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Jul 03
मदरसों को अब बदलना चाहिए
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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मदरसों को लेकर महाराष्ट्र में उठे ताज़ा विवाद से यह सवाल एक बार फिर चर्चा में है कि आख़िर मदरसों को आधुनिक शिक्षा से परहेज़ क्यों है? समय के साथ उन्हें क्यों नहीं बदलना चाहिए?


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मदरसे एक बार फिर विवादों में हैं! इस बार बवाल इस सवाल पर है कि मदरसे स्कूल हैं या नहीं? महाराष्ट्र सरकार ने फ़ैसला किया है कि वह उन मदरसों को स्कूल नहीं मानेगी, जहाँ अँगरेज़ी, गणित, विज्ञान और समाजशास्त्र जैसे विषय नहीं पढ़ाये जाते. इन मदरसों में पढ़नेवाले छात्रों को सरकार 'स्कूल न जानेवाले' बच्चों में गिनेगी. सरकार पर आरोप लगे कि वह साम्प्रदायिक मंशा से काम कर रही है और मदरसों को ख़त्म करना चाहती है. हंगामा मचा. तो सरकार ने सफ़ाई दी कि केवल मदरसों ही नहीं, बल्कि उन वैदिक पाठशालाओं और गुरुद्वारों व चर्चों द्वारा संचालित उन शिक्षण संस्थानों को भी सरकार 'स्कूल' नहीं मानेगी, जहाँ ये चार विषय नहीं पढ़ाये जाते. राज्य सरकार का कहना है कि राज्य के 1889 मदरसों में से 536 मदरसे इन विषयों को पढ़ाते हैं और उन्हें स्कूल माना जायेगा.

300 साल पुराना 'दर्स-ए-निज़ामी!'

बहरहाल, अब अगर राज्य सरकार जो बात कह रही है, उस पर अमल करती है, तो यह विवाद ख़त्म हो जाना चाहिए. लेकिन सवाल यह है कि राज्य के बाक़ी तेरह सौ से ज़्यादा मदरसे आधुनिक शिक्षा के लिए ज़रूरी इन विषयों को क्यों नहीं पढ़ाते या पढ़ाने की ज़रूरत क्यों नहीं समझते? यह हाल केवल महाराष्ट्र का ही नहीं, बल्कि देश भर का है. हालाँकि अाज देश में क़रीब बीस फ़ीसदी से ज़्यादा मदरसे ऐसे हैं, जिन्हें आधुनिक शिक्षा से परहेज़ नहीं और वे अपने पाठ्यक्रम में धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ अँगरेज़ी, विज्ञान, समाजशास्त्र, हिन्दी और क्षेत्रीय भाषा और कम्प्यूटर को शामिल कर चुके हैं. इनमें उत्तर प्रदेश के अति प्रतिष्ठित नदवत-उल-उलेमा समेत देश के कई राज्यों के कई बड़े मदरसे शामिल हैं, जिनके छात्र पढ़-लिख कर आइएएस अफ़सर तक बने. इनमें से कुछ मदरसों में हिन्दू बच्चे भी पढ़ते हैं. लेकिन देश के क़रीब अस्सी फ़ीसदी मदरसे 'परम्परावादी' हैं, जो तीन सौ साल पहले बनाये गये पाठ्यक्रम 'दर्स-ए-निज़ामी' की तर्ज़ पर ही कमोबेश चलना चाहते हैं और अपने आपको बदलना नहीं चाहते.
क्यों? ज़्यादातर मदरसे अपने आपको बदलना क्यों नहीं चाहते? मदरसों के आधुनिकीकरण की बात बरसों से हो रही है, लेकिन हर बार ऐसे प्रयासों का विरोध क्यों होता है? यूपीए सरकार ने मदरसों की हालत सुधारने और उनके लिए पाठ्यक्रम और परीक्षाओं के मानक तय करने के लिए सेंट्रल मदरसा बोर्ड बनाने की कोशिश की, लेकिन उसे समर्थन नहीं मिल सका! इसी तरह शिक्षा के अधिकार क़ानून के तहत मदरसों को लाये जाने की यूपीए सरकार की कोशिशों का पुरज़ोर विरोध हुआ और अन्ततः सरकार को मदरसों और वैदिक पाठशालाओं जैसी संस्थाओं को इसके दायरे से बाहर रखना पड़ा.

सरकारी दख़ल का डर

ज़्यादातर मदरसे आधुनिकीकरण के लिए उत्साह क्यों नहीं दिखाते? मदरसों को शिक्षा के अधिकार क़ानून के तहत लाये जाने के प्रस्ताव का विरोध क्यों होता है? वैसे देश के कई राज्यों में मदरसा बोर्ड की निगरानी में मदरसे चलते हैं, लेकिन फिर भी सेंट्रल मदरसा बोर्ड बनाने के यूपीए सरकार के प्रस्ताव को उलेमाओं, मदरसा संगठनों और मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड जैसी संस्थाओं के कड़े विरोध के बाद ठंडे बस्ते में क्यों डालना पड़ा. इसलिए कि इन संगठनों को आशंका है कि मदरसे अगर मदरसा बोर्ड या शिक्षा के अधिकार जैसे किसी तंत्र के तहत आ गये तो उनमें सरकार की घुसपैठ के दरवाज़े खुल जायेंगे और धीरे-धीरे मदरसों की स्वायत्ता ख़त्म होती जायेगी और एक दिन ऐसा आयेगा, जब मदरसों का नियंत्रण ही उनके हाथ से निकल जायेगा. और अगर मदरसों पर सरकार का नियंत्रण हो गया तो वह मुसलमानों के समूचे धार्मिक चिन्तन को भी प्रभावित करने लगेगी और साथ ही एक दिन मदरसों का अस्तित्व भी ख़त्म हो जाने की नौबत आ जायेगी.
मदरसे मुख्य रूप से तीन काम करते हैं. एक, ग़रीब मुसलमान बच्चों के शुरुआती जीवन की नींव रखना. मदरसे मुफ़्त शिक्षा का एकमात्र साधन हैं. मदरसों में आनेवाले 80 फ़ीसदी से ज़यादा बच्चे बेहद ग़रीब परिवारों के होते हैं, जो पढ़ाई का ख़र्च नहीं उठा सकते. मदरसों की पढ़ाई चाहे जैसी हो, वह बच्चों को छुट्टा घूम कर बरबाद होने से बचाती तो है! इनमें से ज़्यादातर बच्चे तेरह-चौदह साल की उम्र पार करते-करते पढ़ाई छोड़ अपने पारिवारिक काम धन्धों में लग जाते हैं. दो, मदरसे उलेमाओं, मौलवियों और इमामों की अगली पीढ़ियाँ तैयार करते हैं. धार्मिक प्रवृत्ति के कई परिवार अपने बच्चों को केवल इसी उद्देश्य से मदरसे भेजते हैं कि वह उलेमा या धर्मगुरु बनें. और तीन, मदरसे इस्लामिक धार्मिक व आध्यात्मिक विमर्श के महत्वपूर्ण आधार स्तम्भ हैं. वे उलेमाओं की सत्ता का केन्द्र हैं, जहाँ से वह मुसलिम समाज की रीति-नीति और गति को संचालित करते हैं.

आधुनिक शिक्षा से हिचक क्यों?

उलेमा जानते हैं कि मदरसों की संस्था कमज़ोर हुई तो मुसलिम समाज पर उनकी पकड़ ढीली होती जायेगी. वैसे ही ऐसे मुसलमानों की संख्या काफ़ी है, जो आधुनिक शिक्षा पाने के बाद उलेमाओं के 'प्रभावक्षेत्र' से बाहर चले गये हैं. अब अगर उनकी सत्ता के केन्द्र मदरसे भी उनके हाथ से निकल गये तो वह कहीं के नहीं रहेंगे. इसलिए आधुनिक शिक्षा के साथ धार्मिक शिक्षा के घालमेल के बजाय वे मदरसों को इसलामिक, धार्मिक और आध्यात्मिक शिक्षा के केन्द्र के रूप में ही बनाये रखना चाहते हैं. और जिन मदरसों में आधुनिक शिक्षा है भी, वहाँ किताबी पढ़ाई तो हो जाती है, लेकिन कोई आधुनिक दृष्टिबोध तब भी विकसित नहीं हो पाता क्योंकि बाहरी दुनिया के मुद्दों पर खुले विमर्श की गुंजाइश नहीं होती. इस बारे में 2012 में देवबन्द में हुए राब्ता-ए-मदारिस इसलामिया के सम्मेलन के कुछ प्रस्ताव रोचक हैं. इनमें से एक प्रस्ताव में इस बात पर क्षोभ जताया गया कि जो मुसलमान पश्चिमी प्रभाव (यानी आधुनिक शिक्षा) में पलते-बढ़ते हैं, वह मदरसों या इसलामी शिक्षा की ज़रूरत को ही सिरे से ख़ारिज कर देते हैं. ऐसे ही मुसलमान मदरसों में सुधार की बात करते हैं. यानी साफ़ है कि मदरसा संगठनों को ऐसे शिक्षित मुसलमानों की तरफ़ से ख़तरा महसूस होता है, जो 'पश्चिमी सभ्यता' में रंग गये हैं! हालाँकि फिर भी सम्मेलन ने आधुनिक शिक्षा का विरोध नहीं किया और अपने एक दूसरे प्रस्ताव में कहा कि सरकार अगर मुसलमानों की शिक्षा की हालत सुधारना चाहती है तो (मदरसों के बजाय) उन मुसलिम शिक्षण संस्थानों पर ध्यान दे, जहाँ ज़्यादातर मुसलिम बच्चे पढ़ते हैं. मदरसों में तो केवल दो-तीन फ़ीसदी ही मुसलिम बच्चे आते हैं, उनको लेकर इतनी चिन्ता क्यों?
चिन्ता इसीलिए है कि भले ही सिर्फ़ दो-तीन फ़ीसदी बच्चे ही मदरसों में पढ़ते हों, लेकिन सवाल यह है कि वह क्या पढ़ रहे हैं और क्या बन रहे हैं. मान लिया कि मदरसों का पहला काम धार्मिक शिक्षा देना है, और उलेमाओं की पीढ़ी तैयार करना है, तब भी सवाल यह है कि आज के समय में केवल धार्मिक शिक्षा कौन-सी विश्वदृष्टि देगी? आज समाज और परिवार की पूरी संरचना बदल चुकी है, टेक्नालाजी ने रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के सारे तरीक़े बदल दिये, लोकतंत्र, सामाजिक और लैंगिक बराबरी, शिक्षा और नौकरियों में महिलाओं की भागीदारी से लेकर तमाम मुद्दों पर समाज में नयी चेतना है. धर्मों को इस नयी बयार को महसूस करना चाहिए. कम से कम वैटिकन ने तो महसूस कर लिया कि समय के साथ कुछ चीज़ों को बदलना चाहिए. ईसाई धर्म इसलाम से कहीं पुराना है. फिर भी वह इसलिए बदलाव को तैयार है क्योंकि वह कूपमंडूक नहीं है, उसने आधुनिक दुनिया की ज़रूरतों को जाना और समझा है. इसलिए आज के समय में उलेमाओं के लिए भी अकेली धार्मिक शिक्षा अधूरा ही होगी.

बन्द खिड़कियाँ, वैचारिक कूढ़मग़ज़ी!

ज़ाहिर-सी बात है कि मदरसे अगर आधुनिक शिक्षा से छात्रों को वंचित रखते हैं तो वह उनके लिए नये विचारों की तमाम खिड़कियाँ बन्द कर देते हैं. समाज कैसे बदल रहा है, विज्ञान किस प्रकार पुरानी मान्यताओं को ध्वस्त कर रहा है, आधुनिक अर्थव्यवस्था और नयी सामाजिक संरचना में धर्म की क्या और कितनी भूमिका हो या कोई भूमिका न हो, हज़ारों साल पुराने तौर-तरीक़ों, विचारों और अवधारणों को मौजूदा समय की सच्चाइयों के साथ कैसे देखा और बदला जाना चाहिए, इन जैसे तमाम मुद्दों पर मदरसों के छात्र तभी सोचने लायक़ होंगे, जब उन्होंने आधुनिक शिक्षा की हवा में साँस ली होगी. मदरसे न केवल अपनी सदियों पुरानी वैचारिक कूढ़मग़ज़ी को ही पीढ़ी दर पीढ़ी रटते-रटाते आ रहे हैं, बल्कि अलग-अलग पंथ के मदरसे बचपन में ही छात्रों के मन में मुसलमानों के अलग-अलग पंथों के बारे में वैमनस्य की कसैली विभाजन रेखाएँ भी खींच देते हैं! यह समाज के लिए किधर से उपयोगी शिक्षा हुई? शिक्षा जोड़ने के लिए होनी चाहिए, तोड़ने के लिए नहीं. इस बारे में राब्ता-ए-इसलामिया के एक और प्रस्ताव को देखिए, जो कहता है कि क़ादियानी और ईसाई मिशनरियाँ जिस तरह अपना विस्तार करने में लगे हैं, उसे रोकना होगा. साथ ही 'ग़ैर-मुक़ल्लिदीन' ख़ास कर बरेलवी और शिया समुदायों द्वारा देवबन्द के ख़िलाफ़ जैसी मुहिम चलायी जा रही है, उसका मुक़ाबला करने के लिए हमें उलेमाओं को प्रशिक्षित करना पड़ेगा. यह नमूना देवबन्द से जुड़े मदरसा संगठन की सोच का है. ज़ाहिर-सी बात है कि बाक़ी बहुत-से दूसरे पंथों की सोच इससे बहुत अलग नहीं है. अनुदारवाद और कट्टरपन की शुरुआत यहीं से होती है.
मदरसों और मुसलमानों को ऐसी सोच से बाहर निकलना ही होगा. हम एक जीवन्त और आधुनिक लोकतंत्र में रहते हैं, जहाँ ऐसी तमाम सहमतियों-असहमतियों, विचारधाराओं, विश्वासों और मतभेदों के लिए स्वीकार और सम्मान होना चाहिए. मदरसों को अपने समूचे पाठ्यक्रम और सोच दोनों में आधुनिक, उदार और मूल्यों में लोकतांत्रिक होने की सख़्त ज़रूरत है. मुसलिम समाज को मदरसों में सुधार के बारे में गम्भीरता से सोचना चाहिए.
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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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