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Tag Archives: Electoral Reforms

Dec 24
नुस्ख़े राजनीति में नोटबंदी के!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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राजनीतिक दलों का सारा लेन-देन चेक से या ऑनलाइन ही होना चाहिए. अगर किसी मजबूरी में वह कोई चन्दा नक़द लेते हैं या कहीं किसी को कोई नक़द भुगतान करते हैं, तो उन्हें यह प्रमाणपत्र देना ज़रूरी हो कि उस व्यक्ति के पास बैंक खाता नहीं है. आख़िर अभी शादियों के लिए ढाई लाख की रक़म निकालने के लिए सरकार ने लोगों से यह प्रमाणपत्र माँगा था न! तो जो नियम जनता पर लागू हुआ, वह राजनीतिक दलों पर क्यों न लागू हो?


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नोट गन्दे हैं! नोटों में काला धन रहता है! नोट न हों तो भ्रष्टाचार ख़त्म हो जायेगा! तो जनता नोटों में लेन-देन करना छोड़ दे. कर्मचारियों को वेतन चेक से या ऑनलाइन दिया जाये. लेकिन राजनीतिक दल नोटों में चन्दे लेते रहें? क्यों? राजनीतिक दल अपने ख़र्चे नक़दी में करते रहें. क्यों? राजनीतिक दलों के पास नक़दी का जो अथाह अम्बार है, उसे वे बैंकों में ले जा कर आसानी से इस नाम पर बदल लें कि रक़म चन्दे की है! क्यों?

जो नोट जनता के लिए 'गन्दे' हैं, वह राजनीतिक दलों के लिए चन्दा बन कर 'स्वच्छ' क्यों हो जाते हैं? जिन नोटों में काला धन रखा बताया जाता है, वही नोट राजनीतिक दलों के पास पहुँच कर 'सफ़ेद धन' में कैसे बदल जाते हैं? नोटबंदी के बाद यह बहस उठी है.

क्यों हो 'अज्ञात' चन्दे की छूट?

और अब चुनाव आयोग ने भी सुझाव दिया है कि राजनीतिक दल दो हज़ार रुपये से ज़्यादा का नक़द चन्दा 'अज्ञात' स्रोतों से न लें. अब तक यह सीमा बीस हज़ार रुपये की थी. सरकार ने भी इसका स्वागत किया है और कुछ राजनीतिक दलों ने भी. लेकिन सवाल यह है कि यह दो हज़ार के 'अज्ञात' चन्दे की छूट भी क्यों?

अगर राजनीति में काले धन को रोकना है, तो राजनीतिक दलों का हर छोटा-बड़ा चन्दा 'ज्ञात' स्रोत से क्यों नहीं होना चाहिए? उन्हें 'अज्ञात' लोगों से चन्दा लेने की क्या ज़रूरत है? 'अज्ञात स्रोत' के नाम पर काले धन का एक दरवाज़ा खुला छोड़ दिये जाने का क्या तुक है?

सवाल कागज़ी राजनीतिक दलों का

बात सिर्फ़ राजनीतिक चन्दों की ही नहीं हो रही है, राजनीतिक दलों की मान्यता को लेकर भी हो रही है, क्योंकि सैंकड़ों ऐसे दल हैं, जो कागज़ी या फ़र्ज़ी हैं, चुनाव नहीं लड़ते, लेकिन चन्दे पर मिलनेवाली टैक्स-छूट का फ़ायदा उठाते हैं, काले धन को सफ़ेद करने का धन्धा करते हैं. कहा जा रहा है कि जो दल चुनाव नहीं लड़ते या चुनाव में कोई जीत हासिल नहीं कर पाते, उन्हें टैक्स में मिलनेवाली छूट बन्द होनी चाहिए. इसी तरह चुनाव सुधारों की बात भी हो रही है. चुनावों में काले धन के इस्तेमाल को रोकने के लिए एक सुझाव यह भी दिया जा रहा है कि चुनाव का सारा ख़र्च दल और उम्मीदवार नहीं, बल्कि सरकार उठाये.

चुनाव में अनाप-शनाप धन बल का इस्तेमाल रोकने को लेकर बहस बरसों से हो रही ही, सैंकड़ों बड़ी-बड़ी कमेटियाँ बन चुकीं, लेकिन नतीजा ज़्यादा कुछ ठोस नहीं निकला क्योंकि ऐसे सुझाव आये ही नहीं, जो कारगर होते. तो क्या यह काम हो ही नहीं सकता? बिलकुल हो सकता है. कैसे?

नुस्ख़ा एक : चन्दे के लिए आधार नम्बर ज़रूरी हो

सबसे पहले राजनीतिक दलों का हिसाब-किताब. आज अगर घर के चूल्हे के लिए गैस का कनेक्शन या फिर हरेक की ज़रूरत बन चुके मोबाइल फ़ोन का कनेक्शन बिना आधार नम्बर के नहीं मिल सकता है तो राजनीतिक दल आधार नम्बर के बिना किसी से चन्दा क्यों लें? चन्दा एक रुपये का हो या एक करोड़ का, राजनीतिक दलों को मिलनेवाले हर व्यक्तिगत चन्दे के लिए आधार नम्बर ज़रूरी होना चाहिए और हर कारपोरेट चन्दे के लिए पैन कार्ड.

नुस्ख़ा दो : चन्दा देनेवालों का पूरा ब्योरा चुनाव आयोग को दिया जाय

अच्छी बात तो यह होती कि राजनीतिक दल कम से कम अपने आर्थिक लेन-देन के मामले में सूचना के अधिकार के तहत ले आये जाते. लेकिन इक्का-दुक्का दलों को छोड़ कर कोई इसके लिए तैयार नहीं है. तो इतना तो हो सकता है कि राजनीतिक दल चन्दा देनेवालों की पूरी सूची और पूरा ब्योरा चुनाव आयोग को सौंपें, ताकि इस मामले में पूरी पारदर्शिता रहे. अगर किसी दल को इससे आपत्ति है तो इसका मतलब यही है कि चन्दों के मामले में वह साफ़ नहीं है.

नुस्ख़ा तीन : सारा लेन-देन चेक से या ऑनलाइन ही हो

इसी तरह राजनीतिक दलों का सारा लेन-देन चेक से या ऑनलाइन ही होना चाहिए. अगर किसी मजबूरी में वह कोई चन्दा नक़द लेते हैं या कहीं किसी को कोई नक़द भुगतान करते हैं, तो उन्हें यह प्रमाणपत्र देना ज़रूरी हो कि उस व्यक्ति के पास बैंक खाता नहीं है. आख़िर अभी शादियों के लिए ढाई लाख की रक़म निकालने के लिए सरकार ने लोगों से यह प्रमाणपत्र माँगा था न! तो जो नियम जनता पर लागू हुआ, वह राजनीतिक दलों पर क्यों न लागू हो? होना चाहिए न. क्या दिक़्क़त है?

अभी राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग को हिसाब देना होता है. देते हैं, लेकिन आधा-अधूरा. मसलन, कुछ राजनीतिक दलों ने चन्दा देनेवालों के पैन नम्बर ही नहीं दिये. बीस हज़ार से अधिक के नक़द चन्दे के तौर पर तो उन्होंने मामूली रक़म दिखायी, लेकिन किसी ने इसका कोई हिसाब नहीं दिया कि बीस हज़ार से कम के चन्दों के रूप में उन्हें कितना पैसा मिला? ज़ाहिर-सी बात है कि सारा गोलमाल इसी बीस हज़ार से कम के चन्दे के नाम पर होता है.

कुछ पता ही नहीं कि इन फुटकर चन्दों की आड़ में किस पार्टी ने कितने पैसे कहाँ-कहाँ से बटोरे? उन्हें इसके लिए करना ही क्या है, सिर्फ़ इसके-उसके-तिसके नाम से छोटे-छोटे चन्दों की रसीदें ही तो काटनी हैं. इसलिए चुनाव आयोग के दो हज़ार से कम के 'अज्ञात' चन्दे के सुझाव पर किसी दल को कोई एतराज़ नहीं हुआ. क्योंकि इससे बस एक फ़र्क़ पड़ेगा. पहले जितनी रसीदें कटती थीं, अब उसकी दस गुना ज़्यादा रसीदें कटेंगीं. तो थोड़ा दफ़्तरवालों का काम बढ़ जायगा, बाक़ी जैसे पहले काला धन खपता था, अब भी खपेगा.

नुस्ख़ा चार : दलों के खाते चुनाव आयोग ऑडिट करे

अपने खातों की ऑडिट रिपोर्ट भी राजनीतिक दल प्रायः चुनाव आयोग को नहीं देते. तो चुनाव क़ानूनों में सुधार कर चुनाव आयोग को ही राजनीतिक दलों के खातों के ऑडिट का अधिकार दिया जाना चाहिए. चुनाव आयोग के पास अपना एक ऑडिट तंत्र हो, जो सारे रजिस्टर्ड राजनीतिक दलों के खातों का ऑडिट करे, ताकि ऑडिट मानकों में एकरूपता रहे और सभी राजनीतिक दल एकाउंटिंग के एक समान दिशा-निर्देशों का पालन करें.

नुस्ख़ा पाँच : कागज़ी दलों का पंजीकरण रद्द हो

सभी रजिस्टर्ड राजनीतिक दलों को इनकम टैक्स से छूट तो मिलनी चाहिए, लेकिन ऐसे सभी राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द होते रहना चाहिए, जिन्होंने पाँच साल तक कोई चुनाव नहीं लड़ा. चुनाव लड़ना ज़रूरी हो, लेकिन सीटों की हार-जीत को पैमाना नहीं बनाया जा सकता. हाँ, यह हो सकता है कि मान्यता को जारी रखने के लिए तीन या चार चुनावों में भागीदारी के बाद एक न्यूनतम वोट प्रतिशत की सीमा रखी जाय, ताकि पार्टियों को अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए जनता का भरोसा जीतना ही पड़े.

बहरहाल, कुल मिला कर निचोड़ यह है कि अगर हर व्यक्तिगत चन्दा आधार नम्बर से लिया जाये, हर राजनीतिक दल के खातों का ऑडिट एक ही ऑडिट तंत्र से हो और पाँच साल तक चुनाव न लड़ पाने वाले राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द किया जाता रहे, तो राजनीति में काले धन की समस्या पर पूरी तरह क़ाबू पाया जा सकता है.

चुनाव का ख़र्चा सरकार क्यों उठाये?

अब चुनाव लड़ने की बात. चुनाव का ख़र्चा सरकार उठाये, यह सुझाव बहुत दिनों से चल रहा है, लेकिन उसमें बड़े पेंच हैं. मुफ़्त में चुनाव लड़ने को मिले तो एक-एक सीट पर सैंकड़ों उम्मीदवार होंगे. हमारे यहाँ क़रीब 1800 के आसपास राजनीतिक दल हैं. कोई क्यों मौक़ा छोड़ना चाहेगा? फिर निर्दल उम्मीदवार भी बड़ी संख्या में उतरेंगे. इससे कुल मिला कर चुनावी प्रक्रिया की गम्भीरता को ही नुक़सान पहुँचेगा. इसलिए यह सुझाव क़तई व्यावहारिक नहीं है.

राजनीति में नोटबंदी : और अब सबसे बड़ा नुस्ख़ा!

रैलियों, हेलीकाप्टरों, पोस्टरों, बैनरों, होर्डिंगों और टीवी- अख़बारों में विज्ञापनों की सीमा तय हो

तो सरकारी ख़र्च पर चुनाव कराने के बजाय दूसरा रास्ता अपनाना चाहिए. वह ज़्यादा आसान और कारगर है. चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों के लिए ख़र्च की सीमा तय की है, ठीक है. इसके साथ यह सीमा भी लगा दी जाय कि किसी चुनाव में राजनीतिक दल कुल कितनी रैलियाँ कर सकते हैं, कितने हेलीकाप्टर कितने किलोमीटर तक इस्तेमाल कर सकते हैं, कितने पोस्टर छपा सकते हैं, एक चुनाव क्षेत्र में राजनीतिक दल, उम्मीदवार या उनके समर्थक कितने बैनर, कितने होर्डिंग लगा सकते हैं, टीवी पर कुल कितने घंटे और अख़बारों में कुल कितने कॉलम के विज्ञापन दे सकते हैं.

बेतहाशा ख़र्चों पर आसानी से लग जायगी लगाम

अगर ऐसी सीमा तय हो गयी, तो चुनावों में बेतहाशा ख़र्चों पर आसानी से लगाम लग सकती है. इसमें मुश्किल क्या है? कुछ साल पहले तक चुनावों में लाउडस्पीकरों से गली-गली प्रचार होता था, शोर के मारे नाक में दम हो जाता था. इस पर रोक लगी, तो उससे चुनाव में क्या बाधा हुई? कुछ नहीं. तो इसी तरह अगर रैलियों, हेलीकाप्टरों, गाड़ियों, पोस्टरों, विज्ञापनों वग़ैरह की भी सीमा तय कर दी जाय, तो सब पार्टियाँ उसी सीमा में रह कर चुनाव प्रचार करेंगी. आराम से चुनाव हो जायेंगे.

इसके बाद कुछ और बातें रह जाती हैं, जिन पर चुनाव आयोग को और नज़र रखनी होगी. उनमें से एक है पेड न्यूज़, और दूसरी है वोटरों में नक़दी, उपहार और शराब बँटवाने की समस्या, इसकी निगरानी और कड़ी करनी पड़ेगी. तो क्या राजनीति में नोटबंदी और चुनाव सुधारों की तरफ़ हमारा पहला क़दम उठेगा? क्या सरकार और राजनीतिक दल राजनीति को काले धन से मुक्त कराने के लिए इस ज़रा से बदलाव को स्वीकार करेंगे?

© 2016 http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi

email: qwnaqvi@raagdesh.com
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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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