हूँ!

Pullela Gopichand : Amazing story of Committment and Dedication

तो बड़ी कहानियों को तो हर कोई लपकता है, उन पर गर्वित होता है, श्रेय लूटता है, उसमें कोई हर्ज नहीं. लेकिन इसमें चार चाँद लग जायें, जब हम साथ में बहुत-सी दूसरी कहानियों को भी देखने, जानने, समझने का वक़्त निकालें. सिन्धु की कहानी चमाचम चमकदार है, लेकिन उससे भी कहीं ज़्यादा शानदार है उसके कोच पुलेला गोपीचन्द की कहानी, जिसने अथक मेहनत कर और ज़रूरत पड़ने पर अपना घर तक गिरवी रख कर अपनी बैडमिंटन अकादमी के लिए पैसा जुटाया और बैडमिंटन खिलाड़ियों की ऐसी नयी पीढ़ी तैयार की जो शायद अगले कुछ बरसों तक दुनिया पर राज करे. सायना नेहवाल और सिन्धु के अलावा किदम्बी श्रीकान्त से भी बड़ी उम्मीदें की जा सकती हैं. श्रीकान्त दुनिया के नम्बर तीन शटलर और पिछले दो बार के ओलिम्पिक चैम्पियन लिन डैन से क्वार्टरफ़ाइनल बस जीतते-जीतते ही रह गये. मेरे ख़याल से उस मैच में श्रीकान्त का खेल बड़ा अच्छा था, लेकिन 'माइंड गेम' में वह कमज़ोर पड़ गये.

'चलता है' सो 'माइंड गेम' नहीं चलता!

यह 'माइंड गेम' भारतीय खिलाड़ियों की सबसे बड़ी कमज़ोरी है. वरना शायद हमारे कुछ और खिलाड़ी यक़ीनन कुछ और पदक जीत सकते थे. वे वाक़ई पदक जीतने की योग्यता रखते थे, फिर भी नहीं जीत पाये. पिछले कुछ सालों से खिलाड़ियों में 'किलर इंस्टिक्ट' के लिए मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण दिये जाने की शुरुआत हुई है, लेकिन इसके लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है. कई बार हम भारतीय अपनी नैसर्गिक 'चलता है' की प्रवृत्ति के चलते छोटे-छोटे अनुशासनों की परवाह नहीं करते, जिसकी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है. इसका इलाज कहीं और नहीं, ख़ुद हमारे ही पास है. कैसे?

क्रिकेट में कैसे बदल गया 'एटीट्यूड?'

क्रिकेट को लीजिए. कुछ साल पहले तक हम क्रिकेट में भी 'ढुलमुल यक़ीन' ही दिखते थे. कब हार जायें, कब जीत जायें, कुछ पता नहीं. अस्सी के दशक में जब केरी पैकर ने रंगीन कपड़ों में दिन-रात के क्रिकेट की शुरुआत की, तो उसकी बड़ी आलोचना हुई. लेकिन उस क्रिकेट ने आगे चल कर न सिर्फ़ समूचे क्रिकेट को बदला, बल्कि कुछ बरस बाद भारतीय क्रिकेट को भी बदल दिया. क्रिकेट में अथाह पैसा आने से खिलाड़ियों को ख़ुद-ब-ख़ुद समझ में आ गया कि 'हार्डकोर प्रोफ़ेशनल' नहीं बनोगे, तो पैसा नहीं बना पाओगे. पैसा खोना किसे अच्छा लगता है? नतीजा? इस पैसे ने हमारे सारे के सारे क्रिकेटरों की बैटिंग, बॉलिंग, फ़ील्डिंग, थ्रो से लेकर अनुशासन, प्रैक्टिस, रुझान और पूरा का पूरा 'एटीट्यूड' ही बदल दिया. मतलब यह कि ठान लिया जाये कि 'एटीट्यूड' बदलना है, तो वह चुटकी बजाते बदल जायेगा. क्रिकेट में तो पैसे ने यह काम कर दिया, लेकिन बाक़ी खेलों में यह काम कैसे हो? इस सवाल का जवाब आये बिना हम ग़ैर-क्रिकेट खेलों में बड़े करिश्मे लगातार नहीं कर पायेंगे.

संयोग से नहीं होता करिश्मा!

करिश्मा संयोग से नहीं होता. किया जाता है. इसी ओलिम्पिक में इस बार पुरुष हॉकी के फ़ाइनल में दो ऐसी टीमें खेलीं, जिन्हें कोई किसी गिनती में नहीं रखता था. लेकिन बेल्जियम और अर्जेंटीना ने बड़े-बड़े दिग्गजों की मिट्टी पलीद कर दी. यह क्या संयोग से हो गया?

चीन ने कहा था 60, ले गये इकसठ!

बरसों पहले की बात है. बड़े लम्बे अन्तरराष्ट्रीय प्रतिबन्ध के बाद 1982 के एशियाई खेलों में पहली बार चीन के लिए दरवाज़े खोले गये थे. चीनी खिलाड़ी कई बरसों से दुनिया की हर प्रतियोगिता से बाहर थे. वे कहीं खेल नहीं सकते थे, लेकिन वे सुस्त नहीं पड़े, आराम से नहीं बैठे, अभ्यास में कोई कोताही नहीं की. और जब चीनी दल एशियाड के लिए दिल्ली आया तो इस दावे के साथ कि वह कम से कम साठ स्वर्ण पदक जीतेगा. और वे इकसठ स्वर्ण पदक जीत कर लौटे! दावे से एक गोल्ड मेडल ज़्यादा! इसे कहते हैं तैयारी और अनुशासन, जो किसी देश को खेलों का सुपरपॉवर बनाता है. क्या हम करते हैं ऐसी तैयारी? करना चाहते हैं ऐसा? बनना चाहते हैं खेलों के सुपर पॉवर?

The queer case of wrestler Narsingh Yadav in Olympics 2016

यह 'एटीट्यूड' हर जगह चाहिए. नरसिंह यादव का मामला लीजिए. 'नाडा' ने उन्हें 'क्लीयरेन्स' दे दी. उसके बाद सब हाथ पर हाथ धर कर बैठ गये. पहले से यह क्यों नहीं सोचा गया कि ओलिम्पिक में मामला न बिगड़े, इसके लिए कुछ करके चलना चाहिए. शुरू से कहा जा रहा है कि नरसिंह के ख़िलाफ़ साज़िश हुई. किसी ने उसके खाने की चीज़ों में स्टेरायड मिला दिये. यह कोई मामूली आरोप है? यह देश के विरुद्ध सीधी साज़िश है. सीधे-सीधे देशद्रोह का मामला है. लेकिन तब कुछ नहीं किया गया. अब माँग की जा रही है कि सीबीआइ जाँच हो. अरे अगर तभी देशद्रोह का मामला दर्ज हो गया होता, सीबीआइ जाँच शुरू हो गयी होती तो कम से कम 'वाडा' और 'कैस' (कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन फ़ॉर स्पोर्ट्स) के सामने आपकी इस बात का कुछ वज़न होता कि नरसिंह साज़िश के शिकार हुए हैं. लेकिन आपने तथाकथित साज़िश के ख़िलाफ़ कुछ किया ही नहीं, तो दुनिया साज़िश की थ्योरी कैसे मान ले? पूरा मामला दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन इस दुर्भाग्य का दोषी कौन है? भाग्य या हम ख़ुद?

तो अब 'ईज़ ऑफ़ प्लेयिंग' की बात करें?

दीपा करमाकर और साक्षी मलिक के परिवारों ने अपनी बेटियों की तैयारी के लिए ख़ुद अपना घर-बार सब कुछ दाँव पर न लगा दिया होता, तो उनकी कहानियाँ आज किसी के सामने न होती. इनके और गोपीचन्द जैसों के लिए 'ईज़ ऑफ़ प्लेयिंग' जैसी कोई योजना बननी चाहिए न! 'ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस' के लिए तो हम बहुत काम कर रहे हैं, कुछ थोड़ा-सा काम 'ईज़ ऑफ़ प्लेयिंग' के लिए भी हो जाये! आज की दुनिया में ओलिम्पिक मेडल भी सुपरपॉवर होने की निशानी हैं. तो 'सिन्धु-साक्षी' पॉवर से बनिए न सुपरपॉवर! कौन रोकता है?
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  • आदरणीय नकवी जी, बहुत दिनों से आपकी कोई पोस्ट पढ़ने नहीं मिली थी। मेरे जैसे पाठक आपकी लेखनी को मिस कर रहे थे। खैर। मैं आपकी बात से पूरी तरह से सहमत हूं कि हम जैसे उदयोगो को प्रोत्साहन देते है ठीक वैसे ही हमें खेलों को भी प्रोत्साहन देना होगा।

    • qwn

      लेख पढ़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद, ज्योति जी.

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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