Follow Raagdesh

twitter google_plus linkedin facebook mail

Tag Archives: Prashant Kishor

Mar 26
काँग्रेस : बस ‘टीना’ में ही जीना!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 2 

प्रशान्त किशोर ने काँग्रेस को एक 'क्विक फ़िक्स' फ़ार्मूला दिया है. ब्राह्मणों को पार्टी के तम्बू में वापस लाओ. फ़ार्मूला सीधा है. जब तक ब्राह्मण काँग्रेस के साथ नहीं आते, तब तक उत्तर प्रदेश में मुसलमान भी काँग्रेस के साथ नहीं आयेंगे. क्योंकि मुसलमान तो उधर ही जायेंगे, जो बीजेपी के ख़िलाफ़ जीत सके. मायावती के कारण अब दलित तो टूटने से रहे. तो कम से कम मुसलमान और ब्राह्मण तो काँग्रेस के साथ आयें! हालाँकि यह कोई नया फ़ार्मूला नहीं है. उत्तर प्रदेश में तो चाय की चौपालों पर चुस्की मारने वाला हर बन्दा जानता है कि 2007 में ठीक इसी दलित-ब्राह्मण-मुसलमान की 'सोशल इंजीनियरिंग' से मायावती ने कैसे बहुमत पा लिया था.


Prashant-Kishore-Congress-and-Quick-Fixes-Raag Desh 260316.jpg
'राग देश' ईमेल पर मंगाएँ
ब्राह्मण शरणम् गच्छामि! सुना है कि 'वोट गुरू' प्रशान्त किशोर ने उत्तर प्रदेश के लिए काँग्रेस को यह नयी दीक्षा दी है. काँग्रेस उत्तर प्रदेश में 1989 से जो 'लापता' हुई, तो अब तक 'बेपता' है. काँग्रेस ने कभी ख़ुद को भी ढूँढने की कोशिश नहीं की, तो वोटर को भला क्या गर्ज़ पड़ी थी कि वह काँग्रेस को ढूँढने निकलता! ब्राह्मण, दलित और मुसलमान काँग्रेस के परम्परागत वोटर थे. सिर्फ़ उत्तर प्रदेश में ही नहीं, देश भर में. लेकिन ये तीनों काँग्रेस से बिदक कर कब के छिटक चुके हैं.

Prashant Kishore, Congress and Politics of Electoral Quick Fixes!

काँग्रेस का 'टीना' फ़ैक्टर!

राजनीति अकसर ऐसे मज़ाक़ करती है. वोट बैंक की राजनीति के लिए बदनाम काँग्रेस के पास अब कोई 'वोट बैंक' है ही नहीं. फिर उसे किसके वोट मिलते हैं? दरअसल, जो किसी को वोट नहीं देता, या नहीं देना चाहता, वह काँग्रेस को वोट दे देता है. आख़िर कहीं न कहीं तो वोट देना ही है न! जिसे कोई विकल्प समझ में नहीं आता, वह थक-हार कर काँग्रेस को वोट दे देता है. यह है 'टीना फ़ैक्टर' (टी. आइ. एन. ए. यानी देअर इज़ नो आल्टरनेटिव यानी कोई और विकल्प नहीं). इसी के चलते काँग्रेस 2004 और 2009 में केन्द्र की सत्ता में पहुँच गयी. क्योंकि जनता को समझ में नहीं आ रहा था कि किसे वोट दे, इसलिए काँग्रेस को वोट दे दिया!

Prashant Kishore formula for Congress revival in U. P.

ब्राह्मण+दलित+मुसलिम = काँग्रेस पुराना वोट बैंक

जब ब्राह्मण, दलित, मुसलिम वोट बैंक काँग्रेस के पास होता था, तब भी वह एक क़िस्म का 'टीना' फ़ैक्टर ही था. राजनीति में तब दूर-दूर तक कहीं कोई और छाँव नहीं थी, जिसके नीचे बैठ कर ब्राह्मण आराम से सत्ता-सुख भोगते, इसलिए वह काँग्रेस के साथ थे. दलितों और मुसलमानों के पास भी जाने को कोई और जगह थी ही नहीं, सो वह कहाँ जाते? जब जेब में हो 'टीना' तो काँग्रेस क्यों बहाये पसीना? इसलिए काँग्रेस तब भी आरामतलब पार्टी थी और आज भी वह मज़े से औंघाई पड़ी है. जनता वोट दे दे तो ठीक, न दे तो अगली बार दे देगी, अगली बार न सही, तो उससे अगली या उससे भी अगली बार, आख़िर कभी तो जनता वोट देगी. काँग्रेस ने तो बस 'टीना' में ही जीना सीखा है! वरना 2011 में अन्ना हज़ारे के साथ देश भर में करोड़ों की भीड़ देख कर उसे कुछ तो चिन्ता होनी चाहिए थी. नहीं हुई! और 2014 में धूल-धूसरित हो जाने के दो साल बाद तक हाथ पर हाथ धरे बैठी रही काँग्रेस ने सिर्फ़ एक काम किया. प्रशान्त किशोर को लेकर आ गयी. वह करिश्मा कर दें तो ठीक, और न कर पायें तो मजबूरी का नाम 'टीना!'

Mayawati equation of 2007 vs New Prashant Kishore-Congress Formula

तो बहरहाल, प्रशान्त किशोर ने एक 'क्विक फ़िक्स' फ़ार्मूला दिया है. ब्राह्मणों को पार्टी के तम्बू में वापस लाओ. फ़ार्मूला सीधा है. जब तक ब्राह्मण काँग्रेस के साथ नहीं आते, तब तक उत्तर प्रदेश में मुसलमान भी काँग्रेस के साथ नहीं आयेंगे. मुसलमान तो उधर ही जायेंगे, जो बीजेपी के ख़िलाफ़ जीत सके. मुसलमान अकेले तो काँग्रेस को जिता नहीं सकते. या तो दलित साथ आयें या ब्राह्मण. मायावती के कारण अब दलित तो टूटने से रहे. बच गये ब्राह्मण, जिनके 19-19 फ़ीसदी वोट मायावती और मुलायम के साथ थे और 38 फ़ीसदी वोट 2012 विधानसभा चुनाव में बीजेपी के पास गये थे. बाक़ी जातियों में उत्तर प्रदेश में काँग्रेस के पास न नेता हैं, न जनाधार. तो ब्राहमणों और मुसलमानों से टूटा पुराना रिश्ता जोड़ने के अलावा और चारा ही क्या है? हालाँकि यह कोई नया फ़ार्मूला नहीं है. कोई प्रशान्त किशोर की 'चमत्कारी खोज' नहीं है. उत्तर प्रदेश में तो चाय की चौपालों पर चुस्की मारने वाला हर बन्दा जानता है कि 2007 में ठीक इसी दलित-ब्राह्मण-मुसलमान की 'सोशल इंजीनियरिंग' से मायावती ने कैसे बहुमत पा लिया था.

काँग्रेस : अब विरासत छिनने का भी डर!

लेकिन 'क्विक फ़िक्स' फ़ार्मूले पुरानी बीमारियों का इलाज नहीं कर सकते. और नरेन्द्र मोदी और नीतिश कुमार दोनों के मामले में प्रशान्त किशोर क्यों सफल हुए? लोगों के बीच नरेन्द्र मोदी और नीतिश कुमार की लोकप्रियता पहले से थी, सिर्फ़ उसे 'लहर' बनाने के लिए रणनीति बनानी थी और उस पर अमल करना था. काम आसान था. लेकिन न काँग्रेस और न राहुल गाँधी कहीं ऐसे लोकप्रिय हैं, तो प्रशान्त किशोर के पास भी कोई और विकल्प नहीं कि वह फ़िलहाल वोट समूहों के सामने 'टीना' फ़ैक्टर की ही बिसात बिछायें! आप ही बताइए कि काँग्रेस के पास आज अपने आपको मार्केट करने के लिए है क्या? न नेता, न नारे, न कार्यक्रम, बस एक इतिहास और विरासत, जिसकी उसने आज तक कभी सुध नहीं ली और उसे भी संघ अब पूरी तरह हड़पने में लगा है. और काँग्रेस में न कोई हलचल है, न समझ कि वह अपनी विरासत को लुटने से कैसे बचाये?

राजनीति में असली नतीजे बरसों बाद!

ब्राह्मण क्यों काँग्रेस से हाथ से निकल गये? राजनीति में कभी-कभी ऐसी घटनाएँ होती हैं, जिनका उस समय जो नतीजा दिखता है, वह आभासी होता है. असली नतीजा अकसर बरसों बाद दिखता है. काँग्रेस के पतन की कहानी 1969 में इन्दिरा गाँधी के उस विजयी अभियान से शुरू होती है, जब काँग्रेस के सारे दिग्गज नेताओं के शक्तिशाली सिंडीकेट को धूल चटा कर वराह व्यंकट गिरि को राष्ट्रपति चुनवाने में इन्दिरा गाँधी सफल रहीं थीं. काँग्रेस टूटी और 'सत्तारूढ़ काँग्रेस' के नाम से पार्टी का बड़ा धड़ा इन्दिरा के हाथ आ गया. राजनीतिक चिन्तन के बजाय काँग्रेस में 'क्विक फ़िक्स' समाधानों की शुरुआत यहीं से हुई. फिर जो होना था, हुआ. 1975 में इमर्जेन्सी लगी. 1977 में जनता पार्टी के हाथों हुई हार के बाद 1978 में काँग्रेस (अर्स) और काँग्रेस (इन्दिरा) के तौर पर पार्टी फिर टूटी. जो काँग्रेस हम आज देख रहे हैं, वह वही काँग्रेस है, जो इन्दिरा गाँधी के हाथ में रह गयी थी और एनसीपी के रूप में एक और टूट झेल कर फड़फड़ा रही है.

काँग्रेस : राजनीतिक ग़लतियों का लम्बा सिलसिला

पंजाब में अकालियों से निपटने के लिए काँग्रेस ने संत जरनैल सिंह भिंडराँवाले के रूप में जिस 'क्विक फ़िक्स' को आज़माया, उसने अस्सी के दशक में पंजाब को आतंकवाद की गम्भीर समस्या में उलझा दिया. हिन्दुओं को चुन-चुन कर आतंकवाद का निशाना बनाया जाने लगा और हिन्दुओं की रक्षा और एकजुटता के नाम पर विश्व हिन्दू परिषद ने देश भर में 'एकात्मता यात्राओं' की शुरुआत की. हिन्दुओं की इस नयी गोलबन्दी की संघ की योजना को भाँपने मे काँग्रेस न केवल पूरी तरह नाकाम रही, बल्कि इन्दिरा गाँधी के दौर में उसने संघ के लोगों के महिमामंडन समेत अपने आप को 'हिन्दू' दिखाने के लिए कई कोशिशें कीं. इन्दिरा गाँधी की हत्या के बाद भड़के सिख-विरोधी दंगों से हुई बदनामी से डरी काँग्रेस ने मुसलमानों में तनाव भड़कने के डर से 1985 में शाहबानो मामले में एक और 'क्विक फ़िक्स' की कोशिश की. नतीजतन कुछ समय बाद राम जन्मभूमि आन्दोलन ने ज़ोर पकड़ लिया. काँग्रेस ने अयोध्या में 'शिलान्यास' करा कर नुक़सान की भरपाई की फिर 'क्विक फ़िक्स' कोशिश की, लेकिन ब्राह्मणों समेत बड़े पैमाने पर हिन्दू काँग्रेस का साथ छोड़ गये. कांशीराम और मायावती के उभार के साथ दलित पहले ही छिटक चुके थे. कमज़ोर पड़ती काँग्रेस को देख मुसलमान मुलायम सिंह के साथ हो लिये और 1992 में बाबरी मसजिद ध्वंस ने तो पूरे देश में मुसलमानों को काँग्रेस से काट दिया.

कहाँ जाना है, क्या करना है, पता नहीं!

उसके बाद से आज तक काँग्रेस न अपनी दिशा खोज पायी और न ही शायद उसने कभी खोजने की कोशिश की. न ही उसमें राजनीतिक चुनौतियों का सामना करने, उन्हें जीतने का कोई संकल्प, कोई एहसास दिखता है. वरना पहले उड़ीसा में गिरधर गमांग जैसे पुराने काँग्रेसी के साथ छोड़ देने, फिर असम में हिमंता बिस्व सरमा को खो देने, फिर अरुणाचल में सरकार गँवाने के बाद वह उत्तराखंड में फिर वैसी ही स्थितियों का सामना न कर रही होती!

Not only magic of Prashant Kishore, Congress needs to do much more

तो काँग्रेस की बीमारी क्या सिर्फ़ उत्तर प्रदेश है? क्या प्रशान्त किशोर की 'क्विक फ़िक्स' चिप्पियों से काँग्रेस का कोई भला होगा? सिवा इसके कि पहले से उसकी सैकड़ों पैबन्द लगी तसवीर पर कुछ चिप्पियाँ और चिपक जायेंगी. 'वोट गुरू' तो ठीक है, लेकिन काँग्रेस को असल में चाहिए राजनीतिक चिन्तकों की टीम, जिसके पास दृष्टि हो, दिशा हो, कार्यक्रम हो और स्पष्ट लक्ष्य हो, टाइमलाइन हो और रोडमैप हो. लेकिन यह सब उसके पास बरसों से नहीं है, उसकी आदत में ही नहीं है. काँग्रेस की असली समस्या यही है. जब तक काँग्रेस इसका समाधान नहीं खोजती, तब तक वह इस आस में बैठी रहे तो बस बैठी रहे कि शायद बिल्ली के भाग्य से छींका कभी टूटे! मुँह ढक के सोइए, 'टीना' बड़ी चीज़ है!
http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi
'राग देश' के इस लेख को कोई भी कहीं छाप सकता है. कृपया लेख के अन्त में raagdesh.com का लिंक लगा दें.
'राग देश' ईमेल पर मंगाएँ
ADD COMMENT
Most Viewed
muslim-population-myth-and-reality

क्यों बढ़ती है मुसलिम आबादी?
  तो साल भर से रुकी हुई वह रिपोर्ट अब जारी होनेवाली है! ...
Posted On  24th January 2015 2:21
economic-backwardness-literacy-and-muslim-population-growth

मुसलिम आबादी मिथ, भाग-दो!
मुसलिम आबादी का मिथ - भाग दो! पहला भाग कब आया? शायद 'राग द...
Posted On  27th August 2016 7:47
can-demonetisation-curb-black-money

तो क्या ख़त्म हो जायेगा काला धन?
बस एक महीने पहले ही मैंने 'राग देश' में लिखा था कि कुछ ल...
Posted On  12th November 2016 12:35
मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
त्वरित टिप्पणी
तीन तलाक़ और नयी सोशल इंजीनियरिंग तीन तलाक़ पर फ़ैसले के बाद क्या अब एक नयी सोशल इंजीनियरिंग की शुरुआत होगी? और अगर ऐसा हुआ तो क्या देश की राजनीति में हम एक नया मोड़ देखेंगे? ठीक वैसे ही जैसे मंडल के बाद दलित-पिछड़ा राजनीति के बिलकुल नये समीकरण देखे गये थे. हालाँकि पिछले तीन साल में [..] Read More
Follow Us On Facebook

Recent Posts