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Tag Archives: Environment

May 30
इस गरमी पर एक छोटा-सा सवाल!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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गरमी से अठारह सौ लोग मर चुके. हाहाकार मचा है.  अभी बरसात आयेगी. लोग फिर मरेंगे! फिर शीतलहर आयेगी और लोग फिर मरेंगे! हर मौसम में हमारे देश में लोग क्यों मरते हैं. मौसम पर किसी का बस नहीं, लेकिन फिर भी हर साल होनेवाली इन मौतों को बड़ी आसानी से रोका जा सकता है! बशर्तें कि सरकारों को चलाने वाले लोग इस बारे में कुछ सोचें! आँध्र की एक जेल के अफ़सरों ने एक आसान तरीक़ा ढूँढ निकाला. वहाँ की सरकार या कहीं और की सरकारें कभी क्यों ऐसा नहीं सोच सकीं? इस गरमी पर यह एक छोटा-सा सवाल है, जो वास्तव में है बहुत बड़ा!


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लोग गरमी से मर रहे हैं. अब तक अठारह सौ से ज़्यादा लोग मर चुके. ख़बरें छप रही हैं. लोग मर रहे हैं. सरकारें मुआवज़े बाँट रही हैं. गरमी कम हो जायेगी, लोगों का मरना रुक जायेगा. फिर लोग बरसात से मरेंगे. फिर ख़बरें छपेंगी. फिर मुआवज़े बँटेंगे. फिर कहीं-कहीं लोग बाढ़ से मरेंगे. फिर सर्दी आयेगी और लोग ठंड से मरने लगेंगे! मौसम आते रहेंगे, जाते रहेंगे, लोग मौसम की मार से मरते रहेंगे! हर साल की, हर मौसम की यही कहानी है. देश का कोई हिस्सा हो, कोई सरकार हो, यह कहानी नहीं बदलती. कैसे बदले? सरकारों से पूछिए, नेताओं से पूछिए, जवाब एक ही होगा, सरकार क्या करे, मौसम को कौन रोक सकता है? सही बात है. मौसम को तो कोई रोक नहीं सकता. लेकिन मौसम से होनेवाली मौतें रोकी जा सकती हैं. बशर्ते कि कोई इस बारे में सोचे!

दस दिन यह क्यों नहीं हो सकता?

गरमी से कौन मरता है? आमतौर पर शहरी मज़दूर, फेरीवाले, जो दिन भर धूप में खटते हैं. या वे लोग जिन्हें कहीं सिर छिपाने की जगह नहीं होती. आँध्र की ओपन एअर चेरलापल्ली जेल के अधिकारियों ने तय किया गरमी के कारण क़ैदियों से खेतों में काम सुबह छह से दस बजे तक ही लिया जायेगा और शाम को गरमी कुछ कम रही, तो शाम को भी काम होगा. जानलेवा गरमी ज़्यादा से ज़्यादा दस-ग्यारह दिन ही तो पड़ती है. क्या सरकारें इन दस-पन्द्रह दिनों के लिए काम का नया समय नहीं तय कर सकतीं, सिर्फ़ इन पन्द्रह दिनों में सारे दफ़्तर सुबह नहीं खोले जा सकते, बाज़ार क्या दोपहर 12 से चार तक नहीं बन्द रखे जा सकते, जब घातक अल्ट्रा वायलेट (पराबैंगनी) किरणों का तीखापन सबसे ज़्यादा होता है! बरसों पहले जब एयरकंडीशनर और कूलर सुलभ नहीं थे, तो शहरों में गरमी के दिनों में यही होता था. तो अब दस-पन्द्रह दिन के लिए ऐसा करने में क्या दिक़्क़त है? क्यों? इस छोटे-से क़दम में ऐसी क्या कठिनाई थी कि आज तक किसी को यह सूझा नहीं. ख़ास कर अविभाजित आँध्र की किसी सरकार को यह क्यों नहीं सूझा, जहाँँ हर साल गरमी के ये दिन ऐसे ही जानलेवा होते हैं. अकेले आँध्र और तेलंगाना में इस बार गरमी से सत्रह सौ लोग मरे हैं.

असली मुद्दों पर कब सोचती हैं सरकारें?

उत्तर भारत के कई शहरों में ठंड और बरसात में बेघर ग़रीबों को पनाह देने के लिए रैनबसेरे बनते हैं. लेकिन आग बरसाते सूरज में कोई उनमें पनाह नहीं ले सकता? क्यों? इसलिए कि वह अकसर टीन या ऐसी निर्माण सामग्री से बनाये जाते हैं जो गरमी में बेतहाशा तपते हैं. वैसे भी अकसर रैनबसेरे जितनी ज़रूरत हो, उसके मुक़ाबले काफ़ी कम ही बन पाते हैं और जो बनते भी हैं, वह भी कड़ाके की ठंड में लोगों को कोई राहत नहीं दे पाते और गरमी में तो उनमें घुसा ही नहीं जा सकता! ढंग का एक रैनबसेरा कैसे बने, सरकारों और उनके योजनाकारों को इतनी मामूली-सी बात आख़िर क्यों समझ में नहीं आती? अच्छा मान लीजिए कि एक साल समझ में नहीं आयी, दूसरे साल समझ में नहीं आयी, चलो ठीक है, लेकिन सड़सठ साल में भी समझ में नहीं आयी? और किसी ब्राँड की सरकार को समझ में नहीं आयी! क्यों? इसलिए कि ग़रीब आदमी के जीने-मरने से किसी को क्या मतलब? और ग़रीब क्या, असली मुद्दों पर हमारी सरकारों ने कब सोचा है? ग्लोबल वार्मिंग बढ रही है. मौसम बेचाल हो रहा है क्योंकि पर्यावरण पर हमने कोई ध्यान दिया ही नहीं. भारत के आठ सबसे गरम साल 2001 से 2010 के दशक में रहे हैं. पेड़ों और जंगलों की लगातार कटाई और कंक्रीट निर्माण के भयावह विस्तार ने शहरों को तपती भट्टियों में बदल दिया है. विश्व मौसम संगठन के मुताबिक़ दिल्ली, राँची, पटना समेत भारत के कई शहरों में अल्ट्रा वायलेट किरण इंडेक्स बहुत ख़तरनाक स्तर यानी 9 के आसपास पाया गया. आँध्र और तेलंगाना में यह 12 के आसपास रहा. 0-11 के पैमाने पर मापा जानेवाला यह इंडेक्स 4 के नीचे होना चाहिए. जैसे-जैसे यह इंडेक्स ऊपर जाता है, वैसे-वैसे ख़तरा बढ़ता जाता है. और 12 का अल्ट्रा वायलेट इंडेक्स होने पर तो घंटे-आध घंटे भी धूप में रहना तुरन्त जान ले सकता है या फिर इससे त्वचा कैंसर से लेकर शरीर के इम्यून सिस्टम के बिगड़ने तक तमाम दूसरी बीमारियाँ हो सकती हैं. लेकिन पर्यावरण को लेकर हमारी इतनी उदासीनता है कि हम ऐसी किसी चेतावनी पर ध्यान देना तो दूर, अकसर उसे तिरस्कार की नज़र से देखते हैं और 'झोलाछाप' एनजीओ की साज़िश कह कर ख़ारिज कर देते हैं!

एक-तिहाई बच्चों के फेफड़े कमज़ोर!

अभी हाल में ही एक और ख़तरनाक रिपोर्ट आयी है कि देश के महानगरों के एक-तिहाई से ज़्यादा बच्चे फेफड़ों की क्षमता का टेस्ट नहीं पास कर सके. उनका साँस की बीमारियों का शिकार होना तय है. वायु-प्रदूषण को लेकर गम्भीर चेतावनियाँ पिछले कितने बरसों से दी जा रही हैं. लेकिन कौन सुने और क्यों सुने? पिछले साल जम्मू-कश्मीर में आयी बाढ़ के बाद यह सनसनीख़ेज़ ख़ुलासा हुआ था कि वहाँ ऐसी तबाही की चेतावनियाँ काफ़ी पहले से दी जा रही थीं और बाद में तो एक सरकारी रिपोर्ट में तो साफ़-साफ़ कह दिया गया था कि शहरी विकास और ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ों की होड़ ने झेलम के पानी की निकासी के सारे रास्ते बन्द कर दिये हैं और अगर कभी भारी बरसात हुई तो श्रीनगर में भयानक तबाही होगी. तब उस रिपोर्ट की खिल्ली उड़ा कर फेंक दिया गया था! विकास कीजिए, लेकिन पर्यावरण की क़ीमत पर नहीं. आख़िर दुनिया के तमाम दूसरे देश हैं, जो आपसे कहीं ज़्यादा विकसित हैं, लेकिन कितना सुन्दर और निर्मल नीला आसमान उनके शहरों के ऊपर दिखता है! और हमारे यहाँ कितना मटमैला! लेकिन पर्यावरण की चिन्ता न सरकार को है, न जनता को. अजीब हालत है. पर्यावरण की रक्षा की ख़ानापूरी बस सरकारी फ़ाइलों में होती रहती है. उद्योगों, कल-कारख़ानों, बाँधों, बिजलीघरों से लेकर नयी टाउनशिप बनाने और तीर्थों व पर्यटन स्थलों के विकास के नाम पर पर्यावरण का गला हम दिन-रात घोंटते रहते हैं. ऐसा नहीं है कि विकास के यह सारे काम और पर्यावरण की रक्षा, दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकतीं. बिलकुल हो सकती हैं, लेकिन कुछ पैसा ज़्यादा ख़र्च करना पड़ेगा. सो पैसे बचाने के लिए पर्यावरण की बलि चढ़ा दी जाती है.

यथा सरकार, तथा जनता

और जनता भी कम नहीं. घर-घर अस्थमा के मरीज़ बढ़ रहे हैं. सबको पता है कि खेतों और सूखी पत्तियों का कचरा नहीं जलाना चाहिए. उससे बढ़िया खाद बन सकती है. लेकिन जब एक तीली माचिस से काम हो सकता है तो कौन चक्करों में पड़े. लोग अस्थमा के शिकार हो तो हों. कचरा जलानेवालों के अपने घरों के बच्चे भी उसके शिकार हो सकते हैं. लेकिन यहाँ तो लोग अपनी जान की परवाह भी नहीं करते! पोलिथीन बड़ा नुक़सानदेह है. इस्तेमाल न हो तो अच्छा है. और अगर इस्तेमाल हो तो उसे ढंग से अलग करके फेंका जाये. लेकिन किसके पास टाइम है इतना ख़याल करने का. पूरा देश पोलिथीन के विशाल कचराघर में बदल चुका है. सारी गाय-भैंसे उसे खाती हैं, और फिर वह ज़हरीला दूध हम बड़े चाव से पीते हैं. गो-वंश प्रेमी इस देश में किसी को इसकी चिन्ता नहीं हुई. और फिर खाने के हर सामान में मिलावट है. सबको मुनाफ़ा चाहिए. बन्दा दूसरे को मिलावटी सामान बेचता है और किसी और से मिलावटी सामान ख़रीदता है. फिर फ़सलों में ज़रूरत से ज़्यादा रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल. वजह वही, ज़्यादा मुनाफ़ा चाहिए. सब्ज़ियाँ नाले और सीवर के पानी से सींची जाती हैं. फिर शक्ल चमकाने के लिए रंग दी जाती हैं. सब बेधड़क इसलिए हो रहा है कि क़ानून में कड़ी सज़ा नहीं है, और जितनी है भी, उस पर अमल कौन कराये? सरकारी अमला काहे काम करने की ज़हमत उठाये! हम ज़हर उगा रहे हैं, ज़हर खा रहे हैं, ज़हर पी रहे हैं और ज़हरीली हवा में साँसे ले रहे हैं, मर रहे हैं, बीमार पड़ रहे हैं और लगातार पर्यावरण को चौपट करने में लगे हैं. सब बरसों से बदस्तूर जारी है. इस गरमी पर यही एक छोटा-सा सवाल मन में उठा था कि किसी सरकार के एजेंडे में ये बातें कभी क्यों नहीं आतीं? http://raagdesh.com
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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