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Aug 01
याक़ूब मेमन और एक सवाल!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 6 

अपनी फाँसी रुकने पर राजोआना ने कहा कि 'मैं ख़ुश हूँ कि सिख राष्ट्र ने दिल्ली सरकार की चूलें हिला कर रख दीं.' यही नहीं, राजोआना को अकाल तख़्त ने 'ज़िन्दा शहीद' की उपाधि दे रखी है! लेकिन राजोआना के मामले में तथाकथित राष्ट्रवादी स्वर अब तक कहीं नहीं उठे! उसे 'ज़िन्दा शहीद' घोषित किया जाना भी 'राष्ट्रविरोधी' नहीं माना गया और इसके बावजूद अकाली दल केन्द्र की 'राष्ट्रवादी' सरकार का हिस्सा है! जबकि याक़ूब मेमन की फाँसी का विरोध करनेवाले हर व्यक्ति को 'देशद्रोही' क़रार दे दिया गया!


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याक़ूब मेमन को तो फाँसी हो चुकी. बहस जारी है. और शायद अभी यह बहस जारी रहे. बहुत-सारी बातें हो चुकी हैं. मज़हबी रंग की बातें हो चुकी हैं, राष्ट्रवादी जुमलों की तोपें चल चुकी हैं, क़ानूनी दाँव-पेंच हो चुके हैं. फिर भी बहस अभी जारी है कि याक़ूब को फाँसी होनी चाहिए थी या नहीं? लोगों के अपने-अपने निष्कर्ष हैं, जिससे वे डिगना नहीं चाहते.
इस बहस से याक़ूब मेमन पर अब कोई फ़र्क़ नहीं पड़ना. उसे तो फाँसी हो चुकी है. लेकिन यह बहस फाँसी से ख़त्म नहीं हुई, बल्कि शुरू हुई है. और इस बहस को कुछ निरपेक्ष हो कर, आवेशों के खौलते कड़ाहों से परे हट कर देखें तो कुछ गहरे सवाल दिखते हैं, जिनके जवाब तलाशने और देने की कोशिश की जानी चाहिए.
याक़ूब मेमन के अपराध की जघन्यता को लेकर कहीं कोई इनकार नहीं. और उसे अदालत में सुनवाई और अपने बचाव का भी पूरा अवसर मिला, इसमें भी कोई शक नहीं. इसके बाद क़ानून के मुताबिक़ उसे जो सज़ा मिलनी चाहिए थी, मिली. लेकिन इस मामले में एक सवाल का जवाब मिलना चाहिए था. वह यह कि याक़ूब मेमन के भारत आ जाने (या भारत में उसकी तथाकथित गिरफ़्तारी) के बाद दो खेप में उसकी पत्नी और उसके परिवार के कई और लोग दुबई में भारतीय दूतावास से सम्पर्क कर भारत क्यों लौटे? क्या याक़ूब को किसी तरह का कोई भरोसा दिलाया गया था या उम्मीद बँधायी गयी? कहा जा रहा है कि ख़ुफ़िया एजेन्सियों ने उसके साथ कोई 'डील' नहीं की थी और न ऐसी कोई बात अदालतों के सामने मज़बूती से रखी गयी. लेकिन अगर याक़ूब को कोई उम्मीद नहीं दिलायी गयी थी तो वह टाइगर मेमन, दाऊद और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ ठोस सबूतों के पुलिन्दे जुटा-जुटा कर अपने साथ क्यों लाया था? याक़ूब अपने साथ ऐसे आडियो कैसेट क्यों लेकर आया था, जिसमें उसने गुपचुप तरीक़े से ब्लास्ट केस से जुड़ी कई महत्त्वपूर्ण बातचीत रिकार्ड की थी? वह मामले की जाँच में हर सम्भव मदद क्यों कर रहा था? पूर्व राॅ अधिकारी बी. रमन का लेख साफ़-साफ़ कहता है कि याक़ूब को फाँसी की सज़ा से उन्हें बड़ी हैरानी हुई. और रमन पर सन्देह करने का कोई कारण नहीं है क्योंकि इस लेख से उन्हें क्या मिलना था? लेख अगर उनके जीवित रहते छपता तो उलटे शायद वह मुसीबत में पड़ जाते! सवाल यही है कि क्या राजनीतिक कारणों से याक़ूब के साथ यह 'वादाख़िलाफ़ी' की गयी या यह उसे 'जाल में फँसाने' की ख़ुफ़िया एजेन्सियों की चाल थी? या जैसा कि तब के सीबीआइ निदेशक के. विजय रामाराव का कहना था कि मेमन परिवार ने इसलिए आत्मसमर्पण किया क्योंकि उनके पास कोई और विकल्प नहीं था? इस सवाल का जवाब चाहे जो हो, वह इस लेख का विषय नहीं है?
अब बलवन्त सिंह राजोआना का मामला लीजिए. पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के आरोप में उसे फाँसी हुई. अदालत में सुनवाई के दौरान उसने अपने ऊपर लगे आरोपों से कोई इनकार नहीं किया, कोई बचाव नहीं किया, कोई वकील नहीं किया और साफ़ कहा कि उसने बेअंत सिंह को मारा है और इसका उसे कोई अफ़सोस नहीं है. राजोआना ने फाँसी की सज़ा के ख़िलाफ़ अपील करने से भी इनकार कर दिया, अपने परिजनों को भी कहा कि वे कोई दया याचिका न दायर करें. और जब मार्च 2012 में फाँसी का दिन नज़दीक़ आने लगा तो पूरे पंजाब में राजोआना के समर्थन में रैलियाँ होने लगीं, आन्दोलन होने लगे और फाँसी से दो दिन पहले शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी ने अपनी तरफ़ से दया याचिका दायर की, जो तीन साल से ज़्यादा समय से अब भी विचाराधीन पड़ी हुई है. और अपनी फाँसी रुकने पर राजोआना ने कहा कि 'मैं ख़ुश हूँ कि सिख राष्ट्र ने दिल्ली सरकार की चूलें हिला कर रख दीं.' यही नहीं, राजोआना को अकाल तख़्त ने 'ज़िन्दा शहीद' की उपाधि दे रखी है!
लेकिन राजोआना के मामले में तथाकथित राष्ट्रवादी स्वर अब तक कहीं नहीं उठे! उसे 'ज़िन्दा शहीद' घोषित किया जाना भी 'राष्ट्रविरोधी' नहीं माना गया और इसके बावजूद अकाली दल केन्द्र की 'राष्ट्रवादी' सरकार का हिस्सा है! जबकि याक़ूब मेमन की फाँसी का विरोध करनेवाले हर व्यक्ति को 'देशद्रोही' क़रार दे दिया गया! इस लेख का विषय यही है!
समस्या यही है कि हमारी सोच के पैमाने अलग- अलग क्यों हैं? याक़ूब की फाँसी सही है या ग़लत, उस पर मैं बहस ही नहीं कर रहा हूँ, उसके क़ानूनी पहलुओं की पड़ताल क़ानून के जानकार करते रहेंगे. मेरा सवाल यह है कि आज याक़ूब की फाँसी को लेकर जो तथाकथित राष्ट्रवादी हुँकार चल रही है, वह मार्च 2012 में क्यों नहीं उठी, जब अकाल तख़्त ने उसे 'ज़िन्दा शहीद' घोषित किया. याक़ूब के जनाज़े में इतने लोग गये, कुछ मुसलमान याक़ूब को हीरो बनाने की निन्दनीय हरकत कर रहे हैं, यह बेहद ग़लत बात है. इसे लेकर सोशल मीडिया पर कुछ लोग भयानक उत्तेजना फैलाने में लगे हैं. लेकिन मार्च 2012 में कोई शोर क्यों नहीं उठा, जब पंजाब में राजोआना के समर्थन में रैलियाँ हो रही थीं और जब राजोआना कह रहा था कि 'सिख राष्ट्र' ने दिल्ली सरकार की चूलें हिला दीं!
किसी देश में जब राजनीतिक विमर्श भी और सरकारें भी अपनी सुविधा, पसन्द-नापसन्द और आग्रहों-पूर्वग्रहों के आधार पर एक जैसे मामलों में अलग-अलग पैमाने चुनती हैं, तभी समस्या पैदा होती है. याक़ूब और राजोआना के मामले को एक साथ रख कर देखें तो दोनों पर हमारा रवैया क्या रहा, यह बात साफ़ हो जाती है. लेकिन ओवैसी की तरह इसका कोई साम्प्रदायिक अर्थ निकालना परम मूर्खता भी होगी और मुद्दे को भटका कर साम्प्रदायिकता की राजनीति में इसे उलझा देना भी होगा. हो सकता है कि कुछ मामलों में साम्प्रदायिक निहितार्थ भी हों, लेकिन उससे ज़्यादा ये मामले राजनीतिक सुविधा के ही होते हैं.
मिसाल के तौर पर 1984 में सिखों के नरसंहार का मामला ले लीजिए. सारे सबूत सामने थे, सारे नाम सामने थे, जाँच में कुछ सामने नहीं आया और दंगे के बड़े-बड़े कांग्रेसी आरोपी मंत्री बने घूमते रहे. 1992 के मुम्बई दंगों में किसी को सज़ा नहीं मिली, उन पुलिसवालों को भी, जिनके ख़िलाफ़ श्रीकृष्णा आयोग को पुख़्ता सबूत मिले थे. क्यों? क्योंकि वहाँ आयी अलग-अलग सरकारों ने इसमें कोई रुचि नहीं दिखायी. यही नहीं, चाहे कश्मीरी पंडितों का नरसंहार हो, या देश भर में अलग-अलग जगहों पर दलित-विरोधी हिंसा या जातीय नरसंहारों के मामले हों या हाशिमपुरा कांड या फिर वरुण गाँधी के उत्तेजक भाषणों का मामूली-सा मामला हो, इन सब मामलों में अपराधियों को सज़ा दिलाने में क्या किसी सरकार ने कभी रुचि दिखायी? इन सब मामलों में तथाकथित सेकुलर से लेकर उग्र दक्षिणपंथी माने जानेवाले सारे के सारे राजनीतिक दलों का चरित्र बिलकुल एक जैसा क्यों रहा? क्या साफ़ नहीं है कि अलग-अलग राजनीतिक कारणों से इन सब मामलों में जाँच और कार्रवाई का हश्र बिलकुल एक जैसा क्यों हुआ? यही असली सवाल है. और बस यही एक मुद्दा हमारी चिन्ता का विषय होना चाहिए. नफ़रतें फैलाने और राजनीतिक दलों के द्वारा बेवक़ूफ़ बनने के बजाय इस सवाल पर गम्भीरता से सोचिए. आँखें खुल जायेंगी.
कहा जा रहा है कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता. सही बात है. लेकिन साध्वी प्रज्ञा जैसों के मामले में पहले सरकारी वकील रोहिणी सालियान पर दबाव डाल कर और फिर उन्हें हटा कर सरकार ने क्या वाक़ई यही संकेत दिया है कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता?
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  • UPENDRA SWAMI

    जिन लोगों ने यह सवाल उठाए कि याकूब को बचाने के पैरोकार उन ढाई सौ लोगों के बारे में क्यों नहीं सोच रहे जिनकी जानें उन विस्फोटों में गई थी, वे इस सवाल का जवाब देने से कतराते हैं कि उन लोगों की सजा का क्या जिन्होंने उन विस्फोटों से तीन साल पहले देशभर में नफरत के बीज बोए, जिनकी परिणति पहले बड़े पैमाने पर दंगों में और फिर इस तरह के विस्फोटों में हुई। क्या वे किसी सख्त सजा के हकदार नहीं थे? उनकी जांच के नाम पर बने तमाम आयोगों को मखौल बनाकर अमनपसंद लोगों की छाती में त्रिशूल बनाकर घोंप दिया गया।

  • Ameem Ansaari

    What will happen to 5000 people killed in Bombay riots with the help of Police and Shiv sena/RSS . if same thing happeded to you what will you do , when govt is collaborating in killing and majority of people are remain silent .

  • I really don’t understand what the whole hue and cry is about… when he masterminded and killed so many people…

  • i b arora

    याकूब मेमन को फांसी देने का निर्णय किसका था, इस सारी बहस में मुझें यह समझ नहीं आया.

  • JD

    श्रीमान जी। आप ने जिन जिन लोगों का नाम लिया वो सभी लोग दोषी है ओर इसमे कोइ सन्देह नही है। आप ने कहा की इन लोगों के समर्थको के खिलाफ कोइ हो हल्ला नही हुआ।मै बता दूँ की आज याकूब का मुद्दा केवल सोसल मीडिया के चलते इतना आवाज पा सका। ओर हा जो लोग इन दोषियों का समर्थन कर रहै है वो सब लोग देश के साथ अच्छा नही कर रहै।। ओर इन लोगों के लिये हिन्दी सब्दकोश मैं इक ही नाम है ओर वो है देशद्रोही।

  • kuldeep

    अगर पूरी दुनिया में मुस्लिम के सात कही कोई अप्रिय घटना होती है तो उस की परतिक्रिया भारत में क्यों होती है …..ये कट्टरता नहीं तो क्या है ….और बात करते हो बराबरी की …..आज मेमन के पीछे लाखो की भीड़ और कलाम साहब के पीछे ….कुछ सो लोग ..ये क्या है ..एक आतंक वादी तुमारा हीरो है ..और एक रस्त्र्भाग्त से तुम लोग नफरत करते हो ………….क्या यही इस्लाम धर्म है …..

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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