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Tag Archives: Tarun Tejpal

Nov 23
कहिए और लड़िए ताकि भविष्य निराश न हो!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 1 

अफ़सरशाही, नेताशाही, न्यायपालिका और मीडिया अगर सब दुर्भाग्य से एक ही थैली के चट्टे-बट्टे दिखने लगे, तब? कुछ नहीं बचेगा तब. बेचारगी में, लाचारी में लोग सड़कों पर उतरेंगे. सबसे ख़तरनाक यही है. अदालत और मीडिया से कुछ आस तो बची ही थी. लेकिन एक वरिष्ठ जज और Tehelka के सम्पादक Tarun Tejpal पर लगे यौन शोषण के आरोपों से देश स्तब्ध है.


Fight against Sexual Assault Cases must Continue- Raag Desh 231113.jpg
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Sexual Assault, Judiciary & Media | क़मर वहीद नक़वी | Tehelka & Law Intern Case |
यह संस्थाओं के ध्वस्त होने का समय है! विश्वासों और सम्बलों के आख़िरी बचे-खुचे कुछ पायदानों के चरमराने-दरकने-धसकने का वर्तमान बीतने को है, सब कुछ भरभरा कर ढह जाने का भविष्य बस जैसे आ टपकने की ही घात में है. लोकतंत्र के चार खम्भे! दो बस अब ढहे, तब ढहे. अफ़सरशाही और नेताशाही से किसी को शायद ही कोई उम्मीद हो. बाक़ी बचे दो, अदालत और मीडिया. गिरते-पड़ते भी इनकी साख से कुछ आस तो बची ही थी. वैसे ही जैसे डूबते को तिनके का सहारा! लेकिन पिछले एक हफ़्ते में यौन शोषण के मामले सामने आने से दोनों पर बड़ा बट्टा लगा! देश की सबसे बड़ी अदालत की कुर्सियों पर भी ऐसे लोग बैठ सकते हैं, जिन पर यौन शोषण के लाँछन लगें! एक लॉ इंटर्न (Law Intern) ने एक पूर्व वरिष्ठ जज के ख़िलाफ़ जो आरोप लगाये हैं, वह वाक़ई स्तब्ध कर देने वाले हैं. फिर 'तहलका' (Tehelka) के नामी-गिरामी सम्पादक तरुण तेजपाल (Tarun Tejpal) पर अपने एक पत्रकार मित्र की बेटी और अपनी ही सहकर्मी पत्रकार पर यौन आक्रमण के आरोप से तहलका मच गया!

Sexual Assault allegations shock Judiciary and Media

कटघरे में एक 'इलीट' सम्पादक तरुण तेजपाल

इन दोनों मामलों में क्या होगा, दोषियों को सज़ा मिल पायेगी या नहीं, मिलेगी तो कितनी मिलेगी, आरोप साबित हो पायेंगे या वापस ले लिये जायेंगे, जैसा कि ऐसे मामलों में अकसर होता रहता है! ये सब सवाल हैं. बहस जारी है. तेजपाल के 'प्रायश्चित' को दर्ज कर 'फ़र्ज़' पूरा कर लिया जाये या मामले को क़ानून के हाथों सौंपा जाये? अब तेजपाल 'इलीट' सम्पादक हैं, इसलिए बहस हो रही है! सुनते थे क़ानून सबके लिए बराबर होता है. किताबों में तो होता है, लेकिन बस पढ़ने के लिए! जब करने की बात हो तो बड़े आदमी के लिए क़ानून छोटा हो जाता है. जितना बड़ा आदमी, उतना बौना क़ानून! लेकिन तेजपाल साहब 'बड़े' हो कर भी शायद जल्दी नप जायें.

तेजपाल पर क़ानून अपना काम करे

इसलिए नहीं कि देश में अचानक सुराज आ गया, बल्कि इसलिए कि बारह साल से जली-भुनी बैठी बीजेपी के हाथ बटेर लग गयी. गोवा में उसकी सरकार है, अपराध गोवा में हुआ है, उसकी पुलिस ने मामला हाथ में ले लिया है. कम से कम बंगारू लक्ष्मण का बदला तो चुका ही लेगी बीजेपी! अब आया न ऊँट पहाड़ के नीचे! वैसे काँग्रेस ने भी तेजपाल की गिरफ़्तारी की माँग कर दी है. चुनाव का मौसम है! कोई पार्टी रिस्क नहीं ले सकती! यह सब राजनीति की चकल्लस अपनी जगह, पर इस मामले में दो राय नहीं हो सकती कि तेजपाल पर गम्भीर आपराधिक आरोप लगे हैं और क़ानून अपना काम करे, इसके अलावा और कोई बात क़ानून सम्मत नहीं हो सकती.

Sexual Assault Charges a New Low for Credibility of Judiciary and Media!

लोग सकते में हैं!

लोग सकते में हैं! अभी तक बड़ी अदालतों के कुछ फ़ैसलों पर कभी-कभी हैरानी होती थी, कभी-कभार कुछ बदरंग बातें भी इधर-उधर से छन-छना कर बाहर आ जाती थीं. मीडिया पर भी बड़े धब्बे लगे हाल के दिनों में. पेड न्यूज़ और बाज़ारूपन के अलावा राडिया टेपों ने कई बड़े नामों की क़लई उतार दी. यह अलग बात है कि उनमें से सभी अब भी वैसे ही जमे हुए हैं, इज़्ज़त की पूरी गठरी के साथ! लेकिन फिर भी लोगों को इन दोनों 'खम्भों', अदालत और मीडिया से कहीं न कहीं बड़ी आस थी. लेकिन अब इन दो मामलों ने कुछ और छिलके उतार दिये. नेताशाही अगर भ्रष्ट है, राजनीति अगर किसी भी स्तर तक गिर सकती है, तो उस पर लगाम कौन लगायेगा? सवाल कौन उठायेगा? किस मुँह से उठायेगा? कड़ुवे और तीखे सवाल पूछने का क्या नैतिक आधार होगा उसके पास? क्या उससे पलट कर सवाल नहीं पूछा जायेगा कि तुम कौन होते हो उँगली उठानेवाले, तुम्हारे कपड़ों पर भी सत्तर दाग़ हैं, जैसे हम, वैसे तुम. तुम भी खेलो हमारे साथ. हम चारो मौसेरे भाई!

अच्छा हुआ कि पीड़ित लड़कियाँ आगे आयीं

सबसे ख़तरनाक यही है. अफ़सरशाही, नेताशाही, न्यायपालिका और मीडिया अगर सब दुर्भाग्य से एक ही थैली के चट्टे-बट्टे दिखने लगे, तब? कुछ नहीं बचेगा तब. बेचारगी में, लाचारी में लोग सड़कों पर उतरेंगे, उतरे भी थे पिछले दिनों, जनलोकपाल को लेकर और 'निर्भय' को न्याय दिलाने. 'निर्भय' आन्दोलन पूरी तरह सफल रहा. छोटी अवधि का था. लेकिन जनलोकपाल की लड़ाई लम्बी थी. कुछ ही महीनों में उसका शीराज़ा बिखर गया. आन्दोलन व्यवस्था पर बड़े दबाव बना सकते हैं, लेकिन लम्बे समय तक लगातार उन्हें चलाये रख पाना मुश्किल है. हल तो यही है कि अपनी संस्थाओं को सुधारने के लिए लगातार छोटे-छोटे दबाव बनते रहें. यौन शोषण के इन दोनों मामलों में यही हुआ. पीड़ित लड़कियाँ आगे आयीं.
 लड़ाई शुरू हुई. यह एक शुभ संकेत है. लोग अपनी बात कहने लगें, तो उसे सबको सुनना ही पड़ेगा. इसलिए निराशा छोड़िए, कहिए और लड़िए, ताकि भविष्य निराश न हो!
(लोकमत समाचार, 23 नवम्बर 2013)
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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