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Tag Archives: Chai Chaupal

Feb 08
राजनीति का गटर और ‘आप’ की भाप!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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भाप बड़ी चीज़ है. पहली बार इसी चुनाव में पता चला. 'आप' में बड़ी भाप थी. निकल गयी! अब केतली की भाप देखी जा रही है! कहते हैं कि केतली की भाप में बड़ी ताक़त होती है. सच है या गप्प, लेकिन सुनते हैं किसी ज़माने में केतली की भाप देख कर आदमी को भाप का इंजन बनाने का आइडिया आया था! जिसने बाद में बड़ी-बड़ी रेलगाड़ियाँ खींचीं. इसलिए इस बार नमोरथ को खींचने के लिए केतली की मदद भी ली जा रही है. चाय- चौपाल हो रही है. देश के सारे चाय वाले वी आइ पी हो गये हैं! ये सपाइयों और काँग्रेसियों के 'सेल्फ़ गोल' का नतीजा है. न नरेश अग्रवाल और मणिशंकर अय्यर ने चाय वाला कह कर नमो की खिल्ली उड़ायी होती, न चाय के प्याले में यह तूफ़ान उठा होता!


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किसने सोचा था? एक धरने से 'आप' की भाप निकल जायगी? वरना तो देश के सारे ख़ास आदमी 'आम आदमी' बनने के लिए क़दमताल कर रहे थे! 'यू नो आइ ऐम ज्वाइनिंग आप!' क्या ज़बर्दस्त फ़ैशन स्टेटमेंट था! हर बड़ा नाम 'आप' के रैम्प पर 'कैट वाॅक' करने को ललक रहा था. पर मुए उस एक धरने ने सबको बिदका दिया!

अब बेचारे 'आप' वाले रोज़ दो-चार सेलिब्रिटी दरवाज़े खटखटाते हैं, लेकिन 'साहब' या 'मेम साॅब' घर पर नहीं मिलते! सारा 'ग्लैम फ़ैक्टर' उड़न-छू हो गया. सब किया-धरा गुड़-गोबर हो गया. ये राजनीति भी बड़ी विकट चीज़ है. क्रिकेट में विकेट कब उखड़ जाय और राजनीति में कब 'सेल्फ़ गोल' हो जाय, कह पाना बड़ा मुश्किल है!

2014 चुनाव और चाय!

भाप बड़ी चीज़ है. पहली बार इसी चुनाव में पता चला. 'आप' में बड़ी भाप थी. निकल गयी! अब केतली की भाप देखी जा रही है! कहते हैं कि केतली की भाप में बड़ी ताक़त होती है. सच है या गप्प, लेकिन सुनते हैं किसी ज़माने में केतली की भाप देख कर आदमी को भाप का इंजन बनाने का आइडिया आया था! जिसने बाद में बड़ी-बड़ी रेलगाड़ियाँ खींचीं.

इसलिए इस बार नमोरथ को खींचने के लिए केतली की मदद भी ली जा रही है. चाय- चौपाल हो रही है. देश के सारे चाय वाले वी आइ पी हो गये हैं! ये सपाइयों और काँग्रेसियों के 'सेल्फ़ गोल' का नतीजा है. न नरेश अग्रवाल और मणिशंकर अय्यर ने चाय वाला कह कर नमो की खिल्ली उड़ायी होती, न चाय के प्याले में यह तूफ़ान उठा होता!

पहले तो कभी प्रणब दा की चिन्ता नहीं हुई!

अजीब बात है न कि यह चुनाव भाप पर लड़ा जा रहा है! दंगों की थोपाथापी से बात नहीं बनी तो चाय की भाप से चुनाव को गरमा लो. उससे भी काम न बने तो बंगाल में जा कर बोल आओ कि 1984 में या 2004 में प्रणब दा को काँग्रेस ने क्यों प्रधानमंत्री नहीं बनाया? बंगाल जा कर ही आप ऐसा क्यों बोलते हैं श्रीमान? इतने सालों में इससे पहले तो कभी आपको प्रणब दा की कोई चिन्ता नहीं हुई! अब अचानक क्या हो गया कि उनसे इतनी आत्मीयता फूट पड़ी?

और अगर ऐसा प्रेम उमड़ा भी तो यही बात आप 'अपने' गुजरात में भी बोल सकते थे. यूपी, एमपी, राजस्थान, कर्नाटक, आँध्र कहीं भी बोल सकते थे. ख़ास तौर पर बंगाल में बोलने का मक़सद क्या था? यही न कि बंगालियों को भड़काया जाय. यह लोगों को तोड़ना हुआ या जोड़ना? उत्तराखंड में त्रासदी होती है तो आप सिर्फ़ गुजरातियों को राहत पहुँचाने का इन्तज़ाम करते हो. और बंगाल में जा कर बंगालियों को बरगलाते हो! और फिर कहते हो, इंडिया फ़र्स्ट! बात कुछ समझ में नहीं आयी!

काँग्रेसियों को नयी भाप की तलाश

काँग्रेसियों की भाप तो पहले ही निकल चुकी है. उन्हें नयी भाप की तलाश है. मोदी के पास चायवाले हैं तो काँग्रेस रेहड़ी-पटरीवालों के लिए अचानक चिन्तित हो उठी है! काफ़ी देर से जगी. गैस सिलिंडर भी नौ से बारह कर दिये. ताकि लोग घर में ही जी भर कर चाय बना लें. बाहर चाय-चौपाल पर न जायें और नमो संक्रमण से बचे रहें! पहले छह, फिर नौ और अब बारह सिलिंडर.

यही करना था तो कम ही क्यों किये थे? कम इसलिए किये थे कि अर्थव्यवस्था बिगड़ रही थी! अब नहीं बिगड़ेगी क्या? उधर अब भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ भी आस्तीनें चढ़ गयी हैं. जुगत लगायी जा रही है. बचे-खुचे बिल कैसे भी पास हो जायें. लोकपाल कैसे भी जल्दी से जल्दी बन जाय. आख़िर पोस्टर तो छापने हैं न! भ्रष्टाचार बिलकुल बर्दाश्त नहीं! अब यह अलग बात है कि आदर्श घोटाले की मक्खी उनकी अपनी चाय में पड़ी थी, इसलिए उन्हें नहीं दिखी, बाक़ी सबको दिखी!

मूर्ख बनाने का तमाशा है चुनाव!

एक तीसरा मोर्चा है. एक? उस तीसरे मोर्चे के अन्दर जाने कितने मोर्चे हैं. इस उम्मीद में कि बिल्ली के भाग्य से छींका टूटे तो जाने कौन प्रधानमंत्री बन जाय. उसमें भी एक पवार साहब हैं, जो सर्वव्यापी हैं. यूपीए के साथ हैं, मोदी से भी गलबहियाँ करते फिरते हैं, और तीसरे मोर्चे की चौसर पर भी गोटियाँ बिछाये दिखते हैं. कोई भी सरकार बने, वह सरकार में बने रहें. कोउ नृप होय, हमें का हानि. इन पंक्तियों के नये अर्थ के आविष्कार का श्रेय उन्हें जाता है!

चुनाव हमेशा ही तमाशा क्यों होता है? मूर्ख बनाने का तमाशा! क्या कभी ऐसा भी होगा कि चुनाव चाय के प्याले, आग, भाप और हवा पर नहीं, सचमुच जनता के मुद्दों पर ही लड़े जाय. ऐसा नहीं है कि लोग ऐसा नहीं चाहते. वह चाहते हैं और ख़ूब चाहते हैं. भला कौन बार-बार बेवक़ूफ़ बनना चाहता है?

आम आदमी पार्टी : अराजक धरने की ग़लती

इसीलिए दिल्ली में अचानक आम आदमी पार्टी को लोगों ने सिर माथे बैठाया. इस उम्मीद में कि वे सचमुच आम आदमी हैं और नेताओं की तरह गटर में नहीं गिरेंगे. लेकिन सत्ता का सेब चखते ही राजनीति के 'ज्ञानचक्षु' खुलने लगते हैं, अपने चारों तरफ़ ठाठें मार रही भीड़ की लालसाएँ लपलपाने लगती हैं. सही-ग़लत के बीच तब अकसर ग़लत को चुन लेना ज़्यादा सही लगने लगता है! भाषा अचानक बदल जाती है. फिर बाक़ी राजनीतिक दलों और 'आप' में क्या फ़र्क़ है? एक फ़र्क़ है. जो भी 'आप' की हाँ में हाँ न मिलाये, वह ग़लत--मीडिया भी, न्यायपालिका भी, क़ानूनविद् भी!

वैसे राजनीति सबको कम से कम एक ऐतिहासिक मौक़ा ज़रूर देती है. 'आप' के 'सेल्फ़ गोल' ने भी उसे ऐसा ही एक लड्डू दिया है. ऊपर से कड़ुवा, भीतर से मीठा! एक अराजक धरने की ग़लती से ही सही, 'आप' का सेलिब्रिटी स्टेटस ध्वस्त होने ने उसे फिर से 'ख़ास' के बजाय 'आम' होने का मौक़ा दिया है. हाड़तोड़ ठंड में खुले आसमान के नीचे सड़क पर रज़ाई तले सो सकने का हौसला रखने वाला एक मुख्यमंत्री! इससे बड़ा पोस्टर और क्या होगा? लौट सकें तो उसी बेचारे आम आदमी के पास लौटिए. उससे सीखिए. वरना तो सब भाप ही भाप है.
(लोकमत समाचार, 8 फ़रवरी 2014)
© 2014 http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi

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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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