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Oct 24
अब ताप में हाथ मत तापिए!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 2 

चिन्ता की बात है. देश तप रहा है! चारों तरफ़ ताप बढ़ रहा है! क्षोभ, विक्षोभ, रोष, आवेश से अख़बार रंगे पड़े हैं, टीवी चिंघाड़ रहे हैं, सोशल मीडिया पर जो कुछ 'अनसोशल' होना सम्भव था, सब हो रहा है! लोग सरकार को देख रहे हैं! सरकार किसी और को देख रही है! कुत्ते संवाद के नये नायक हैं!


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इस बार अक्तूबर कुछ ज़्यादा ही गरम है. हर तरह से! ताप चढ़ा है. मौसम को भी और देश को भी. दोनों ही लक्षण अच्छे नहीं हैं! वैसे भी मेडिकल साइन्स कहती है कि बुख़ार अपने आपमें कोई बीमारी नहीं! वह तो बीमारी का लक्षण है! बीमारी शरीर में कहीं अन्दर होती है, बुख़ार बाहर दिखता है! अक्तूबर तप रहा है, बीमारी कहाँ है? सबको पता है, पर्यावरण बीमार हो रहा है! किसका दोष? तेरा कि मेरा? किसका कचरा? तेरा कि मेरा? लड़ो! लड़ते रहो! विकास की दौड़ में तुम न रुको, तो मैं क्यों रुकूँ? देखा जायेगा! लेकिन कौन देखेगा? मौसम की आँखें कहाँ होती हैं? वह कुपित होता है तो कब देखता है कि वह किसको मार रहा है?

We all must Act Fast to curb Growing Intolerance in India

कोप आया नहीं कि विवेक गया!

मौसम की छोड़िए, वैसे भी कोप और विवेक एक गली में कभी नहीं समाते. कोप आया नहीं कि विवेक गया नहीं! मरीज़ का ताप भी बढ़ जाये तो सबसे पहले वह होश ही खोता है!

चिन्ता की बात है. देश तप रहा है! चारों तरफ़ ताप बढ़ रहा है! क्षोभ, विक्षोभ, रोष, आवेश से अख़बार रंगे पड़े हैं, टीवी चिंघाड़ रहे हैं, सोशल मीडिया पर जो कुछ 'अनसोशल' होना सम्भव था, सब हो रहा है! लोग सरकार को देख रहे हैं! सरकार किसी और को देख रही है! कुत्ते संवाद के नये नायक हैं!

क्यों इतना ज़हर?

लोग तप रहे हैं. तपाये जा रहे हैं! किसी से दो मिनट बात कीजिए. हिन्दू हैं, मुसलमान हैं, सिख हैं, ईसाई हैं, इस राज्य के हैं, उस राज्य के हैं, यह भाषा बोलते हैं या वह भाषा बोलते हैं, जिसे भी कुरेदिये, थोड़ी देर में भीतर से ज्वालामुखी फूट पड़ता है! हैरानी होती है. इतना ज़हर भर चुका है, भरा जा चुका है लोगों के भीतर!

पढ़े-लिखे लोग हैं. समझदार हैं. अच्छी नौकरियों में हैं. अच्छे बिज़नेस में हैं. भरपूर कमाई है. लेकिन फिर भी ग़ुस्से से खौल रहे हैं! तरह-तरह के ग़ुस्से हैं. तरह-तरह की नफ़रतें हैं. तरह-तरह की कहानियाँ हैं. तरह-तरह की मनगढ़न्त धारणाएँ हैं. इतिहास के झूठे-सच्चे पुलिंदे हैं. इसके ख़िलाफ़, उसके ख़िलाफ़. जिसे देखो किसी न किसी के ख़िलाफ़ दिखता है! हर किसी के पास अपने-अपने निशाने हैं, अपने-अपने 'टारगेट' हैं, जिसे बस उड़ा देना है! यह हो क्या रहा है देश में?

चिनगारियाँ भड़काने का बेलगाम सिलसिला!

अजब माहौल है. पिछले दस-बारह दिनों से कोई पंजाब को फिर से दहकाने के षड्यंत्र में लगा है! उधर, महाराष्ट्र में शिव सेना अपनी विशिष्ट 'लोकतांत्रिक' स्याही से बीजेपी के लिए पाकिस्तान नीति का नया भाष्य लिखने में लगी है! शिव सेना ने बता दिया कि महाराष्ट्र का 'बिग बाॅस' कौन था, है, और रहेगा, सरकार चाहे जिसकी रहे! बीजेपी को अब पता चल रहा है कि सरकार में रहने की मजबूरी क्या होती है? वरना, इसके पहले पाकिस्तान पर कब उसकी भाषा शिव सेना से अलग थी! उधर, गुजरात में पटेल ग़ुस्से में हैं. आरक्षण-विरोध से पूरे देश को तपाने की तैयारी है. और गुजरात सरकार को देखिए. पटेल न भड़कते हों तो भड़क जायें, इसलिए हार्दिक पटेल पर देशद्रोह की धाराएँ जड़ दीं. क्यों? ऐसा क्या किया हार्दिक पटेल ने?

यहाँ आरक्षण का मुद्दा, वहाँ हरियाणा में एक दलित परिवार के दो मासूम बच्चों को ज़िन्दा भून दिये जाने की दिल दहला देने वाली घटना! दादरी में गोमांस की अफ़वाह फैला कर भीड़ का उन्मादी हमला! जम्मू-कश्मीर के एक विधायक का 'बीफ़ पार्टी' देकर हिन्दुओं को मुँह चिढ़ाने की घिनौनी कोशिश, फिर विधानसभा में उसकी पिटाई और दिल्ली में स्याही का तमाशा, एक मुख्यमंत्री से लेकर केन्द्र के कई मंत्रियों तक, कुछ सांसदों से लेकर साध्वियों तक, ओवैसियों से लेकर आज़म ख़ानों तक, चिनगारियाँ भड़काने, खिल्लियाँ उड़ाने और जले पर नमक छिड़कने वाले बयानों का बेलगाम सिलसिला!

जो टोके, वह छवि बिगाड़े!

और कोई रोके-टोके, विरोध जताये, बताये कि देश का माहौल बिगड़ रहा है, सुधारने के लिए कुछ करो, बात सुनो, नहीं सुनते और कुछ नहीं करते इसलिए कुछ लेखक पुरस्कार लौटा दें तो उन्हें देश-विरोधी घोषित कर दो कि वह दुनिया में भारत की छवि ख़राब कर रहे हैं! अद्भुत! तमाम 'धर्म रक्षा' सेनाएँ बारूद सुलगाती रहें, इस-उस अफ़वाह के नाम पर लोगों की जान लेती रहें, 'परिवार' के अख़बार घोर साम्प्रदायिक मिसाइलें दाग़ते रहें, उनसे भारत की छवि नहीं ख़राब होती! छवि तब ख़राब होती है, जब कोई इसके विरोध में बोले!

क्या कर सकती है सरकार?

और फिर पूछा जाता है कि सरकार क्या करे इसमें? सरकार यानी केन्द्र सरकार! क्या मासूमियत है? भोली सरकार को, उसके मुखिया को, सरकार चलानेवाली पार्टी को पता ही नहीं कि वह क्या कर सकती है? या उसे कुछ करना चाहिए! सरकार चेतावनियाँ जारी कर सकती थी. कभी नहीं की. सरकार अपने मंत्रियों और सांसदों पर चाबुक लगा सकती थी. बड़े दिनों तक कन्नी काटे बैठी रही, फिर आख़िर तीन-चार लोगों का समझावन-बुझावन हुआ भी, लेकिन कोई समझा ही नहीं! मनमोहन सिंह से किस मामले में कम मजबूर सरकार है यह? उनकी सरकार में रोज़ मंत्रियों के भ्रष्टाचार के क़िस्से आते थे, मोदी सरकार के मंत्री रोज़ बेहूदे बयानों के गोले दाग़ते रहते हैं, वह सरकार भी कुछ नहीं कर पायी, यह सरकार भी कुछ नहीं कर पायी! अच्छा चलो, सरकार अपने मंत्रियों को नहीं रोक पायी. कम से कम दो-चार सद्भावना रैलियाँ तो हो सकती थीं. सैंकड़ों चुनावी रैलियाँ हो सकती हैं, तो देश के चार कोनों में चार सद्भावना रैलियाँ क्यों नहीं? राजपथ पर योग हो सकता है, तो राजघाट पर सद्भावना उपवास क्यों नहीं? सबको सन्देश जाता कि नहीं जाता कि सरकार क्या चाहती है?

सवाल यही है कि क्या सरकार कोई ऐसा सन्देश देना भी चाहती है! सरकार को भी और लोगों को भी अब सोचना चाहिए कि देश का ताप कैसे घटे? बस कीजिए तेरा दोष, मेरा दोष! अब ताप में हाथ मत तापिए, बल्कि ताप घटाइए! मौसम की तरह समय की आँखें भी नहीं होतीं!

http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi
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  • kushal

    अब बताईये देश को कौन तपा रहा है नक़वी साहब ?

  • kushal

    आजकल देश के साहित्यकारों-लेखकों में सम्मान-पुरस्कार लौटाने की होड़ बची हुई है. बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में देश को यह बताने की कोशिश की जा रही है कि भारत में “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में है”, “लेखकों को दबाया जा रहा है”, “कलम को रोका जा रहा है”… आदि-आदि-आदि. इस सम्मान लौटाने की नौटंकी के बाद कम से कम देश को यह तो पता चला कि “अच्छा!!! इसे भी पुरस्कार मिला हुआ है??”, “अच्छा!!! इसे कब सम्मान मिल गया, लिखता तो दो कौड़ी का भी नहीं है..”. साथ ही इसी बहाने ऐसे सभी सम्मान पुरस्कार लौटाऊ साहित्यकारों की “पोलमपोल” लगातार खुलती जा रही है. इसी कड़ी में एक नाम है वडोदरा के सयाजीराव विवि के भूतपूर्व प्रोफेसर गणेश देवी साहब का…

    गणेश देवी को भी साहित्य अकादमी सम्मान मिला हुआ है, और आपको भले ही जानकारी नहीं हो गणेश देवी साहब को कोई पद्म पुरस्कार भी मिला हुआ है. गणेश देवी ने सिर्फ साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाया है, पद्म पुरस्कार नहीं लौटाया… और अकादमी पुरस्कारों के साथ मिली हुई मोटी राशि मय ब्याज तो लौटाने के बारे में सोचा भी नहीं है. बहरहाल, अब जैसी कि “परंपरा” है, उसी के अनुसार गणेश देवी साहब का एक NGO भी है. NGO का नाम है “भाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर”, बताते हैं कि इस NGO के तहत देवी साहब भारतीय भाषाओं पर काम करते हैं. गणेश देवी साहब प्रभावशाली और अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त लेखक बताए जाते हैं, इसलिए इनका यह NGO विदेशों से भी अनुदान एवं सहायता प्राप्त करता है (यह भी उसी परंपरा का ही एक अंग है). पिछले आठ वर्षों से इनके NGO “भाषा” को लगातार मोटी रकम विदेशों से अनुदान के रूप में प्राप्त होती रही है… लेकिन NGO के बही-खाते के अनुसार इस वर्ष, अर्थात नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद, अर्थात 2014-15 में… अर्थात नरेंद्र मोदी द्वारा विदेशी फोर्ड फाउन्डेशन जैसे संदिग्ध दानदाताओं की नकेल कसने तथा NGOs के खातों एवं खर्चों को अपडेट रखने के निर्देश देने के बाद से इन्हें सिर्फ और सिर्फ 31 लाख रूपए का ही चंदा मिला… “सिर्फ” 31 लाख?? जी हाँ, 31 लाख जैसी मोटी रकम को मैंने “सिर्फ” क्यों लिखा, यह आप जल्दी ही समझ जाएँगे.

    2014-15 के खातों के अनुसार गणेश देवी साहब के NGO को “सिर्फ” 31 लाख रूपए मिले…

    जबकि 2013-14 में “भाषाओं के उत्थान” के लिए इस NGO को एक करोड़ चौबीस लाख रूपए मिले थे, जिसमें से 56 लाख रूपए तो अकेले फोर्ड फाउन्डेशन ने दिए थे…

    उससे पहले 2012-13 में गणेश देवी साहब को एक करोड़ नब्बे लाख रूपए का चन्दा मिला था, इस रकम में भी 55 लाख रूपए फोर्ड फाउन्डेशन ने दिए थे, जबकि नीदरलैंड के एक और संदिग्ध दानदाता ने भी खासी मोटी रकम दान में दी थी…

    सन 2011-12 के रिकॉर्ड के अनुसार देवी साहब के NGO को एक करोड़ 67 लाख रूपए मिले, जिसमें से 42 लाख रूपए फोर्ड फाउन्डेशन ने दिए थे. इसके अलावा “एक्शन होम्स, जर्मनी” ने भी एक मोटी रकम दी है.

    सन 2010-11 में चन्दे की रकम एक करोड़ 99 लाख रूपए तक पहुँची थी. इसमें से लगभग 45 लाख रूपए फोर्ड फाउन्डेशन ने, जबकि 50 लाख रूपए का दान “कैथोलिक रिलीफ सर्विस” नामक संस्था ने दिए थे.

    सन 2009-10 में गणेश देवी साहब को विदेशों से दो करोड़ चौबीस लाख रूपए मिले. इसमें फोर्ड फाउन्डेशन ने 56 लाख रूपए दिए, फ्रांस की एक संस्था ने 66 लाख रूपए वोकेशनल ट्रेनिंग, मोटर रिपेयरिंग, कंप्यूटर खरीदी आदि के लिए दिए, जबकि कैथोलिक रिलीफ सर्विस ने सेमिनार आयोजित करने के लिए सात लाख रूपए दिए थे.

    सन 2008-09 में देवी साहब के NGO को एक करोड़ 55 लाख रूपए मिले थे, जिसमें से 25 लाख फोर्ड फाउन्डेशन ने, जबकि अमेरिका की “एक्शन एड” नामक संस्था ने 46 लाख रूपए का चंदा दिया (सनद रहे कि “एक्शन एड” वही संस्था है, जिसने नर्मदा बचाओ आंदोलन और अरविन्द केजरीवाल के NGO को भी मोटी रकम प्रदान की थी).

    सन 2007-08 में NGO “भाषा” ने एक करोड़ 15 लाख का दान हासिल किया था, जिसमें फोर्ड फाउन्डेशन ने दो किस्तों में 25 लाख और 27 लाख की रकम प्रदान की थी.

    कहने का तात्पर्य यह है कि पिछले आठ साल से लगातार गणेश देवी साहब को विदेशों से एक करोड़, सवा करोड़, डेढ़ करोड़, दो करोड़ जैसे मोटे-मोटे चन्दे मिल रहे थे (भगवान जाने इस रकम का कितना, कैसा और कहाँ उपयोग उन्होंने किया होगा?)… लेकिन बुरा हो नरेंद्र मोदी का, जिनके आने के बाद इसी वर्ष उन्हें “सिर्फ और सिर्फ” 31 लाख रूपए का चन्दा ही मिल पाया, जिसमें फोर्ड फाउन्डेशन ने फूटी कौड़ी भी नहीं दी…

    अब बताईये, ऐसे माहौल में साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाना बनता है कि नहीं?? मोदी ने कुछ साहित्यकारों(??) को ऐसी गरीबी और भुखमरी की स्थिति में ला पटका है, कि वे क्या तो साहित्य रचें, क्या तो भाषा के लिए काम करें और क्या तो खर्चा-पानी चलाएँ और क्या सेमीनार करें?? ज़ाहिर है कि चन्दे में भारी कमी से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में आनी ही थी, फोर्ड फाउन्डेशन को “तड़ीपार” करने से लोकतंत्र का गला घुटना ही है… इससे अच्छा है कि “स्वामिभक्ति” दिखाते हुए पुरस्कार ही लौटा दिया जाए, कम से कम “दानदाताओं” की निगाह में छवि तो बनी रहेगी और देश की जनता भी यह जान लेगी कि वे “सम्मानित बुद्धिजीवी” हैं…

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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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