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Sep 05
आरक्षण के ख़िलाफ़ हवाई घोड़े!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 14 

क्या हार्दिक पटेल की बात में कोई दम है? क्या आरक्षण ख़त्म कर देना चाहिए या फिर आर्थिक आधार पर देना चाहिए? शहरी मध्य वर्ग का बड़ा तबक़ा हार्दिक पटेल की हाँँ में हाँ मिलाता दिख रहा है? लेकिन आरक्षण के ख़िलाफ़ सारे तर्क काग़ज़ी क्यों हैं? सारी बातें हवा-हवाई क्यों हैं? पढ़िए और समझिए, हवाई घोड़ों का छलावा!


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क्या यह महज़ संयोग ही है कि हार्दिक पटेल ने आरक्षण का मुद्दा तभी उठाया, जब जातिगत जनगणना के पूरे आँकड़े मोदी सरकार दबाये बैठी है? सवाल पर सोचिए ज़रा! जातिगत जनगणना के शहरी आँकड़े तो अभी बिलकुल गुप्त ही रखे गये हैं, और आरक्षण का बड़ा ताल्लुक़ शहरी आबादी से ही है. लेकिन केवल ग्रामीण आँकड़ों का भी जो ज़रा-सा टुकड़ा सरकार ने ज़ाहिर किया है, उसमें भी ओबीसी के आँकड़े उसने पूरी तरह क्यों छिपा लिये? यह नहीं बताया कि कितने ओबीसी हैं? क्यों? ओबीसी के आँकड़े बिहार चुनाव में मुद्दा बन जाते? बनते तो क्यों? ओबीसी के आँकड़ों में ऐसा क्या है, जिसे सरकार अभी सामने नहीं आने देना चाहती! इसलिए क्या यह वाक़ई संयोग है कि ठीक इसी समय गुजरात से ओबीसी आरक्षण को चुनौती दी जाती है?

Do we need Caste based Reservation?

क्या हैं जातिगत आरक्षण के ख़िलाफ़ तर्क?

होने को यह संयोग हो भी सकता है और नहीं भी! लेकिन जितना पैसा, जितना संसाधन, जितनी तैयारी इस पटेल आन्दोलन के पीछे दिखी, उसे महज़ संयोग कैसे मान लिया जाये? क्या यह ओबीसी समुदाय में सिर-फुटव्वल कराने की किसी सोची-समझी योजना का हिस्सा है? वरना गुजरात के पटेलों के मुद्दे को देश भर में ले जाने का क्या मतलब? देर-सबेर सच सामने आयेगा ही, लेकिन फ़िलहाल हार्दिक पटेल कम से कम अपने पहले लक्ष्य में सफल हुए हैं. शहरी मध्य वर्ग का बड़ा तबक़ा उनसे सुर में सुर मिला रहा है. आम आदमी से लेकर 'विशेषज्ञों' और राजनेताओं तक मौजूदा आरक्षण को ख़ारिज करने के तर्क पर तर्क दिये जा रहे हैं. कहा जा रहा है कि 65 साल से आरक्षण पा रही जातियाँ पहले के मुक़ाबले काफ़ी सक्षम और सशक्त हो चुकी हैं. ओबीसी भी पच्चीस साल तक आरक्षण पा चुके? अब कितने और दिन आरक्षण चाहिए? और आरक्षण अगर अब हो तो केवल आर्थिक आधार पर ही हो. जातिगत आरक्षण (Caste based Reservation) तो बिलकुल होना ही नहीं चाहिए. जातिगत आरक्षण का तो 'वोट बैंक' के लिए बहुत दुरुपयोग हुआ. इससे जातियों में विद्वेष और दूरियाँ ही बढ़ी हैं, समाज में खाइयाँ और चौड़ी हो गयी हैं, इसलिए इसे बन्द कीजिए और बस आर्थिक आधार पर आरक्षण दीजिए. जातिगत आरक्षण के ख़िलाफ़ मूल रूप से यही कुछ तर्क हैं.

धारणाएँ नहीं, आँकड़ों पर बात कीजिए

मज़े की बात है कि तर्क तो ख़ूब हैं, लेकिन सारे हवा-हवाई! लोग हवाई घोड़े तो उड़ा रहे हैं, लेकिन अभी तक अपने पक्ष में अब तक एक भी आँकड़ा नहीं दे पाये! यानी जो कुछ कहा जा रहा है, वह केवल कुछ बनी-बनायी धारणाओं के निष्कर्ष हैं! सही विश्लेषण धारणाओं पर नहीं, आँकड़ों और तथ्यों पर होता है. तो ज़रा कुछ आँकड़ों और तथ्यों पर आइए. 2011 की जातिगत जनगणना के घोषित आँकड़ों को ही लीजिए. इसके मुताबिक़ देश के ग्रामीण इलाक़ों में अनुसूचित जाति के 18.46% और अनुसूचित जनजाति के 10.97% घर हैं, यानी दोनों को जोड़ दें, तो कुल 29.43% घर इनके हुए. बाक़ी बच गये सत्तर प्रतिशत में ओबीसी कितने हैं, यह सरकार ने नहीं बताया. लेकिन इसी अवधि में हुए नेशनल सैम्पल सर्वे (एनएसएस 68वाँ दौर) के आँकड़ों से हम संकेत पकड़ सकते हैं, हालाँकि आँकड़ों में थोड़ा फ़र्क़ हैं, फिर भी अन्दाज़ लगाने के लिए वह काफ़ी हैं. उसके मुताबिक़ गाँवों में क़रीब 32% अनुसूचित जाति-जनजाति घर हैं, 44% ओबीसी और बाक़ी बच गये 24% से कुछ कम 'अन्य' हैं. एनएसएस के मुताबिक़ गाँव-शहर मिला कर पूरे देश में 27.5% अनुसूचित जाति-जनजाति, 44% ओबीसी और 28.5% 'अन्य' हैं. तो बन्धु आरक्षण के बावजूद इन 28.5% के लिए 50.5% अवसर तो उपलब्ध हैं! तो ये 28.5% अगड़े पिछड़ों का हक़ मार रहे हैं या पिछड़े इनका हक़ मार रहे हैं? याद रखिए कि इस 'अन्य' में अगड़ी जातियों के अलावा मुसलमान और दूसरे सभी धर्मों के लोग भी शामिल हैं. अगर मुसलमानों को 'अन्य' से अलग कर दें तो अगड़ों का प्रतिशत और भी कम हो जायेगा!

कितने पिछड़े हैं पिछड़े?

अब ज़रा देखिए कि इनमें कौन कितना पिछड़ा है? स्नातक या उससे ऊपर शिक्षा पानेवालों में अनुसूचित जाति के लोग सिर्फ़ 3%, अनु. जनजाति के 3.7%, ओबीसी के 6.2% और अन्य के 15% हैं. इस 'अन्य' में मुसलमान भी हैं, जो शिक्षा में बहुत पिछड़े हैं. उन्हें 'अन्य' से अलग करके देखें तो अगड़ों में स्नातक या उससे ऊपर शिक्षित लोगों का प्रतिशत कुछ और बढ़ जायेगा! तो क्या यह आँकड़े आँखे खोलने के लिए काफ़ी नहीं हैं कि 65 साल आरक्षण के बावजूद पिछड़ा तबक़ा पढ़ाई-लिखाई में अगड़ों से कहीं पीछे है और उसे बराबरी करने में बरसों लगेंगे. पढ़ाई में इतना पीछे हैं तो नौकरियों में कितना पीछे होंगे, इसका अन्दाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है.

सरकारों की चतुराई

और एनएसएस (68वाँ दौर) के मुताबिक़ शहरों में अनु. जाति का प्रति व्यक्ति मासिक ख़र्च 2028 रुपये, अनु. जनजाति का 2193 रुपये, ओबीसी का 2275 रुपये और अन्य का 3242 रुपये था. यहाँ भी 'अन्य' में से मुसलमानों (जो आर्थिक रूप से बहुत पिछड़े हैं) को अलग कर के देखें तो अगड़ों का प्रति व्यक्ति ख़र्च कहीं ज़्यादा आयेगा! सरकारों ने चतुराई से अगड़ों को कहीं अलग करके नहीं रखा ताकि पूरी सच्चाई सामने न आ सके! अब इन आँकड़ों के बाद भी क्या पिछड़ी जातियों के पिछड़ेपन पर कोई सन्देह रह जाता है? तो फिर यह बात किस आधार पर कही जा रही है कि ये जातियाँ अब सक्षम हो चुकी हैं और बराबरी पर आ चुकी हैं!

इस रोचक प्रयोग ने खोली पोल

और आर्थिक आरक्षण से क़तई बात नहीं बनेगी? क्यों? 2007 में दो शोधार्थियों सुखदेव थोराट और पाॅल ऐटवेल ने एक रोचक प्रयोग किया. अंग्रेज़ी दैनिकों में छपे बड़ी कम्पनियों की नौकरियों के विज्ञापन के जवाब में हर पद के लिए उन्होंने तीन बायो-डाटा भेजे. शिक्षा-योग्यता सब समान रखते हुए तीन अलग-अलग नाम से, एक सवर्ण हिन्दू, एक दलित हिन्दू और एक मुसलिम नाम से. सवर्ण हिन्दू के मुक़ाबले बाक़ी दोनों वर्गों के बायो-डाटा पर इंटरव्यू के लिए बहुत कम बुलावे आये (Economic & Political Weekly, October 13, 2007). योग्यता समान रहते हुए भी बाक़ी दोनों वर्ग के उम्मीदवार इंटरव्यू के लिए बुलाये जाने लायक़ भी क्यों नहीं समझे गये? यह एक अध्ययन आर्थिक आरक्षण के समूचे तर्क की चिन्दी-चिन्दी उड़ा देता है!

छलावा है आर्थिक आरक्षण की बात

साफ़ है कि इन पिछड़े वर्गों के विरुद्ध एक अदृश्य पूर्वग्रह काम करता है. इसलिए आर्थिक आधार पर सहारा देकर इन्हें पढ़ा-लिखा भी दिया तो नौकरी कहाँ मिलेगी? देश में कुल छह प्रतिशत नौकरियाँ सरकारी क्षेत्र में हैं और जातिगत आरक्षण न हो तो पिछड़े वर्गों को यहाँ भी नौकरियाँ मिल पायेंगी, इसकी क्या गारंटी है?
ज़ाहिर है कि आर्थिक आरक्षण की बात एक छलावा है और जातिगत आरक्षण (Caste based Reservation) के अलावा और कोई चारा नहीं है. हाँ, यह सही है कि उसमें कई समस्याएँ हैं, जिन पर चर्चा होनी चाहिए और उन्हें दूर किया जाना चाहिए. पहली समस्या तो यही है कि आरक्षित श्रेणी में भी कई जातियों का वर्चस्व हो गया है और सारी मलाई वही खा जाती हैं और बाक़ी जातियाँ पिछड़ती जाती हैं. इसलिए आरक्षण की निगरानी के लिए एक स्वायत्त तंत्र हो, जो यह आडिट करता रहे कि आरक्षण का लाभ सही तरीक़े से सभी जातियों में बँट रहा है. दूसरे आरक्षण और पिछड़े वर्गों से जुड़े मुद्दों पर सारे निर्णय केवल सक्षम स्वतंत्र आयोगों की सिफ़ारिशों पर ही हों, राजनीतिक तंत्र से नहीं, तब वोट बैंक की राजनीति से छुटकारा पाया जा सकता है. अनारक्षित वर्ग में आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए पर्याप्त शैक्षणिक अनुदान देकर उनकी मदद की जा सकती है.

'निकास-प्रावधान' का सही सुझाव

सुप्रीम कोर्ट का यह सुझाव सही है कि कोई 'निकास-प्रावधान' भी होना चाहिए. समय-समय पर सर्वे और अध्ययन हों और आकलन हो कि कुछ जातियाँ आरक्षण के दायरे से बाहर जाने लायक़ हुईं या नहीं या फिर कब तक वह इस लायक़ हो पायेंगी. यह तर्क भी दिया जाता है कि नौकरी में आरक्षण का लाभ मिलने के बाद जो व्यक्ति समान सामाजिक स्तर प्राप्त कर ले, उसे आरक्षण के दायरे से बाहर कर दिया जाना चाहिए. शिक्षा के क्षेत्र में ऐसा किया भी जा सकता है, और ओबीसी में तो क्रीमी लेयर है ही, लेकिन नौकरियों में बाक़ी वर्गों के मामले में ऐसा तब तक नहीं हो सकता, जब तक हम अपने जातीय और सामाजिक पूर्वग्रहों से मुक्त नहीं होते. थोराट और ऐटवेल के अध्ययन का यह स्पष्ट निष्कर्ष है.
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  • Laxmirangam

    Dear Sir,

    I am not in a position to agree with you in this subject. Kindly think on the issue who got benefitted by reservations so far. SC/ST and OBC/EBC have their status as it is , Those who were benefitted are still gathering the benefits notwithstanding the status. I am failing to understand that an erudite of your stature says caste based reservation is still the need of the day. Why should not the govt or so called agencies support by all means – money and facilities all those deprived and bring them at par with the general mass. reducing the qualifying criteria only brings down the stature and quality of the society besides all. Let all those needed individuals be supported but not across the board – as a class. No one chose hi scaste for taking birth. Then why are we differentiating. Its not by choice I am born to my parents. Kindly re think on your views. It is the policy , and more to it, is implementation which is faulty. Today you see the stature of a general candidate… no use studying graduation no jobs are left for them . I have many of my relatives and frioends’ wards to quote for.

    • qwn

      Dear Mr. Laxmirangam,
      If you read my article again carefully, you will get all your answers. Please see the research experiment done by Thorat and Attewell in 2007, which I quoted in the article. There is huge bias against backward communities which clearly showed up in Thorat & Attewell experiment where reputed companies didn’t show interest in calling those candidates for even interviewing them despite they have equal merit, skill set and qualification.
      This means that Economic Reservation can give them education but still they may not get jobs because of bias against them. The situation still very much persists. Therefore, jobs can only be assured through caste based reservation.

      • Laxmirangam

        Dear Sir,
        Yes, I have seen the portion you quoted. It is the implementation part of the reservation. In our country it has always been so dramatic.ONLY Our people successfully design all over the world, even in Nasa, Microsoft, face book all ove – but when they design in the country the design fails why ??? only because the implementation is poor. Even today the way the existing reservation policies are implemented you may see that the general quota goes to SC/ST but not vice versa. Inspite of their candidates getting qualified in regular course, the exclusive reseved seats are separately filled. Say panelist at No. ! is ST and may be 3or 5 is SC – notwith standing anything. A general candidate even if gets more than an ST he can’t occupy Srl No.1. and so on. Ultimately it turns out that the reserved candidates occupy seats ( portion) more than the designated quota – thereby eating away the seats meant FOR GENERAL CANDIDATES. I am sure quite much issues will get resolved ONLY if implementation is done as per the policy . It is the middle men who create many issues. Moreover the creamy layer issue is the most heart burning one. Principals gets reservations for their wards notwithstanding the stature. An SC/ST MLA/MP/ Agriculturist, businessman and even industrialist gets reservations for their wards… on what account… just because they are born in a specific caste??? did they select it??? what is the mistake of a poor brahmin for not getting the reserved seat??? DO you have responses sir???

  • vaibhav

    Not agree with the assembling of figures….. When you are talking about reservation it CAN NOT be linked by total population… Reservation is a totally education and job linked matter….so if any population which is more educated, as said above 15%, it gets space In 50.5% of total Requirement And on other side the 3-8% educated onces are getting remaing reserved for them.
    The others that are 28.5% of total population are 15% educated i.e. 4.27% where as on other side remaining 71.5% are 3% educated i e. 2.14%. Almost half of the other once. And getting 49.5% reservarion.
    So, to cover the lack of education they are benefited by reservation but after 25 years of the schem they are taking it as a enjoyment of getting less population share educated.

    • qwn

      Dear Mr. Vaibhav,
      You are ignoring one big fact in your logic. SC/ST in almost all cases and OBC in most cases are dependent on government service, while all lucrative private jobs go to only general category. Therefore the general category has 50.5% share of government jobs plus more than 90% of all private jobs assuming that may be 10% OBC getting chance in private jobs though I don’t have any data on this. But I think my this estimate is not much far off from reality.

      • Laxmirangam

        Sir, I beg to differ here. Make a survey of private jobs for data caste wise and you will be proved wrong. And if done seoparately even in Govt sector it will all be the same.

      • vaibhav

        Thnks for your reply sir,
        But how can we drag private sector in this discussion of reservarion, its a matter of deciding the basis of giving the part of nation’s bread to SC/ST/OBC classes.
        And my concen is that how can we ignore there education ratios to give them reservation. As the root cause of there backward ness is there low education ratio which need to be improved.
        And slowly the governmet needs to remove this quition of reservation and other benefits from the future generation of these classes who succed to cover from there financial backwordness (like the officers from these casts are in good govt. Service/deptt.)

        Regards

      • JD

        What the source. And if u have no source u can’t talk on that.let’s hope that ur assumption is right then please sher the disadvantage of reservation on the society

  • Handful of Nectar

    How someone can say that the reservation system is correct? I feel disappointed after reading this. reservation should be given to those who are economically backward. When you talk about cast and creed then there is a hidden political move. If a person belongs to general category it does not mean that he is rich or super intelligent. And there is anger among those who are working hard to make their future bright but are being kicked out just because of this reservation system. Sooner or later this situation will be out of control. Why govt gives reservation at each and every step from education to promotion in job. You do not know how hard people are working to get good college and good govt job and when their right is taken away on the name of reservation how bad they feel. I have been victim of this situation so know it better. But still for past so many years people are quite.

    And if people of general category are in private sector, it’s because they work hard to get their place there.I guess you will also support for reservation in private sector. This all situation should be changed. But when you put these facts ahead and play dirty reservation game behind these facts it hurts.

    • qwn

      Sorry for responding you late. Was a bit occupied.

      But it seems that you didn’t read carefully my article, which has all the answers for points you have raised. Lets take it again.

      1. A comparison between SC/ST/OBC and General category can not be done because they grow up and interact within society in entirely different circumstances and environment, which you have never faced. Have you ever realised that how many SC/ST or OBC bloggers are there in blogosphere? At least 3-6% of those are educated upto degree level or above, then what prevents them to come and do blogging like you? It doesn’t need any money to start a blog except an internet connection and anyone can blog without any hindrance and competition, still their presence is minuscule? Why? Because of social backwardness, which you can never comprehend? So, if they can’t equal you in a minor activity like blogging, how can we expect them to equal and compete forward classes?

      2. Also, Do you have any person from these backward communities in your friend circle, with whom you move socially like your other upper caste friends? If not, why? Hope, you will give an honest answer. If you don’t have any such friends, it is because none of them could have reach to that social status which could have brought them in to your circle like your other friends. This is due to social backwardness.

      3. Therefore, they can come to equal status only if social barriers against them are dismantled and this can happen only if we can stop caste biases. Can we?

      4. Indian society is predominantly caste based and can not get rid of its caste biases. So, if two candidates of equal eligibility appear before a selection board, what guarantee is there that the candidate will not be selected/ rejected on the basis of caste. And here comes the reservation, which ensures that caste biases do not prevent selection of socially backward communities.

      4. Reservation comes into play in government jobs only, which is declining fast post liberalization in 1991 and more than half of this 17.1 million government jobs constitutes menial jobs like sweepers, peons etc. Therefore white collar middle class govt jobs are only around 9 million where upper caste people want to be employed. Of this, 49.5 % is reserved for backward castes which have more than 70% share in population and 50.5% goes to upper castes with less than 20% share in population. A very small portion of this is shared by other communities like Muslims, Christians etc. And after that almost all private sector jobs go to General Category candidates. in 2011 around 11.5 million jobs were in Private Sector. Though we don’t have exact data of available number of white collar jobs in private sector, but we can safely say that almost 40% of this may fall under White collar jobs. That means that additional 4 or 4.5 million plum jobs are solely available for general category. So why this noise against reservation?

      5. The problem which economically weaker section of general category faces, is solely related to education which has become extremely expensive after privatisation. Government must give enough subsidy and open more government owned institutes to solve this problem.

      6. Yes, it is right that current reservation policy is gravely misused by certain classes of backward communities and also by Politicians for Vote bank Politics. There are several loop-holes in the policy. These things must be corrected and steps should be taken to correct that. We should discuss them. But if we had faulted with systems which we created, that doesn’t mean that the system is bad and should be discarded completely. By that logic, we should not have Police which has become corrupt beyond any scope of reform! And so we should disown Democracy too? Everyone know how deep corruption is in our political sphere and there is no chance that we can ever get rid of that. But is it the right thing to do? Obviously no. The right thing is correct the system.

      • Handful of Nectar

        (1)The criteria of comparison
        you have used is not correct. People are either rich or they are poor. A rich
        person will provide good education to his/her children and a poor will not be
        able to do so. It’s very simple and
        understood fact and no one can deny it. Now a poor can belong to any cast or
        creed. We are not supposed to see them through the lances of cast or creed
        always. If we are doing so then we are not solving the problem we are only making
        the situation worse. And we do not have cast wise data of bloggers and it’s not
        appropriate to ask bloggers to mention their cast. Since here we all are same
        and our cast or creed does not make any sense.
        In each technical college (Since I have no idea about non-technical
        colleges I am not sure about those colleges but I guess there are also reserved
        seats ) there are seats for people belonging to SC/ST/OBC category and they get
        all their education for free. Coming to this point you must know many people
        get seats in good colleges even having very few marks just because of this
        reservation system and many of those students leave their education in midway
        thus spoiling govt resources and future of any needy student. You must know
        according to a study if any candidate from reserved category does not attempt
        even a single question in CAT exam he/she can still get a seat in IIM or in any
        other top class business school. Do you think this is right? If any particular
        section of society is weak then govt should help it in getting good education
        and I do not think reservation is necessary for it. All we need is awareness and
        to help those who are economically weak not those who belong to any particular
        cast. And once they are educated let them fight the competition. Now you may
        ask that certain people are getting good coaching how those students will
        compete with them. The answer is very simple, it’s hard work.

        (2)I have friends
        belonging to different communities of society. When you have asked me about
        having any friend from socially backward class it’s like you are making fun of
        me or you have any perception about my views. Even answering this question is
        very shameful coz I am dividing my own friends according to their cast or
        creed. I have respect for them as much as I should have for any other human being
        irrespective of cast and creed. When you use these words like “social status”,
        “backward class” you start dividing people.

        (3)I accept that the cast and creed system is
        not going to end soon. But reservation is not answer for sure. Cast wise
        reservation will only make situation worse. While reservation based on economic
        condition of a family may help to attain same economic level for each and every
        individual and that will be better situation then the present situation. If
        most of the people of the society will be on same prosperity level it will be
        easier to fill the gap of cast and creed system. So first thing we have to
        remove is the poverty.

        (4)I have not seen any such situation ever and
        neither had I had any advantage just because of my cast. And since you are claiming
        here that Indian society cannot get rid of this caste biases it means you have
        already lost hope and you are not willing to find a solution. If a person is
        talented he/she does not need any certificate from any one and he/she will find
        his/her own way. And your perception about selection based on cast system in
        any interview is awful and shows your antipathy towards a particular section of
        society.

        (5)A job is never menial. People from general
        category are also doing those jobs which you have declared as menial job. And I
        guess here we are talking about only Govt jobs, so private sector is out of context and
        since it is open for all so only the best will survive irrespective of cast of
        creed and why people of so called backward class cannot work in private
        industry ? Please do not tell me again that because of their cast they will not
        be selected. This is the most awful excuse I have ever heard. And just because
        a person belongs to a certain cast we cannot give them advantage of it at each
        and every step. Help them to get good education till 12th level and
        support them to get coaching facility but let them fight for themselves. I have
        seen people who were not able to pass school exams and today they are enjoying
        Officer class jobs just because of reservation system and I have seen poor but
        intelligent people from general class who are doing comparatively menial(as you
        said) jobs. The problem is that you have not gone out and examined situation,
        you got inputs from certain sources and you are talking on behalf of those figures,
        and I am seeing the situation on ground for past many years. Sitting in your
        room and writing about such topics is relatively easier job then facing the
        pain of losing your chance of getting a good college or job.

        (6)Education is not an issue. People from govt
        schools are also doing very well in their life. I have got my education from
        Govt School and it was good. Although there were fewer facilities but we all
        have to fight for our future. And due to this reservation system many bright
        students are losing their chance in good colleges it is not acceptable. If
        someone is working hard to get a good college after 12th and does
        not get it just because seats are reserved it is not justified. By the way I have
        faced this situation. And govt is providing subsidy to the student of backward
        class in higher education then why they need reservation at the time of
        admission as well? They are getting reservation as well as subsidy and for poor
        people of general class you think only subsidy is sufficient. Is it not biased opinion?

        (7)This whole idea of reservation is stupid.
        You are giving reservation to a particular group within the so called backward
        class. Not all of them are getting reservation and those who are taking benefit
        of this system for past so many years are still taking it on the name of those
        who are still poor and backward. This cycle will never end since there is flaw
        in the implementation of the reservation system. It’s not the mistake of the
        general category people but its mistake of govt and for their mistake why
        people of general category has to suffer? Make reservation on the economic
        condition based and seethe results.

        I have
        always believed in idea of fair competition and I believe that the best will
        always survive. This reservation system does not stop or support anyone to
        achieve anything in life. But for general category people it makes competition
        tough at each and every step. From getting a good college to till promotion in
        job and you cannot justify it because you are snatching their right to grow.
        Yes certain people need help, help tem but it should be economic based. And if
        soon this situation will not be handled the situation will go out of control.

  • MKS

    सर,

    आरक्षण से जुड़ी सारी बहस के दो आयाम हैं। पहला, किसे और क्यों आरक्षण और दूसरा, अवसरों की कमी से जूझते समाज में आरक्षण से पनपा असन्तोष। आपने पहले आयाम की तो बहुत सार्थक समीक्षा कर दी लेकिन दूसरा आयाम अभी छूट गया। शायद, आगे कभी आप उस पर लिखें।

    मुझे लगता है कि पहले आयाम का निचोड़ ये है कि “गाँव-शहर मिला कर पूरे देश में 27.5% अनुसूचित जाति-जनजाति, 44% ओबीसी और 28.5% ‘अन्य’ हैं. तो बन्धु आरक्षण के बावजूद इन 28.5% के लिए 50.5% अवसर तो उपलब्ध हैं! तो ये 28.5% अगड़े पिछड़ों का हक़ मार रहे हैं या पिछड़े इनका हक़ मार रहे हैं?” ये तथ्य अकाट्य हैं। लेकिन ये कैसी व्याख्या है कि 28.5% के लिए 50.5% अवसर हैं तो कैसे ‘अगड़ों’ का हक़ ‘पिछड़े’ मार रहे हैं? इस तर्क से तो हमें ये नीति बना देनी चाहिए कि आबादी में जिस तबके की जितनी हिस्सेदारी होगी, उसे उसी अनुपात में आरक्षण मिलेगा। उस फ़ार्मूले को नयी समाजशास्त्रीय व्यवस्था का नाम दिया जा सकता है। ऐसी व्यवस्था का विचार तो शायद उस वक़्त भी बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर के ज़हन में आया होगा, जब वो संविधान बना रहे थे।

    तो फिर ऐसा किया क्यों नहीं गया? इसीलिए न कि हमें दो लक्ष्य हासिल करने थे। एक आरक्षण के ज़रिये पिछड़ों को आगे लाया जाए और दूसरा अनारक्षण की बदौलत योग्यता को भी सम्मान मिले, उसे ‘समुचित’ अवसर भी मिलते रहें। सारा बवाल इसी ‘समुचित’ को लेकर खड़ा होता रहा है। पहले भी और आज भी। आपने भी इस ओर इशारा किया है कि सरकारी क्षेत्र में 6% से ज़्यादा नौकरियाँ नहीं हैं। तो समाधान क्या है? सरकारी क्षेत्र को कोई भी राज-व्यवस्था असीमित नहीं बना सकती। वो ज़्यादा से ज़्यादा बेरोज़गारी भत्ता ही दे सकती है। जैसा कि कुछ सम्पन्न देशों में होता है।

    लिहाज़ा, सरकार को दो मोर्चों पर बड़े पैमाने पर काम करना होगा। पहला, शिक्षा के क्षेत्र में तरह-तरह के पाठ्यक्रमों में सीटों की संख्या या अवसर इतने ज़्यादा बढ़ाये जाएँ कि एक ख़ास स्तर की योग्यता रखने वालों को मायूस न होना पड़े। दूसरा, सरकारी क्षेत्र की नौकरियों जैसी सामाजिक सुरक्षा और वेतन-भत्तों की व्यवस्था ग़ैर-सरकारी क्षेत्रों पर भी सख़्ती से लागू हो। यदि ऐसा होने लगेगा तो सरकारी नौकरियों के लिए वैसी मारा-मारी नहीं होगी, जैसी कि आज दिखायी देती है।

    ये आलम किससे छिपा है कि ग़ैर-सरकारी क्षेत्र में रोज़गार की शर्ते कैसी हैं? ये सही है कि सरकारी क्षेत्र की तरह ‘टिकाऊ’ रोज़गार दे पाना ग़ैर-सरकारी क्षेत्र के लिए सम्भव नहीं है। लेकिन Hire & Fire की जैसी निरंकुश छूट उन्हें हासिल है, उससे भी सामाजिक ताना-बाना बहुत बिगड़ जाता है। वो आज भी मध्यकालीन सामन्तवादी तौर-तरीक़ों से चलना चाहते हैं। श्रम क़ानूनों को ‘अपनी प्रगति’ में बाधक मानते हैं। ग़ैर-सरकारी क्षेत्र में विचित्र तरह की महामारी है। उसे भी तो सरकारी क्षेत्र के माध्यम से ही दुरुस्त किया जा सकता है।

    उधर, अगड़ों में भी इस बात की जागरूकता फैलाना बहुत ज़रूरी है कि उनको 50.5% अवसर मिलते हैं, जबकि उनकी आबादी 28.5% ही है।

  • kushal

    नक़वी साहब आपने इस लेख में एक शोध का हवाला दिया कि किस तरह अगड़ी जाति वालों को मौक़ा पहले क्यों दे दिया जाता है

    मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ फिर क्यों आरक्षण को अम्बेडकर ने इसको १० सालों तक लागू करने की सीमा रखी ? फिर क्यों सुप्रीम कोर्ट और अन्य दूसरी अदालतें कहती हैं कि आरक्षण को समाप्त हो जाना चाहिए ? क्या ये जातियों को आपस में नहीं लड़ाता ?क्या आरक्षण की आड़ में गन्दी राजनीति नहीं होती ? क्या आरक्षण की वजह से युवा देश छोड़ कर नहीं जा रहे ?

    इसमें क्या हर्ज़ है कि आरक्षण का आधार जातिगत ना होकर आर्थिक होना चाहिए ?

    और सबसे बड़ी बात क्या आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू हो गया तो पिछड़े और दलित आरक्षण से वंचित हो जायेंगे ? बल्कि देश के अंदर समानता की भावना आएगी . क्या ये ग़लत है ? और इतने सालों के बाद आरक्षण देने के बाबजूद अभी दलितों और पिछड़ों की आर्थिक स्थिति नहीं सुधरी है तो क्या आरक्षण की समीक्षा की आवश्यकता नहीं ? एक सिर्फ हमारा देश है कि कि देशवासियों में पिछड़े बनने की होड़ मची हुयी है और जल्दी ही जो सवर्ण जाति के लोग पिछड़ जायेंगे फिर उनको भी अगले सौ सालों के लिए आरक्षण मिलने लगेगा . क्या ये हास्यपद स्थिति नहीं होगी ?

  • arun kumar

    RESERVATION k khilaaf jesse log he vesse apni jaatigat vishist ta or usse unhe jo janam jaat aarakshan milta he uske khillaf kyu nahi he…………

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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