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Tag Archives: Gajendra Singh Kalyanwat

Apr 25
‘डांस आॅफ़ डेमोक्रेसी’ में एक गजेन्द्र!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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डांस आॅफ़ डेमोक्रेसी!' राजस्थान के किसान गजेन्द्र सिंह कल्याणवत की मौत के बाद जो हुआ, जो हो रहा है, उसे और क्या कहेंगे? यह राजनीति का नंगा नाच है. और जो कुछ हो रहा है, सब लोकतंत्र के नाम पर हो रहा है, लोकतंत्र के लिए हो रहा है! नेता, पार्टियाँ, मीडिया हर कोई लोकतंत्र के जयकारे लगा रहा है और लोकतंत्र को नचा रहा है. मुखौटे नाच रहे हैं, झाँसों के व्यापारी नाच रहे हैं! ब्राँड अलग-अलग हैं, मुखौटे अलग-अलग हैं, रैपर अलग-अलग हैं, लेकिन भीतर साबुन सबके पास वही एक ही है, जो मैल धोता नहीं, बल्कि जितना रगड़ो, उतना और मैला कर देता है!


Farmer Gajendra Singh Suicide in AAP Rally-Raag Desh 250415.jpg
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यह 'डांस आॅफ़ डेमोक्रेसी' है! लोकतंत्र का नाच! राजस्थान के किसान गजेन्द्र सिंह कल्याणवत की मौत के बाद जो हुआ, जो हो रहा है, उसे और क्या कहेंगे? यह राजनीति का नंगा नाच है. बेशर्म अश्लील, घमंड से मदान्ध और उन्मत्त नाच! और जो हो रहा है, सब लोकतंत्र के नाम पर हो रहा है, लोकतंत्र के लिए हो रहा है! नेता, पार्टियाँ, मीडिया हर कोई लोकतंत्र के जयकारे लगा रहा है और लोकतंत्र को नचा रहा है. मुखौटे नाच रहे हैं, झाँसों के व्यापारी नाच रहे हैं! ब्राँड अलग-अलग हैं, मुखौटे अलग-अलग हैं, रैपर अलग-अलग हैं, लेकिन भीतर साबुन सबके पास वही एक ही है, जो मैल धोता नहीं, बल्कि जितना रगड़ो, उतना और मैला कर देता है!

कैसे चलती रही रैली?

बीचोंबीच रैली में एक मौत हो जाये, चाहे किसी भी कारण से हो जाये और रैली वैसे ही चलती रहे, हैरत की बात है! पेड़ पर एक आदमी चढ़ जाये, अपने को आप की आम आदमी पार्टी का ही कार्यकर्ता बताये, मंच से उसे नीचे आने की अपीलें होती रहें, पुलिस निठल्ली घूमती रहे, नीचे पार्टी कार्यकर्ता खड़े हों, सब तमाशा देखते रहें, उस आदमी के 'लटक जाने' की ख़बर भी मंच तक पहुँच जाये, मंच पर मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री मौजूद हों, और रैली बदस्तूर चलती रहे, हैरत की बात है! पार्टी का कोई ज़िम्मेदार नेता यह भी ज़हमत न करे कि मंच छोड़ कर कुछ क़दम चल कर ही देख आये कि आख़िर हुआ क्या? सही बात है कि अरविन्द केजरीवाल तो उसे पेड़ पर चढ़ कर नहीं बचा सकते थे, लेकिन 'लटक गया' सुन कर तो पेड़ तक जा सकते थे! ख़ुद अपनी आँखों से उसकी हालत देखने जा सकते थे न. आख़िर 'जनता के सीएम' हैं. दिल्ली का बजट बनाने के लिए जनता के बीच जा सकते हैं, तो अपने ही एक कार्यकर्ता के 'लटक जाने' पर उसका हाल लेने जनता के बीच क्यों नहीं जा सकते थे?

माफ़ी तो माँगी, लेकिन....

और अगर रैली रोक ही देते तो क्या हो जाता? केजरीवाल का भाषण होना बाक़ी था, तो उसके लिए कुछ दिन बाद फिर रैली कर लेते! रैली न सही, एक-दो दिन बाद एक-दो घंटे के धरने पर बैठ जाते, जो बातें रैली में कहनी थीं, धरने पर कह देते, कोई प्रेस कान्फ़्रेन्स करके कह देते! ऐसा क्या था कि एक आदमी के 'लटक जाने' की ख़बर के बाद भी मोदी सरकार पर हमला करने का काम टाला नहीं जा सकता था? वह काम, जो किसी भी राजनीतिक दल का रूटीन काम है. तो किसी का पेड़ से लटक जाना क्या उससे भी कहीं ज़्यादा 'रूटीन' है? हैरत इसी पर होती है कि कुल दो साल पहले राजनीति में क़दम रखनेवालों की चमड़ी इतनी जल्दी इतनी मोटी कैसे हो गयी? और वह भी राजनीति के उसी रूटीन का हिस्सा बन गये, जिसके ख़िलाफ़ बग़ावत करने वह आये थे. ऐसा न होता तो वे राजनीति के बदचलन रूटीन पर चल बेहयाई से अपना बचाव करने के बजाय अपनी शर्मनाक ग़लती पर पहले दिन से जनता से खुले दिल से माफ़ी माँग रहे होते, प्रायश्चित में राजघाट पर जा कर मौन व्रत पर बैठे होते. उन्हें गाँधी की उस तसवीर की याद ज़रूर आयी होती, जिसके नीचे बैठ कर वह राजनेताओं के अहंकार को कोसा करते थे, आज वह ख़ुद उसी अहंकार की प्रतिमूर्ति क्यों हो गये? हालाँकि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक ख़बर आ गयी कि केजरीवाल ने रैली जारी रखने के लिए ग़लती मान ली है और माफ़ी माँगी है. लेकिन माफ़ी में बात अगर केवल माफ़ी की ही की जाती तो बेहतर होता.

घिनौनी राजनीति में लगी पार्टियाँ!

और गजेन्द्र की मौत पर क्या घिनौनी राजनीति हो रही है. काँग्रेस और बीजेपी को बैठे-बिठाये नये-नये तीर मिल गये. काँग्रेस को भूमि अधिग्रहण बिल पर मोदी सरकार को पटखनी देने का दाँव हाथ लग गया तो बीजेपी दिल्ली पुलिस के बहाने 'आप' को नापने में लग गयी है. होना तो यह चाहिए था कि केन्द्र सरकार इस पूरे मामले में दिल्ली पुलिस की भूमिका की जाँच कराती कि उसकी मौजूदगी में इतनी बड़ी घटना कैसे हो गयी? लेकिन इसके बजाय केन्द्र सरकार इसमें लगी है कि अपनी पुलिस का 'इस्तेमाल' कर कैसे 'आप' को फँसाया जाये. अगर बीजेपी और केन्द्र सरकार ईमानदार होती तो सीधे न्यायिक जाँच की घोषणा करती ताकि कोई षड्यंत्र होता तो वह भी सामने आता और पुलिस की भूमिका भी साफ़ होती. बाक़ी आत्महत्या के मामले की जाँच पुलिस और मजिस्ट्रेट मिल कर क़ानून के अनुसार करते रहते. कह सब रहे हैं कि इस मामले में राजनीति नहीं होनी चाहिए, लेकिन सबके सब पूरी निर्लज्जता से ग़लीज़ राजनीति कर रहे हैं. मूल मुद्दा लापता है. मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण बिल को बदलने पर मजबूर हो जाये, तो काँग्रेस को उसका श्रेय लेने का मौक़ा मिल जायेगा. इसलिए काँग्रेस लार टपका रही है. लेकिन किसानों की समस्या अधिग्रहण से कहीं आगे की है. वह बरसों से लगातार आत्महत्याएँ करते आ रहे हैं. अब तक उनके नाम पर राजनीति के अलावा कभी और कुछ नहीं हुआ. अब गजेन्द्र की मौत के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ज़रूर बयान दिया है कि किसानों की हालत सुधारने के लिए वह सबकी बात सुनने को तैयार हैं, हर अच्छे सुझाव पर विचार करने को तैयार हैं. चलिए इतना तो हुआ. अच्छी बात है. RELATED POST यह भी पढ़ें खेती करके वह पाप कर रहे हैं क्या?

बस दो बातों का सवाल है सरकारबहादुरो

किसानों की क्या समस्याएँ हैं, सबको मालूम हैं. परिवारों के बँटते रहने से जोत लगातार छोटी होती जा रही है, नक़द फ़सलों और विदेशी बीजों के इस्तेमाल से खेती की लागत लगातार बढ़ गयी है, किसानों को सस्ता क़र्ज़ नहीं मिलता, फ़सल का बीमा नहीं है, फ़सल का सही दाम नहीं मिलता और फ़सल बर्बाद हो जाये तो घाटे की भरपाई हो ही नहीं पाती. छोटे किसानों की कमाई तो इतनी कम है कि वह मामूली-सा घाटा भी सह पाने की हालत में नहीं हैं. फिर जो किसान बँटाई पर काम करते हैं, फ़सल बर्बाद होने पर मुआवज़ा तो उन्हें मिलता नहीं. पैसा उनका डूबता है और मुआवज़ा उसे मिलता है, जिसकी ज़मीन होती है. सरकारों के पास कोई रिकार्ड नहीं होता कि किस किसान ने क्या बोया है, कितना पैसा लगाया है और अगर उसका नुक़सान होगा तो कितने का होगा और उसे कितना मुआवज़ा मिले कि घाटा पूरा हो जाये! इन सवालों पर बरसों से चर्चा हो रही है. हल कुछ नहीं निकला. चर्चा इस पर भी हो रही है कि लागत पर मुनाफ़ा तय किया जाये, न कि सरकार मनमाने तरीक़े से समर्थन मूल्य घोषित करे. माँग जायज़ है क्योंकि खेती में मुनाफ़ा ख़ासकर छोटे किसानों के लिए लगभग न के बराबर रह गया है. सबसे पहले इसका हल ढूँढना पड़ेगा कि खेती में मुनाफ़ा कैसे बढ़ाया जाये, छोटे और बँटाई वाले किसानों के लिए क्या किया जाये, हर किसान को बैंक से सस्ता क़र्ज़ कैसे मिले, क़र्ज़ वसूली में मानवीय पहलू को कैसे शामिल किया जाये, नुक़सान होने पर किसान को किसी हालत में नुक़सान से कम मुआवज़ा न मिले, फ़सल का अनिवार्य बीमा हो (इसे लागू करेंगे तो हर फ़सल का सही रिकार्ड अपने आप रखा जाने लगेगा). इसके अलावा सिंचाई और भंडारण की बड़ी गम्भीर समस्याएँ तो हैं हीं, जिन पर काम होना चाहिए. लेकिन सबसे ज़रूरी दो बातें हैं. एक खेती में मुनाफ़ा बढ़ाइए और दो, किसी किसान को एक रुपये का नुक़सान भी न होने पाये, इसकी पक्की व्यवस्था कीजिए.

कस्तूरी और ग़लती!

तो सरकारबहादुरो, क्या आपसे ये दो काम हो सकते हैं? अपनी गन्दी राजनीति को कुछ दिन के लिए अपनी दराज़ों में बन्द रखिए और इन दो बातों पर बैठ कर बात कीजिए, कोई हल निकालिए. आप सब बहुत नचा चुके जनता को, लोकतंत्र को. गजेन्द्र की मौत के बाद के दो दिनों में सबके मुखौटे उतरे हैं. उनके भी जो कभी आम आदमी होते थे, लेकिन आज राजनेता हैं! जो समझना चाहता है, वह समझ लेता है कि समय उसे क्या और क्यों सिखाना चाहता है? कस्तूरी की तरह ग़लती भी भीतर ढूँढनी चाहिए, बाहर नहीं!
(लोकमत समाचार, 25 अप्रैल 2015) http://raagdesh.com
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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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