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Tag Archives: Muslim Personal Law Board

Oct 17
कामन सिविल कोड से क्यों डरें?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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हिन्दुओं ने तो ज़्यादातर सामाजिक सुधारों को स्वीकारना शुरु कर दिया, लेकिन मुसलमानों ने पर्सनल लाॅ को 'धर्म की रक्षा' का सवाल बना कर अपनी अलग पहचान और अस्तित्व का मुद्दा बना लिया और वह उसमें किसी भी बदलाव का विरोध करते रहे. 1985 का शाहबानो मामला इसकी चरम परिणति थी, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने अगर कट्टरपंथी मुसलमानों के सामने घुटने न टेके होते तो आज शायद देश में आम मुसलमानों की स्थिति पहले से कहीं बेहतर होती!


SC seeks status on Uniform Civil Code - Raag Desh 171015.jpg
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जो बहस पचास-साठ साल पहले ख़त्म हो जानी चाहिए थी, हम आज तक उसे शुरू ही नहीं कर पाये हैं! वह बात हो गयी होती तो देश अब तक जाने कहाँ आगे बढ़ गया होता. इस तरह धार्मिक पहचानों में फँसा-धँसा न होता! ऐसी अल्लम-ग़ल्लम लंतरानियाँ न सुनने को मिलतीं, शायद तब ऐसी ज़मीन ही न मौजूद होती कि धर्म के नाम पर फ़सलें काटी जा सकतीं, शायद तब पुराने ज़मानों को आज इक्कीसवीं सदी में खींच लाने की वकालत कर सकने की बात भी कोई न सोचता!

Uniform Civil Code could have brought a Positive Change in India!

तब बदल गयी होती सोच!

और तब शायद गोद लेने के नये नियमों को लेकर आज 'मिशनरीज़ आॅफ़ चैरिटी' (Missionaries of Charity) के सामने आस्था का संकट न खड़ा हुआ होता! तब शायद ससुर के बलात्कार की शिकार इमराना और आरिफ़-गुड़िया-तौफ़ीक़ के मामलों का फ़ैसला फ़तवों से नहीं, क़ानून से होता! तब शायद खाप पंचायतों के पास भी संस्कृति और परम्पराओं का बहाना न होता, अगर हमने कामन सिविल कोड (Uniform Civil Code) को अपना लिया होता! तब शायद हम अब तक वाक़ई बहुत आधुनिक देश बन गये होते, हर मामले में बराबरी का समाज बना पाने की तरफ़ हम तेज़ी से आगे बढ़े होते, पोंगापंथ को न तर्क मिल पाते और न धर्म के नाम पर लोगों को हाँका-भड़काया जा सकता था. कामन सिविल कोड ने देश और समाज की तस्वीर और सोच बदल दी होती.

Strange Position taken by Missionaries of Charity!

मिशनरीज़ आॅफ़ चैरिटीज़ की बात पर हैरानी!

बताइए, हैरानी होती है कि आज के ज़माने में 'मिशनरीज़ आफ़ चैरिटी' (Missionaries of Charity) को यह बात स्वीकार नहीं कि कोई अकेला व्यक्ति बच्चे को गोद ले सकता है! इसमें उनका धर्म आड़े आ जाता है! उनका कहना है कि ईसाई धर्म के अनुसार केवल विवाहित दंपति को ही बच्चों को गोद दिया जा सकता है. उन्हें आशंका है कि अकेले रहनेवाले पुरुष या महिला समलैंगिक भी हो सकते हैं और उनके हाथों में बच्चे को सौंपना धर्म-विरुद्ध होगा! क्योंकि ईसाई धार्मिक मान्यताओं में समलैंगिकता का पूरी तरह निषेध है.

अजीब हास्यास्पद तर्क है! इस बात की क्या गारंटी है कि आज विवाहित दंपति बच्चे को गोद लेने के बाद कल को तलाक़, मृत्यु या किसी विवाद के चलते अकेले नहीं हो जायेंगे? और विवाहित होना क्या समलैंगिक न होने की गारंटी देता है? क्या विवाहित लोग विवाहेतर समलैंगिक रिश्ते नहीं बना सकते? या भविष्य में विवाह-विच्छेद होने पर वे कभी समलैंगिक रुझान की तरफ़ नहीं बढ़े सकते? आज की नयी अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना में जब दुनिया भर में महिलाओं और पुरुषों के बीच नौकरी, रोज़गार, कारोबार, घर-परिवार में निजी आज़ादी को लेकर रिश्ते नये सिरे से परिभाषित हो रहे हैं, वहाँ चीज़ों को सदियों पुराने धार्मिक चश्मों से कैसे देखा जा सकता है?

Supreme Court asked Govt to take Quick Decision on Uniform Civil Code

सुप्रीम कोर्ट का सवाल

मिशनरीज़ आॅफ़ चैरिटीज़ का यह विवाद बड़े मौक़े से खड़ा हुआ है, जब इसी हफ़्ते सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि कामन सिविल कोड (Uniform Civil Code) लाने के बारे में उसका नज़रिया क्या है? देश की अदालतें पहले भी कई बार कामन सिविल कोड की ज़रूरत पर ज़ोर देती रही हैं. लेकिन अब तक की तमाम सरकारें पर्सनल लाॅ की उन बेड़ियों को छेड़ने भर की कोशिशों से भी बचती रही हैं, जिन्हें अँग्रेज़ डाल गये थे. इसी का नतीजा है कि आज हिन्दुओं, सिखों, जैनियों, बौद्धों के लिए अलग हिन्दू क़ानून और मुसलमानों, ईसाइयों, पारसियों के लिए अलग-अलग पर्सनल लाॅ लागू हैं. और जब भी इनकी जगह एक समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) बनाने की बात होती है, बड़ा बखेड़ा खड़ा हो जाता है.

Opposition to Uniform Civil Code comes in the name of Religion!

धर्म के नाम पर विरोध!

आज़ादी के बाद जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और क़ानून मंत्री बाबासाहेब आम्बेडकर ने कामन सिविल कोड (Uniform Civil Code) तैयार करने की कोशिश की तो मुसलिम नेताओं की घोर आपत्तियों के कारण उन्हें हाथ खींचना पड़ा. तब नेहरू को मजबूर हो कर अपने आपको हिन्दू कोड बिल तक ही सीमित करना पड़ा, लेकिन तब भी बहुविवाह निषेध, महिलाओं को तलाक़ के अधिकार और अन्तर्जातीय विवाह जैसे कुछ मुद्दों पर उन्हें हिन्दूवादी संगठनों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था.

हालाँकि उसके बाद से हिन्दुओं ने तो ज़्यादातर सामाजिक सुधारों को स्वीकारना शुरु कर दिया, लेकिन मुसलमानों ने पर्सनल लाॅ को 'धर्म की रक्षा' का सवाल बना कर अपनी अलग पहचान और अस्तित्व का मुद्दा बना लिया और वह उसमें किसी भी बदलाव का विरोध करते रहे. 1985 का शाहबानो मामला इसकी चरम परिणति थी, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने अगर कट्टरपंथी मुसलमानों के सामने घुटने न टेके होते तो आज शायद देश में आम मुसलमानों की स्थिति पहले से कहीं बेहतर होती!

Shahbano Case: A historical mistake by Muslim Leadership

मुसलमानों की कूढ़मग़ज़ ज़िद!

मुसलमानों की उस कूढ़मग़ज़ ज़िद ने न सिर्फ़ तब आम हिन्दू मानस में क्षोभ पैदा किया, बल्कि हिन्दूवादी ताक़तों को अपना आधार बढ़ाने के लिए नये तर्क भी दिये. इसी के बाद राम जन्मभूमि आन्दोलन ने ज़ोर पकड़ना शुरू किया और आम हिन्दू इस बात से सहमत नज़र आने लगा कि अगर शाहबानो मामला धार्मिक आस्था का सवाल है, तो राम मन्दिर भी धार्मिक आस्था का सवाल है! और शायद यह शाहबानो के जवाब में हुए 'हिन्दुत्व उदय' का ही नतीजा था कि सितम्बर 1987 में राजस्थान के दिवराला में रूपकँवर के सती होने के बाद हिन्दुओं में सती प्रथा को फिर से महिमामंडित करने की कोशिश भी शुरू हुई, हालाँकि उसे बहुत समर्थन नहीं मिल पाया और आख़िर अगले साल सती निरोधक क़ानून बन गया.

Rigid and Regressive attitude of Muslim Personal Law Board!

इतिहास की भूल से कुछ नहीं सीखा!

दुर्भाग्य की बात है कि मुसलिम पर्सनल लाॅ बोर्ड और मुसलिम उलेमाओं ने इतिहास की उस भूल से कुछ नहीं सीखा. इमराना और गुड़िया के मामलों में फिर वही कठमुल्ला रवैया अपनाया गया. एक बार में तीन तलाक़ को लेकर मुसलिम महिलाओं की पीड़ा को बोर्ड आज तक मानने-समझने को तैयार नहीं है. हिन्दू अगर सती प्रथा जैसी बुराई रोकने की ज़रूरत समझ सकते हैं तो मुसलमान 'तीन तलाक़' जैसी चीज़ ख़त्म करने को क्यों तैयार नहीं होते?

Uniform Civil Code has nothing to do with Religious belief!

कामन सिविल कोड नहीं है धार्मिक आस्था का सवाल!

और उससे भी ज़्यादा दुर्भाग्य की बात यही है कि अभी तक देश में कभी कामन सिविल कोड (Uniform Civil Code) पर गम्भीर चर्चा भी नहीं हुई. क्योंकि राजनीति ऐसा करने नहीं देती! क्योंकि धार्मिक आस्थाओं के नाम पर पर्सनल लाॅ से छेड़छाड़ न किये जाने का शोर उठने लगता है! लेकिन धार्मिक आस्थाओं का विवाह, तलाक़, उत्तराधिकार, गोद लेने और महिलाओं के अधिकारों से क्या लेना-देना? यह सब धार्मिक प्रश्न कहाँ से हुए? यह सब सामाजिक सवाल हैं और जिनका हल सामाजिक पैमानों से ही ढूँढा जाना चाहिए, जो किसी एक समाज में अलग-अलग नहीं हो सकते.

अलग धर्म, अलग अधिकार का तुक नहीं!

लोकतंत्र में हर नागरिक बराबर है और उसके अधिकार भी बराबर हैं. ऐसे में धार्मिक आस्था के नाम पर कोई धर्म अपने समुदाय के लोगों को उन अधिकारों से वंचित नहीं कर सकता, यह बुनियादी बात है. पर्सनल लाॅ हटने से अगर देश की हर महिला को समान अधिकार मिलते हैं, देश के हर बच्चे के लिए उत्तराधिकार के समान प्रावधान लागू होते हैं और हर व्यक्ति अगर समान तरीक़े से गोद ले सकता हो, तो इसमें धर्म बीच में कहाँ आता है? एक सेकुलर राज्य में हर धर्म के लोगों को अपने धर्म के अनुसार पूजा-पद्धति अपनाने, रीति-रिवाज, संस्कृति और धार्मिक प्रथाओं के पालन की स्वतंत्रता है और इसकी हर क़ीमत पर रक्षा भी होनी चाहिए. लोग अपनी-अपनी धार्मिक प्रथाओं से विवाह करें, बच्चे का नामकरण करें, अक्षर संस्कार करें, बिलकुल ठीक. लेकिन तलाक़ के बाद अलग-अलग धर्म की महिला के लिए मुआवज़े के अलग-अलग धार्मिक आधार हों, यह बात कैसे सही मानी जाये?

पिंजड़े से बाहर निकलें मुसलमान!

बहरहाल, कामन सिविल कोड (Uniform Civil Code) पर अब गम्भीरता से चर्चा होनी चाहिए. हाँ, यह अलग बात है कि इस समय माहौल ऐसी चर्चा के लिए बहुत अनुकूल नहीं है और अपनी घोषित नीति के बावजूद नरेन्द्र मोदी सरकार शायद इस मुद्दे को तुरन्त छेड़ना न चाहे, लेकिन इस पर खुले मन से चर्चा की ज़रूरत तो है. मुसलमानों को भी इस बारे में विवेक से सोचना चाहिए क्योंकि इसका सबसे ज़्यादा विरोध अकसर उनकी ही तरफ़ से होता है.

दुर्भाग्य से मुसलिम समाज पर पुरातनपंथी तत्वों और धर्मगुरुओं की पकड़ बड़ी गहरी है. जिस दिन पर्सनल लाॅ ख़त्म हो जायेगा, उस दिन बहुत-से मामलों का निपटारा फ़तवों से नहीं, क़ानून से होने लगेगा और मुसलिम समाज पर धर्मगुरुओं का नियंत्रण घटने लगेगा और उनकी भूमिका सिर्फ़ धार्मिक कार्यों और समारोहों तक ही सीमित रह जायेगी. यही कारण है कि धर्म और शरीअत की दुहाई देकर वे मुसलमानों को पिंजड़े में रख कर अपना वर्चस्व बनाये रखने की कोशिश करते हैं.

मुसलमानों को यह बात समझनी चाहिए और अब इस पिंजड़े से बाहर आना चाहिए. खुली हवा में उड़ान भरे बग़ैर तरक़्क़ी का आसमान भला कैसे छुआ जा सकता है?

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http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi

इसे भी पढ़ें: Why I Support The Uniform Civil Code | Tariq Ansari | Click to Read.

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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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