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Tag Archives: Samajwadi Party Infighting

Dec 31
जंग तो जीत ही चुके हैं अखिलेश!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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यह कॉलम समाजवादी पार्टी से अखिलेश के  निष्कासन के तुरन्त बाद लिखा गया था, इसे इसी सन्दर्भ में पढ़ें. 



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राजनीति धारणाओं से चलती है. एक लाइन के इस सूत्र को 2014 में नरेन्द्र मोदी ने धमाकेदार कामयाबी से आज़माया. और किसी ने इसे समझा हो या न समझा हो, अखिलेश यादव ने इस सूत्र को ख़ूब छान-घोट कर पी लिया है, यह पिछले कुछ महीनों की घटनाओं से साफ़ है.

अखिलेश को उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी से निकाल दिया है. पार्टी अब साफ़-साफ़ दो फाड़ के रास्ते पर है. लेकिन इससे मुलायम को क्या मिलेगा और अखिलेश क्या खोयेंगे, क्या पायेंगे? देखना दिलचस्प होगा.

राजनीति धारणाओं से कैसे चलती है? धारणाएँ वह, जो जनता अपने मन में बनाती है. वह सच भी हो सकती हैं और नहीं भी. लेकिन युद्ध अगर सच और धारणाओं में होता है, तो जीत हमेशा धारणाओं की होती है. इसीलिए धारणाएँ राजनीति में बड़ा गुल खिलाती हैं.

धारणा युद्ध में धराशायी हुई काँग्रेस

नरेन्द्र मोदी 2014 में लोगों के मन में यह बात बैठाने में सफल रहे कि सत्तर साल में देश में कुछ भी नहीं हुआ, और काँग्रेस ने भ्रष्टाचार बढ़ाने और देश को रसातल में ले जाने के अलावा कुछ नहीं किया. उससे हुआ यह कि काँग्रेस 2014 में जिस रसातल में गयी, उससे वह आज तक उबर ही नहीं पायी. काँग्रेस और उसके नेता आज भी जनता में अपने ख़िलाफ़ बनी इस धारणा को तोड़ नहीं पाये हैं.

वैसे काँग्रेस पिछले ढाई साल में रत्ती भर भी विश्वसनीयता क्यों नहीं हासिल कर पायी, इसका बड़ा कारण ख़ुद काँग्रेस को अपने भीतर ही ढूँढना चाहिए. वैसे ही जैसे कबीर ने कहा है, कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढ बन माहि!

केजरीवाल पर नहीं चला धारणा हथियार!

2015 में मोदी और बीजेपी ने दिल्ली चुनाव में अरविन्द केजरीवाल को 'भगोड़ा' बता कर उनके ख़िलाफ़ धारणा के इसी हथियार का इस्तेमाल करने की कोशिश की, लेकिन केजरीवाल ने गली-गली घूम कर न सिर्फ़ इस वार को भोथरा कर दिया, बल्कि वह अपने पक्ष में यह धारणा बनाने में भी सफल रहे कि वह दिल्ली को एक ईमानदार सरकार देंगे. नतीजा? सत्तर में से सड़सठ सीटें आम आदमी पार्टी ने जीत लीं.

तो यह है धारणा का कमाल. और मोदी तो 2014 से लेकर आज तक राजनीति में धारणा के इसी एक सूत्र पर अपनी राजनीति चलाते आ रहे हैं. देश में ही नहीं, मोदी ने दुनिया भर में अपने बारे में बनी पुरानी धारणाएँ ध्वस्त कर दीं, नयी चमकीली धारणाएँ स्थापित कीं. नतीजा सामने है. सच्चाई की ज़मीन पर मोदी कहाँ हैं, किसी को इससे मतलब नहीं, न मोदी को, न उनके छवि-प्रबन्धकों को, न उनकी पार्टी को और न जनता को. मतलब की बात बस एक है कि धारणाओं के आसमान पर मोदी कितने ऊँचे दिखते हैं!

नोटबंदी और धारणा फार्मूला!

नोटबंदी ताज़ा उदाहरण है. जनता बड़ी तकलीफ़ में है, लेकिन जनता की यह धारणा अब तक टूटी नहीं है कि नोटबंदी एक अच्छा क़दम है, देशहित में है. यह कोई नहीं जानना-समझना चाहता कि 1946 और 1978 में हुई नोटबंदियों से वे फ़ायदे क्यों नहीं हुए, जो इस बार की नोटबंदी के बताये जा रहे हैं? देश के गाँव-गिराँव, क़स्बों, छोटे शहरों, छोटे-मोटे रोज़गारों, ग़रीबों, मज़दूरों, किसानों पर टिकी अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ रहा है और पड़ेगा, किसी को न जानने की फ़ुर्सत है, न सुनने की इच्छा. क्यों? बस इसलिए कि लोग मानते हैं कि यह अच्छा क़दम है. इससे देश का भला होगा.

लोग क्यों मानते हैं ऐसा? क्योंकि मोदी कहते हैं ऐसा? धारणा का यही खेल है. अगर यही नोटबंदी मनमोहन सिंह ने की होती, तो देखते कि देश में अब तक कितना बड़ा तूफ़ान खड़ा हो गया होता!

अखिलेश ने बदली धारणा

राजनीति में धारणा के इस खेल को मोदी से अगर किसी ने बड़ी ख़ूबी से सीखा, तो वह अखिलेश यादव हैं. 2015 में उत्तर प्रदेश में धारणा यह थी कि अगले चुनाव में अखिलेश सरकार क़तई नहीं लौटने वाली है. हर जगह बस यही सुनने को मिलता था कि 2017 में मायावती को कोई टक्कर नहीं दे पायेगा. बीजेपी भी नहीं, जिसने साल भर पहले ही मोदी लहर में सबका सूपड़ा साफ़ कर दिया था. क़ानून-व्यवस्था तब बड़ी चिन्ता का मुद्दा था और इसीलिए लोग मायावती के क़सीदे पढ़ रहे थे, क्योंकि धारणा है कि मायावती राज में अपराधियों के हौसले पस्त रहते हैं. लेकिन आज उत्तर प्रदेश की जंग में मायावती पीछे दिखने लगी हैं, समाजवादी पार्टी के ताज़ा संकट के पहले तक कहा जा रहा था कि मुक़ाबला इसमें दिख रहा है कि प्रदेश अखिलेशवादी विकास चुनेगा या मोदीवादी विकास?

यह बदलाव कैसे और क्यों हुआ? 2015 में अखिलेश के बारे में क्या धारणा थी? यही कि वह बस 'कठपुतली' मुख्यमंत्री हैं. डोर तो पिता और चाचाओं के हाथ में है. वह जैसे चाहते हैं, नचाते हैं. इसलिए अखिलेश कुछ कर नहीं पाते. अखिलेश ने सही समय पर यह बात समझ ली. और दो काम किये. एक तो विकास के धुँआधार कार्यक्रमों की शुरुआत की और पिता और चाचाओं की छाया से अपने को बाहर निकालने की कोशिशें शुरू की. इसी की परिणति है समाजवादी पार्टी में आज चल रही पिता-पुत्र की जंग.

पार्टी टूटी तो नुक़सान पिता-पुत्र दोनों को

सही है कि बाप-बेटे की इस लड़ाई से समाजवादी पार्टी को बहुत नुक़सान पहुँचा है और अगर कहीं पार्टी टूट गयी, तब चुनावी समीकरण कैसे बनेंगे, किसके कितने वोट बँटेंगे, कटेंगे, यह हिसाब नये सिरे से लगाना पड़ेगा. पार्टी टूटती है तो मुलायम तो चुनाव जीतने से रहे, हो सकता है कि अखिलेश को भी सत्ता से दूर रहना पड़े.

लेकिन ज़रा सोचिए कि अगर अखिलेश अपने पिता-चाचा यानी मुलायम-शिवपाल की इच्छाओं पर ही चलते रहते और 2015 वाली धारणाओं को न तोड़ते तो भी समाजवादी पार्टी चुनाव जीतने की हालत में कहाँ आ पाती. पार्टी तो चुनाव हारती ही हारती और उससे भी बड़ा नुक़सान अखिलेश का होता कि वह इसी हार के साथ इतिहास के कुँए में समा गये होते. और भविष्य में वह जब भी राजनीति में उतरते, उनकी 'बिना रीढ़ वाली' छवि उन पर चिपकी रहती! उन्हें कोई कभी गम्भीरता से नहीं लेता.

कड़े फ़ैसले लेने वाले नेता की छवि बनी

तो समाजवादी पार्टी के इस झगड़े से अखिलेश अपनी यह छवि बनाने में तो सफल ही रहे कि उनमें कड़े फ़ैसले लेने और उन पर टिके रहने का बूता है, चाहे यह फ़ैसला अपने पिता के ख़िलाफ़ ही क्यों न लेने की मजबूरी आ जाय. ध्यान देने की बात एक और है. झगड़ा तीन महीने से चल रहा है. कई बार अखिलेश को पीछे हटना पड़ा. बर्ख़ास्त मंत्रियों को वापस लेकर अपमान का घूँट भी पीना पड़ा. महीन बात है. समझिए. अखिलेश ने बार-बार क़दम पीछे न खींचे होते और पार्टी तब टूट गयी होती, तो सहानुभूति मुलायम सिंह यादव के साथ होती, धारणाएँ अखिलेश के ख़िलाफ़ होती कि बेटे ने बूढ़े बाप को बेसहारा कर दिया, घर छोड़ दिया.

सवाल किस पर उठेंगे, अखिलेश पर या मुलायम पर!

लेकिन अब ऐसी धारणाएँ नहीं बनेंगी. क्योंकि मुलायम सिंह यादव ने ख़ुद अखिलेश को पार्टी से निकालने की घोषणा कर दी है. और इसमें ढेरों सवाल हैं कि ऐसी नौबत क्यों आयी? झगड़ा क्या था? मामूली-सा था. अखिलेश कुछ मंत्रियों को सरकार में नहीं रखना चाहते थे, शिवपाल और मुलायम इन मंत्रियों को हटाना नहीं चाहते थे. दूसरा मुद्दा टिकट के बँटवारे का था. कुछ लोगों को अखिलेश टिकट नहीं देना चाहते थे, तो कुछ लोगों को शिवपाल टिकट नहीं देना चाहते थे. ऐसे विवाद हर चुनाव के पहले क़रीब-क़रीब हर पार्टियों में होते हैं. लेकिन ऐसे मुद्दों पर पार्टियों में ऐसी टूट की नौबत आती है क्या? एक और मुद्दा था. अखिलेश नहीं चाहते थे कि मुख़्तार अन्सारी के क़ौमी एकता दल का समाजवादी पार्टी में विलय हो. हैरानी की बात है कि अखिलेश की इच्छा की उपेक्षा कर मुलायम ने यह विलय तो मंज़ूर कर लिया, लेकिन काँग्रेस के साथ किसी गठबन्धन की बात सुनने तक को मुलायम तैयार नहीं थे. ये सवाल तो उठेंगे ही.

तो पिछले एक साल में अखिलेश ने बड़ी चतुराई से तीन धारणाएँ स्थापित कीं. एक, पिछले एक-डेढ़ साल में विकास के कामों की झड़ी लगा कर अपनी नयी छवि बनायी. मुख़्तार अन्सारी और अतीक़ जैसे लोगों के मुद्दे पर पिता और चाचा से टकराव लेकर यह सन्देश दिया कि राजनीति और अपराधियों की साँठगाँठ उन्हें बिलकुल मंज़ूर नहीं. तीसरी यह कि पार्टी उन्होंने नहीं तोड़ी.

अब समाजवादी पार्टी बनी रहती है या टूटती है, चुनाव हारती है या जीतती है, यह अलग बात है. लेकिन अखिलेश अपनी जंग तो जीत ही चुके हैं. वह साबित कर चुके हैं कि वह एक मज़बूत नेता हैं और राजनीति में धारणा के खेल में भी उस्ताद हो चुके हैं. लोगों को नज़र रखनी चाहिए कि दस साल बाद राजनीति में अखिलेश किस मुक़ाम पर होंगे.
© 2016 http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi

email: qwnaqvi@raagdesh.com
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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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