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Tag Archives: 2014 Elections

May 24
काँग्रेस जी, क्या नौ मन तेल होगा?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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काँग्रेस अनेक बार संकटों में घिरी, उतरायी और उबरी, लेकिन पार्टी में आज जैसा संकट इससे पहले कभी नहीं देखा गया था. यह संकट है पार्टी के शीर्ष स्तर पर किंकर्तव्यविमूढ़ता का! यह शायद दुनिया का सबसे बड़ा अजूबा होगा कि दस साल सत्ता में रहने के बाद कोई पार्टी बिना किसी तैयारी के, बिना किसी मुद्दे के, बिना किसी रणनीति के इतनी बेफ़िक्री से चुनाव के मैदान में जाये, हरहरा कर हारे और उसके बाद भी ठलुआती रहे!


Congress facing tough task to revive itself after crushing defeat in Loksabha Elections 2014- Raag Desh 240514.jpg
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काँग्रेस भी ग़ज़ब चीज़ है! नमो ने चुनाव में कूट-कूट कर काँग्रेस की चिंदी-चिंदी कर दी, उसकी पूरी की पूरी बत्तीसी बाहर आ गयी, लेकिन पार्टी न हिली, न डुली, बस ठसियाई हुई पड़ी है! लोगों ने सोचा था कि इतनी बड़ी हार से पार्टी हिल जायेगी. थोड़ी हिली ज़रूर! होंठ हिले और एक मुस्कराहट में हार तमाम हो गयी! हर कोई हक्का-बक्का-सा बस देखता रह गया!

जड़, ठस पड़ी काँग्रेस!

लोग हैरान भी हैं और परेशान भी! चुनावों में ऐसी तगड़ी कुटम्मस के बावजूद पार्टी में कुछ ख़ास हलचल नहीं दिखी, सिवा एक रस्मी बैठक के! पार्टी आगे क्या करेगी, रहेगी या नहीं रहेगी, लड़ेगी या दम तोड़ देगी, और अगर लड़ेगी तो कैसे लड़ेगी, कैसे हथियार होंगे, कैसे जिरह-बख़्तर होंगे, कैसी सेना होगी, कैसी व्यूह रचना होगी, कैसे सेनापति होंगे, अभी इस पर किसी सोच-विचार की शुरुआत भी हुई दिखती नहीं है. और अभी क्या, पिछले तीन साल से काँग्रेस ऐसे ही जड़, ठस, बे-हरकत, बेख़बर पड़ी है. यह शायद दुनिया का सबसे बड़ा अजूबा होगा कि दस साल सत्ता में रहने के बाद कोई पार्टी बिना किसी तैयारी के, बिना किसी मुद्दे के, बिना किसी रणनीति के इतनी बेफ़िक्री से चुनाव के मैदान में जाये, हरहरा कर हारे और उसके बाद भी ठलुआती रहे!

शीर्ष स्तर पर किंकर्तव्यविमूढ़ता

1967 में छह राज्यों में काँग्रेस की हार, 1969 में इंडिकेट-सिंडिकेट के रूप में काँग्रेस की टूट, 1977 में जनता पार्टी के हाथों करारी हार, 1984 में इन्दिरा गाँधी की हत्या, 1989 में वीपी सिंह के हाथों हार, 1991 में राजीव गाँधी की हत्या और फिर 1996 से 2004 तक सत्ता से बाहर रहने के दौरान काँग्रेस अनेक बार संकटों में घिरी, उतरायी और उबरी, लेकिन पार्टी में आज जैसा संकट इससे पहले कभी नहीं देखा गया था. यह संकट है पार्टी के शीर्ष स्तर पर किंकर्तव्यविमूढ़ता का! क्या करना चाहिए, कैसे करना चाहिए और किसे करना चाहिए? पार्टी इसी एक प्रश्न का उत्तर ढूँढने में तीन साल से गोल-गोल घूम रही है और अभी तक घूम रही है! यही वजह है कि जनता में लगातार बढ़ती बेचैनी और राजनीतिक क्षितिज पर उभर रही दुर्दम्य चुनौतियों के बावजूद पिछले तीन बरसों में न तो पार्टी ने कुछ किया और न ही सरकार ने!

इधर पिलपिले विज्ञापन, उधर धारदार मार्केटिंग

हालत यह हुई कि पार्टी को चुनाव बाद ही यह समझ में आया कि उसके चुनावी विज्ञापन बोदे और पिलपिले हैं. तमाम सोशल मीडिया में इन विज्ञापनों का मखौल उड़ता रहा, पार्टी टुकुर-टुकुर देखती रही. टीम नमो ने ज़बर्दस्त पैने और धारदार तरीक़े से ब्राँड मोदी की मार्केटिंग और पैकेजिंग की, 'चाय पर चर्चा' से लेकर ब्राँड मोदी की मर्चेंडाइज़िंग तक तमाम नये-नवेले तरीक़ों से प्रचार के वार किये, हर दूसरे दिन उनके पास प्रचार का, वोटर के मन को छूने का कोई न कोई नया तरीक़ा होता, कोई नया कंटेंट होता, समय और माहौल के साथ टीम नमो के प्रचार की रणनीति बदलती रही, हज़ारों की साइबर-सेना सोशल मीडिया पर दिन-रात धावा बोलती रही, हर चुनाव क्षेत्र में बूथ-बूथ पर कार्यकर्ताओं की तैनाती से लेकर हर राई-रत्ती तक का ध्यान रख कर रणनीति बनायी गयी और उसकी पूरी मानीटरिंग की गयी. मोदी के कपड़ों से लेकर उनके हाव-भाव, मैनरिज़्म तक पर काम किया गया. और यह सब तैयारियाँ कोई दो-चार महीने में नहीं हुई थीं. इनके लिए कम से कम तीन-चार साल का समय लगा होगा. यानी जब काँग्रेसी चैन से ख़र्राटे भर रहे थे और दूर-दूर तक नमो को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाये जाने की कोई चर्चा नहीं थी, तब से टीम नमो अपने ब्लू प्रिंट पर काम कर-करके पसीना बहा रही थी!

ठलुएपन की हद

एक तरफ़, इतनी प्लानिंग, इतनी तैयारी, और दूसरी तरफ़ इतना ठलुआपन कि इतनी अपमानजनक हार के बावजूद कहीं कोई ठोस क़दम उठाये जाने की सुन-गुन न हो, तो यही लगता है कि या तो काँग्रेस इस भँवर से निकलने की आस ही छोड़ बैठी है या पार्टी नेतृत्व अति का भाग्यवादी और आशावादी है कि उसे लगता है कि एक दिन ऐसा आयेगा कि मोदी सरकार अपने आप विफल हो जायेगी और जनता को मजबूरन उसके दरवाज़े लौटना पड़ेगा!

कीचड़ उछाल, पल्ला झाड़

कड़ुवी सच्चाई यह है कि काँग्रेस को समझना पड़ेगा कि मोदी की इस जीत ने देश की राजनीति के नियम सदा-सर्वदा के लिए बदल दिये हैं. मैं फिर दोहराना चाहूँगा कि यह बीजेपी की जीत नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से मोदी और उनकी टीम की जीत है, जिसे उन्होंने बाज़ार और कारपोरेट दुनिया के आज़माये हुए हथियारों और रणनीतियों से जीता. इसलिए अब अगर काँग्रेस खेल में वापस आना चाहती है तो उसे सबसे पहले यह देखना होगा कि उसके पास ऐसा क्या 'प्रोडक्ट' है, जो 'ब्रांड मोदी' के मुक़ाबले 'बाज़ार' में उतारा जा सकता है. इसके लिए पहले उसे 'ब्रांड मोदी' का बारीकी से अध्य्यन करना होगा, उसके गुण-दोषों को पढ़ना पड़ेगा और लोगों को अपना एक ऐसा 'ब्रांड' देना पड़ेगा, जिसकी क्षमताओं पर लोग भरोसा कर सकें, जो लोगों की आकाँक्षाओं और सपनों के ज़्यादा निकट हो, जिसमें कुछ ऐसी यूएसपी हो, जो 'ब्रांड मोदी' में न हो, जिसकी पैकेजिंग और मार्केटिंग कहीं ज़्यादा भव्य और स्मार्ट हो, और जो तमाम पैमानों पर लोगों को आश्वस्त कर सके कि काँग्रेस का यह 'ब्रांड' मौजूदा 'ब्रांड मोदी' से हर मामले में बेहतर है. जब तक काँग्रेस अपना कोई भरोसेमन्द 'ब्रांड' नहीं दे पाती, तब तक आगे की बाक़ी बातें बेकार हैं. क्या काँग्रेस के पास ऐसा कोई 'ब्रांड' है? या उसे यह एहसास भी है या नहीं कि उसे किसी ऐसे 'ब्रांड' की ज़रूरत है? फ़िलहाल तो काँग्रेस में ऐसी कोई सोच दिख नहीं रही है. वहाँ तो अभी 'कीचड़ उछाल, पल्ला झाड़' चल रहा है!

'स्मार्ट' नेताओं की ज़रूरत

राष्ट्रीय स्तर पर एक अच्छा 'ब्रांड' खड़ा कर लेने के बाद काँग्रेस को हर राज्य में ऐसे ही 'स्मार्ट' नेताओं की ज़रूरत पड़ेगी, जो अपने-अपने राज्यों में ख़ुद एक 'ब्रांड' बन सकें और एक सपनीले भविष्य का 'पावर पाइंट प्रेज़ेंटेशन' स्थानीय जनता को दे सकें. इसके बाद हो एक कुशल, कर्मठ और समर्पित टीम, जो राष्ट्रीय और राज्य स्तर से लेकर ज़िला, शहर, गाँव तक फैली हो, जो घर-घर तक पार्टी की बात पहुँचा सके और घर-घर से जनता की बात पार्टी दफ़्तर तक ला सके. सोशल मीडिया के लिए साइबर-बाँकुरों की संगठित और प्रशिक्षित फ़ौज हो, रणनीतिकारों, रिसर्चरों की विशेषज्ञ टीम हो, मार्केटिंग, पैकेजिंग की बड़ी पेशेवर और स्थायी टीम हो, नियमित अन्तरालों पर रणनीतिक और समीक्षा बैठकें हों, मोदी की काट के लिए ठोस एजेंडा हो और आगे की कार्ययोजना लगातार अपडेट की जाती रहे, तब जा कर काँग्रेस मुक़ाबले में लौट पाने की कुछ उम्मीद कर सकती है.

कांग्रेस के लिए दिन भारी हैं!

पता नहीं कि काँग्रेस को यह एहसास है या नहीं कि वही अकेली पार्टी है, जो राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी को रोक पाने का सपना देख सकती है, लेकिन उसके लिए यह चुनौती काफ़ी कठिन है क्योंकि अब उसका मुक़ाबला परम्परागत बीजेपी से नहीं, बल्कि 'ब्रांड मोदी' से है. दिल्ली विजय के बाद से मोदी किस प्रकार 'मुख्यमंत्री मोदी' के बजाय 'प्रधानमंत्री मोदी' की नयी और बेहद चमकीली छवि बनाने के अभियान में जुटे हैं, यह सबके सामने है. मोदी और संघ को लेकर तमाम आशंकाएँ अपनी जगह हैं, और कम से कम अगले पाँच साल तक यह देखने के लिए रुकना ही पड़ेगा कि वे आशंकाएँ कितनी सही थीं? और अगर इन पाँच सालों में संघ के एजेंडे, सेक्यूलरिज़्म और मानवाधिकारों को लेकर मोदी सरकार नहीं घिरी, मीडिया चारण गान के बजाय निर्भीक और स्वतंत्र होने का साहस करता दिखे, सांविधानिक संस्थाएँ पूरे दबदबे के साथ काम कर पायीं, तो मोदी पर हमले के लिए काँग्रेस को शायद मुद्दों का टोटा भी पड़ जाय! कांग्रेस के लिए आने वाले दिन बड़े भारी हैं. क्या नौ मन तेल होगा? क्या काँग्रेस फिर से नाच सकेगी?

(लोकमत समाचार, 24 मई 2014)
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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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