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Tag Archives: Arvind Kejriwal

Dec 14
जब जनता आती है और ठगी जाती है!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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1947 में जनता आयी थी, उसने अँगरेज़ों से सिंहासन ख़ाली करा लिया और लकदक खादी कुरते वाले वहाँ विराजमान हो गये. राजकाज चलने लगा, लोकतंत्र आ गया था, इसलिए नेता राजा हो गये, जनता वैसे ही 'परजा' बनी रही और गाँधी 'महात्मा' बना कर अपने आश्रम में सिमटा दिये गये! गोडसे की गोली के काफ़ी पहले ही तंत्र गाँधी को मार चुका था!


People of India felt cheated by Politics- Raag Desh 141213.jpg
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People & Indian Politics | क़मर वहीद नक़वी | No Real Change in Politics |
सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है! देश के पहले गणतंत्र दिवस के मौक़े पर रामधारी सिंह 'दिनकर' ने यह कविता लिखी थी. उसके चौबीस साल बाद उनकी यह पंक्ति जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन का नारा बन कर गली-गली गूँजी थी. अब दिल्ली में 'आप' (AAP) के चमत्कार के बाद ऐसा लगता है कि जनता एक बार फिर अपना सिंहासन पाने के लिए फिर मचल उठी है! लेकिन सब एक ही सवाल पूछ रहे हैं. क्या हर बार की तरह एक बार फिर लुटी-पिटी और ठगी हुई जनता को सत्ता के दरवाज़े से दुरदुरा कर भगा दिया जायेगा? पिछले दो सालों से देश की जनता में बड़ी बेचैनी दिख रही है. अन्ना के जनलोकपाल आन्दोलन से जनता उठ खड़ी हुई थी. भ्रष्टाचार ख़त्म हो, जनता का राज हो. न भ्रष्टाचार ख़त्म हुआ, न जनता का राज आया, न लोकपाल बना. अन्ना ज़रूर दिल्ली से अपना बोरिया-बिस्तर लेकर अपने गाँव रालेगण सिद्धि पहुँच गये और अब वहीं अनशन कर रहे हैं.

Why People of India always gets cheated by Politics of the Day?

'आप'  क्या राजनीति में बदलाव ला पायेगी?

हाँ, उस आन्दोलन से टूट कर आम आदमी पार्टी (AAM AADMI PARTY) ज़रूर बन गयी, जो दिल्ली के बाद अब लोकसभा चुनाव के लिए ताल ठोक रही है. लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि 'आप' यानी कि आम आदमी पार्टी क्या सचमुच राजनीति में कोई बदलाव ला पायेगी, क्या वाक़ई सत्ता में आम आदमी को हिस्सेदारी मिल पायेगी, क्या पार्टी के पास कोई ठोस राजनीतिक दृष्टि है, क्या उसके पास देश की समस्याओं का कोई ठीकठाक हल है या फिर महज़ नारों के गुब्बारे ही हैं, जिनसे भीड़ को कुछ देर बहलाया ही जा सकता है, बस.

People Power dislodged Indira Gandhi, but did That bring any Real Change in Politics?

बदलाव के लिए लड़ रही जनता हर बार ही क्यों ठगी जाती है? 1974 के दिन याद आ रहे हैं. हालात तब भी कमोबेश आज जैसे ही थे. महँगाई थी, भ्रष्टाचार था, सत्ता निरंकुश थी, जनता त्रस्त थी, कहने को लोकतंत्र था, लेकिन लोक पूरी तरह ग़ायब हो चुका था, सिर्फ़ तंत्र ही तंत्र बचा था, जो देश को किधर हाँक रहा था, किसी को पता नहीं था. ऐसे में गुजरात से छात्रों का 'नवनिर्माण आन्दोलन' शुरू हुआ और देखते ही देखते वह बिहार पहुँचा और 'सम्पूर्ण क्रान्ति' का नारा बुलन्द हो गया. जेपी यानी जयप्रकाश नारायण के पीछे सारा देश खड़ा हो गया. वह लोकनायक कहलाये जाने लगे. और आख़िर जनता की ताक़त ने इमर्जेन्सी के तमाम दमन को बर्दाश्त करते हुए भी इन्दिरा गाँधी के शासन का ख़ात्मा कर दिया.

सम्पूर्ण क्रान्ति, जनता और जेपी: किनारे लग गये!

जनता जीत गयी थी. दिल्ली की सरकार बदल गयी थी. लेकिन सम्पूर्ण क्रान्ति के सपने की गठरी के साथ जनता और जेपी दोनों किनारे लगाये जा चुके थे. राजनीति ने उन्हें ठग लिया था, ठीक वैसे ही जैसे आज़ादी के बाद गाँधी ठगे हुए हाथ मलते रह गये थे! हालाँकि आज़ादी मिलने के कुछ सालों तक लोगों को यह भरम ज़रूर बना रहा कि जनता का राज आ चुका है. वरना 26 जनवरी 1950 को देश का पहला गणतंत्र मनाने के लिए 'दिनकर' यह न लिखते कि 'सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है!'

People fought for Change but every time they end up changing the Ruler!

 नेता राजा हो गये, जनता 'परजा' बनी रही!

1947 में जनता आयी थी, उसने अँगरेज़ों से सिंहासन ख़ाली करा लिया और लकदक खादी कुरते वाले वहाँ विराजमान हो गये. राजकाज चलने लगा, लोकतंत्र आ गया था, इसलिए नेता राजा हो गये, जनता वैसे ही 'परजा' बनी रही और गाँधी 'महात्मा' बना कर अपने आश्रम में सिमटा दिये गये! गोडसे की गोली के काफ़ी पहले ही तंत्र गाँधी को मार चुका था!

'राजा नहीं फ़क़ीर है, देश की तक़दीर है!'

फिर 1988 में एक बार फिर भ्रष्टाचार के मुद्दे ने देश को मथा. बोफ़ोर्स तोपों का मामला गूँजा. वी. पी. सिंह के पीछे जनता फिर खड़ी हुई. नारा गूँजा, 'राजा नहीं फ़क़ीर है, देश की तक़दीर है!' एक बार फिर लगा कि भ्रष्टाचार हारेगा, ग़रीब जीतेगा, व्यवस्था में बुनियादी बदलाव होंगे. लेकिन मंडल-कमंडल की राजनीति में देश ऐसा बँटा कि सब बंटाधार हो गया!

अब 'आप' की डुगडुगी!

और अब 'आप' की डुगडुगी बज रही है. जनता ने फिर उम्मीदें रोपनी शुरू की हैं. बहुत-से लोगों को लगता है कि परम्परागत राजनीति के ढर्रों को अगर कभी कोई ध्वस्त कर सकता है, वह 'आप' जैसा संगठन ही हो सकता है, जिसके लोग 'पेशेवर' राजनेता नहीं, बल्कि सचमुच हमारे अड़ोस-पड़ोस के आम आदमी हैं. ऐसा मानना और समझना ग़लत नहीं. लेकिन 'आप' को इतिहास से सीखना चाहिए. अरविन्द केजरीवाल न गाँधी हैं, न जेपी और न ही वीपी. गाँधी और जेपी तो ख़ैर बहुत बड़ी चीज़ थे और उनकी दृष्टि, दर्शन और राजनीतिक-सामाजिक सूझ-बूझ के मामले में कोई दूर-दूर तक कहीं नहीं ठहरता. फिर भी इतिहास गवाह है कि ये दोनों सत्ता के राजनीतिक कुचक्र के हाथों बुरी तरह ठगे गये. वीपी ख़ुद राजनीति के खिलाड़ी थे, लेकिन वह अपनी ही राजनीति के भँवर में ऐसे फँसे कि ख़ुद ही डूब गये! कुछ और भी उदाहरण हैं. जैसे अन्ना हज़ारे, जिनके साथ जुटी भीड़ देख कर तंत्र का दम फूल गया, लेकिन आख़िर उन्हें भी उसने अपने मकड़जाल में उलझा कर समेट दिया!

केजरीवाल के पास क्या कार्ययोजना है?

केजरीवाल ने अभी तक सपने तो ख़ूब बेचे, लेकिन वे पूरे कैसे होंगे, यह वह साफ़ नहीं करते. उन्हें चाहिए कि वह देश को विस्तार से बतायें कि उनके पास क्या कार्ययोजना है, आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक-वैश्विक मोर्चे पर उनकी नीतियाँ क्या होंगी और वे नीतियाँ मौजूदा व्यवस्था के मुक़ाबले कैसे बेहतर होंगी, वे तंत्र को कैसे दुरुस्त करेंगे? वरना जनता एक बार फिर ठगी जायेगी और उनमें व दूसरे राजनीतिक दलों में क्या अन्तर रह जायेगा जो हर पाँचवे साल जनता को ठगते हैं?
(लोकमत समाचार, 14 दिसम्बर 2013)
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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