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Nov 14
मोदी जी, काला धन यहाँ है!
त्वरित टिप्पणी  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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नोटबंदी, बेनामी सम्पत्ति या सोने की पकड़-धकड़ तो महज़ नुमाइशी कार्रवाइयाँ हैं, उससे धारदार विज्ञापन बनेंगे, जनता लट्टू हो जायेगी कि वाह सरकार क्या लाजवाब काम कर रही है, छोटे-छोटे मेंढक और छोटी-छोटी मछलियाँ मर जायेंगी, लेकिन घड़ियाल, मगरमच्छ और बड़ी-बड़ी शार्क का बाल भी बाँका नहीं होगा. सब जानते हैं कि वे लोग कौन हैं, जिन्हें इन सब ऑपरेशनों से खरोंच भी नहीं लगेगी!


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तो प्रधानमंत्री ने साफ़ कर दिया है कि काले धन के सफ़ाये को लेकर वह वाक़ई बेहद गम्भीर हैं. नोटबंदी महज़ शोशा नहीं है. अगला निशाना बेनामी सम्पत्तियों पर होगा. और सिलसिला यहीं नहीं रुकेगा. प्रधानमंत्री का कहना है कि भ्रष्टाचार और काले धन के ख़िलाफ़ उन्होंने कई और 'प्रोजेक्ट' सोच रखे हैं. बड़ी अच्छी बात है. ऐसी मुहिम ज़रूर चले, ज़ोरदार तरीक़े से चले और लगातार चले. लेकिन सोच-समझ कर चले, सूझ-बूझ के साथ चले और इस तरह न चले कि सारे के सारे देश को चक्की में बेमतलब पीस दिया जाय. और वहाँ चले, जहाँ जड़ है. पत्तों और टहनियों को काटने से पेड़ सूखता नहीं है, बल्कि कँटाई-छँटाई से और भी मोटा-तगड़ा हो जाता है. किसी भी बाग़बानी वाले से पूछिए, यही बतायेगा.

नोटबंदी पर बड़े सवाल

नोटबंदी को लेकर बड़े सवाल उठे. बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों ने उठाये. क्योंकि काले धन के सफ़ाये के मामले में यह नुस्ख़ा अब तक हर जगह फ़ेल रहा है. अपने यहाँ भी, और पड़ोसी म्याँमार और श्रीलंका में भी. तो इस बार कैसे सफल होगा, यह सवाल उठना लाज़िमी है? सवाल यह भी है कि नोटबंदी ने अगर करेन्सी के रूप में मौजूद काले धन को नष्ट भी कर दिया, तो उससे भी क्या होगा? करेन्सी में तो कुल काले धन का राई जैसा मामूली हिस्सा ही रहता है. वह नष्ट हो जायेगा, लेकिन अर्थव्यवस्था में काले धन का जो पहाड़ बन चुका है और लगातार बनाया जा रहा है, वह कैसे ध्वस्त होगा? और यह कैसे माना जाये कि नये नोट आ जाने के बाद फिर से काले धन का गोरखधन्धा वापस क्यों नहीं शुरू हो जायेगा?

War on Black Money : Now 'Surgical Strike' on Benami Properties and probably on Gold too!

बेनामी सम्पत्ति के बाद क्या निशाने पर सोना भी?

लेकिन गोवा में प्रधानमंत्री ने इशारा कर दिया कि वह काले धन पर लगाम लगाने की एक बड़ी योजना पर काम कर रहे हैं. नोटबंदी उसकी शुरुआत है, अगला वार बेनामी सम्पत्तियों पर होगा. ऐसी कार्रवाई का स्वागत है. सबको मालूम है कि काले धन को खपाने के दो आम रास्ते हैं, बेनामी सम्पत्ति और सोना. तो क्या बेनामी सम्पत्ति के बाद सोने का नम्बर भी आनेवाला है? और क्या अब भी सोना काले धन को खपाने का सुरक्षित साधन बना रह सकता है? मुझे लगता तो है कि अगला वार शायद सोने पर ही होगा. जिन्होंने सोने की शक्ल में काला धन रखा है, यह सवाल वाक़ई उन्हें परेशान करने वाला है.

लेकिन चोट सिर्फ़ छोटी मछलियों पर!

अगर ऐसा होता है, तो काले धन के धन्धे पर बड़ी चोट पड़ेगी. स्वागत है. यह चोट ज़रूर की जानी चाहिए. लेकिन इसमें एक बड़ा पेंच है. काले धन को खपाने की ये दोनों जो तरकीबें हैं, वह बस छोटी मछलियों के काम की हैं. जिनके पास कुछ लाख या कुछ करोड़ तक का, शायद ज़्यादा से ज़्यादा सौ-दो सौ करोड़ का काला धन है, वही लोग इस तरह अपना काला धन छिपा सकते हैं. क्यों? आख़िर सम्पत्तियों को बेनामी ख़रीदने और उन्हें सहेज-सम्भाल कर गुपचुप रखने की एक सीमा होती है. कोई कितनी सम्पत्तियाँ ख़रीद लेगा और उन्हें छिपाये भी रहेगा? इसी तरह कितने करोड़ का सोना आप जमा कर लेंगे, उसे ऐसे कहाँ रखेंगे कि सुरक्षित भी रहे और किसी को नज़र भी न आये.

नोटबंदी के साथ भी यही समस्या है. करेन्सी में तो उतना ही काला धन रहता है, जिसे खपाने का इन्तज़ाम तब तक न किया जा सका हो. इसीलिए करेन्सी को 'स्वच्छ' बना देने से काले कारोबारियों को तात्कालिक झटका तो लगता है, लेकिन उनका धन्धा नहीं रुकता, कुछ समय बाद वह फिर चालू हो जाता है.

Strike on ill gotten money is great, but War on Black Money must also aim Real Targets!


इसलिए नोटबंदी, बेनामी सम्पत्ति या सोने की पकड़-धकड़ तो महज़ नुमाइशी कार्रवाइयाँ हैं, उससे धारदार विज्ञापन बनेंगे, जनता लट्टू हो जायेगी कि वाह सरकार क्या लाजवाब काम कर रही है, छोटे-छोटे मेंढक और छोटी-छोटी मछलियाँ मर जायेंगी, लेकिन घड़ियाल, मगरमच्छ और बड़ी-बड़ी शार्क का बाल भी बाँका नहीं होगा. सब जानते हैं कि वे लोग कौन हैं, जिन्हें इन सब ऑपरेशनों से खरोंच भी नहीं लगेगी!

काले धन के असली पहाड़ कहाँ खड़े हैं?

नोटबंदी को बचकानी तीरन्दाज़ी बताने वाले मेरे पिछले लेख से कुढ़ कर मुझसे बहुत-से लोगों ने पूछा कि आप ही बताइए कि सरकार को काला धन ख़त्म करने के लिए क्या करना चाहिए. तो लीजिए जानिए और समझिए कि काले धन के असली पहाड़ कहाँ खड़े होते हैं, और अगर वाक़ई काले धन को हम सचमुच जड़ से ख़त्म करना चाहते हैं, तो क्या क़दम हमें उठाने चाहिए. हालाँकि इनमें से कई बातों को मैं पहले भी कई बार लिख चुका हूँ, लेकिन मालूम है कि अभी इन्हें और कई बार भी लिखना पड़ेगा.

FDI और प्राइवेट इक्विटी का खेल

सबसे बड़ा पहाड़ है उस काले धन का जो यहाँ से पहले विदेश जाता है और फिर एफ़डीआइ या 'प्राइवेट इक्विटी' के मुखौटे लगा कर बड़े-बड़े उद्योगों में खप जाता है. इसके खिलाड़ी भी वही हैं, हज़ारों-लाखों करोड़ वाले. इस पर भी हज़ारों बार चर्चा हो चुकी है कि यहाँ से बाहर जानेवाले धन पर कैसे निगरानी रखी जाय. लेकिन अभी तक हम कोई तरीक़ा नहीं ढूँढ पाये हैं और न शायद कभी ढूँढ पायें! क्यों? कारण आप जानते ही हैं. इतने समझदार तो आप हैं ही.

काली खेती का गोरखधन्धा

दूसरा है काली खेती का गोरखधन्धा. पिछले दिनों एक विस्मयकारी आँकड़ा सामने आया था. और यह आँकड़ा आय कर के एक पूर्व अधिकारी विजय शर्मा ने पेश किया था कि 2011 में साढ़े छह लाख से ज़्यादा लोगों ने कुल बीस करोड़ करोड़ रुपये (गिनती में लिखें तो इतने शून्य लगाने पड़ेंगे कि दिमाग़ चकरघिन्नी हो जाय) की कृषि आय दिखायी थी. यानी इनमें से औसतन हर आदमी को साल में तीन सौ करोड़ रुपये से ज़्यादा की कृषि आय हुई थी! किस ज़मीन पर इन्होंने क्या खेती की कि एक साल में तीन सौ करोड़ कमा लिये? दिलचस्प बात यह है कि कृषि आय दिखानेवालों की संख्या और उनकी आमदनी 2008 से 2012 के पाँच वर्षों में ही नाटकीय ढंग से बढ़ी! यह वह दौर था जब यह सुगबुगाहट शुरू हो गयी थी कि काला धन रखना अब मुश्किल होता जायेगा. तो इस तरह धन-धुलाई हो गयी! और यह सबकी जानकारी में है.

एक सीमा से ऊपर कृषि आय पर टैक्स क्यों नहीं?

इस मामले में क्या हुआ, पता नहीं. सुना था कि कोई जाँच हो रही है. ज़ाहिर है कि कृषि आय धन-धुलाई का बेहद सुरक्षित तरीक़ा बनी हुई है. तो सरकार एक सीमा से ऊपर होनेवाली कृषि आय पर टैक्स क्यों नहीं लगाती? शहर के वेतनभोगी लोगों की ढाई लाख रुपये से ऊपर की आय पर टैक्स लगता है, तो किसानों के लिए भी कोई सीमा तय होनी चाहिए या नहीं. खेती में उन्हें जो नुक़सान हो, उसे अगले आठ वर्षों के मुनाफ़े में समायोजित करने का प्रावधान हो, जैसा कि शेयर बाज़ार में होनेवाले घाटे के बारे में है. इससे किसानों के हित की सुरक्षा भी हो जायेगी और सरकार को टैक्स भी मिलने लगेगा. लेकिन तय मानिए कि जब तक कृषि को इनकम टैक्स के दायरे में नहीं लाया जाता, तब तक काले धन के लिए हम एक बहुत सुरक्षित क़िला बनाये रहेंगे.

राजनीतिक चन्दे के लिए आधार कार्ड ज़रूरी हो

अब राजनीतिक चन्दे और ख़र्चे की बात. सबको मालूम है कि 2014 के चुनावों में हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च हुए. यह पैसा सफ़ेद था क्या? कहाँ से आया? एक पार्टी की एक चुनावी रैली पर कितना ख़र्च आता है? यह पैसा किसने ख़र्च किया? ज़ाहिर-सी बात है कि यह सब काला धन था. विडम्बना है कि काले धन पर सवार हो कर हम काले धन पर तलवार भाँजते हैं और जनता भावविह्वल हो जाती है! सब लोकतंत्र की माया है!

हालाँकि इसमें ज़्यादा बड़ा काम नहीं करना है. जो करना है, वह बहुत ही आसान है! एक तो यह करना है कि राजनीतिक दल अगर एक रुपये का भी चन्दा लें, तो उसके साथ आधार कार्ड का नम्बर भी लें. फिर जितनी रैलियाँ हों, तो रैली के हफ़्ते भर के भीतर पूरा हिसाब सार्वजनिक करें कि क्या सामान किस वेंडर के यहाँ से कितने रेट में आया? तो करिए न महोदय! क्या कठिनाई है?

सफ़ाई पहले घर में क्यों न हो?

हमारे देश में आम तरीक़ा तो यह है कि आदमी अपने घर में सफ़ाई करता है और कूड़ा चाहे पड़ोसी के दरवाज़े या सड़क पर डाल देता है. तो राजनेता पहले अपने घर से सफ़ाई की शुरुआत क्यों नहीं करते? उसके बाद सड़क की सफ़ाई के लिए निकलिए!

ऐसे तो लिस्ट लम्बी है, लेकिन शुरुआत में कम से कम इतना तो किया जाये. तब लगेगा न कि काले धन के बड़े-बड़े विशाल क़िलों पर आप निशाना साध रहे हैं, सिर्फ़ छोटे-छोटे बिलों में डीडीटी का छिड़काव नहीं कर रहे हैं!

और हाँ जो भी करें, थोड़ा समय लेकर सोच-समझ कर करें. बरसों से काले धन की समस्या है, कुछ दिन और रह जायगी तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. नोटबंदी जैसी हड़बड़-तड़बड़ की क्या ज़रूरत थी, अब तक समझ में नहीं आया. शादियों का मौसम, रबी की बुआई, अस्पतालों में बीमारों और बैंकों में बूढ़ों को होनेवाली परेशानी, नये नोटों की नाप और एटीएम का कैलिब्रेशन, यह सब किसी ने सोचा ही नहीं! ऐसी अकुशलता का ज़िम्मेदार कौन है? नेशन वाँट्स टु नो!
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काले धन के मुद्दे पर इस लेखक के पिछले लेख:

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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