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May 09
इस ‘ड्रमेटिक्स’ से आगे देखिए!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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देश में बहुत कुछ हो रहा है. मोदी सरकार के एक साल पूरे होने वाले हैं. बड़ी तीखी बहस हो रही है इस पर. सरकार ने एक साल में क्या किया? राहुल गाँधी नये जोश में दिख रहे हैं. वह ख़ुद तो नहीं, लेकिन उनका दफ़्तर ट्विटर पर आ चुका है! लोग पूछ रहे हैं कि राहुल तो काफ़ी बदले हुए दिख रहे हैं, लेकिन वह काँग्रेस की क़िस्मत कितनी बदल पायेंगे? केजरीवाल अपने पुराने मीडिया सिन्ड्रोम में लौट आये हैं. और मीडिया? वह केजरीवाल ही नहीं, सबकी गालियाँ खा रहा है, ख़ासकर, टीवी चैनल वाले! गजेन्द्र सिंह की आत्महत्या, फिर कुमार विश्वास, फिर नेपाल और फिर सलमान ख़ान, टीवी वालों के लिए 'ख़बरें' आती रहीं, और टीवी वालों को लताड़ पड़ती रही कि ख़बर नहीं, वह सिर्फ़ ड्रामेबाज़ी करते हैं! लेकिन न टीवी वाले बदले, न लोगों ने अपने चैनल बदले!


Gajendra Suicide, Politics, Dramatics and Media-raagdesh.jpg
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देश में बहुत कुछ हो रहा है. मोदी सरकार के एक साल पूरे होने वाले हैं. बड़ी तीखी बहस हो रही है इस पर. सरकार ने एक साल में क्या किया? राहुल गाँधी नये जोश में दिख रहे हैं. वह ख़ुद तो नहीं, लेकिन उनका दफ़्तर ट्विटर पर आ चुका है! लोग पूछ रहे हैं कि राहुल तो काफ़ी बदले हुए दिख रहे हैं, लेकिन वह काँग्रेस की क़िस्मत कितनी बदल पायेंगे? अरविन्द केजरीवाल अपने पुराने मीडिया सिन्ड्रोम में लौट आये हैं. और मीडिया? वह केजरीवाल ही नहीं, सबकी गालियाँ खा रहा है, ख़ासकर, टीवी चैनल वाले! राजस्थान के किसान गजेन्द्र सिंह कल्याणवत की आत्महत्या, फिर कुमार विश्वास, फिर नेपाल भूकम्प और फिर सलमान ख़ान, टीवी वालों के लिए 'ख़बरें' आती रहीं, और टीवी वालों को लताड़ पड़ती रही कि ख़बर नहीं, वह सिर्फ़ ड्रामेबाज़ी करते हैं! लेकिन न टीवी वाले बदले, न लोगों ने अपने चैनल बदले!

किसे इन्साफ़ मिला?

बड़े सवाल हैं. और इनमें से बहुत-से सवाल सही हैं. लेकिन इन सवालों से ज़्यादा बड़े कुछ और सवाल है. जैसे कौन सोचे? कौन सुने? कौन माने? कौन मनवाये? और ड्रामा कहाँ नहीं है. पूरा देश ही 'ड्रमेटिक्स' पर चल रहा है. अब सलमान का ही मामला ले लीजिए. सारे शोर-शराबे में यह बात उठ कर भी गुम हो गयी कि सलमान को जो सज़ा मिली, वह तो मिली, लेकिन उन बेचारों को क्या मिला, जिनकी ज़िन्दगी इस हादसे में तबाह हो गयी? एक सड़क दुर्घटना के मामले में फ़ैसला आने में तेरह साल क्यों लग गये और इस तेरह साल बाद हुए इन्साफ़ के बाद क्या सचमुच उन ग़रीब परिवारों को इस इन्साफ़ से कुछ मिला?

सलमान से सहानुभूति और क़ानून पर चुप्पी!

और इससे भी बड़ी बात यह कि इतने बड़े मामले के बाद भी क्या देश में कहीं यह बहस उठी कि मोटर व्हिकिल क़ानून में ऐसे कड़े बदलाव हों कि लोगों को शराब पी कर या लापरवाही से गाड़ी चलाने में सचमुच डर लगे! लेकिन इसे कौन सोचे? पुरू राजकुमार, अलिस्टेयर परीरा, संजीव नन्दा से लेकर सलमान ख़ान तक ऐसे सैंकड़ों मामले हैं, जिनमें सैंकड़ों ग़रीब मारे गये. लेकिन किसी को क़ानून का डर है क्या? क्यों डर हो, जब सज़ा मुश्किल से सिर्फ़ पाँच प्रतिशत मामलों में ही हो पाती है! और इससे भी बड़ी विडम्बना क्या होगी कि जो सरकार अपनी पिछली सरकार के 'निकम्मेपन' की मार्केटिंग पूरी दुनिया में करते नहीं थक रही है, वह अपने एक वरिष्ठ मंत्री की सड़क हादसे में मौत के एक साल बाद भी मोटर व्हिकिल क़ानून में बदलाव के लिए कुछ भी नहीं कर सकी! तो सलमान के मामले पर तमाशा ख़ूब हुआ, फ़िल्म इंडस्ट्री से लेकर राज ठाकरे तक को सलमान से सहानुभूति हो गयी, उनकी ज़मानत के क़ानूनी दाँव-पेंच पर ख़ूब चर्चा हुई, लेकिन इस पर कोई चिन्ता नहीं दिखी कि क़ानून कड़ा किया जाना चाहिए, फ़ैसले जल्दी होने का इन्तज़ाम हो और ऐसा कुछ किया जाये कि लोग क़ानून की परवाह करें. लेकिन ऐसा कौन करेगा? अगर ऐसा हो गया तो क़ानून सबको नापने लगेगा? अब अभी मध्य प्रदेश में व्यापम घोटाले की चर्चा है. अभी इस घोटाले से जुड़े आठवें व्यक्ति की मौत की ख़बर आयी है. ये सभी मौतें रहस्यमय हैं. आपको याद होगा कि कुछ बरस पहले उत्तर प्रदेश में एनआरएचएम घोटाले के सामने आने पर एक के बाद कितनी रहस्यमय मौतें हुई थीं. क्या यह महज़ संयोग है? और केवल यही क्यों, जितने भी बड़े मामले हैं, उनमें से किसी एक मामले में भी लीपापोती न हो, ईमानदारी से जाँच हो जाये, यह शायद अब तक की सबसे बड़ी ख़बर होगी!

नेपाल में 'ड्रमेटिक्स' की 'ट्रेजेडी!'

तो जाँच कहाँँ होती है, जाँच का ड्रामा होता है! और अब तो राजनीति भी 'ड्रमेटिक्स' पर चल रही है! मुद्दे कहाँ है? मुद्दे लम्बे चलते हैं, 'ड्रमेटिक्स' लम्बी चल ही नहीं सकती. लोग बोर हो जाते हैं. कल वह दिखाया था, आज कुछ दूसरा दिखाओ! नरेन्द्र मोदी पिछला चुनाव बड़े धमाके से जीते. सरकार की शुरुआत भी बड़े धमाके से हुई. पूरे साल देश ने मोदी की धमाकेदार विदेश यात्राएँ देखीं. लगा जैसे कि वह विदेश में भी कोई चुनाव लड़ रहे हैं! दुनिया भर में उनकी धूम मची. लोग कह रहे हैं कि सरकार की विदेश नीति धमाकेदार रही, उसे सफलता भी धमाकेदार मिली! लेकिन नेपाल में बैठ गयी. मीडिया ने भूकम्प में मोदी का ऐसा पीआर किया या उससे कराया गया कि मोदी की पिछली नेपाल यात्रा ने जो ज़मीन तैयार की थी, वह पैर के नीचे से निकल गयी. 'ड्रमेटिक्स' में कभी-कभी ट्रेजेडी भी होती है! मीडिया की कवरेज से नेपाल में लोग नाराज़ हुए. हालाँकि यह भी सही है कि भारतीय मीडिया की वजह से ही नेपाल के भयावह भूकम्प की तसवीर दुनिया के सामने आयी और फिर सारी दुनिया से राहत टीमें वहाँ पहुँचनी शुरू हो गयी. लेकिन इसके बावजूद यह सच है कि मीडिया कवरेज कहीं-कहीं बहुत अखरनेवाली थी. और नेपाल ही नहीं, बहुत-से मामलों में मीडिया कवरेज से अकसर लोगों को शिकायत रहती है. और ये शिकायतें अकसर बहुत ग़लत भी नहीं होती! मीडिया के अन्दर बैठे लोग भी यह जानते हैं और मानते हैं! फिर क्यों नहीं सुधरता मीडिया? कैसे सुधरे? और कौन पहले सुधरे? कौन शुरुआत करे? कोई तंत्र नहीं है जो यह काम करे! फिर यह भी पूछना चाहिए कि मीडिया कम्पनियाँ अपने पत्रकारों के प्रशिक्षण के लिए क्यों एक धेला भी ख़र्च नहीं करतीं? बुनियादी सवाल हैं, जिन पर कभी बात नहीं होती!

कहाँ गया 'स्वच्छ भारत?'

बुनियादी सवालों पर मोदी सरकार भी ज़रूर कुछ न कुछ कर रही होगी, लेकिन सरकार को भी मालूम है और सबको मालूम है कि बुनियादी मामलों में 'अच्छे दिन' आने में बड़ा समय लगता है. एक साल में कुछ हो नहीं सकता! फिर लोग क्यों सवाल कर रहे हैं कि 'अच्छे दिन' आ गये क्या और अगर नहीं आये तो कब तक आयेंगे? और शायद ऐसा पहली बार है कि किसी सरकार के एक साल होने पर देश में इतनी तीखी बहस छिड़ी हो कि सरकार ने कैसा काम किया? और सरकार इस कोशिश में लगी हो कि वह अपनी पहली सालगिरह पर कैसे अपने को 'ग़रीब-समर्थक' पैकेजिंग में पेश करे! और दिक़्क़त यह है कि 'कारपोरेट समर्थक' छवि बन जाने के बावजूद कारपोरेट जगत इस बात पर एकमत न हो कि उनके लिए हालात कुछ बदल पाये हैं या नहीं! अच्छा, बड़ी बातें नहीं हुईं, तो कोई बात नहीं. छोटी बातों का क्या हुआ? 'स्वच्छ भारत' अभियान को अब कोई क्यों याद नहीं करता? बड़ा अच्छा अभियान था. 'ड्रमेटिक्स' के बजाय ईमानदारी से किया जाता तो देश में बहुत कुछ बदल सकता था. मोदी ने चुनाव के पहले दहाड़ कर कहा था कि 2015 तक संसद से अपराधी तत्वों का सफ़ाया हो जायेगा. ऐसे किसी बिल की चर्चा आज तक नहीं सुनी! चंदे को लेकर केजरीवाल पर बड़ा हमला बोला गया, लेकिन काले धन के ख़िलाफ़ सरकार जो क़दम उठाने को सोच रही है, उसमें राजनीतिक दलों को मिलनेवाले चंदों की कोई चर्चा क्यों नहीं है?

राहुल, केजरीवाल और 'ड्रमेटिक्स!'

उधर, राहुल गाँधी हर दिन नये-नये मुद्दे उठा रहे हैं. आज यहाँ, तो कल वहाँ दिख रहे हैं. इससे तुरत-फुरत मीडिया कवरेज तो मिल जाती है, पार्टी में तालियाँ बज जाती हैं, लेकिन इसके आगे क्या? पार्टी के पास कार्यक्रम क्या है, दिशा क्या है, लक्ष्य क्या हैं, और टाइमलाइन क्या है, यह सब तय किये बिना पार्टी कैसे खड़ी हो पायेगी. काँग्रेस को पुनर्जीवित होने के लिए एक लम्बा और ठोस कार्यक्रम और गम्भीर नेतृत्व चाहिए, रोज़-रोज़ की 'ड्रमेटिक्स' नहीं! अरविन्द केजरीवाल को अपनी पिछली पारी में यह समझ में ही नहीं आया था कि उनकी कौन-कौन सी 'ड्रमेटिक्स' ने उनको अचानक उनको जनता की आँखों से उतार दिया था. अपनी दूसरी पारी में फिर वह वही पुरानी ग़लतियाँ दोहरा रहे हैं. सच है, जो चली जाये, वह आदत ही क्या?
(लोकमत समाचार, 9 मई 2015) http://raagdesh.com
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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