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Tag Archives: Indian Democracy

Aug 03
क्यों जी, आप सेकुलर हो?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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सेकुलरिज़्म को हम क्यों सफल नहीं बना पाये? भ्रष्ट, अवसरवादी और वोट बैंक की राजनीति के कारण. ठीक वैसे ही, जैसे कि सब जानते-बूझते हुए भी आज विधायिका में लगभग एक तिहाई अपराधी हैं. ठीक वैसे ही, जैसे यह एक खुली हुई गोपनीय बात है कि काले धन के बिना चुनाव नहीं लड़ा जा सकता, ठीक वैसे ही जैसे कि यह सबको पता है कि भारत में कोई ट्रैफ़िक नियमों को नहीं मानता. फिर भी अपनी तमाम समस्याओं के बावजूद लोकतंत्र और ट्रैफ़िक दोनों यहाँ चलते हैं, वैसे ही सेकुलरिज़्म भी चल रहा है! इसलिए लोकतंत्र को ठीक कीजिए. सेकुलरिज़्म अपने आप ठीक हो जायेगा! लोकतंत्र में बेईमानियाँ चलती रहें और सेकुलरिज़्म ईमानदारी से चलता रहे, ऐसा तो हो नहीं सकता. यह बात सबको समझनी पड़ेगी.

--- क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi क्यों जी, आप सेकुलर हो? तो बन्द करो यह पाखंड! पक गये सेकुलरिज़्म सुन-सुन कर! अब और बेवक़ूफ़ नहीं बनेंगे! पुणे पर इतना बोले, सहारनपुर पर चुप्पी क्यों? दुर्गाशक्ति नागपाल जो अवैध दीवार ढहाने गयी थी, अब वहाँ मसजिद बन गयी है, सेकुलरवादियो जाओ वहाँ नमाज़ पढ़ आओ! नहीं चाहिए ऐसा सेकुलरिज़्म! क्रिकेट में पाकिस्तान जीते तो उसे चीयर करते हो! ईद की बधाई क्यों दें हम आपको? वग़ैरह-वग़ैरह. यह पिछले दिनों सोशल मीडिया की एक झलक थी!raagdesh India and secularism पिछले दो काॅलम इसलामी और हिन्दू पुनरोत्थानवाद के नये उभरते ख़तरों पर लिखे. इस हफ़्ते कोई और विषय लेना चाह रहा था. लेकिन लगा कि घाव दिनोंदिन गहरे होते जा रहे हैं. इसलिए सेकुलरिज़्म पर खरी-खरी चर्चा ज़रूरी है.

क्या सेकुलरिज़्म एक बोगस बकवास है?

सबसे पहला सवाल! क्या सेकुलरिज़्म के बिना देश का काम चल सकता है या नहीं? अगर सेकुलरिज़्म नहीं तो उसकी जगह क्या? बीजेपी वाला सर्वधर्म समभाव? दोनों में मोटे तौर पर कोई फ़र्क़ नहीं, बस एक छिपे एजेंडे के अलावा. उसकी चर्चा हम बाद में करेंगे. इसलिए फ़िलहाल सवाल को इस तरह रखते हैं कि क्या सेकुलरिज़्म या 'सर्वधर्म समभाव' एक बोगस बकवास है? चलिए, मान ही लिया कि हमारे देश को उसकी कोई ज़रूरत नहीं? उसे हम रद्दी की टोकरी में फेंक दें तो उसकी जगह क्या लायेंगे? कुछ न कुछ तो होना ही पड़ेगा न? राज्य या तो सेकुलर होता है या धर्म के खूँटे से बँधता है. बीच की कोई स्थिति नहीं होती! तो सेकुलरिज़्म के अलावा दूसरा विकल्प क्या है? हिन्दू राष्ट्र! बस. सोचने की दो बातें हैं. पहली यह कि राज्य को सेकुलर होने की ज़रूरत क्यों पड़ी? और राज्य को राजतंत्र के बजाय लोकतंत्र की ज़रूरत क्यों पड़ी? ज़ाहिर-सी बात है कि राजतंत्र और धर्म के खूँटे से बँधे राज्य की अवधारणा बड़ी पुरानी है. राजतंत्र की बुनियाद ही इस पर रखी गयी थी कि राजा ईश्वर का अंश है. तो जो राजा का धर्म हुआ, वही उस राज्य का 'ईश्वरीय धर्म' हो गया! यानी राज्य और धर्म एक सिक्के के दो पहलू हुए. लेकिन असलियत में जब राज्य और धर्म में कभी टाॅस होने की नौबत आ जाये तो चित भी धर्म और पट भी धर्म! सदियों के कड़ुवे अनुभवों के बाद लोकतंत्र की खोज हुई और पश्चिम में राज्य को चर्च से अलग रखने यानी राज्य के सेकुलर होने के विचार ने जन्म लिया. यानी राज्य के काम में धर्म का कोई दख़ल न हो. धर्म लोगों की निजी आस्था का मामला रहे. दूसरी बात यह कि यह दोनों माडल हमारे सामने आज भी मौजूद हैं. और यह बात पानी की तरह साफ़ है कि इनमें से कौन-सा माडल ज़्यादा बेहतर, ज़्यादा मानवीय, ज़्यादा हितकारी, ज़्यादा संवेदनशील, वक़्त के अनुसार बदलाव के लिए ज़्यादा लचीला, ज़्यादा आधुनिक और सतत प्रगतिवादी है! (more…)
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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