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Oct 10
कुछ नहीं करना भी एक फ़ैसला है!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 6 

हिन्दू-मुसलमान तो आपस में कहीं भी झगड़ नहीं रहे हैं. बल्कि जो कुछ हो रहा है, वह ईसाइयों और मुसलमानों के ख़िलाफ़ आम हिन्दुओं का ध्रुवीकरण कराने के लिए संगठित तौर पर हो रहा है. 'घर-वापसी', 'लव-जिहाद' से लेकर किसी न किसी बहाने ईसाइयों और मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने, गाँधी-नेहरू को बदनाम करने, गोडसे को पूजने, अन्धविश्वास के विरुद्ध काम कर रहे लेखकों की हत्याओं से लेकर दादरी कांड तक का लम्बा सिलसिला, यह सब क्या कोई हिन्दू-मुसलिम झगड़े थे? क्या इनमें कहीं आम हिन्दू-मुसलमान शामिल थे? तो प्रधानमंत्री किस हिन्दू-मुसलिम झगड़े की बात कर रहे हैं? बात को क्यों घुमा रहे हैं?


Why Narendra Modi not willing to act against Hindutva Extremism- Raag Desh 101015.jpg
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तो प्रधानमंत्री आख़िर दादरी पर भी बोले. मौक़ा गुरुवार को दिन की उनकी आख़िरी चुनावी रैली का था. इसके पहले वह दिन भर में बिहार में तीन रैलियाँ कर चुके थे. गोमांस पर लालूप्रसाद यादव के बयान पर ख़ूब दहाड़े भी थे. 'यदुवंशियों के अपमान' से लेकर 'लालू की देह में शैतान के प्रवेश' तक जाने क्या-क्या बोल चुके थे वह! एक-एक कर तीन रैलियाँ बीतीं, दादरी पर नमो ने कोई बात नहीं की. लोगों ने सोचा कि कहाँ प्रधानमंत्री ऐसी छोटी-छोटी बातों पर बोलेंगे? अब यह नीतीश कुमार के ट्वीट का कमाल था या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहले से तय किया था कि वह नवादा में दिन की अपनी आख़िरी रैली में ही दादरी पर बोलेंगे, यह तो पता नहीं. ख़ैर वह बोले! अच्छी बात है!

Hindutva Extremism: Why PM Narendra Modi is so Evasive?

कहना ही कहना है, या कुछ करना भी है?

हालाँकि अकेले दादरी तो मुद्दा है ही नहीं. दादरी तो महज़ सन्दर्भ भर है, उन सारी घटनाओं का, उन सारे विषाक्त कुचक्रों का, उन सारे हमलावर जुमलों का, जिनका सिलसिला क़रीब एक साल से चल रहा है!

यह केवल संयोग ही है या और कुछ कि पिछले पन्द्रह अगस्त को प्रधानमंत्री ने लाल क़िले से अपने भाषण में अपील की थी कि हमें साम्प्रदायिकता पर दस साल की रोक लगानी चाहिए और ठीक उस भाषण के बाद से ईसाइयों और मुसलमानों को निशाना बनाने की शुरुआत हो गयी!

और अब प्रधानमंत्री ने नवादा में कहा क्या? और जो कहा, वह काफ़ी है क्या? और क्या सिर्फ़ कहना ही काफ़ी है, या कुछ करना भी है? और करना है, तो किसे? जनता को?

Is it Hindu-Muslim Clash or planned Hindutva Extremism?

कहाँ है हिन्दू-मुसलिम झगड़ा?

प्रधानमंत्री जी ने कहा कि वह पहले भी कह चुके हैं कि हिन्दुओं-मुसलमानों को तय करना चाहिए कि उन्हें आपस में लड़ना चाहिए या एक साथ मिल कर ग़रीबी से लड़ना चाहिए? बात तो सही है! लेकिन सवाल यह है कि इस समय देश में जो हो रहा है, क्या वह हिन्दू-मुसलिम झगड़ा है? ज़रा, बताइए कहाँ है हिन्दू-मुसलिम झगड़ा?

हिन्दू-मुसलमान तो आपस में कहीं भी झगड़ नहीं रहे हैं. बल्कि जो कुछ हो रहा है, वह ईसाइयों और मुसलमानों के ख़िलाफ़ आम हिन्दुओं का ध्रुवीकरण कराने के लिए संगठित तौर पर हो रहा है. क्या कारण है कि मोदी सरकार आने के बाद से संघ परिवार और उसके साथ ही हिन्दू महासभा, सनातन सेना या ऐसे ही तमाम दूसरे हिन्दूवादी संगठनों का ज़ोर अचानक बढ़ गया!

Why Hindutva Extremism suddenly increased after Modi Govt came in Power?

बात को घुमा क्यों रहे हैं मोदी जी?

'घर-वापसी', 'लव-जिहाद' से लेकर किसी न किसी बहाने ईसाइयों और मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने, गाँधी-नेहरू को बदनाम करने, गोडसे को पूजने, अन्धविश्वास के विरुद्ध काम कर रहे लेखकों की हत्याओं से लेकर दादरी कांड तक का लम्बा सिलसिला, यह सब क्या कोई हिन्दू-मुसलिम झगड़े थे? क्या इनमें कहीं आम हिन्दू-मुसलमान शामिल थे? तो प्रधानमंत्री किस हिन्दू-मुसलिम झगड़े की बात कर रहे हैं? बात को क्यों घुमा रहे हैं? जैसे उनके मंत्री बात घुमा रहे थे कि दादरी कांड महज़ एक 'दुर्घटना' है!

Modi says People shouldn't pay attention to irresponsible statements of Politicians

राजनेता देते हैं ग़ैर-ज़िम्मेदार बयान: मोदी

और नवादा में जो दूसरी बात प्रधानमंत्री मोदी ने कही, वह यह कि कुछ राजनेता अपने राजनीतिक हितों के लिए ग़ैर-ज़िम्मेदार बयान देते रहते हैं. जनता को इन पर ध्यान नहीं देना चाहिए और नरेन्द्र मोदी भी अगर ऐसी बात कहें, तब भी नहीं. बल्कि जनता को वह बात माननी चाहिए, जो अभी राष्ट्रपति महोदय ने कही. बहुत ख़ूब!

प्रधानमंत्री ने आख़िर माना कि कुछ राजनेता ग़ैर-ज़िम्मेदार बयान देते हैं. जनता उन पर ध्यान न दे! इसीलिए प्रधानमंत्री अपनी पार्टी के कुछ नेताओं के ग़ैर-ज़िम्मेदार बयानों पर कोई ध्यान नहीं देते!

But Why onus on people?

Why not Govt should pay attention to increasing Hindutva Extremism and Sangh Parivar's nefarious designs?

इसीलिए बयानों पर ध्यान नहीं देते प्रधानमंत्री!

इसीलिए जब अशोक सिंहल ने महीनों पहले यह बयान दिया था कि भारत में आठ सौ साल बाद हिन्दुओं का शासन लौटा है, तो प्रधानमंत्री ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया था! उनके तमाम मंत्री और सांसद लगातार ग़ैर-ज़िम्मेदार बयान देते रहते हैं, लेकिन इसीलिए नरेन्द्र मोदी उन पर कभी ध्यान नहीं देते! आख़िर जनता को उन्होंने सीख दे रखी है कि वह ग़ैर-ज़िम्मेदार बयानों पर कोई ध्यान न दे, तो फिर प्रधानमंत्री हो कर वह भला अपनी ही सीख का उल्लंघन कैसे करें?

और चूँकि उनकी पार्टी के नेताओं को मालूम है कि वह कुछ भी बयान देते रहें, पार्टी में कोई उस पर ध्यान नहीं देगा, कोई उनके कान नहीं उमेठेगा, उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होगी, इसलिए वह लगातार ऐसे बयान देते रहते हैं. अब यह जनता की ज़िम्मेदारी है कि वह प्रधानमंत्री की सलाह मानते हुए इन पर ध्यान न दे! समस्या ख़त्म!

क्या कभी कोई क़दम उठाया?

समस्या यही है कि प्रधानमंत्री ने कभी क्या कोई एक भी ऐसा क़दम उठाया, जिससे ग़ैर-ज़िम्मेदार बयानों और घृणा ब्रिगेड के षड्यंत्रों पर अंकुश लग सके? क्या यह मामला इतना गम्भीर नहीं कि प्रधानमंत्री को इसकी चिन्ता करने की ज़रूरत हो?

मामला गम्भीर न होता तो ओबामा को क्या पड़ी थी कि वह एक नहीं, दो-दो बार यह कहते कि भारत में बढ़ रही धार्मिक असहिष्णुता से वह बहुत चिन्तित हैं.

ऐसा नहीं कि तब प्रधानमंत्री इससे चिन्तित नहीं थे. ओबामा के बयान के क़रीब महीना भर पहले ही दिसम्बर 2014 में इस तरह की ख़बरें आयी थीं कि नरेन्द्र मोदी ने संघ को धमकी दी है कि अगर घृणा ब्रिगेड का कारोबार नहीं रुका तो वह पद छोड़ देंगे! इसके बाद संघ परिवार के कुछ संगठन कुछ दिन के लिए शान्त पड़ गये थे.

दिल्ली का वह भाषण!

फिर उसके बाद आपको इस साल फ़रवरी में दिल्ली में ईसाइयों के एक समारोह में दिया प्रधानमंत्री का वह भाषण भी याद होगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि किसी भी धर्म के विरुद्ध किसी भी बहाने की गयी हिंसा हमें बर्दाश्त नहीं है और ऐसा करनेवालों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जायेगी.

भाषण बहुत अच्छा था, तारीफ़ के क़ाबिल था, लेकिन इस स्तम्भकार ने तब भी यह सवाल उठाया था कि प्रधानमंत्री जो कह रहे हैं, क्या वह उस पर अमल करेंगे भी और क्यों उनका यह भाषण बस भाषण के लिए है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं? इस स्तम्भकार की आशंका बिलकुल सही निकली!

Click to Read:भाषण बस भाषण के लिए!

Published on 21 Feb 2015

क्योंकि धार्मिक वैमनस्य फैलाने और बढ़ाने के अभियान तब से निरन्तर जारी हैं, देश के तमाम बड़े अख़बारों में लगातार इन पर चिन्ता जतायी जाती रही है, अकसर महीने में कई-कई बार अख़बारों ने लिखा कि प्रधानमंत्री मोदी को कड़े क़दम उठाने चाहिए, लेकिन सच यह है कि प्रधानमंत्री ने भाषण के सिवा इस बारे में अब तक कुछ भी नहीं किया! हैरानी की बात है न!

क्या बीजेपी वाले भी प्रधानमंत्री की नहीं सुनते?

और अगर उन्होंने वाक़ई कुछ किया है या करने की कोशिश की है, तो और भी ज़्यादा हैरानी की बात है कि बीजेपी और संघ परिवार में उनकी बात क्यों नहीं सुनी जा रही है? क्या प्रधानमंत्री इतने कमज़ोर हैं कि बीजेपी में भी कोई उनकी नहीं सुनता? या संघ के सामने प्रधानमंत्री इतने लाचार हैं कि सब कुछ चुपचाप देखते रहने के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं है. या जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव कहते थे कि कोई फ़ैसला न लेना भी एक फ़ैसला है, क्या मोदी का कुछ नहीं करना भी एक फ़ैसला है?

और नवादा का यह भाषण!

फ़रवरी में दिल्ली के भाषण में तो उन्होंने कम से कम कुछ संकल्प जताया भी था कि ऐसा करनेवालों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जायेगी. लेकिन साढ़े सात महीने बाद नवादा आते-आते तो भाषण से 'कड़ी कार्रवाई' का वह रस्मी संकल्प भी ग़ायब हो गया और देश उन्होंने जनता के हवाले छोड़ दिया कि वह राजनेताओं की उलटी-सीधी बातों पर ध्यान न दे!

यानी उन्होंने साफ़ कर दिया है कि जो चल रहा है, वह वैसे ही चलता रहेगा! नरेन्द्र मोदी क्यों हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना चाहते हैं, यह वाक़ई समझ में नहीं आता!

http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi

इसे भी पढ़ें: दो महत्त्वाकाँक्षाएँ, एक तीर!Click to Read.

Published on 29 Nov 2014

 इसे भी पढ़ें: सेकुलर घुट्टी क्यों पिला गये ओबामा?Click to Read.

Published on 31 Jan 2015
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  • UPENDRA SWAMI

    नरेंद्र मोदी ने यह तय कर रखा है कि वह प्रधानमंत्री की हैसियत से किसी भी घरेलू मुद्दे पर नहीं बोलेंगे, आखिर यह उनका फैसला ही है। उन्होंने सोलह महीने में किसी भी घरेलू विवादास्पद मसले पर अपनी तरफ से कोई राय नहीं रखी- ललित मोदी से लेकर, व्यापमं, दादरी, आरक्षण, ईसाइयों पर हमले, वगैरह, वगैरह। यह काम उन्होंने बाकी मंत्रियों पर छोड़ रखा है, जिन्हें अक्सर पता नहीं होता है कि उन्हें क्या रुख लेना है। गाहे-बेगाहे मोदी केवल कॉरपोरेट धंधे और विदेशी रिश्तों पर राय रखते हैं, वो भी अक्सर विदेशी धरती पर। उनकी दहाड़ केवल भाजपा प्रचारक के तौर पर सुनने में आती है, चाहे वह दिल्ली विधानसभा के चुनाव में थी या अब बिहार विधानसभा के चुनाव में है। रही बात हिंदू-मुस्लिम झगड़े की तो, साफ है- भाजपा केवल उसे गुजरात की शैली में तय करना चाहती है। इसलिए जब मोदी कहते हैं कि देश को दस साल के लिए सांप्रदायिकता पर रोक लगानी चाहिए तो वह गर्व से कह सकते हैं कि गुजरात में उन्होंने पिछले दस साल में कोई दंगा नहीं होने दिया। उनकी राय में हिंदू-मुस्लिम रिश्ते उसी तरह से निबटाए जाने चाहिए, संघ-भाजपा खेमा वही कर भी रहा है।

    • rajeev

      ये नकवी साहेब भी कट्टरपंथी है अभी इन्होंने मेरा पोस्ट delt कर दिए है…जो की एक अचछ पोस्ट था

      • qwn

        प्रिय राजीव जी,
        आपका कोई कमेंट डिलीट नहीं किया गया है. यह Disqus की समस्या है कि कभी-कभी वह कोई-कोई कमेंट कुछ समय के लिए दिखाना बन्द कर देता है और फिर दिखाने लगता है. कई बार तो मेरे ख़ुद के कमेंट के साथ ऐसा हो चुका है.
        ‘राग देश’ में कमेंट के बारे में स्पष्ट नीति है और यह देश की कुछ गिने-चुने ब्लागों में से एक है, जिसने बाक़ायदा अपनी Comments Policy घोषित की है कि किन स्थितियों में किसी कमेंट को डिलीट किया जायेगा. इसे आप Menu Bar में Terms of Use के अन्तर्गत देख सकते हैं.

    • qwn

      धन्यवाद उपेन्द्र जी. आपके विश्लेषण और आकलन से सहमत हूँ.

  • rajeev

    सबसे पहले तो मै आप से ये कहना चाहता हु की नैतिक रूप से मुसलमान का तो हिंदुस्तान है ही नही..उसने तो अपने लिए पाकिस्तान माँगा था और वो पाकिस्तान ले लिया हिंदुस्तान से…भारत दुनिया का पहला देश है जिसका बटवारा धर्म के आधार पे हुआ था..मुसलमान ने अपने लिए पाकिस्तान चुना
    …अब हिंदुसतन हिन्दू का है नैतिक रूप से….

    • qwn

      प्रिय राजीव जी,
      जिन मुसलमानों को धर्म आधारित राज्य में रहना था, उन्होंने पाकिस्तान बनाया और वे वहाँ गये. लेकिन उनसे कहीं ज़्यादा संख्या ऐसे मुसलमानों की थी, जो धर्म आधारित इसलामी राज्य के बजाय सेकुलर गणराज्य में रहना चाहते थे. इसलिए उन्होंने सेकुलर भारत में रहना चुना.
      देश के नेताओं ने भारत को सेकुलर गणराज्य बनाने का फ़ैसला किया था, सारे देश ने उस पर मुहर लगायी थी और इसीलिए वही मुसलमान यहाँ रह गये, जो धर्म आधारित राज्य की परिकल्पना के विरोधी थे.
      हिन्दू राष्ट्र का विरोध इसीलिए है.

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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