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Mar 12
ऐसे ही ‘टाइमपास’ होता रहे!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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विजय माल्या कहाँ है? उनका ट्वीट कहता है कि वह जहाँ कहीं भी हैं, देश छोड़ कर भागे नहीं हैं. वह भगोड़े नहीं हैं, क़ानून का पालन करनेवाले सांसद हैं! और उनका एक और ट्वीट मीडिया के दिग्गजों के नाम हैं, जिसमें वह कहते हैं कि आप भूल न जायें कि मैंने आपके लिए कब, क्या-क्या किया, क्योंकि मेरे पास सबके दस्तावेज़ी सबूत हैं! माल्या जी मीडिया की पोल खोलें तो हो सकता है कि बड़ी चटपटी स्टोरी बने, लेकिन असली कहानी तो 'टाइमपास' की है, जो बरसों से चल रही है, चलती ही जा रही है. 


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वह 'अच्छे वक़्त का राजा' है. सो 'अच्छे दिनों' की बहती बयार में उड़नछू हो गया! अब वह वहाँ मज़े से अपने 'अच्छे दिन' बितायेंगे. जैसे ललित मोदी बिता रहे हैं! सब पूछ रहे हैं, अरे ये कैसे हो गया? इतना माल गड़प कर माल्या जी कैसे उड़ गये? कैसे उड़ सकते हैं? यह भी कोई पूछने की बात है भला? उड़ना और उड़ाना तो माल्या जी का बड़ा पुराना शग़ल रहा है. उन्होंने जहाज़ भी उड़ाये और बैंकों के पैसे भी उड़ाये! जहाज़ उड़ते रहे, साथ-साथ बैंकों के पैसे भी उड़ते रहे! लोग देखते रहे. बैंक भी पैसों को उड़ते हुए देखते रहे. सरकार भी देखती रही. सब देखते रहे. और पैसे उड़ते रहे, पार्टियों में, शान-शौकत में, मौज में, मस्ती में. उनके कैलेंडर लोगों के होश उड़ाते रहे और वह नीलामी में गाँधी का चश्मा और टीपू सुल्तान की तलवार ख़रीद कर 'देश की इज़्ज़त' को धूल में उड़ने से बचाते रहे! तो इस बार वह बैंकों की नींद उड़ा कर 'पूरी इज़्ज़त से' बाहर उड़ गये!

Vijay Mallya loan default: will the story reach to its logical conclusion?

क्या पहली बार हुआ है ऐसा 'उड़' जाना?

और ऐसा 'उड़' जाना कोई पहली बार हुआ है? ओत्तावियो क्वात्रोची भी कभी ऐसे ही उड़नछू हो गया था. और भोपाल गैस कांड के मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन को तो 'उड़ जाने के लिए' ख़ैर हम बाक़ायदा एअरपोर्ट तक छोड़ कर आये थे. फिर दुबारा न कभी क्वात्रोची तक हमारे हाथ पहुँच पाये और न एंडरसन तक. अदालतें उन्हें भगोड़ा घोषित करती रहीं, अदालतों के टाइपराइटर खड़कते रहे, क़ानूनी काग़जों के घोड़े दौड़ते रहे, सरकारों में लिखा-पढ़ी, चिट्ठी-पत्री चलती रही यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ. सबको मालूम था कि कुछ नहीं होना है, कुछ नहीं हो सकता है. ये सब बस 'टाइमपास' है. तो 'टाइमपास' होता रहा, दोनों अब स्वर्ग सिधार चुके हैं. न बोफ़ोर्स का रहस्य खुला और न कभी खुलेगा, न भोपाल के गैसपीड़ितों को न्याय मिला और न कभी मिलेगा. क़िस्सा ख़त्म! तो अब माल्या को लेकर भी 'टाइमपास' करते रहिए!

Vijay Mallya loan is a tip of the iceberg of Great Indian Bank Robbery!

छोटी मछली, बड़ी मछली!

कोई विजय माल्या अकेले हैं क्या जो 'उड़नछू' हो गये. मोटा-मोटा अनुमान है कि बैंकों का जो क़र्ज़ डूबा हुआ या डूब सकनेवाला माना जा रहा है, वह देश की जीडीपी का क़रीब छह से सात फ़ीसदी है.(Click to Read) लाखों की करोड़ की रक़म है यह और सैंकड़ों ऐसे महाधन्नासेठ क़र्ज़दार हैं, जो पैसा लेकर गड़प कर गये. इनमें ऐसे लोगों की लम्बी सूची है, जिन्होंने जानबूझ कर क़र्ज़ नहीं चुकाये क्योंकि वे आश्वस्त हैं कि उनका कुछ नहीं बिगड़ सकता, कुछ नहीं बिगड़ेगा. क़र्ज़ किसी काम के लिए लिया, किसी कम्पनी के नाम पर लिया और पैसा कहीं और पहुँच गया. माल्या ख़ुद ही अदालतों में कहते घूम रहे थे कि वह तो 'बहुत छोटी मछली' हैं, 'बड़ी-बड़ी मछलियों' पर भी निशाना लगाइए. लेकिन सबको मालूम है कि वह निशाना कभी नहीं लगेगा. निशाना तो तभी लगेगा न, जब आप निशाना लगाना चाहें और जब आप कुछ देखना चाहें! आप देख कर मुँह फेर लें तो आपने कुछ देखा ही नहीं. बात ख़त्म!

Priya Pillai Speech vs Vijay Mallya loan : Two faces of Governance!

ग्रीनपीस की प्रिया पिल्लई विदेश में भाषण न कर पाये, इसलिए उसे बड़ी मुस्तैदी से एअरपोर्ट पर रोक लिया जाता है. लेकिन माल्या जी सात-सात लहीम-शहीम बैगों के साथ चार्टर्ड जेट से 'उड़' जाते हैं. ख़बरें हैं कि इमीग्रेशन ब्यूरो ने सीबीआइ को माल्या के देश छोड़ने की बाबत सूचित भी किया था, लेकिन सीबीआइ ने यह कह कर उसे 'अनसुना' कर दिया कि माल्या की गिरफ़्तारी का कोई वारंट नहीं है! तो एक व्यक्ति को आप महज़ इसलिए विदेश जाने से रोक देते हैं कि वह वहाँ जाकर भाषण न कर पाये और दूसरी तरफ़ देश का नौ हज़ार करोड़ रुपये गड़प कर जानेवाले दूसरे व्यक्ति को 'आराम से उड़ जाने' देने के लिए आप आँखें फेर लेते हैं! पूरी दुनिया में भद पिटा लेने के बावजूद प्रिया पिल्लई का भाषण तो ख़ैर फिर भी आप नहीं रोक पाये क्योंकि वह वीडियो कान्फ्रेन्सिंग से हो गया, लेकिन माल्या जी के नाम जो क़र्ज़ है, वह तो अब 'टाइमपास' के औंधे कुँए में पड़ ही गया, जहाँ से कुछ वापस नहीं लौटता!

अक़्लमंद के लिए इशारा काफ़ी!

यक़ीनन माल्या की यह बात बिलकुल सच है कि वह बहुत छोटी मछली हैं. और माल्या इतनी आसानी से निकल गये तो अरबों रुपये के क़र्ज़ वाली 'बड़ी मछलियों' के साथ क्या होगा, अक़्लमंद के लिए इशारा काफ़ी!

एनजीटी पर क्यों तरेरी आँखें श्री श्री रविशंकर ने

और जब कुछ न होने का इत्मीनान हो तो फिर किसी को किस बात की परवाह? श्री श्री रविशंकर ने आख़िर क्यों एनजीटी यानी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को आँखें दिखायी और कहा कि हमने कुछ भी ग़लत नहीं किया, नहीं देंगे पाँच करोड़ का जुर्माना, जेल जाना होगा, चले जायेंगे. आप सत्ता के नज़दीक हों तो क्यों किसी की परवाह करेंगे, इसमें हैरानी क्या? ख़ैर चलिए, जब अगले दिन एनजीटी ने फटकार लगायी, तो मान गये कि चार हफ़्ते में जुर्माना दे देंगे. एनजीटी ने पहले अपने फ़ैसले में साफ़ कहा था कि जो भी यमुना तट पर हो रहा है, ग़लत हो रहा है और सारे सरकारी विभाग इस मामले में अपनी क़ानूनी ज़िम्मेदारी निभाने में विफल रहे हैं. बहरहाल, अब क़ानूनी पेंचों में 'टाइमपास' कर क़ानून मान लेने की ख़ानापूरी कर दी जायेगी. बात ख़त्म!

(Indian Express की ख़बर के मुताबिक़ NGT (National Green Tribunal) ने शुक्रवार 11 मार्च को यह स्पष्ट किया कि पाँच करोड़ की इस रक़म को 'पर्यावरण मुआवज़ा' समझा जाय, न कि 'नियमों के उल्लंघन का जुर्माना.' दो दिन पहले यानी बुधवार को इसी एनजीटी ने कहा था कि इसे 'अन्तरिम जुर्माना' कहा था और कहा था कि इसे नहीं चुकाया गया तो क़ानून अपना काम करेगा. तो शब्दों के बदल जाने का अर्थ क्या है, आप आसानी से समझ सकते हैं!) Click to Read.

कुछ नहीं देखने की कला!

ऐसे हर मामले में सरकारी विभाग इसी तरह मुँह फेर कर कुछ नहीं देखने की कला में पारंगत हो चुके हैं. जो सरकार देखना चाहे, वह देखती है, जो न देखना चाहे, वह नहीं देखती. अब जेएनयू का ही मामला लीजिए. बिना ठोस सबूतों के कन्हैया के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मामला ठोंक देनेवाली दिल्ली पुलिस ने उन लड़कों को पकड़ने में आज तक कोई भी रुचि क्यों नहीं दिखायी, जिन्होंने सारे देश-विरोधी नारे लगाये थे? ज़ाहिर है कि इसके राजनीतिक कारण हैं, जो सबको पता हैं.

'टाइमपास': विजय माल्या से इशरत जहाँ तक

यही मामला इशरत जहाँ का है. कहा जा रहा है कि अब फ़ाइल से वह काग़ज़ ग़ायब हो गये हैं, जिन पर पूर्व गृह सचिव जी. एस. पिल्लई और पूर्व गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की टिप्पणियाँ दर्ज थीं. आप उन पर आरोप लगाते रहिए, वह आप पर आरोप लगाते रहें, आपकी सरकार हो तो जाँच उधर जाये, उनकी सरकार हो तो जाँच इधर जाये और लोग बैठे सिर धुनते रहें कि आख़िर सच क्या था. और बस ऐसे ही 'टाइमपास' होता रहे!
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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