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Jan 31
सेकुलर घुट्टी क्यों पिला गये ओबामा?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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Jan 31
12:20 am

राष्ट्रपति ओबामा ने गुरुवार 5 फ़रवरी 2015 को अपने 'नेशनल प्रेयर ब्रेकफ़ास्ट' सम्बोधन में फिर कहा कि अगर आज महात्मा गाँधी होते तो भारत में बढ़ी धार्मिक असहनशीलता से उन्हें बहुत धक्का पहुँचा होता. ओबामा ने कहा कि 'भारत अद्भुत विविधताओं से भरपूर देश है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से वहाँ अपनी धार्मिक आस्थाओं और विरासत के कारण कुछ धार्मिक समुदाय दूसरे धार्मिक विश्वास के लोगों के निशाने पर हैं.' स्पष्ट है कि ओबामा का इशारा हिन्दुत्ववादी संगठनों की ओर था.

आधुनिक सेकुलरिज़्म और लोकतंत्र आज एक दूसरे के पूरक विचार हैं. सारी दुनिया में लोगों को अब दो बातें समझ में आती जा रही हैं. एक यह कि आर्थिक विकास के लिए स्वस्थ लोकतंत्र बड़ा ज़रूरी है. और दूसरी यह कि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए मज़बूत सेकुलरिज़्म को ज़रूरी शर्त माना जाने लगा है. 


Obama gives Narendra Modi a lesson on Secularism- Raag Desh 310115.jpg
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ओबामा आये, क्या लाये? बस एक सेकुलर घुट्टी पिला कर चले गये. अब ये घुट्टी तो अकसर कड़ुवी होती है या बेस्वाद. सब मुँह का मज़ा बिगड़ जाता है! बताइए भला. आपको बुलाया. इतनी धूमधाम की, बाजा-गाजा किया, मन की बात भी कर ली, इतनी बार बराक-बराक कह कर इतनी दिलजोई भी की, फिर भी जाते-जाते घुट्टी पिला गये! सब मूड उखड़ गया! और कुछ तो हत्थे से ही उखड़ गये! आख़िर ये ओबामा होता कौन है हमें उपदेश पिलाने वाला?

विज्ञापन को लेकर विवाद

अब यह सेकुलर नाम की चीज़ कुछ लोगों को हमेशा ही बेहूदा लगती है. न बोलना पड़े तो अच्छा. न सुनना पड़े तो अच्छा. और न देखना पड़े तो और भी अच्छा. ख़ास कर आरएसएस का नज़रिया इस पर बिलकुल अलग रहा है. इसलिए गणतंत्र दिवस के सरकारी विज्ञापन में संविधान की 'बिना सेकुलर वाली' पुरानी प्रस्तावना छप जाती है तो नीयत पर शक तो होता ही है. हालाँकि यह विवाद अब ख़त्म हो गया है क्योंकि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने सभी सरकारी विभागों को चिट्ठी लिख कर कह दिया है कि वह सब जगह संविधान की संशोधित प्रस्तावना ही लें, जिसमें 'सेकुलर' और 'समाजवादी' शब्द हैं. शुरू में सरकार ने यही सफ़ाई दी थी कि उसकी मंशा तो सिर्फ़ संविधान की उस मूल प्रस्तावना को दिखाने की थी, जिसे आज के ही दिन हमने अपनाया था. और 'सोशलिस्ट' और 'सेकुलर' शब्द तो इसमें 1976 में जोड़े गये थे. इसलिए पुरानी प्रस्तावना दिखाने में कुछ भी ग़लत नहीं. और फिर यूपीए सरकार ने भी 2012 में यही तस्वीर इस्तेमाल की थी, तब तो कोई हल्ला नहीं मचा था! चलिए, हो सकता है कि सरकार सच ही बोल रही हो और उसकी नीयत बिलकुल साफ़ हो. या फिर जैसा कि कुछ लोग शक ज़ाहिर कर रहे हैं, यह भी हो सकता है कि जानबूझकर ही मूल प्रस्तावना की वह तसवीर इसीलिए चुनी गयी हो, ताकि पता चल सके कि इस पर कैसी प्रतिक्रिया होती है? बहरहाल अब सच जो भी है, इस पर सिर्फ़ अटकलें ही लग सकती हैं.

संघ का सेकुलरिज़्म यानी हिन्दुत्व

सवाल यह नहीं है कि सरकार की नीयत सही थी या नहीं! सवाल यह है कि इस मुद्दे पर सरकार की नीयत पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?

दरअसल, सवाल इसीलिए उठ रहे हैं कि मोदी सरकार और बीजेपी आज चाहे कुछ भी कहे, लोगों के मन में यह सवाल बना ही हुआ है कि क्या बीजेपी सचमुच इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार से अलग हो सकती है? आज नहीं तो कल, क्या वह संघ के एजेंडे को लागू नहीं करेगी? अब संघ का क्या विचार है? संघ का कहना है कि वह हिन्दुत्व के जिस विचार को लेकर चलता है, वह अत्यन्त उदार विचार है, सर्व-समावेशक है, सच्चे अर्थों में सेकुलर विचार है! संघ के लिए हिन्दुत्व ही सेकुलरिज़्म है! वह सेकुलरिज़्म को उस अर्थ में स्वीकार करता ही नहीं है, जिस अर्थ में संविधान में उसे लिया गया है. तो अब मामला समझ में आ ही गया होगा कि संघ के लिए हिन्दुत्व ही एकमात्र सेकुलर विचार है. इसलिए इस एक विज्ञापन पर इतना शक-शुबहा, शंका-आशंका होने लगे तो अचरज कैसा?

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और हिन्दुत्व के 'आदर्श सेकुलर विचार' का नमूना तो हम रोज़ ही देख रहे हैं. 'लव जिहाद' और 'घर-वापसी' के शिग़ूफ़ों के तौर पर! कभी कहते हैं कि भारत में रहनेवाले सभी हिन्दू हैं, चाहे वह किसी भी धर्म (या पंथ) के मानने वाले हों. सभी हिन्दू हैं तो फिर 'लव जिहाद' और 'घर-वापसी' का गुल-गपाड़ा क्यों? मुसलमान और ईसाई अगर भारत में रहने के कारण हिन्दू हैं तो उन्हें फिर हवन-शुद्धीकरण करके 'हिन्दू' क्यों बना रहे हो भाई! शायद यही संघ का 'सर्व-समावेशक' तरीक़ा है! और फिर जब इस 'सर्व-समावेशक' तरीक़े से सारे भारत की 'घर-वापसी' हो जायेगी, सबका 'समावेश' हो जायेगा तो सेकुलरिज़्म का टंटा अपने आप ही ख़त्म हो जायेगा! है न दूर की कौड़ी! अब समझ में आया कि संघ का हिन्दुत्व किस प्रकार सच्चे अर्थों में 'सेकुलर' विचार है!

धार्मिक और पुरानी रूढ़ियों के विरुद्ध

सारी दिक़्क़त यहीं है. आधुनिक सेकुलरिज़्म और लोकतंत्र आज एक दूसरे के पूरक विचार हैं. सारी दुनिया में लोगों को अब दो बातें समझ में आती जा रही हैं. एक यह कि आर्थिक विकास के लिए स्वस्थ लोकतंत्र बड़ा ज़रूरी है. ताज़ा शोध के मुताबिक़ लोकताँत्रिक शासन व्यवस्था अपनाने से देशों की जीडीपी में अमूमन एक प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो गयी! यह भी पाया गया कि मामूली लोकताँत्रिक सुधारों का भी अच्छा प्रभाव आर्थिक विकास पर पड़ा और जो देश लोकतंत्र से विमुख हुए, वहाँ इसका असर उलटा हुआ और आर्थिक विकास की गति धीमी हो गयी. और दूसरी यह कि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए मज़बूत सेकुलरिज़्म को ज़रूरी शर्त माना जाने लगा है. और अब तो सेकुलरिज़्म को भी नये सिरे से देखा जा रहा है. अब तक सेकुलरिज़्म का मतलब था कि राज्य का अपना कोई धर्म न हो और राज्य की दृष्टि में सभी धर्म समान हों. लेकिन अब सेकुलरिज़्म को आधुनिक विचारों को अपनाने और परम्परागत धार्मिक मूल्यों को छोड़ने के तौर पर भी कहीं-कहीं देखा जाने लगा है.

यानी सेकुलरिज़्म का मतलब केवल राज्य और धर्म के बीच दूरी नहीं, केवल यही नहीं कि राज्य के नागरिकों को अपनी इच्छा से कोई धर्म मानने या न मानने की स्वतंत्रता है और राज्य किसी से धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा और न किसी को प्राथमिकता देगा, बल्कि अब सेकुलरिज़्म एक आधुनिकतावादी विचार है, जो वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना चाहता है और मनुष्य को धार्मिक, पुरातन और प्रतिगामी रूढ़ियों से भी मुक्त देखना चाहता है. आरएसएस या संघ के लिए सेकुलरिज़्म के विरोध का यह भी एक बहुत बड़ा कारण है, जो वैज्ञानिक तरीक़ों से किये जाने वाले शोध को नकार कर किंवदन्तियों के आधार पर इतिहास से लेकर विज्ञान तक का निर्माण करना चाहता है!

संघ क्यों चिढ़ता है सेकुलरिज़्म से?

इसलिए जिन लोगों को भ्रम हो कि सेकुलरिज़्म का मतलब केवल हिन्दू-मुसलमान-ईसाई आदि तक ही सीमित है और जो लोग 'छद्म-धर्मनिरपेक्षता' के फ़र्ज़ी फ़िक़रे के झाँसे में आये बैठे हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि संघ का सेकुलरिज़्म विरोध केवल हिन्दू-मुसलमान-ईसाई तक सीमित नहीं है. वैसे संघ का यह आरोप बिलकुल सही है कि सभी तथाकथित सेकुलर पार्टियों ने वोट बैंक की राजनीति के कारण सेकुलरिज़्म को लगातार फ़ुटबाल बना कर खेला है और इसके नाम पर पर्सनल लाॅ जैसे रूढ़िवादी क़ानूनों पर समझौता किया है. सच है. यह सेकुलरिज़्म की मूल भावना के बिलकुल विरुद्ध है. और सेकुलरिज़्म का तक़ाज़ा है कि देश में कामन सिविल कोड हो. क्योंकि नागरिक क़ानून आधुनिकतावादी होते हैं और पर्सनल लाॅ जैसी चीज़ें पुरातनपंथी व्यवस्था के अवशेष हैं.

लेकिन यहीं संघ परिवार का अन्तर्विरोध खुल कर सामने आता है. एक तरफ़ वह आधुनिकतावादी कामन सिविल कोड की वकालत करता है, दूसरी ओर इतिहास से लेकर शिक्षा और विज्ञान तक में वैदिक काल में लौटना चाहता है! खाप पंचायतें उसकी निगाह में सही काम कर रही हैं, उसके विचार से बच्चे अँगरेज़ी न पढ़ें क्योंकि उससे भारतीय संस्कृति नष्ट होती है, महिलाएँ पुराने ज़माने के 'भारतीय परिधान' में रहें और चार से लेकर दस बच्चे पैदा करते हुए भोग्या बनी हुई जीवन गुज़ार दें! आधुनिक सेकुलरिज़्म में ऐसे विचारों की कोई जगह नहीं है.

ओबामा आये, सेकुलरिज़्म पढ़ा गये? क्यों? ओबामा को क्यों चिन्ता है कि भारत सेकुलर रहे? इसलिए कि आज की दुनिया में आर्थिक विकास का लोकतंत्र, सेकुलरिज़्म, आधुनिक विचारों से सीधा और गहरा रिश्ता है. और ऐसा भारत, अमेरिका के लिए बड़ा अनुकूल है, बाज़ार के हिसाब से भी और विश्व राजनीति के हिसाब से भी.

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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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