Follow Raagdesh

twitter google_plus linkedin facebook mail

Tag Archives: Lobbying

Oct 19
काजल की कोठरी और चतुर सुजान!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 0 

अब ये सब जानते हैं कि सीबीआई को सबूत कब मिलते हैं और कब नहीं 'मिल पाते' हैं और कब 'मिल कर भी नहीं मिल पाते' हैं! जब रही भावना जैसी, केस की मूरत सीबीआई देखी तिन तैसी! कभी राजनीति की ज़रूरतें, कभी कोर्ट का डंडा, कभी सीबीआई की अपनी मनमर्ज़ी, इनमें से जब जैसी लगाम हो, केस का घोड़ा वैसे ही चलेगा.


Radia Tapes expose nexus of Politicians, Industrialists and Lobbyists-Raag Desh 191013.jpg
'राग देश' ईमेल पर मंगाएँ
The Enigma of Radia Tapes | क़मर वहीद नक़वी | An Unholy Nexus |
पता नहीं जिन्न सचमुच में होते हैं या नहीं. हों या न हों, लेकिन कहते हैं कि जिन्न कभी मरते नहीं. बोतल में बन्द करके समंदर में फेंक दो या कुछ भी कर दो, कभी न कभी वे फिर निकल आते हैं. राडिया टेपों (Radia Tapes) का जिन्न भी एक बार फिर निकल पड़ा है. जब पहली बार निकला था, तब बड़ा गुल-गपाड़ा मचा था. राजनीति, उद्योग, लाॅबीइंग के  भ्रष्ट त्रिकोण की एक छोटी-सी झलक तब दिखी थी. सत्ता के गलियारों में कैसे काम बनवाया-बिगड़वाया जाता है, कैसे कहाँ किसकी गोटियाँ फ़िट करायी जाती हैं, अख़बारों और मीडिया में क्या छपे और दिखे, सरकार बन रही तो कौन किस विभाग का मंत्री क्यों बने, और जाने क्या-क्या! देश ने पहली बार देखा कि ये राजकाज सचमुच चलता कैसे है. यह सब देख लोगों की आँखें खुली की खुली रह गयीं. बड़े-बड़े नाम सामने आये, मीडिया के भी नाम! फिर सब कुछ लीप-पोत बराबर हो गया. राजकाज फिर बदस्तूर चल पड़ा. सबने सबको बड़ी इज़्ज़त से बचा लिया!

Radia Tapes: A Mix Masala of Lobbying, Corruption and Politics!

राडिया टेपों का जिन्न!

लेकिन बोतल से जिन्न एक बार फिर बाहर निकला है. पूरा नहीं, बहुत थोड़ा-सा! सुप्रीम कोर्ट ने राडिया टेपों (Radia Tapes) के पहाड़ में से कुछ मुद्दे और मामले ढूँढ निकाले हैं. अब उनकी जाँच होगी! कोर्ट को साफ़-साफ़ लगता है कि राडिया टेपों (Radia Tapes) का मामला सिर्फ़ सिर्फ़ 2जी स्पेक्ट्रम (2 G Spectrum) के आवंटन तक ही नहीं था. बल्कि यह राजनेताओं, सरकारी अफ़सरों और उद्योगपतियों के बीच बहुत गहरी गिरोहबन्दी का भंडाफोड़ है, जिससे पता चलता है कि निजी फ़ायदों के लिए दुष्चक्र कैसे गढ़े जाते हैं, भ्रष्टाचार के हमाम में सब एक साथ कैसे नहाते हैं, ऊँची-ऊँची नियुक्तियाँ कैसे होती हैं, काम निकलवाने के लिए करोड़ों की थैलियाँ कैसे इधर से उधर होती हैं, और कुछ मामलों में ऊँची अदालतों के फ़ैसलों को प्रभावित करने के लिए क्या खेल खेले गये.

Radia Tapes expose nexus of Politicians, Industrialists, Lobbyists & Media!

केस की मूरत सीबीआई देखी तिन तैसी!

कोर्ट ने फ़िलहाल सभी मामलों को अभी गुप्त रखा है, क्योंकि सब बड़े-बड़े नाम, बड़ी-बड़ी इज़्ज़त वाले लोग हैं. पहले जाँच हो और पता चले कि इन मामलों में कुछ सबूत मिल पायेंगे या नहीं, कोई क़ानूनी कार्रवाई हो सकती है या नहीं. सीबीआई को कुछ ठोस सबूत मिलेंगे, तो मामला कुछ आगे बढ़ेगा, वरना टाँय-टाँय फिस्स! अब ये सब जानते हैं कि सीबीआई को सबूत कब मिलते हैं और कब नहीं 'मिल पाते' हैं और कब 'मिल कर भी नहीं मिल पाते' हैं! जब रही भावना जैसी, केस की मूरत सीबीआई देखी तिन तैसी! कभी राजनीति की ज़रूरतें, कभी कोर्ट का डंडा, कभी सीबीआई की अपनी मनमर्ज़ी, इनमें से जब जैसी लगाम हो, केस का घोड़ा वैसे ही चलेगा.अब दूर क्यों जाते हैं. अपराध के दो मामले देखिए. आरुषि तलवार हत्याकांड और निठारी में बच्चों की हत्या, यौन शोषण और मानव माँस भक्षण के मामले. कोई बहुत बड़े-बड़े 'पाॅवर' वाले लोगों का मामले नहीं थे ये. लेकिन जाँच कैसे चली, जाँच ने कब-कब कितनी कितनी पलटियाँ खायीं, सबके सामने है. कभी सबूत नहीं मिले, कभी मिल गये! है न कमाल की बात!

बहत्तर हज़ार टेपों की कहानी!

तो फिर इन टेपों के जिन्न के दोबारा निकलने से क्या होगा? कह नहीं सकते! और अभी तो बहत्तर हज़ार टेपों में से सिर्फ़ अठारह हज़ार को सुना जा सका है. बाक़ी कहाँ-कहाँ क्या दबा पड़ा है, कौन जानता है? जब पहली बार टेप मीडिया में लीक हो गये थे, तब बहुत-सी बातचीत छप गयी थी. क़ानूनी कोई मामला बन पाया हो या न बन पाया हो, कई मामलों में नैतिकता का संकट तो खड़ा हो ही गया था. अब यह अलग बात है कि आज के ज़माने में चतुर सुजानों ने काजल की कोठरी से 'बेदाग़' निकल आने का मंतर ढूँढ लिया है. सो किसी का बाल भी बाँका नहीं हुआ.

क्या लोकपाल रोक पायेगा भ्रष्टाचार?

अपन बरसों से देख रहे हैं. भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े मामले आये और गये. काजल की कोठरियों से लेकर काजल के बड़े-बड़े भूत बंगले खड़े हुए. जाँच बैठी, अदालतें लगीं. साबित कुछ भी नहीं हुआ. जनता बेचारी के बस में बस टुकुर-टुकुर देखना ही बचा है. वह इन्तज़ार कर रही है कि एक दिन लोकपाल आयेगा और सब ठीक हो जायेगा. अन्ना के जन लोकपाल का दम तो निकल चुका है. अब जो परकटा लोकपाल आयेगा (अगर वह वाक़ई आ सका तो), वह फड़फड़ा भर भी ले तो तसल्ली करके चुप बैठियेगा. राजकाज तो जैसे चलता है, चलता रहेगा!
(लोकमत समाचार, 19 अक्तूबर 2013)
http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi
'राग देश' ईमेल पर मंगाएँ
ADD COMMENT
Most Viewed
muslim-population-myth-and-reality

क्यों बढ़ती है मुसलिम आबादी?
  तो साल भर से रुकी हुई वह रिपोर्ट अब जारी होनेवाली है! ...
Posted On  24th January 2015 2:21
economic-backwardness-literacy-and-muslim-population-growth

मुसलिम आबादी मिथ, भाग-दो!
मुसलिम आबादी का मिथ - भाग दो! पहला भाग कब आया? शायद 'राग द...
Posted On  27th August 2016 7:47
can-demonetisation-curb-black-money

तो क्या ख़त्म हो जायेगा काला धन?
बस एक महीने पहले ही मैंने 'राग देश' में लिखा था कि कुछ ल...
Posted On  12th November 2016 12:35
मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
त्वरित टिप्पणी
तीन तलाक़ और नयी सोशल इंजीनियरिंग तीन तलाक़ पर फ़ैसले के बाद क्या अब एक नयी सोशल इंजीनियरिंग की शुरुआत होगी? और अगर ऐसा हुआ तो क्या देश की राजनीति में हम एक नया मोड़ देखेंगे? ठीक वैसे ही जैसे मंडल के बाद दलित-पिछड़ा राजनीति के बिलकुल नये समीकरण देखे गये थे. हालाँकि पिछले तीन साल में [..] Read More
Follow Us On Facebook

Recent Posts