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Tag Archives: Delhi Assembly

Nov 08
क्या हो पायेगा ‘आप’ का पुनर्जन्म?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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दिल्ली में चुनाव की रणभेरी बज चुकी है. सबसे बड़ा सवाल यही है, 'आप' का क्या होगा? केजरीवाल या मोदी? दिल्ली किसका वरण करेगी? केजरीवाल और उनकी सेना के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई है. आम आदमी पार्टी को अगर एक राजनीतिक सम्भावना के तौर पर फिर से जन्मना है तो इस चुनाव में उसे जी- जान लगा कर अच्छा प्रदर्शन करना ही पड़ेगा. उधर, मोदी के लिए यह नाक का सवाल है. इज़्ज़त की लड़ाई है! दो नये क़िले वह जीत चुके हैं. अगले दो और राज्य जीत लेने के क़रीब हैं! और इस सबके बाद उस सूबे को उन्हें फ़तह करना है, जहाँ से वह देश का राजकाज चला रहे हैं. क्या 'आप' के लिए मोदी की चतुरंगिणी सेना का मुक़ाबला कर पाना आसान होगा? क्या पिछली बार की तरह इस बार भी केजरीवाल दिल्ली चुनाव को किसी नये राजनीतिक वैचारिक ध्रुवीकरण की तरफ़ मोड़ पायेंगे?

--- क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi तो क्या 'आप' का पुनर्जन्म हो सकता है? दिल्ली में चुनाव की रणभेरी बज चुकी है. सबसे बड़ा सवाल यही है, 'आप' का क्या होगा? केजरीवाल या मोदी? दिल्ली किसका वरण करेगी? महाराष्ट्र और हरियाणा के क़िले फ़तह कर चुकी मोदी की सेना क्या दिल्ली में भी वही कमाल दिखा पायेगी? केजरीवाल क्या मोदी के अश्वमेध रथ को रोक पायेंगे? बनारस में मोदी भले ही भारी वोटों से जीते हों, लेकिन वहाँ क्या ग़ज़ब चुनावी नज़ारा था! और अब दिल्ली में भी क्या कोई ग़ज़ब चुनावी नज़ारा देखने को मिलेगा? ख़ास तौर पर तब, जब लगातार चुनावी पराजयों से मुरझायी हुई काँग्रेस मरघिल्ली-सी दुबकी पड़ी हो!

केजरीवाल: अस्तित्व की लड़ाई

इसीलिए, कहने को भले यह एक छोटे-से राज्य की विधानसभा का चुनाव हो. एक ऐसे राज्य की महज़ सत्तर सीटों वाली विधानसभा का चुनाव, जो पूर्ण राज्य बनने के लिए तरस रहा हो. फिर भी दिल्ली की यह लड़ाई एक बड़ी चीज़ तय करेगी, वह यह कि क्या ग़ैर-परम्परागत raagdesh kejriwal modi and delhi electionsराजनीति का जो अँखुआ एक बरस पहले अचानक फूटा था, वह कुम्हला कर ख़त्म हो जायेगा या उसमें नयी कोंपलों की उम्मीदें खिलेंगी? इसलिए, अरविन्द केजरीवाल और उनकी सेना के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई है. जान की बाज़ी है. अभी नहीं तो कभी नहीं! आम आदमी पार्टी को अगर एक राजनीतिक सम्भावना के तौर पर फिर से जन्मना है तो इस चुनाव में उसे जी- जान लगा कर अच्छा प्रदर्शन करना ही पड़ेगा, विकट जूझम-जूझ करनी पड़ेगी. वह सरकार बना पाये या न बना पाये, लेकिन उसे बीजेपी से बिलकुल बराबरी की गुत्थम-गुत्था तो करनी ही पड़ेगी. वरना एक अकाल मृत्यु के बाद उसकी भटकती आत्मा को कौन जाने कितने बरसों तक पुनर्जन्म की प्रतीक्षा करनी पड़े, कि क़िस्मत से कोई अन्ना आन्दोलन सरीखी दूसरी कोख मिल जाये! कहाँ मिल पाती है ऐसे नसीबों वाली कोख? (more…)
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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