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Aug 30
क्यों नहीं उठ सकते तीन आसान क़दम?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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बलात्कार के जो मामले अदालत पहुँचते हैं, उनमें 74 फ़ीसदी मामलों में आरोपी क्यों बरी हो जाते हैं? प्रसव पूर्व लिंग परीक्षण निरोधी क़ानून में पिछले पन्द्रह सालों में केवल 20 मामलों में सज़ा हुई! दहेज हत्या के भी जो मामले अदालत तक पहुँच पाते हैं, उनमें भी 64 फ़ीसदी मामलों में आरोपी छूट जाते हैं! क्यों? छेड़छाड़, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, बलात्कार, दहेज हत्याएँ, कन्या भ्रूण हत्याएँ, तेजाब हमले, महिलाओं की तस्करी, इन सारे मामलों में ही क़ानून के हाथ तंग क्यों हो जाते हैं? अब आप आसानी से समझ सकते हैं कि महिलाओं के प्रति अपराधों में आख़िर क्यों कोई कमी नहीं आती?

--- क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi अपने देश का एक स्थायी भाव है, ढर्रा! ढर्रे के आगे क्या है? ढर्रा ही है! ढर्रे के पीछे क्या था? ढर्रा ही था! सब कुछ बदल सकता है, ढर्रा नहीं बदल सकता! रोहतक की दो मासूम बच्चियों की आत्महत्या की ख़बर आयी और चली गयी. दिल दहला देनेवाली ख़बर! इन बच्चियों की निराशा का अन्दाज़ लगाइए. कुछ लड़के इन्हें छेड़ते थे. इन्हें कहीं कोई रास्ता नहीं दिखा होगा! न समाज, न पुलिस, न सरकार, किसी से इन्हें रत्ती भर भी मदद की उम्मीद नहीं रही होगी. ऐसी लाचारी, ऐसी हताशा! अपनी आख़िरी चिट्ठियाँ लिख वह दुनिया से चली गयीं. किसे फ़िक्र है? कौन बदलेगा? सब वैसे ही अपने ढर्रे पर चल रहा है! चलता रहेगा. कुछ साल पहले मध्य प्रदेश में अम्बिकापुर से ऐसी ही दिल दहला देनेवाली ख़बर आयी थी. एक लड़की को छेड़ रहे कुछ लड़कों ने जीप चढ़ा कर उसकी हत्या कर दी थी. देश के हर छोटे-बड़े शहर में हर दिन सैंकड़ों ऐसी छोटी-बड़ी घटनाएँ होती रहती हैं. कोई अख़बार पलट कर देख raagdesh crime against womenलीजिए. शायद ही ऐसी किसी ख़बर के बिना देश के किसी अख़बार का कोई अंक कभी छपा हो! यह भी तब, जब छेड़छाड़ के इक्का-दुक्का मामले ही पुलिस के पास पहुँचते हैं, जब बर्दाश्त की सारी हदें पार हो चुकी होती हैं. वरना अगर छेड़छाड़ का हर मामला रिपोर्ट होने लगे तो तो शायद अख़बार में किसी और ख़बर के लिए जगह ही न बचे!

असली सज़ा किसको, आरोपी को या पीड़ित को?

क्यों होता है ऐसा? क्योंकि किसी को क़ानून का कोई डर नहीं है! पहले तो क़ानून ही बिलकुल कमज़ोर हैं. और जो हैं भी, उनके सहारे न्याय पाने का रास्ता कितना जटिल, थकाऊ और अकसर पीड़ित महिला की अस्मिता को चुभनेवाला होता है, यह किसी से छिपा नहीं है! रोहतक वाले मामले में ही मान लीजिए कि लड़कियों ने पुलिस से शिकायत की होती. मान लीजिए कि पुलिस ने बड़ी चुस्ती दिखायी होती, बिना आनाकानी किये रिपोर्ट लिखी होती, पीड़ित लड़कियों को 'अजीब-सी' निगाहों से देखे बग़ैर पूरी ईमानदारी से मामले की जाँच की होती, सबूत जुटा लिए होते, लड़कों को पकड़ लिया होता, चार्जशीट दायर कर दी होती, फिर एक लम्बी न्यायिक प्रक्रिया के बाद सज़ा कितनी होती? सिर्फ़ तीन महीने और कुछ जुर्माना! यह तो तब, जब अभियुक्त इतने 'निरीह' हों कि पीड़ित परिवार को बिलकुल भी 'डराने-धमकाने' की या दबाव में लाने की कोशिश न करें. लेकिन जब अभियुक्त बड़े रसूख़ वाला हो, तब? रुचिका गिरोत्रा का मामला याद आया आपको? पुलिस से शिकायत करने के बाद उसे स्कूल से निकाल दिया गया, उसके पिता, भाई और सहेली के ख़िलाफ़ फ़र्ज़ी मामले दर्ज कराये गये, परिवार को इस तरह प्रताड़ित किया गया कि तीन साल बाद रुचिका ने आत्महत्या कर ली. अनन्त यातनाओं के 19 साल लम्बे दौर के बाद आख़िर आरोपी डीआइजी एस. पी. एस. राठौर को सज़ा मिली. क़ानून ने क़ानून के मुताबिक़ अपराधी को सज़ा सुना दी, लेकिन इस परिवार ने जो कुछ इस बीच सहा, वह रोंगटे खड़े कर देनेवाला है? छेड़छाड़ की शिकायत करने की जैसी सज़ा इस परिवार ने भुगती, उसके मुक़ाबले डीआइजी राठौर को मिली सज़ा तो कुछ भी नहीं है! (more…)
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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