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Sep 26
संघ क्यों चाहता है आरक्षण की समीक्षा?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 14 

जातिगत आरक्षण ख़त्म होते ही मायावती, मुलायम, लालू जैसे क़द्दावर नेताओं की ज़मीन और राजनीति ही ख़त्म हो जायेगी और इस तरह संघ के रास्ते के कुछ बड़े पहाड़ भी ध्वस्त हो जायेंगे, साथ ही जातीय पहचान अलग रखने के सारे तर्क और कारण भी ख़त्म हो जायेंगे. संघ जानता है कि जातिगत आरक्षण को ख़त्म किये बिना न तो जातीय क्षत्रपों को निष्प्रभावी किया जा सकता है और न ही हिन्दू राष्ट्र की अपील इन समूहों में कारगर हो सकती, जो देश की हिन्दू आबादी का तीन-चौथाई हिस्सा हैं.


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सुना है संघ के पास आरक्षण का कोई नया समाधान है! लेकिन वह समाधान है क्या, इस पर बिहार चुनाव तक फ़िलहाल बिलकुल चुप्पी रहेगी. संघ के एक बड़े नेता इंद्रेश कुमार का ऐसा बयान अख़बारों में छपा है! तो चुनाव बीत जाये, फिर पता चलेगा कि संघ ने आरक्षण का कौन-सा नया फ़ार्मूला ढूँढा है! बहरहाल, अब तो बात साफ़ हो ही गयी! यही कि हार्दिक पटेल का शोशा यों ही नहीं उठ गया था! उठाया गया था! और तैयारी से उठाया गया था. तब उस आन्दोलन को लेकर जो अटकलें लगी थीं कि कौन उसके पीछे हो सकता है, वह यक़ीनन ग़लत नहीं थीं!

Why Sangh wants review of Caste based Reservation?

मोहन भागवत का पहला बयान

और इसलिए अब यह भी साफ़ हो गया है कि आरक्षण को लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत का पहला बयान भी यों ही नहीं आ गया था. बातों-बातों में वह बात निकल नहीं गयी थी, बल्कि सोच-समझ कर बोली गयी थी! अब यह अलग बात है कि लालू प्रसाद यादव की दहाड़ और बिहार चुनाव में नुक़सान की आशंका से बीजेपी ने सफ़ाई से कन्नी काट ली थी कि आरक्षण की समीक्षा का सरकार का कोई इरादा नहीं है! लेकिन संघ का इरादा तो पक्का है! क्योंकि बीजेपी की इस लीपापोती के बाद भी मोहन भागवत कुल्लू में फिर बोले कि आरक्षण पर चर्चा करना कोई बुरी बात नहीं और आज हर जाति और हर वर्ग आरक्षण माँग रहा है, यह हालत क्यों हुई, इस पर सोचना तो होगा. यानी बात बिलकुल साफ़ है. आरक्षण की समीक्षा संघ का नया एजेंडा है!

Economic Status or Caste based Reservation: Real Agenda behind this debate

क्या है राजस्थान का इशारा?

और अब इसी के साथ इस ख़बर को जोड़ कर देखिए कि बीजेपी शासित राजस्थान ने गूजरों को अलग से पाँच प्रतिशत और आर्थिक पिछड़ों को 14 प्रतिशत आरक्षण देने के दो बिल पास किये हैं और तमिलनाडु की तरह इसे भी संविधान की नौंवी अनुसूची में रखने की केन्द्र से सिफ़ारिश की है. यानी इशारा साफ़ है. अगर राजस्थान की तरह कुछ और राज्य ऐसे ही बिल पास करते हैं तो केन्द्र सरकार को उन्हें नौंवी अनुसूची में रखने का तगड़ा बहाना मिल जायेगा! महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण का मामला है ही. गुजरात में पटेलों के आन्दोलन को बेअसर करने के लिए हालाँकि मुख्यमंत्री आनन्दीबेन पटेल ने आर्थिक रूप से पिछड़े युवाओं को शिक्षा में के लिए आर्थिक मदद देने के लिए 'मुख्यमंत्री युवा स्वावलम्बन योजना' की घोषणा की है, लेकिन पटेल आन्दोलन अगर क़ाबू में न आया तो कल को वहाँ भी नये वर्गों को या आर्थिक आधार पर अलग से आरक्षण देने और आरक्षण का कोटा बढ़ाने के बिल पास किये जा सकते हैं. फिर देखादेखी दूसरे राज्यों में भी ऐसा करने की होड़ लगेगी. बीजू जनता दल के बड़े नेता तो पहले ही आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठा चुके हैं. अभी हाल में काँग्रेस के भी इक्का-दुक्का नेताओं ने आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत कर दी है. तो अगर एक-एक करके कई और राज्य राजस्थान की राह पकड़ते हैं तो आर्थिक आधार पर आरक्षण के लिए अच्छा समर्थन भी जुटाया जा सकेगा और फिर यही तर्क लेकर जातिगत आधार पर आरक्षण की मौजूदा पूरी व्यवस्था को ही बदलने की बहस तेज़ की जा सकेगी!

आरक्षण से उपजा नव-सामन्तवाद!

आख़िर संघ को जातिगत आरक्षण (Caste based Reservation) से समस्या क्या है? क्यों अचानक संघ ने आरक्षण की समीक्षा का राग छेड़ा? तर्क दिया जा रहा है कि जातिगत आरक्षण ने दलितों और पिछड़ों में कुछ जातियों के एक नव-सामन्तवाद को स्थापित किया है और अपने राजनीतिक वर्चस्व के कारण यही गिनी-चुनी जातियाँ आरक्षण का पूरा लाभ लूट रही हैं, जबकि आरक्षित वर्ग की तमाम दूसरी जातियाँ आरक्षण के लाभ से पूरी तरह वंचित रही हैं. यह बात बिलकुल सही है और आरक्षण पर अपने पिछले लेख में मैं भी यह बात कह चुका हूँ कि ऐसे उपाय किये जाने की ज़रूरत है कि आरक्षण के लाभ का बँटवारा सही तरीक़े से हो सके. लेकिन सवाल यह है कि क्या संघ भी इसीलिए आरक्षण की समीक्षा चाहता है कि आरक्षण का लाभ उसके सही हक़दारों को मिल सके? नहीं! संघ की मंशा यह क़तई नहीं है!

Caste based Reservation: A big hurdle in the way of 'Hindu Rashtra'

'हिन्दू राष्ट्र' के रास्ते की रुकावट!

दरअसल, संघ का मानना है और उसका यह मानना ग़लत नहीं है कि जब तक जातिगत आरक्षण (Caste based Reservation) की व्यवस्था चलती रहेगी, तब तक 'हिन्दू राष्ट्र' का उसका एजेंडा क़तई पूरा नहीं हो सकता! क्यों? हिन्दू राष्ट्र का लक्ष्य पाने के संघ के रास्ते में जातिगत आरक्षण सबसे बड़ी बाधा है, यह बात समझनी ज़रूरी है. आमतौर पर लोग समझते हैं कि जातिगत आरक्षण से शिक्षा और नौकरियों में अगड़ों के अवसर घटते हैं, इसीलिए संघ जैसे दक्षिणपंथी रुझानवाले संगठन इसका विरोध करते हैं. लेकिन बात इतनी सीधी नहीं है. दरअसल, जातिगत आरक्षण ने तमाम जातीय समूहों को अपने आपको एक अलग पहचान के रूप में स्थापित करने की आकाँक्षा दी और इसलिए उन्होंने अपने-अपने नेता पैदा किये, जो उनके हितों को आगे बढ़ा सकें. इसने देश में एक बिलकुल नये क़िस्म की सोशल इंजीनियरिंग और राजनीति को जन्म दिया. मायावती, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम माँझी से लेकर देश के तमाम राज्यों में छोटे-बड़े जातीय क्षत्रप आज जातिगत आरक्षण से उपजे इन्हीं जातीय समूहों का नेतृत्व करते हैं. ज़ाहिर है कि इन नेताओं का अस्तित्व और प्रासंगिकता तभी तक है, जब तक इनके अनुयायी जातीय समूह अपनी अलग पहचान पर क़ायम रहें. जातिगत आरक्षण (Caste based Reservation) इन समूहों को आपस में जोड़े रखने के लिए फ़ेविकोल जैसा काम करता है.

लस्टम-पस्टम काँग्रेस, बुढ़ाते क्षेत्रीय दल!

अब तक तो काँग्रेस ही संघ के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा थी, लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में हार के बाद से काँग्रेस जिस लस्टम-पस्टम तरीक़े से चल रही है और जिस नेतृत्व-शून्यता की शिकार है, उससे संघ लगभग आश्वस्त है कि काँग्रेस अब शायद ही कोई ठोस चुनौती पेश कर पाये. बच गये देश भर में बिखरे क्षेत्रीय दल. इनमें से ज़्यादातर दलों का नेतृत्व बुढ़ा रहा है और उनके यहाँ दूसरे नम्बर का नेतृत्व शून्य है. संघ को लगता है कि अगले कुछ वर्षों में बहुत-से राज्यों में वह बीजेपी के ज़रिए या तो क्षेत्रीय दलों को हाशिए पर ढकेल देने की स्थिति में होगी या फिर वह उसे चुनौती देने के बजाय उसके साथ आने को तैयार ही हो जायेंगे. लेकिन जातीय आधारित दल, चाहे वह अभी बीजेपी के साथ हों या उसके विरुद्ध, वह कभी भी जातीय राजनीति की अपनी ज़मीन नहीं छोड़ना चाहेंगे और कभी नहीं चाहेंगे कि उनके समूहों की जातीय पहचान ख़त्म हो.

साफ़-साफ़ दिखती मंज़िल!

जब तक जातिगत आरक्षण (Caste based Reservation) रहेगा, तब तक जाति की यह राजनीति चलती रहेगी, जातीय क्षत्रप बने रहेंगे, और तब तक यह अलग-अलग जातीय समूह उन क्षत्रपों के पीछे ही चलते रहेंगे और वह संघ की विराट हिन्दू पहचान के साथ कभी एकाकार नहीं होंगे. जातिगत आरक्षण ख़त्म होते ही मायावती, मुलायम, लालू जैसे क़द्दावर नेताओं की ज़मीन और राजनीति ही ख़त्म हो जायेगी और इस तरह संघ के रास्ते के कुछ बड़े पहाड़ भी ध्वस्त हो जायेंगे, साथ ही जातीय पहचान अलग रखने के सारे तर्क और कारण भी ख़त्म हो जायेंगे. संघ जानता है कि जातिगत आरक्षण को ख़त्म किये बिना न तो जातीय क्षत्रपों को निष्प्रभावी किया जा सकता है और न ही हिन्दू राष्ट्र की अपील इन समूहों में कारगर हो सकती, जो देश की हिन्दू आबादी का तीन-चौथाई हिस्सा हैं. इसलिए बीजेपी फ़िलहाल, अभी कुछ भी कहती रहे, जातिगत आरक्षण को ख़त्म करना संघ का ज़रूरी एजेंडा है. रास्ता क्या होगा, समय कितना लगेगा, यह अभी कहा नहीं जा सकता, लेकिन मंज़िल तो बिलकुल साफ़-साफ़ दिख रही है!

http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi

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  • Laxmirangam

    कृपया लिंक http://www.rachanakar.org/2015/09/blog-post_181.html
    देखें.

  • Prashant Tandon

    सौ फीसद सहमत हूँ आपसे कि ये निश्चित तौर पर जाति आधारित आरक्षण को खत्म करने का संघ-बीजेपी का गेमप्लान है. मंडल के बाद से सवर्ण हिंदुओ का पब्लिक पॉलिसी के इदारो (सरकारी और गैरसरकारी दोनो) और पब्लिक पॉलिसी को प्रभावित करने वाले इदारो (जिसमे मीडिया प्रमुख है) में वर्चस्व लगभग शत प्रतिशत हुआ है. मनमोहन के शासनकाल मे ये बिलकुल इंस्टीट्यूशनल तरीके से किया गया. इसका नतीजा ये हुआ कि सभी नीतिगत मामलो मे पब्लिक स्फीयर में दूसरा दृष्टिकोण है ही नही. ये हिंदू राष्ट्र की ज़मीन तैयार करने का प्रोजेक्ट था. इन सब के बावजूद संघ-बीजेपी-सर्वण के लिये इतना आसान नही होगा. ये बात ठीक है जिनके हाथ मे गैर सर्वण जातियो का नेतृत्व है वो CBI के गुलाम हैं पर बीते सालो में समाजिक स्तर पर ज़बरदस्त चेतना आई है. आप जांच करेंगे तो पता चलेगा कि आज सबसे ज़्यादा अम्बेडकर की या उनपर लिखी हुई किताबे ही बिकती और पढी जाती हैं. ये तो केवल एक छोटी से मिसाल है. आपका लेख वामपंथी पार्टियो को ज़रूर पढना चाहिये.

    • qwn

      धन्यवाद प्रशान्त जी.

  • Handful of Nectar

    AApka ye article bhi poorvagrah se grasit hai.. Aapke har article main sangh ke khilaf kuch na kuch hota hai ya aarakshan ke support m kuch facts hote hain… aapne in dono concepts ko milakar ek jabardast fiction likhne ka kam kar hi diya.. Or ye sansani failane wala dava bhi kar diya ki sangh is desh se aarakshan khtm kar ke desh ko hindu rastra bana dega.. agar aap samyseema bhi bata dete to accha hota.. Jara aap facts ko dekhiye.. kya aap ko lagta hai ki aane wale kam se kam 50 years tak aarakshan hat skta hai ? mera manna hai nahi.. kyunki jo bhi party ye karegi wo satta se jayegi and jo nayi party aayegi wo fir se purani vyavasta chala degi… Or agar aane wale 50 years bad bhi yahi halat rahe to fir yekiska dosh hoga ki samaj main har koi samanta ke level par nahi aaya ? Or is bat ki sameeksha kyun nahi ki jati ki pichle 50 years m aarakshan ka labh kis kis ko mila and samaj ke kitne log mainstream m aaye ? Aap apne article se sansani failane ka kam to kar dete hain par kabhi samadhan ke bare m bat nahi karte.. ye bhi sayad ek agenda hoga… Sangh ke hindu rashtra ki tarah…
    Aaj har koi is samsya ke samadhan ke bare m bat kar raha hai taki aarakshan ka labh deserving candidate tak pahuch sake par kuch logo ko ye rash nahi aata. Unka apna agenda hai ki ek dar or dahsat ka mahual khara khar do nahi to aise logo ki sunega kaun. Yahi kam aapne is article m bakhoobi nibhaya hai. Accha hota aap koi aisa rasta sujhate ki har kisi ke vikash ki rah khulti. Waise meri or aapke ho halla karne se kuch khas fark nahi padne wala system par… Fir bhi man bahlane ke liye aapka khayal bhi accha hai, mera aakrosh bhi accha hai…

    • qwn

      प्रिय Handful of Nectar जी,
      पहली बात यह कि काम से काम यह लेख इस पर नहीं है की जातिगत आरक्षण होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह लेख इस मुद्दे पर घट रही घटनाओं का विश्लेषण करने की कोशिश है कि आज इसी समय इस मुद्दे को इस रूप में उठाने के पीछे क्या उद्देश्य हैं? आप इस विश्लेषण से असहमत हो सकते हैं, लेकिन जहाँ तक RSS की रणनीति और कार्यप्रणाली की मेरी समझ है, उसके अनुसार मेरा निष्कर्ष यही है RSS जातिगत आरक्षण को इसीलिए ख़त्म करना चाहता है क्योंकि उसे लगता है कि जातीय पहचानों और उनके नेताओं को ध्वस्त किये बिना वह हिन्दू राष्ट्र का लक्ष्य नहीं पा सकता.
      रही टाइमलाइन की बात, तो नीचे मोहन भागवत के एक भाषण का वीडियो लिंक दे रहा हूँ. यह भाषण उन्होंने मार्च 2013 में दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था की हिन्दू राष्ट्र का लक्ष्य अगले 30 वर्षों में पा लिया जायेगा और अगर 30 नहीं तो अधिक से अधिक 50 वर्ष में तो हिन्दू राष्ट्र बनना ही है. वह आगे कहते हैं कि अगर इतने वर्षों में हम हिन्दू राष्ट्र नहीं बना पाये, तब तो दुनिया का ही अन्त हो जायेगा , प्रलय हो जायेगा, ऐसा समझो। Link यह है: http://www.youtube.com/watch?v=dKbxEvN5fV8
      अभी पिछले हफ्ते भागवत ने फिर कहा कि अगले 25 वर्ष में भारत में वैदिक संस्कृति पूरी तरह आ जायेगी, हालांकि इस भाषण की वीडियो क्लिप मेरे पास नहीं है, अख़बार में पढ़ा था.

      • qwn

        रही
        बात समाधान की, तो आरक्षण पर लिखे पिछले लेख में मैंने समाधान भी सुझाये थे, शायद आपका
        ध्यान न जा पाया हो. लेख के उस हिस्से को फिर से नीचे दे रहा हूँ. Link भी साथ में
        है:

        http://raagdesh.com/why-india-need-caste-based-reservation/

        जातिगत आरक्षण (Caste based Reservation)….में कई समस्याएँ हैं, जिन पर चर्चा होनी चाहिए और उन्हें दूर किया जाना चाहिए. पहली समस्या तो यही है कि आरक्षित श्रेणी में भी कई जातियों का वर्चस्व हो गया है और सारी मलाई वही खा जाती हैं और बाक़ी जातियाँ पिछड़ती जाती हैं. इसलिए आरक्षण की निगरानी के लिए एक स्वायत्त तंत्र हो, जो यह आडिट करता रहे कि आरक्षण का लाभ सही तरीक़े से सभी जातियों में बँट रहा है. दूसरे आरक्षण और पिछड़े वर्गों से जुड़े मुद्दों पर सारे निर्णय केवल सक्षम स्वतंत्र आयोगों की सिफ़ारिशों पर ही हों, राजनीतिक तंत्र से नहीं, तब वोट बैंक की राजनीति से छुटकारा पाया जा सकता है. अनारक्षित वर्ग में आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए पर्याप्त शैक्षणिक अनुदान देकर उनकी मदद की जा सकती है.

        ‘निकास-प्रावधान’ का सही सुझाव

        सुप्रीम कोर्ट का यह सुझाव सही है कि कोई ‘निकास-प्रावधान’ भी होना चाहिए. समय-समय पर सर्वे और अध्ययन हों और आकलन हो कि कुछ जातियाँ आरक्षण के
        दायरे से बाहर जाने लायक़ हुईं या नहीं या फिर कब तक वह इस लायक़ हो पायेंगी. यह तर्क भी दिया जाता है कि नौकरी में आरक्षण का लाभ मिलने के बाद जो व्यक्ति समान सामाजिक स्तर प्राप्त कर ले, उसे आरक्षण के दायरे से बाहर कर दिया जाना चाहिए. शिक्षा के क्षेत्र में ऐसा किया भी जा सकता है, और ओबीसी में तो क्रीमी लेयर है ही, लेकिन नौकरियों में बाक़ी वर्गों के मामले में ऐसा तब तक नहीं हो सकता, जब तक हम अपने जातीय और सामाजिक पूर्वग्रहों से मुक्त नहीं होते. थोराट और ऐटवेल के अध्ययन का यह स्पष्ट निष्कर्ष है.
        ********

  • Naqvi ji, let digital India show its power by petitioning the government to eliminate all reservation. Reservation creates entitlement and a 68% entitled junta (using Rajasthan as an example). Entitled people are lazy and arrogant. India will never progress with reservation. Modified can talk till he is hoarse about this century belonging to India but that will always be a pipe dream as long as there are caste based politics. I am all for lifting all Indians out of poverty. Why can’t the government say education is free. After that you have to create your own opportunities?

    • qwn

      Lata ji,
      Talk of growth, development and 21st Century certainly looks very rosy but India’s politics is very complex and social structure is much more complex than what we see on the surface.
      I agree that reservation has failed to deliver, it is being politically exploited by politicians and few dominating castes, it has brought several evils, yet it is necessary because our mindset hasn’t changed a bit. Upper castes still have same biases against them and they are much much backward beyond our comprehension.
      I will give you a simple test. Just check how many bloggers belong to SC/ST/ OBC castes and just check how many of them on Facebook. Creating a blog and joining Facebook needs only a mobile phone and internet connection. Then what stops them to join these forums? They have no money like us to waste on such luxuries, nor there are enough educated people among them. Otherwise, if they would have been in this space in ratio of their population, they would have been in dominating majority. But their presence is minimal in this space, that is why we mostly hear anti-reservation talks here. There is no barrier, no competition to start a blog, to join FB, but why they aren’t joining it like us? This is the question.

      Also, in this whole debate the intent is more dangerous and not the issue itself but unfortunately our educated middle class has miserably failed to notice that and the changes being brought by forces of fascism. What Rajasthan did is a clearly mischievous act, not expected from a really pro-people government. This was done only with one objective, to give boost to Anti-Reservation debate.

      The real intent behind raising this debate is something extremely dangerous. Since I have been a very keen watcher of RSS for last 45 years, I know why they are pushing it so badly.

      Unfortunately, our Middle class has become blind because of its aspirations and glitters of hope and it don’t even want to see harsh realities around it.
      Things are happening around us too fast, regressive thoughts are being legitimised with great force and speed and protective shields are being dismantled with rigor. Many people may not be able to foresee and analyse it, but if we fail to stop it now, which we certainly would seeing current euphoria for development, we will see in next 5-7 years how our country silently slipped into age of regression.

      • Naqvi ji, you have given me a great deal to think about and now I am even more worried and increasingly regretting giving BJP my vote. Actually my vote was always more anti-Congress than pro-BJP. Looks like the Indian voting public is caught between a rock and a hard place.

  • i b arora

    मौर्य काल से लेकर आजतक क्या धर्म और राजनीति पूरी तरह अलग रहे हैं? अगर ऐसा हुआ भी होगा तो अपवाद के रूप में?

    • qwn

      प्रिय अरोड़ा जी,
      वह राजतंत्र का समय था, आज लोकतंत्र का दौर है. वास्तविक लोकतंत्र में धर्म लोगों की व्यक्तिगत आस्था का मामला हो सकता है, राज्य का नहीं.
      और जिन देशों ने लोकतंत्र के साथ-साथ राज्य का भी एक धर्म अपनाया, वहाँँ आधुनिक विचार नहीं पनपते और वहाँ लोकतंत्र वास्तविक रूप में है ही नहीं. जैसे पाकिस्तान, जहाँ इसलाम को उन्होंने राष्ट्र के धर्म के रूप में अपनाया, इसलिए वहाँ अल्पसंख्यकों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र है और उन्हें मुसलिम नागरिकों के समकक्ष नहीं माना जाता. या ईरान जहाँ चुनाव होते हैं, लेकिन सत्ता पर धर्म का नियंत्रण है.
      जैसे ही राज्य पर धर्म किसी न किसी रूप में हावी होता है, वैसे ही वह प्राचीन काल को वर्तमान में लाने का प्रयास करता है, नैतिक मूल्यों के नाम पर उन रूढ़ियों को वापस लाने का प्रयास करता है, जहाँ व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है.

      • i b arora

        हमारा लोकतंत्र सिर्फ वोट डाल कर सरकार चुनने तक ही सीमित है, सच्चा लोकतंत्र एक जीवन शैली होता है, जहां सब बराबर होते हैं, यहाँ राजीनीतिक परिवारों की ज़मींदारी चलती है, राजनेता सत्ता पाने के लिए धर्म को भी एक हथियार बनाते हैं, शायद १९८३ के चुनाव थे जम्मू कश्मीर में, शिव सेना ने भी इंदिरा गाँधी का समर्थन किया था क्योंकि जम्मू में हिन्दुओं के मन में नेशनल कांफ्रेंस का भय जगाया गया था. ‘प्राचीन काल’ से ‘वर्तमान’ में आने में अभी देर है.

        • qwn

          आप सही कह रहे हैं. राजनीति में बड़ी बुराइयाँ, लोकतंत्र में बड़ी बुराइयाँ हैं. लेकिन इन्हें हम छोड़ नहीं सकते. इनमें सुधार के लिए जनमत बनाने में जिससे जो हो सके, वह करते रहना होगा.

  • kushal

    स्वतंत्रता से पहले जब देश पराधीन था तब दासत्व के जीवन का बोध आसानी से हो जाता था। अंग्रेज ‘डिवाइड एंड रुल’ की नीति अपनाकर भारतवासियों पर 300 वर्ष तक शासन किये। उन्होंने जाति ,धर्म जैसी चीजों को बारीकी से समझा और हमें बांट दिया। देश स्वतंत्र हुआ पर, अपनों ने आपस में ऊंच–नीच की सीमारेखा खींच दी। ऊंची जाति, नीची जाति की रुपरेखा में जीवन उलझ गया। अहं की भावना ने उच्चवर्ग और निम्नवर्ग को जन्म दिया जिससे दासत्व खत्म नहीं हो पाया। 1882 में महात्मा ज्योतिराव फूले ने शिक्षा सभी तबकों के लिए अनिवार्य करने की मांग उठाई। तब हंटर कमीशन ने इसे अपनी मंजूरी दी। जिससे शिक्षा और सरकारी नौकरी लिए पाने का हक सभी वर्ग को समान तौर पर मिल सके। गांधीजी ने 1932 में ही इसकी पुष्ट नींव रख दी थी। समाज के अंदर पनपे भेदभाव, असुरक्षा और निम्न स्तर के जीवन से छुटकारा पाने की दृष्टि से आरक्षण का जन्म हुआ।

    ब्रिटिशर्स के जाने के बाद भी हमारे बुद्धिजीवी नेताओं के अंदर इस पनपे कांटे को नष्ट करने का ख्याल नहीं आया। बल्कि अंग्रेजों की दी गयी विरासत के पदचिन्हों पर नेतागण देश को बढ़ाते चले गये। स्वतंत्र भारत का संविधान बनाते समय बाबा भीमराव अंबेडकर ने इस बात का बकायदा ख्याल रखा और हरिजन और उससे जुड़े दूसरे वर्गों को आरक्षण का दर्जा लिखित तौर पर मिल गया। आरक्षण ने जहां समाज में फैली असमानताओं को दूर कर निम्न वर्ग को जीने का एक अधिकार सामाजिक स्तर पर दिलवाया। आरक्षण के कारण ही तेजस्वी बच्चों को प्रतिष्ठित स्कूलों में पढ़ने का सुअवसर मिल पाया। मेडिकल, इंजीनियरिंग के कालेजों में जहां हर स्तर के लोगों का पढ़ना संभव नहीं हो पाता वहीं आरक्षण के बलबूते समाज के इस तबके ने अपनी हाजिरी लगवायी और फिर एक स्थान बनाया।

    आरक्षण ने जहां समाज के लोंगों में समानता लाने का अचूक प्रयास है वहीं बाद में इसका दुरुपयोग भी होने लगा। सरकारी कोटा, मंत्री कोटा स्वयं का आक्षरण कोटा के तहत उन लोगों को एंट्री मिलने लगी जो उस योग्य न थे। जो योग्य न थे उन्हें एंट्री दिलाने के नाम पर भ्रष्टाचार का जन्म हुआ। इस तरह धीरे धीरे समाज का दूसरा तबका जिसे जनरल कैटेगरी कहा जाता है समस्याओं से घिर गया। पहले आरक्षण ओबीसी, एस सी एस टी वर्ग को प्राप्त था। जिसमें धोबी, कुम्हार, नाई, मुस्लिम वर्ग और भी कई जातियां शामिल थीं। इनके अलावा आरक्षण उस तबके को देना आवश्यक था जो विकलांग थे अथवा किसी कारण वश विकलांगता के शिकार हो जाते हैं। इसके बाद परिस्थतियां बदलीं और जाट वर्ग ने अपने अधिकार की मांग आरक्षण के तौर मांगी।

    सन 2008 के मध्य में जाट वर्ग ने भारी आन्दोलन किया। तबसे अब तक आन्दोलन जारी है। इसके बाद जैन समाज को भी आरक्षण के दायरे में लाया गया। महिलाओं का आरक्षण बिल 33 प्रतिशत के लिए अटल बिहारी जी की सरकार के समय सदन में पेश हुआ था पर आज तक उस पर अमल नहीं हुआ। हाल ही में अहमदाबाद के 22 वर्षीय हार्दिक पटेल ने पटेल जाति को आरक्षित करवाने का बीड़ा अपने कंधों पर उठा लिया है। इसी तरह 1902 में छत्रपति शाहुजी जो कोल्हापुर के महाराज थे उन्होंने पिछड़ी जातियों के लिए आवाज उठायी और 1902 में ही 50 प्रतिशत नौकरियां कोल्हापुर के प्रशासन में आरक्षित करवायीं।

    जेहन में ये सवाल बार-बार कौंधता है कि भारत जो 300 साल बाद जब आजादी की सांस ले पाया। 68 साल में ही देश की दशा इस कगार पर आ पहुंची है कि देश इतनी जर्जर हालत में पहुंच गया कि हर समुदाय को आज आरक्षण की आवश्यकता महसूस होने लगी है। पहले उच्च जाति के लोगों को हर प्रकार की सुविधा समाज ने दी थी। पर प्रताड़ित वर्ग जिन्हें किसी न किसी तरह उच्च जाति के लोगों ने जीना दुर्भर कर रखा था, आरक्षण के बाद कुछ राहत की सांस ली इस वर्ग ने। किसी भी चीज की अति विनाश का कारण बनती है। मुस्लिम शासक इसी बात का फायदा उठा सके। क्योंकि हिन्दु राजा आपस में अपने तुच्छ हितों की प्राप्ति के लिए लड़ते रहते थे। जिससे एकता का अभाव सर्वव्यापी हो चुका था।

    अब जब देश 21वीं सदी में तकनीकी क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़े चला जा रहा है। वहीं देश में पनपती असुरक्षा की भावना आज हर जाति, समाज और वर्ग को आरक्षण पाने की दौड़ में शामिल होने को मजबूर कर रहा है। जाट, गुर्जर, महिला और अब पटेल सबको शिक्षा, सरकारी नौकरी में स्थान सुरक्षित करवाना है। महिलाओं को शुरु से घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ा। कहीं न कहीं अमानवीय प्रताड़नाओं को सहने के कारण अपनी उपस्थिति को रेखांकित कराने के उद्देश्य से महिला आरक्षण की मांग पनपी। अब समय इस ओर इंगित कर रहा है जहां अब उच्च वर्ग भी आरक्षण की मांग को लेकर धरने पर न बैठ जायें। क्योंकि एससी, एसटी, मुस्लिम वर्ग, क्रिश्चियन, इन सबके बाद शिक्षा हो या नौकरी सीटें ही कहां बचेंगी कि जनरल वर्ग कुछ प्राप्त हो सकेगा।

    सरकार को ऐसी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। आरक्षण में संसोधन का प्रस्ताव ही आरक्षण रुपी काल से देशवासयों को और बड़े पैमाने पर उठी इस क्रांति की आग को बुझा सकता है। आरक्षण नहीं सबको समान रुप से शिक्षा नौकरी की प्राप्ति, उसकी योग्यता के अनुसार होनी चाहिए। देश विकास की सीढियां चढ़ रहा है। ऐसे में देश में विकास और एकजुटता की लहर होनी चाहिए ना कि बंटवारे की आग। एकजुटता देश को आगे ले जायेगा तो बंटवारा चाहे राज्य का हो अथवा आरक्षण के तौर पर इंसान का, खतरनाक ही होगा।

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Posted On 12th Nov 2016 12:35 hrs
मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
त्वरित टिप्पणी
तीन तलाक़ और नयी सोशल इंजीनियरिंग तीन तलाक़ पर फ़ैसले के बाद क्या अब एक नयी सोशल इंजीनियरिंग की शुरुआत होगी? और अगर ऐसा हुआ तो क्या देश की राजनीति में हम एक नया मोड़ देखेंगे? ठीक वैसे ही जैसे मंडल के बाद दलित-पिछड़ा राजनीति के बिलकुल नये समीकरण देखे गये थे. हालाँकि पिछले तीन साल में [..] Read More
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