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Feb 28
काँग्रेस को चाहिए एक टच स्क्रीन!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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Feb 28
7:41 am

राहुल गाँधी छुट्टी से या कि 'चिन्तन' से लौटेंगे, तो काँग्रेस के सामने नया रास्ता होगा या कि कोई बीच का रास्ता होगा या कि कुछ नहीं बदलेगा या कि राहुल अपनी राह पकड़ेंगे और पार्टी अपनी राह पकड़ेगी? एक, दो, तीन, चार; किस जवाब पर 'टिक' लगेगी? सबको इन्तज़ार है. पार्टी के भीतर भी और पार्टी के बाहर भी! देश क़लम-दवात से चल कर टच स्क्रीन पर आ चुका है! तो आप कब तक पुरानी हैंडराइटिंग में लिखते रहेंगे. कौन पढ़ेगा उसे? काँग्रेस को आज टच स्क्रीन चाहिए. उसके बिना वह कैसे जनता को और जनता कैसे उसे 'टच' कर पायेगी?


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काँग्रेस बाट जोह रही है! एक नये कायाकल्प का इन्तज़ार है! एक फ़ैसला रुका हुआ है! उस रुके हुए फ़ैसले पर क्या फ़ैसला होता है, इसका इन्तज़ार है! कहीं अटकलें चल रही हैं, कहीं चिन्तन चल रहा है, कहीं चिन्ता हो रही है, क्या होगा, कैसे होगा? पुराने ज़माने के कामराज प्लान जैसा कोई प्लान आयेगा? नेताओं की पुरानी पीढ़ी हटेगी, नयी टीम आयेगी? राहुल छुट्टी से या कि 'चिन्तन' से लौटेंगे, तो काँग्रेस के सामने नया रास्ता होगा या कि कोई बीच का रास्ता होगा या कि कुछ नहीं बदलेगा या कि राहुल अपनी राह पकड़ेंगे और पार्टी अपनी राह पकड़ेगी? एक, दो, तीन, चार; किस जवाब पर 'टिक' लगेगी? सबको इन्तज़ार है. पार्टी के भीतर भी और पार्टी के बाहर भी!

गले में हार का हार, बार-बार

कहने को भले ही ऊपर विकल्प चार दिख रहे हों, लेकिन काँग्रेस के पास तो एक ही विकल्प है! बस राहुल गाँधी! पर काँग्रेस की समस्या का समाधान क्या यही? और काँग्रेस की समस्या, दरअसल, है क्या? असल में काँग्रेस की समस्या यही है कि उसे यही नहीं पता कि उसकी Congress Waits for Rahul Gandhi to Return from Sabbaticalसमस्या क्या है? वरना ऐसा क्यों कि उत्तर प्रदेश और बिहार से काँग्रेस चौबीस-पच्चीस साल पहले साफ़ हो गयी और अब तक उसके माथे पर कभी शिकन तक नहीं दिखी! 1969 में तमिलनाडु राज्य बनने के बाद से काँग्रेस वहाँ कभी सत्ता में आयी ही नहीं! यानी पैंतालीस साल से ज़्यादा हो गये, पार्टी वहाँ कभी अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पायी. पश्चिम बंगाल में आख़िरी काँग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धार्थशंकर रे थे, जो 1977 में हटे. उसके बाद से काँग्रेस तो वहाँ कभी कुछ नहीं कर पायी, लेकिन काँग्रेस से अलग हुईं ममता बनर्जी ने वाम मोर्चा के चौंतीस साल पुराने क़िले को ध्वस्त कर दिया. गुजरात ने भी 1995 के बाद कोई काँग्रेसी मुख्यमंत्री नहीं देखा, बीस साल हो गये. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी पिछले तीन चुनावों से काँग्रेस लगातार हार का हार पहनती रही! (more…)
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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