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Dec 20
पेशावर की परतों के भीतर
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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पेशावर का हमला कहीं न कहीं उस पुनरोत्थानवादी और मध्ययुगीन 'इसलामी ख़िलाफ़त' के सपने से जाकर जुड़ता है, जिसे चरमपंथी इसलाम का एक धड़ा हवा दे रहा है. इधर पेशावर में तालिबान इन्सानियत को शर्मसार कर देनेवाली हैवानियत का नंगा नाच दिखाते हैं, उधर लगभग उसी समय आइएस का अबू अनस अल लिबी डेढ़ सौ 'विधर्मी' महिलाओं को मौत के घाट उतार देता क्योंकि वे 'सेक्स ग़ुलाम' बनने को तैयार नहीं हुईं. तालिबान पेशावर हमले को 'इसलामी उसूलों' के मुताबिक बताते हैं तो आइएस के लोग 'विधर्मी' औरतों को सेक्स ग़ुलाम बनाने को पूरी तरह 'इसलामिक' बताते हैं! उधर बोको हराम भी इसलामी जिहाद के नाम पर अब तक पाँच हज़ार से ज़्यादा लोगों की हत्याएँ कर चुका है. आज की आधुनिक और वैज्ञानिक दुनिया में यह किस इसलाम की बात की जा रही है, जो हर तरह के वैज्ञानिक विचारों का, हर तरह के समाजिक सुधारों का, लोकतंत्र का, उदार सह-अस्तित्व का, समानता का और विकास का विरोधी है? यह किस इसलाम का सपना है जिसे सारी आधुनिक तकनालाजी तो चाहिए, लेकिन समाज और राज्य व्यवस्था डेढ़ हज़ार साल पहले की चाहिए?

दुनिया को अब एक नये राजनीतिक 'एलाइनमेंट' की ज़रूरत है, 'जिहाद विरोधी' एलाइनमेंट की. और इस पर अगर दुनिया फिर से दो धड़ों में बँटती हो तो बँटे.

---क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi पेशावर के ग़म, ग़ुस्से और मातम में सारी दुनिया शरीक हुई, कुछ को छोड़ कर! तालिबान के इस क्रूरतम चेहरे पर सारी दुनिया ने लानत-मलामत की, लेकिन कुछ बिलकुल भी नहीं बोले. ये कुछ कौन हैं? जो चुप रहे. जिन्होंने रस्मी मातमपुर्सी के लिए भी कुछ बोलने की ज़हमत गवारा नहीं की. यही वह सवाल है, जिसके जवाब में बहुत कुछ छिपा है. और यह जवाब बताता है कि पेशावर महज़ एक हादसा नहीं है, जो बस हो गया! बल्कि यह आधुनिक इतिहास का एक बेहद नाज़ुक, संगीन और ख़तरनाक मोड़ है! सवाल यह है कि क्या दुनिया उस ख़तरे को ठीक-ठीक देख पा रही है, जिसके संकेत पेशावर से उठने वाले बारूदी धुओं से मिल रहे हैं?

पेशावर के संकेत क्या हैं?

पेशावर को ऊपर-ऊपर से देखना बड़ी भूल होगी. उसकी परतों के भीतर देखिए. ऊपर से क्या दिखता है? पाकिस्तानी सेना के आपरेशन ज़र्ब-ए-अज़्ब की क्रूरता से बौखलाए तालिबानियों ने raagdesh-Peshawar-massacreबदला चुकाने के लिए सैनिक स्कूल के बच्चों को निशाना बना डाला. हाँ, वजह तो यही है और घटना भी यही है. लेकिन इसके आगे भी बहुत कुछ है. इसलिए शार्ट कट व्याख्याएँ यक़ीनन ग़लत मुक़ामों तक पहुँचाएँगी! ग़लत मुक़ाम क्या? यही कि यह मान लेना कि पेशावर पाकिस्तान की एक स्थानीय घटना है और पाकिस्तान ने आतंकवाद के जिन साँपों को अपने पड़ोसियों के लिए पाला था, उन्होंने ही आख़िर उसे बुरी तरह डस लिया. (जैसा कि तीन साल पहले अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने उसे चेताया था और आज क्लिंटन की भविष्यवाणी सच हुई!). और यही कि यह मान लेना कि इतने बड़े हादसे के बाद अब पाकिस्तानी समाज, मीडिया, सरकार, राजनीतिक दल और सेना में जगार होगी और आतंकवाद के ज़हर को अपने जिस्म में फैलने देने से रोकने के लिए वह कुछ कारगर क़दम उठाने पर मजबूर होंगे!

हमला इसलाम-विरुद्ध नहीं: तालिबान

सारी बहस आज ऊपर के दो सवालों पर ही हो रही है. लेकिन छोटा मुँह, बड़ी बात और गुस्ताख़ी माफ़ कीजिएगा हुज़ूर, ये दोनों सवाल बहस के क़ाबिल ही नहीं हैं. क्योंकि पेशावर सिर्फ़ एक दिल दहला देनेवाला हादसा नहीं है, जिसकी धमक सिर्फ़ पाकिस्तान की सरहदों तक सिमटी रहे. उसके संकेत और सन्देश पूरी दुनिया के लिए बहुत भयावह हैं! कैसे? शायद इन बातों की तरफ़ या तो लोगों का ध्यान नहीं गया या लोग उसके अर्थ समझ नहीं पाये! पेशावर हादसे को अफ़ग़ानी तालिबानियों तक ने जब 'इसलाम-विरुद्ध' क़रार दिया, तो लगा कि पाकिस्तानी तालिबानियों को शायद अब शर्मिन्दगी का एहसास हो कि कहीं न कहीं उनसे भारी ग़लती हो गयी है. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. शाम होते-होते उन्होंने 'गर्व' से सैनिक स्कूल पर हमला करनेवाले आतंकवादियों की तसवीरें जारी कर दीं, जो हमले के ठीक पहले खींची गयी थीं. और फिर तालिबान प्रवक्ता ख़ालिद ख़ुरासानी का यह कथित बयान आया कि पेशावर की कार्रवाई सुन्नत-ए-नबवी के मुताबिक थी और बनू क़ुरैज़ा के ख़िलाफ़ युद्ध में ख़ुद पैग़म्बर मुहम्मद ने जो निर्देश दिये थे, उसकी रोशनी में 'बच्चों और औरतों का क़त्ल रसूल पाक की तालीम के मुताबिक़ है, एतराज़ करनेवाले "सही बुख़ारी" जिल्द पाँच, हदीस 148 देख लें.'

यह किस इसलाम का सपना है?

और अब चलिए उस सवाल पर जो मैंने बिलकुल शुरू में उठाया था. वे कौन हैं जो मासूम बच्चों और औरतों के इस क़त्ल-ए-आम पर कुछ नहीं बोले? कोई प्रतिक्रिया नहीं? बिलकुल चुप रहे? अरब देशों से कोई प्रतिक्रिया आपको देखने को मिली? दो दिन तक चुप्पी छायी रही. हालाँकि शुक्रवार को ज़रूर एक छोटी-सी ख़बर आयी कि सऊदी सरकार की ओर से किंग अब्दुल्ला ने तालिबानी हमले की तीखी निन्दा की है! लेकिन दो दिन बाद! कुछ अजीब नहीं लगता आपको? बस यहीं सवाल का जवाब है. पेशावर का हमला कहीं न कहीं उस पुनरोत्थानवादी और मध्ययुगीन 'इसलामी ख़िलाफ़त' के सपने से जाकर जुड़ता है, जिसे चरमपंथी इसलाम का एक धड़ा हवा दे रहा है. इधर पेशावर में तालिबान इन्सानियत को शर्मसार कर देनेवाली हैवानियत का नंगा नाच दिखाते हैं, उधर लगभग उसी समय आइएस का अबू अनस अल लिबी डेढ़ सौ 'विधर्मी' महिलाओं को मौत के घाट उतार देता क्योंकि वे 'सेक्स ग़ुलाम' बनने को तैयार नहीं हुईं. तालिबान पेशावर हमले को 'इसलामी उसूलों' के मुताबिक बताते हैं तो आइएस के लोग 'विधर्मी' औरतों को सेक्स ग़ुलाम बनाने को पूरी तरह 'इसलामिक' बताते हैं! उधर बोको हराम भी इसलामी जिहाद के नाम पर अब तक पाँच हज़ार से ज़्यादा लोगों की हत्याएँ कर चुका है. आज की आधुनिक और वैज्ञानिक दुनिया में यह किस इसलाम की बात की जा रही है, जो हर तरह के वैज्ञानिक विचारों का, हर तरह के समाजिक सुधारों का, लोकतंत्र का, उदार सह-अस्तित्व का, समानता का और विकास का विरोधी है? यह किस इसलाम का सपना है जिसे सारी आधुनिक तकनालाजी तो चाहिए, लेकिन समाज और राज्य व्यवस्था डेढ़ हज़ार साल पहले की चाहिए?

तथाकथित जिहाद की बढ़ती आँच

और सिर्फ़ पेशावर, इराक़, सीरिया, नाइजीरिया ही क्यों. ख़तरा तो बढ़ता जा रहा है. सिडनी के लिंट कैफ़े से लेकर बर्दवान के आतंकवादी माड्यूल और बेंगलुरु के मेंहदी मसरूर बिसवास तक, तथाकथित इसलामी जिहाद की आँच अब दुनिया भर को झुलसाने और तपाने लगी है. यह सही है कि चरमपंथी इसलामी तत्वों को पूरी दुनिया भर में पैदा करने, बढ़ाने, पालने-पोसने में अगर सबसे ज़्यादा बड़ी भूमिका किसी की है तो वह अमेरिका की है, जिसे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अपनी राजनीतिक ज़रूरतों के लिए तब ऐसा करना फ़ायदेमन्द दिख रहा था. लेकिन जिस तेज़ी से इसने अपने पंख फैलाये हैं, वह वाक़ई चिन्ता की बात है. इसलिए अब और देर करने का वक़्त रह नहीं गया है. दुनिया को अब एक नये राजनीतिक 'एलाइनमेंट' की ज़रूरत है, 'जिहाद विरोधी' एलाइनमेंट की. और इस पर अगर दुनिया फिर से दो धड़ों में बँटती हो तो बँटे. और भारत के लिए तो फँूक-फूँक कर क़दम रखने की ज़रूरत है. ख़ास तौर पर तीन बातें तो बेहद ज़रूरी हैं. एक तो यह कि देश के मुसलमान युवा किसी बहकावे में न फँसे और दूसरी यह कि इस मुद्दे पर किसी क़िस्म की राजनीति न की जाये, न मुसलिम वोट बैंक की और न हिन्दू वोट बैंक की और तीसरी यह कि साम्प्रदायिक माहौल बिगाड़ने वाली साज़िशों के ख़िलाफ़ कठोर रवैया अपनाया जाये. देश के मुसलिम उलेमाओं को, मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड और तमाम दूसरे संगठनों को इस बारे में खुल कर बोलना और आगे आना चाहिए कि तथाकथित जिहाद की जिस चरमपंथी अवधारणा को इसलामी कह कर बेचा जा रहा है, उसकी इसलाम में कोई जगह नहीं है. इस मुद्दे पर संवाद की निरन्तरता बनाये रखने के लिए केन्द्र और राज्यों की सरकारों को भी पहल करनी चाहिए. दूसरी बात यह कि भारतीय मुसलमान भले ही विकास की दौड़ में काफ़ी पीछे रह गये हों और उतनी आर्थिक प्रगति न कर पाये हों, फिर भी इतने बरसों तक एक आधुनिक और उदार लोकतंत्र में रहने के बाद वह जानते हैं कि किसी लोकतंत्र में रहने का मतलब क्या होता है! और धर्म चाहे कोई भी हो, धर्म पर आधारित राज्य की कोई भी अवधारणा मूल रूप से लोकतंत्र विरोधी होती है, वह मूल रूप से अल्पसंख्यक विरोधी होती है, वह मूल रूप से महिला विरोधी और पुरुष सत्तात्मक होती है, वह पुनरोत्थानवादी, अनुदार, कट्टर होती है और वहाँ किसी विचार-वैभिन्नय की कोई गुंजाइश नहीं होती और अन्ततः वह कुछ धार्मिक मठाधीशों व भ्रष्ट राजनेताओं के शोषक गँठजोड़ में बदल जाती है. पाकिस्तान इसका जीता-जागता उदाहरण है. ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो ने अपनी डगमग सत्ता बचाये रखने के लिए धार्मिक नेताओं के हाथ-पैर दबाने शुरू किये और बाद में सैनिक तानाशाह जनरल ज़िया-उल-हक़ ने पूरी तरह कट्टरपंथियों से हाथ मिला लिया. नतीजा आज सामने है. इसलामी जिहादी तत्व आज पाकिस्तान पर पूरी तरह हावी हैं. सरकार कोई भी हो, पर्दे के पीछे से जिहादी ही उसे नियंत्रित करते हैं. चरमपंथी इसलाम और शरीअत के दुराग्रहों के चलते पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान की क्या दुर्गति हो चुकी है, यह सबके सामने है! इसलिए भारत में लोगों को इसे समझना चाहिए. न यहाँ किसी को जिहाद की ज़रूरत है और न हिन्दू राष्ट्र की. बुनियादी तौर पर दोनों का चरित्र एक ही है, बस लेबल बदल जाता है.
(लोकमत समाचार, 20 दिसम्बर 2014) http://raagdesh.com
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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