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Dec 27
तो क्या टाइट्रेशन शुरू हो चुका है?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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चौदह का साल देश में बहुत कुछ बदल कर जा रहा है.

सौ साल पहले गाँधी दक्षिण अफ़्रीका से लौटे थे. अब सौ साल बाद गोडसे को लाने की तैयारी हो रही है!

चौदह में सिर्फ़ सरकार नहीं बदली है. सरकार का मतलब और मक़सद भी बदल गया है!

चौदह में बड़े-बड़े काम हुए. मसलन लोग क्रिसमस मनाना चाहें तो मनायें, सरकार तो बस 'गुड गवर्नेन्स डे' मनायेगी!

सरकार ने तो गाँधी जयन्ती को भी 'सफ़ाई दिवस' बना दिया! अब गाँधी का यही एक सत्य लोग जानेंगे. गाँधी मतलब 'स्वच्छ भारत.' बाक़ी के 'सत्यों' के लिए सोशल मीडिया पर रणबाँकुरों की फ़ौज पहले ही लगी है, जो गाँधी को मारने के लिए हर दिन नये-नये 'सत्य' गढ़ती रहती है!

'घर-वापसी' का, हिन्दू राष्ट्र का रोज़ शंखनाद हो रहा है! यह वह है जो बाहर दिख रहा है. अन्दर-अन्दर बहुत-कुछ बदल रहा है! बक़ौल मोहन भागवत यह केमिस्ट्री का 'टाइट्रेशन' चल रहा है!

अलविदा चौदह! अब पन्द्रह के रंग देखेंगे.


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जाओ चौदह, जाओ! तुम वैसे साल नहीं थे, जो अकसर आते ही जाते रहते हैं. तुम वैसे साल नहीं थे, जो गुज़रते ही बिलकुल गुज़र जाते हैं! साल गया, बात गयी! लोगों को अकसर कुढ़ते सुना है. साल तो बदलते हैं, लेकिन कुछ और भी बदलता है क्या? इस बार ऐसी बात नहीं!

चौदह का साल ऐसा नहीं था. वह बहुत कुछ बदल कर जा रहा है. और यह कह कर भी जा रहा है कि देखते रहो, अगले कुछ और साल भी जो आयेंगे, और वह भी बहुत कुछ बदल कर जायेंगे!

गाँधी और गोडसे

सौ साल पहले गाँधी देश लौटे थे. दक्षिण अफ़्रीका से. अब सौ साल बाद गोडसे को लाने की तैयारी हो रही है! यह चौदह है! अरे क्या कहा? गिनती के कुछ मुट्ठी भर सिरफिरों की ख़ुराफ़ात है यह, बस! काहे को इतनी गम्भीरता से लेते हैं इसे? जी, सही कहा. भला इसे क्या गम्भीरता से लेना? कुछ 'गोडसे-भक्त' तो हमेशा से ही रहे हैं. किसी ने कभी उन्हें गम्भीरता से नहीं लिया. लेकिन गोडसेप्रेमियों को इतना मुखर आज से पहले कभी देखा नहीं था! यही फ़र्क़ है चौदह का! चौदह में बहुत-सी चीज़ों का रंग भी बदल गया, ढंग भी और अर्थ भी!

क्रिसमस यानी गुड गवर्नेन्स!

अरे जी, छोड़िए भी गोडसे को. आप तो बेकार में स्यापा करते हैं. मामूली-सी बात! तिल का ताड़ मत बनाइए. कहाँ गाँधी, कहाँ गोडसे? कोई कुछ भी कर ले, गोडसे को हीरो कैसे बना सकता है? जी, वह हिन्दू महासभा वाले बोलते हैं! अरे बोलने भी दीजिए. कौन सुनता है उनकी बात! जी, वह साक्षी महाराज जी ने भी बोला! अरे वह नासमझी में बोल गये होंगे! ज़बान फिसल गयी होगी. ग़लती उन्होंने मान ली. अब जब तक सांसद हैं, ऐसा नहीं बोलेंगे. अन्दर-अन्दर चाहे जो मानते रहें! बाहर नहीं बोलेंगे! बाहर कुछ, अन्दर कुछ! यह अन्दर की बात है! अन्दर की बात आप जानते हैं किसे कहते हैं? और अन्दर की बात पर काम कैसे होता है? कितने बरसों तक चुपचाप 'काम' होता रहता है? और फिर एक दिन अचानक लोगों को पता चलता है, 'हो गया काम!' कुछ इसे समझते हैं. कुछ नहीं समझते हैं. कुछ अच्छी तरह समझ कर समझाते हैं कि इसे ऐसा समझना बिलकुल सही नहीं. यह तो हारे हुए सेकुलरों के लिए महज़ प्रलाप का बहाना भर है! क्रिसमस को जिसे ईसा मसीह का जन्मदिन मनाना हो मनाये, लेकिन सरकार तो 'गुड गवर्नेन्स डे' मनायेगी! इसमें काहे की हाय-तौबा! आपका क्रिसमस आपको मुबारक! जितना चाहे, उतना मनाइए, जैसे चाहे, वैसे मनाइए. हमारा 'गुड गवर्नेन्स डे' तो हम इसी दिन मनाएँगे. चौदह से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ. अब हो रहा है और होगा! वैसे यह भी मामूली-सी बात है! बेकार में हल्ला क्यों मचाते है? समझिए न! 'गुड गवर्नेन्स डे' मनाये बग़ैर विकास कैसे होगा? और विकास के लिए इतना-सा त्याग करने में क्या परेशानी है? सबका साथ, सबका विकास! इसलिए विकास में साथ दीजिए! सरकार को 'गुड गवर्नेन्स डे' मनाने दीजिए!

गाँधी मतलब स्वच्छ भारत!

अब देखिए न, गाँधी जयन्ती के दिन भी तो आख़िर सरकार ने इस साल से 'सफ़ाई दिवस' मनाना शुरू किया है न! तो फिर ईसा जयन्ती के दिन 'गुड गवर्नेन्स डे' मनाने में क्यों एतराज़? चौदह में बड़े-बड़े काम हुए हैं. गाँधी को महज़ एक अदद झाड़ू से जोड़ दिया. बाक़ी के गाँधी को पूरा 'साफ़' कर दिया! पहले गाँधी चरखे वाले थे. अब झाड़ू वाले हो गये! पहले वाले लोगों ने चरखा चला-चला कर गाँधी को 'आउटडेटेड' कर दिया. कहाँ 'ग्लोबल इकाॅनाॅमी' और कहाँ गाँधी म्यूज़ियम का चरखा! इसलिए अब गाँधी का 'मेकओवर' हो गया. गाँधी मतलब स्वच्छ भारत! जब तक गोडसे का 'अन्तिम प्रहार' नहीं होता, गाँधी का यही एक सत्य लोग जानते रहेंगे! बाक़ी के 'सत्यों' के लिए सोशल मीडिया के रणबाँकुरों की फ़ौज पहले ही लगी है, जो गाँधी को मारने के लिए हर दिन नये-नये 'सत्य' गढ़ने में जी-जान से लगी हुई है!

मुख बोला, मुखौटा चुप लगा गया

'लव जिहाद' का पूरा का पूरा झूठा शिगूफ़ा उछाला गया. देश भर में पुलिस कहीं एक भी मामला पकड़ नहीं पायी! और उत्तर प्रदेश के उपचुनावों में करारी हार होते ही उसे भूल गये! वह कार्ड सही नहीं बैठा! धर्मान्तरण के ख़िलाफ़ बिल लाना है. बड़ी अच्छी बात है. लाना चाहिए. लेकिन बहाना क्यों चाहिए? पहले 'घर-वापसी' का ड्रामा हो, हल्ला-ग़ुल्ला मचे, तो फिर कहिए कि इसे रोकना है तो धर्मान्तरण के ख़िलाफ़ क़ानून पर राज़ी होइए. वरना तो 'घर-वापसी' होती रहेगी! और फिर कहिए कि बीजेपी बलात् धर्मान्तरण का समर्थन नहीं करती. और उधर परिवार के इस नाम, उस नाम, तरह-तरह के नाम के तरह-तरह के संगठन अपने-अपने 'काम' में लगे रहें. सरकार चलानेवाली पार्टी कहती रहे कि हम इसका समर्थन नहीं करते. फिर ख़बर आयी, या कहिए पत्रकारों को बाँटी गयी कि प्रधानमंत्री ने संघ को साफ़-साफ़ कह दिया है कि ऐसे तो नहीं चलेगा. अगर यह सब रुका नहीं तो वह इस्तीफ़ा दे देंगे! और 'एंटी क्लाइमेक्स' कि अगले ही दिन परिवार के मुखिया ने बोल दिया कि जो किसी ज़माने में भटक कर, बहक कर दूसरे धर्म में चले गये, उन्हें वापस अपने धर्म में लौटा लाने में ग़लत कुछ भी नहीं! भारत एक हिन्दू राष्ट्र था और हिन्दू अब जाग रहे हैं! मुख बोला, मुखौटा चुप लगा गया!

मुख और मुखौटों की कहानी बड़ी पुरानी है. एक बार गोविन्दाचार्य जी ने ग़लती से सच खोल दिया. अटलबिहारी वाजपेयी को मुखौटा बोल दिया. वह किनारे लगा दिये गये. इस बार विकास का मुखौटा है. वह विकास की बातें करता है. बड़ी-बड़ी बातें करता है. बाहर विकास, अन्दर? बाहर की बात और अन्दर की बात! आप समझ ही गये होंगे!

बूँद-बूँद से रंग बदलेगा!

तो चौदह में सिर्फ़ सरकार नहीं बदली है. सरकार का मतलब भी बदल गया है और मक़सद भी! कुछ तेज़ी से बदल रहा है, कुछ धीरे-धीरे. कुछ सबको दिख रहा है, कुछ नहीं भी दिख रहा है! वैसे संघ प्रमुख मोहन भागवत का एक-डेढ़ साल पुराना एक भाषण है. वह केमिस्ट्री के टाइट्रेशन की मिसाल देते हैं. टाइट्रेशन केमिस्ट्री के छात्रों को स्कूल में सिखाया जाता है. किसी अज्ञात रसायन का पता लगाना हो कि वह क्या है, तो उसमें कुछ ज्ञात रसायन बूँद-बूँद कर मिलाते हैं. एक बूँद डालिएगा तो कुछ नहीं होगा. धीरे-धीरे कुछ और बूँदें डालिएगा, तो भी कुछ बदलाव नहीं दिखेगा. लेकिन जैसे ही बूँदों की एक निश्चित संख्या पार होगी, रसायन का रंग बदलना शुरू हो जायेगा और फिर जैसे-जैसे बूँदें बढ़ती जायेंगी, रंग बदलता चला जायेगा और एक स्थिति आयेगी, जब रंग पूरी तरह बदल जायेगा. भागवत जी उस भाषण में कहते हैं, अभी हम बूँदें मिला रहे हैं, धीरे-धीरे करके रंग बदल जायेगा, धीरज रखिए! भागवत जी कह रहे हैं तो सही ही कह रहे होंगे! वैसे बात मामूली-सी ही है. हो सकता है कि यह महज़ एक संयोग ही हो. या सिर्फ़ मेरे साथ ही ऐसा हुआ हो. फिर कुछ दोस्तों से भी पूछा. ज़्यादातर मित्रों को लगा कि पिछले सालों के मुक़ाबले इस बार क्रिसमस पर बधाई के एसएमएस उन्हें काफ़ी कम आये! क्या वाक़ई अन्दर-अन्दर कुछ बदल रहा है?

काँग्रेस क्या 'हिन्दू-विरोधी' है?

क्या वाक़ई टाइट्रेशन शुरू हो चुका है? बहुतों को अभी कुछ भी नहीं दिख रहा है. दिखेगा भी नहीं. बूँद-बूँद बढ़ने दीजिए और रंग बदलने का इंतज़ार कीजिए. उधर, काँग्रेस बेचारी अब इस खोज में लगी है कि क्या पार्टी की छवि वाक़ई 'हिन्दू-विरोधी' हो गयी है? क्या पार्टी इसी वजह से तो लगातार पिटती नहीं जा रही है? कहते हैं इतिहास अपने को दोहराता है. कहीं काँग्रेस फिर वही ग़लती दोहराने की तैयारी तो नहीं कर रही है जो उसने कभी अयोध्या में शिलान्यास करा कर की थी! बहरहाल अलविदा चौदह. अब पन्द्रह के रंग देखते हैं. इस प्रार्थना के साथ नये साल की बधाई कि ईश्वर करे कि टाइट्रेशन की आशंकाएँ महज़ इस लेखक का दिमाग़ी बुख़ार साबित हों!

(लोकमत समाचार, 27 दिसम्बर 2014)
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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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