Follow Raagdesh

twitter google_plus linkedin facebook mail

Tag Archives: Problems of Muslim Women

Aug 23
तीन तलाक़ : अबकी बार नहीं शाहबानो!
त्वरित टिप्पणी  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 0 

तीन तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड और मुसलिम नेताओं की आँखें भी अब खुल जानी चाहिए. उन्हें समझ लेना चाहिए कि मुसलमानों में बरसों से जारी कठमुल्लेपन के ख़िलाफ़ बयार अब बहना शुरू हो चुकी है. इसलिए बात-बेबात धार्मिक हाँका अब नहीं चलेगा. सेकुलर ब्रांड के राजनीतिक दलों की आँखें भी अब खुलनी चाहिए. तीन तलाक़ के फ़ैसले पर मुसलिम महिलाओं के जोशीले तेवरों को देख कर सबको समझ में आ गया होगा कि मुसलमानों का मतलब सिर्फ़ इमाम, मौलाना, धर्मगुरू या मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड नहीं है और सिर्फ़ इन्हें ही सहला-बहला कर रखने की राजनीति के बड़े जोखिम हो सकते हैं.


sc-sets-aside-triple-talaq
'राग देश' ईमेल पर मंगाएँ
तीन तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फ़ैसले के बाद अब बहुत कुछ बदलेगा. बदलना ही पड़ेगा. 1985 और 2017 में यही बहुत बड़ा फ़र्क़ है. 1985 के शाहबानो फ़ैसले को याद कीजिए. शाहबानो के साथ कौन था? बस गिनती के लोग! और मुसलमानों ने तब उस फ़ैसले का कैसा ज़बर्दस्त विरोध किया था. काँग्रेस की राजीव गाँधी सरकार दब गयी और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को बेअसर करने के लिए नया क़ानून ले आयी.

लेकिन आज? तीन तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर कोई आगबबूला प्रतिक्रिया कहीं से नहीं दिखाई दी. कहीं से 'इसलाम के ख़तरे में होने' की कोई आवाज़ नहीं आयी! क्यों? क्या मुसलमानों के कठमुल्ला नेतृत्व का दिल वाक़ई बदल गया है? नहीं. यह बदलाव जो आज हम देख रहे हैं, यह असल में मजबूरी का बदलाव है.

मुसलिम नेतृत्व क्यों अब भी कूपमंडूक?

पिछले दिनों दिल्ली में तीन तलाक़ पर मुसलमानों के एक बड़े सेमिनार में जाने का मौक़ा मिला. बड़ी निराशा हुई कि भारतीय मुसलमानों का शीर्ष नेतृत्व आख़िर क्यों अब भी कूपमंडूक बना हुआ है, वह बदलते समय की ज़रूरतों से मुँह क्यों मोड़े रहना चाहता है और सुधारों के लिए क्यों तैयार नहीं है और अपने पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्लादेश से क्यों नहीं कुछ सीखता, जो चालीस- पचास साल पहले ही तीन तलाक़ को ग़ैरक़ानूनी घोषित कर चुके हैं.

कुछ महीनों पहले एक युवा मुसलिम महिला डॉक्टर ने मुझे लिखा था कि वह इस बात पर वाक़ई बहुत हैरान है कि उसके साथी सभी मुसलिम पुरुष डॉक्टर क्यों शरीअत के नाम पर तीन तलाक़ का बेशर्मी से समर्थन करते हैं? इतना पढ़-लिख कर भी आख़िर उनकी सोच क्यों नहीं बदली? और यह तब है, जब भारतीय मुसलमानों में इस विषय पर पिछले कई वर्षों से गहरा मंथन चल रहा है और कई प्रमुख मुसलिम समुदाय एक बार में तीन तलाक़ को सही नहीं मानते. तो फिर मुसलमानों का एक बड़ा तबक़ा और उसका पुरुष वर्ग और मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड क्यों तीन तलाक़ को छोड़ना नहीं चाहता, क्यों इसे 'मौलिक अधिकारों' के नाम पर, शरीअत के नाम पर बचाए रखने की हारी लड़ाई लड़ते रहना चाहता है? और विरोधाभास देखिए कि इसके बावजूद मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड या मुसलमानों के किसी स्वनामधन्य नेता ने तीन तलाक़ के फ़ैसले पर कोई मुखर विरोध नहीं किया! यह बदलाव क्यों?

तीन तलाक़ : हज़ारों मुसलिम महिलाओं की लड़ाई

दरअसल, इस बदलाव के कई आयाम हैं. पहला यही कि 1985 के मुक़ाबले 2017 में मुसलिम महिलाओं में साक्षरता और सामाजिक चेतना कहीं ज़्यादा है. वह धर्म के नाम पर चल रहे शोषण के कुचक्र को अब अच्छी तरह पहचानने और समझने लगी हैं. अपने अधिकारों और सामाजिक सुधारों के लिए लड़ने का साहस उनमें आ चुका है. इसीलिए तीन तलाक़ की लड़ाई किसी एक या दो नहीं, बल्कि हज़ारों मुसलिम महिलाओं ने एक साथ लड़ी और शान से जीती. हाजी अली दरगाह में प्रवेश से लेकर तीन तलाक़ तक, मुसलिम महिलाओं ने अब यह खुल कर बता दिया है कि मुसलिम समाज को महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक सुधारों पर गम्भीरता से सोचना पड़ेगा.

मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड क्या कोई सबक़ सीखेगा?

इसलिए मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड और मुसलिम नेताओं की आँखें भी अब खुल जानी चाहिए. उन्हें समझ लेना चाहिए कि मुसलमानों में बरसों से जारी कठमुल्लेपन के ख़िलाफ़ बयार अब बहना शुरू हो चुकी है. इसलिए बात-बेबात धार्मिक हाँका अब नहीं चलेगा. मुसलिम समाज को अब अच्छी शिक्षा, अच्छा रहन-सहन, अच्छी नौकरी, अच्छा रोज़गार और तरक़्क़ीपसन्द और आधुनिक समाज चाहिए. और आधुनिक समाज के लिए यह ज़रूरी है कि वह अपनी दकियानूसी मान्यताओं, परम्पराओं, प्रथाओं, रूढ़ियों की बेड़ियों से अपने को मुक्त करे.

दिलचस्प बात यह है कि मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी लगातार मानता रहा है कि एक बार में तीन तलाक़ कहना गुनाह है, लेकिन फिर भी क़ानूनी तौर पर ग़लत नहीं है. बोर्ड अब कह रहा है कि वह पूरी कोशिश कर रहा है कि एक बार में एक साथ तीन तलाक़ को रोका जाए, निकाहनामा में ऐसा कोई प्रावधान किया जाए कि पति यह क़रार करे कि वह एक बार में तीन तलाक़ नहीं बोलेगा. अच्छा होता कि बोर्ड ने पहले ही ख़ुद आगे बढ़ कर अपनी तरफ़ से यह पहल की होती. लेकिन उसने यह बात तब कही जब सिर पर तलवार लटक गयी और सुप्रीम कोर्ट में फ़ैसले की घड़ी नज़दीक आने लगी.

तो सवाल यह है कि मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड और मुसलिम उलेमा क्या इससे कोई सबक़ सीखेंगे और आगे चल कर अपनी तरफ़ से कुछ सुधारवादी क़दमों की पहल करेंगे?

गेंद राजनीतिक दलों के पाले में भी

इस फ़ैसले के बाद गेंद राजनीतिक दलों के पाले में भी है. ख़ास तौर पर सेकुलर ब्रांड के राजनीतिक दलों की आँखें भी अब खुलनी चाहिए. दो कारण हैं. एक तो यही कि तीन तलाक़ के फ़ैसले पर मुसलिम महिलाओं के जोशीले तेवरों को देख कर सबको समझ में आ गया होगा कि मुसलमानों का मतलब सिर्फ़ इमाम, मौलाना, धर्मगुरू या मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड नहीं है और सिर्फ़ इन्हें ही सहला-बहला कर रखने की राजनीति के बड़े जोखिम हो सकते हैं. ऐसे मुद्दों पर कठमुल्लेपन का साथ देकर किसी पार्टी को मुसलमानों के वोट मिलेंगे या नहीं, इसकी तो गारंटी नहीं, लेकिन यह तय है कि कोई दल अगर आज तीन तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का विरोध करेगा तो वह हिन्दू वोटों को थाली में रख कर बीजेपी को परोस देगा!

वैसे तो केन्द्र सरकार के सूत्रों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन तलाक़ रद्द कर देने के बाद किसी नये क़ानून की ज़रूरत नहीं है, लेकिन फिर भी भविष्य में अगर मोदी सरकार इस बारे में अगर क़ानून बनाना चाहेगी, तो किसी भी बड़े राजनीतिक दल के लिए उसका विरोध करना बहुत मुश्किल होगा. बीजेपी को इसका फ़ायदा होगा, इसमें शक नहीं, और बीजेपी ने पहले ही दिन से इसे भुनाना भी शुरू कर दिया है, लेकिन किसी भी दूसरे राजनीतिक दल के लिए इसके अलावा और चारा ही क्या है कि वह तीन तलाक़ विरोधी क़ानून का समर्थन करे. ज़ाहिर है कि शाहबानो वाली कहानी अब नहीं दोहरायी जा सकती, चाह कर भी! इसीलिए मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड को नयी राजनीतिक तसवीर में अपने आपको नये सिरे से 'एडजस्ट' करने की आदत डालनी पड़ेगी!

(दैनिक हिन्दुस्तान के 23 अगस्त 2017 के अंक में प्रकाशित मेरे मूल लेख का विस्तारित रूपान्तरण)

© 2017 http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi

email: qwnaqvi@raagdesh.com
'राग देश' ईमेल पर मंगाएँ
ADD COMMENT
Most Viewed
muslim-population-myth-and-reality

क्यों बढ़ती है मुसलिम आबादी?
  तो साल भर से रुकी हुई वह रिपोर्ट अब जारी होनेवाली है! ...
Posted On  24th January 2015 2:21
economic-backwardness-literacy-and-muslim-population-growth

मुसलिम आबादी मिथ, भाग-दो!
मुसलिम आबादी का मिथ - भाग दो! पहला भाग कब आया? शायद 'राग द...
Posted On  27th August 2016 7:47
can-demonetisation-curb-black-money

तो क्या ख़त्म हो जायेगा काला धन?
बस एक महीने पहले ही मैंने 'राग देश' में लिखा था कि कुछ ल...
Posted On  12th November 2016 12:35
मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
त्वरित टिप्पणी
तीन तलाक़ और नयी सोशल इंजीनियरिंग तीन तलाक़ पर फ़ैसले के बाद क्या अब एक नयी सोशल इंजीनियरिंग की शुरुआत होगी? और अगर ऐसा हुआ तो क्या देश की राजनीति में हम एक नया मोड़ देखेंगे? ठीक वैसे ही जैसे मंडल के बाद दलित-पिछड़ा राजनीति के बिलकुल नये समीकरण देखे गये थे. हालाँकि पिछले तीन साल में [..] Read More
Follow Us On Facebook

Recent Posts