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Sep 13
न हादसे के पहले, न हादसे के बाद!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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हैरान मत होइए कि जम्मू-कश्मीर में आज जो बाढ़ आयी है, उसकी भविष्यवाणी वहाँ के बाढ़ नियंत्रण विभाग ने चार साल पहले कर दी थी. बिलकुल साफ़-साफ़! उन्होंने 2010 में कहा था कि अगले पाँच साल में श्रीनगर शहर में भयानक बाढ़ आ सकती है; झेलम नदी से डेढ़ लाख क्यूसेक पानी बह कर श्रीनगर के ज़्यादातर हिस्सों को अपनी चपेट में ले सकता है; अनन्तनाग से बारामूला के बीच के इलाक़ों में भारी बाढ़ आ सकती है; श्रीनगर-जम्मू राजमार्ग बह सकता है और घाटी का सम्पर्क देश से कट सकता है! ऐसा लग रहा है, जैसे यह रिपोर्ट बाढ़ आने के बाद आज लिखी गयी हो! इसे पेश करने वालों को तब 'जोकर' तक कह दिया गया था.

--- क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi टीवी की भाषा में इस लेख की टीआरपी शायद बहुत कम हो! क्योंकि असली मुद्दों में कोई रस नहीं होता! उन पर लोग लड़ते नहीं, न उन पर उन्हें लड़ाया जा सकता है! भला फीके, नीरस, बेस्वाद, बदरंग, बोझिल, उबाऊ, भारी-भरकम गम्भीर सच पर भी कोई लड़ सकता है? पहले के ज़माने में राजे-रजवाड़ों वाले लोग मज़े के लिए मेढ़े, मुर्ग़े और बटेर लड़ाया करते थे! आजकल राजनीति के लिए जनता को लड़ाते हैं! जनता फ़र्ज़ी मुद्दों पर ख़ूब लड़ती है! वह न गम्भीर बात पर लड़ती है, न गम्भीर बात पढ़ती है! इसलिए यह लेख 'बोर' लगे तो पढ़ने की कोई मजबूरी नहीं है! हालाँकि इसे पढ़ना बेहद ज़रूरी है! raagdesh will we ever learn from man made calamities like jammu kashmir floodsपता नहीं, इतिहास में नास्त्रेदमस सचमुच हुए थे या नहीं! लेकिन अपने देश का कोई सरकारी विभाग अगर भविष्यवाणी करने में नास्त्रेदमस के भी कान काट ले तो? ऐसा हुआ! लेकिन फिर क्या हुआ? अरे होना क्या है? गम्भीर चीज़ है न! किसे इतनी फ़ुर्सत है इन 'बेकार' की बातों में पड़ने की? इसलिए हैरान मत होइए कि जम्मू-कश्मीर में आज जो बाढ़ आयी है, इसकी भविष्यवाणी वहाँ के बाढ़ नियंत्रण विभाग ने चार साल पहले कर दी थी. बिलकुल साफ़-साफ़! उन्होंने कहा था कि अगले पाँच साल में श्रीनगर शहर में भयानक बाढ़ आ सकती है; झेलम नदी से डेढ़ लाख क्यूसेक पानी बह कर श्रीनगर के ज़्यादातर हिस्सों को अपनी चपेट में ले सकता है; अनन्तनाग से बारामूला के बीच के इलाक़ों में भारी बाढ़ आ सकती है; श्रीनगर-जम्मू राजमार्ग बह सकता है और घाटी का सम्पर्क देश से कट सकता है!

 मतलब 'विकास' हो चुका है!

ऐसा लग रहा है, जैसे यह रिपोर्ट बाढ़ आने के बाद आज लिखी गयी हो! इसे पेश करने वालों को तब 'जोकर' तक कह दिया गया था. रिपोर्ट में कहा गया था कि 1892 की बाढ़ के बाद अंगरेज़ों ने श्रीनगर और आसपास के इलाक़ों में बाढ़ के पानी की निकासी के लिए नाले- नालियों की जो व्यापक व्यवस्था की थी और 'वेटलैंड' के नाम पर जो ज़मीनें छोड़ी थीं, वह सब आज लापता हैं. उन पर घर, बाज़ार, शापिंग काम्प्लेक्स बन चुके हैं. श्रीनगर से पानी बाहर निकलने का न कोई रास्ता बचा है, न कोई ऐसी जगह जहाँ यह पानी जमा हो सके. सोपोर और बारामूला के बीच झेलम की तली से कीचड़ की सफ़ाई आख़िरी बार चौंसठ साल पहले 1950 में हुई थी! आप चौंके कि नहीं! यही नहीं, छह साल पहले सन 2008 में राज्य की रिमोट सेन्सिंग और जीआइएस प्रयोगशाला ने भी सेटेलाइट तसवीरों के अध्ययन के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 1911 से 2004 के बीच के क़रीब 93 सालों में श्रीनगर के आधे से ज़्यादा जलाशय और ख़ाली पड़ी दलदली ज़मीनें ख़त्म हो चुकी हैं, वहाँ सड़कें और कालोनियाँ बन चुकी हैं, अवैध क़ब्ज़े कर उन्हें पाटा जा चुका है, बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य हो चुका है! मतलब 'विकास' हो चुका है! (more…)
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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