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Dec 12
न्याय क्या सबके लिए बराबर है?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 6 

Salman Khan समेत तमाम बड़े मामले हमारी न्याय व्यवस्था पर गम्भीर सवाल उठाते हैं कि न्याय क्या सबके लिए बराबर है? न्यायपालिका क्या अपने भीतर झाँक कर देखेगी? क्या वह कोई ऐसा तंत्र विकसित करेगी कि इन्साफ़ की तराज़ू पर सब वाक़ई बराबर हों, क़ानूनी पेंचों की व्याख्याओं में अदालतों की सोच में बहुत अन्तर न हो.


Salman Khan Verdict in Hit and Run Case -S- Raag Desh 121215.jpg
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बड़ी-बड़ी अदालतें हैं. बड़े-बड़े वकील हैं. बड़े-बड़े क़ानून हैं. और बड़े-बड़े लोग हैं. इसलिए छोटे-छोटे मामले अकसर ही क़ानून की मुट्ठी से फिसल जाते हैं! साबित ही नहीं हो पाते! और लोग चूँकि बड़े होते हैं, इतने बड़े कि हर मामला उनके लिए छोटा हो ही जाता है! वैसे कभी-कभार ऐसा हो भी जाता है कि मामला साबित भी हो जाता है. फिर? फिर क्या, बड़े लोगों को बड़ी सज़ा कैसे मिले? इसलिए सज़ा अकसर छोटी हो जाती है! और अगर कभी-कभार सज़ा भी पूरी मिल जाये तो? तो क्या? पैरोल पर एक क़दम जेल के अन्दर, दो क़दम जेल के बाहर! वह भी न हो सके तो अस्पताल तो हैं ही न!

Salman Khan: रिहाई और सवाल

Salman Khan छूट गये. तेरह बरस की क़ानूनी लड़ाई सात महीनों में ही पलट गयी! कार कौन चला रहा था, पता नहीं. सलमान ख़ान Salman Khan ने शराब पी रखी थी या नहीं, पता नहीं. दुर्घटना शराब पी कर गाड़ी चलाने के कारण हुई थी या नहीं, पता नहीं. कार का टायर दुर्घटना के पहले फटा था या दुर्घटना के कारण फटा था, पता नहीं. अब बहस होती रहेगी. सवाल दो हैं. और सवाल बड़े हैं. और ये सवाल सिर्फ़ इस मामले से जुड़े हुए नहीं हैं. सवाल हर छोटे-बड़े अपराध, उनकी जाँच, अदालती सुनवाई और फ़ैसलों से जुड़े हैं. इन पर चर्चा होनी ही चाहिए.

जितने बड़े मामले, उतनी ढीली जाँच?

पहला सवाल यही कि पुलिस मामलों की जाँच कैसे करती है? अदालतों में अकसर मामले क्यों साबित नहीं हो पाते? जुटाये गये और पेश किये गये सबूत बहुत बार ऊपरी अदालतों में क्यों ख़ारिज हो जाते हैं? कई बार मामले को तकनीकी पेंचों में उलझा कर क्यों आरोपी बच निकलने में सफल हो जाते हैं? क्या जानबूझ कर सबूतों में कसर छोड़ दी जाती है? और क्या पुलिस में ऐसा कोई समीक्षा-तंत्र है, जो इस बात का जायज़ा लेता हो कि किस जाँच अधिकारी ने किस मामले की जाँच कैसे की, सही की या ग़लत की, कितने मामले अदालत में साबित हो सके, कितने नहीं हो सके और क्यों? क्या किसी पुलिस-अधिकारी की कार्यकुशलता इस बात से मापी जाती है कि कितने मामलों में अदालतों ने जाँच पर सवाल उठाये और कितने मामलों में किसी निर्दोष को ग़लत तरीक़े से फँसा दिया? एन्काउंटर के 'गुड वर्क' के लिए तो पुलिसवाले प्रमोशन पाते रहे हैं, 'लीप-पोत' जाँच के 'बैड वर्क' के लिए उनके ख़िलाफ़ क्या होता है?

Salman Khan & Other High Profile Cases, Grey Areas in Judicial Process

दूसरा सवाल इससे भी बड़ा है. निचली अदालत ने जिन सबूतों के आधार पर सलमान ख़ान Salman Khan को सज़ा सुनायी, हाइकोर्ट ने सात महीनों के भीतर उन सबको ख़ारिज कर दिया! सबूत वही, स्थितियाँ वही, लेकिन दो अदालतों की व्याख्या में इतना अन्तर? अन्तर हो सकता है? लेकिन यह अन्तर क्यों, क्या इसकी समीक्षा नहीं होनी चाहिए? क्या कुछ ऐसा नहीं हो सकता कि व्याख्याओं के इस अन्तर को कम किया जा सके? अब तक देश की अदालतों में हज़ारों पेचीदा मामले आ चुके और जा चुके. क्या उन तमाम फ़ैसलों की समीक्षा का कोई तंत्र है, जिससे पता चले कि किन परिस्थितियों में किन अदालतों से क़ानूनी पेचीदगियों की व्याख्याओं में क्या ग़लतियाँ हुईं? और यह कैसे सुनिश्चित किया जाये कि एक जैसे हर मामले में अदालतों का रुख़ लगभग एक जैसा हो. आरोपी चाहे छोट हो या बड़ा, अदालत का रवैया हर मामले में एक हो.

इतनी जल्दी ज़मानत कैसे मिली Salman Khan को?

Salman Khan का मामला ही लीजिए. सेशन अदालत से सज़ा मिलने के कुछ घंटों के भीतर ही आनन-फ़ानन में उन्हें हाईकोर्ट से ज़मानत मिल गयी. क्या यह सामान्य प्रक्रिया है? क्या किसी सामान्य व्यक्ति के मामले में हाइकोर्ट इतनी ही तत्परता से उसकी ज़मानत की अर्ज़ी सुनवाई के लिए स्वीकार करता? क्या कार-दुर्घटना में सज़ा पानेवाला हर आदमी कुछ घंटों में इस तरह ज़मानत पा सकता है?

Uphaar Fire Tragedy: अन्सल बन्धुओं को क्या सज़ा मिली?

फिर उपहार आग दुर्घटना के मामले में अन्सल बन्धुओं का मामला देखिए. उपहार सिनेमाघर में सारे नियमों की इस तरह अनदेखी न की गयी होती तो इतनी जानें बच सकती थीं. इतनी बड़ी दुर्घटना के इतने साल बाद जो सज़ा मिली, उसकी भरपाई भी कुछ लाख का जुर्माना देकर हो गयी! ऐसी सज़ा से कौन सबक़ लेगा? बात कही गयी कि उनकी उम्र का ध्यान कर सज़ा कम कर दी गयी. मामला 1997 का है. सुनवाई अठारह साल तक खिंची और फिर जो सज़ा होनी थी, वह भी नहीं हुई. कारण चाहे जो भी हों, पर उनमें एक कारण यह तो था ही कि मामला बड़े लोगों से जुड़ा था.

Ruchika Girotra Case: आख़िर परिवार हार गया!

रुचिका गिरोत्रा मामला ले लीजिए. सत्ता प्रतिष्ठान ने एक बड़े पुलिस अफ़सर को बचाने के लिए क्या-क्या नहीं किया, रुचिका के परिवार का किस तरह उत्पीड़न किया गया, यह किसे मालूम नहीं. और रुचिका की आत्महत्या के बावजूद उसके परिवार को अन्तत: न्याय नहीं ही मिल सका. कारण? यही कि क़ानूनी दाँव-पेंचों में और लचर जाँच में मामला झूलता रहा और अन्त में 22 साल बाद रुचिका के परिवार ने लड़ने का हौसला छोड़ दिया.

Jessica Lal & Priyadarshini Matto murder cases

जेसिका लाल और प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड के मामलों में भी निचली अदालत में आरोपियों के ख़िलाफ़ मामले साबित नहीं हो पाये. जेसिका लाल मामले में तो बाद में यह भंडाफोड़ भी हो गया कि किस तरह पुलिस जाँच में जानबूझ कर गड़बड़ी की गयी थी. यह अलग बात है कि जनाक्रोश भड़क जाने के बाद दोनों मामलों में हाईकोर्ट की सुनवाई में आरोप साबित हुए और सज़ा हुई.

Salman Khan समेत यह सारे मामले हमारी न्याय व्यवस्था पर गम्भीर सवाल उठाते हैं कि न्याय क्या सबके लिए बराबर है? न्यायपालिका क्या अपने भीतर झाँक कर देखेगी? क्या वह कोई ऐसा तंत्र विकसित करेगी कि इन्साफ़ की तराज़ू पर सब वाक़ई बराबर हों, क़ानूनी पेंचों की व्याख्याओं में अदालतों की सोच में बहुत अन्तर न हो. और पुलिस सुधार पर भी क्या हम गहराई से सोचेंगे? क्या पुलिस जाँच में ढिलाई को 'बैड वर्क' मान कर ऐसे अफ़सरों को सबक़ नहीं सिखाया जाना चाहिए?

http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi
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  • Qamar Ji, sawal bahut gambheer hain ki aakhir yeh nyay hai kya? Kya hai yeh justice? Agar maarne wale ko phansi bhi de di jaye to kya marne wale ko nyay milega? Jo mar gaya usko to kabhi bhi wapis nahi laaya ja sakta to phir kaisa nyay? Baki sab to phir khanapurti hain?

    Mujhe aisa lagta hai ki hum nyay ke naam pe badle ki bhawna ko protshahan dete hain. Main Islam ke maafi wale pravdhaan ka pakhshdhar hoon jisme marne wale ka parivaar aaropi ko maaf kar sakta hai.

    Mera aisa maanna hain ki samaj ne ek ko to kho diya. Agar dusre ko bacha kar sahi rah par laya ja sake to ye badi baat hogi bajaye iske ki dusro ko bina sudharne ka mauka diye maar diya jaaye.

    Jahan tak sawal hai amir aur gareeb ka to aasharam ke aneko prayas ko court ne kharij kar diya. Sahara shree abhi bhi jail me hin hain. Wo alag baat hain ki Shibu Shoren ko jail jaana pada lekin Narashimha Rao bach gaye.

    Hum log bade bade sabd garh ke niji jimmedari se bachna chahte hain. Court ka faisla kya hai? Kewal ek vyakti ki niji rai. Aur ye swabhawik hai ki har ek vyakti ki rai bhinn hogi ek hi masle par. Wahi humko dekhne ko mila nichli adaalat aur uchh nyayalaya ke faisle me. Ek hi saboot par dekhne ke do nazariye.

    Aur yahi prakriti ka bhi sach hai ki raat aur din dono ek saath hote hain. Kewal raat aur kewal din nahi hota. Ek band ghari bhi din me do baar sahi samay batati hai. Aadha gilas khali ko hum aadha gilas bhara bhi keh sakte hain.

    To fir kya hai ye nyay? Nichli adaalat se leke uchyatam nyayalaya ka kya matlab hai agar ek hi vyakti ki niji rai ko maanna hai to fir itni saari adaalaton ka kya prayojan? Kon tah karega ki kon se nyaydheesh jyada samajhdaar hain? Nichli wale ya upar wale?

    Masla bahut gambhir awam pechida hai aur iska koi samadhan to mujhe nahi dikhta siwaye antahkaran ko shudhh karne ke. Koi bahri niyam isko to nahi rok sakta kyun ki usko dono taraf se samjhaya ja sakta hai – aadha khali ya aadha bhara. Hame apne antahkaran me jhakne ki jaroorat hai.

  • I agree with the point given by Ravish to a great extent. It is a very tricky question. Not that I am saying anyone who has committed a crime should go scott free, but will condemning a person, so many years after the incident help in any way the family of those who lost their lives? Will it deter others from doing similar things? Meanwhile the person may have changed for the better.

  • आशुतोष गुप्ता

    कमर साहब निर्णय से मै सन्तुष्ट हूँ मरने वाला जिन्दा रहकर क्या देता? सलमान खान करोडो का व्यापार देगा वैसे भी पतंग साथ मे उडायी ही इसलिए गई थी/ वैसे भी सही मायनो मे सत्य की ही जीत हुई है यहॉ सत्य मतलब गॉधी और गॉधी मतलब सब को पता है ५००- ५०० के हरे हरे गॉधी

  • kushal

    नक़वी साहब आपने बिलकुल सही कहा न्याय सबको समान मिलना चाहिए लेकिन हिन्दुस्तान में शायद ये संभव नहीं है क्योंकि हमारा जो सविधान है उसमें व्याख्या दी गयी है कि हिन्दुस्तान के सभी लोग एक हैं तथा सरकारी योजनाओं और देश में उपलब्ध संसाधनो व अवसरों में सबकी बराबर की भागीदारी हो . लेकिन क्या ये हमारे देश में होता है ? देश में उपलब्ध सरकारी योजनाओं और देश में उपलब्ध संसाधनो व अवसरों को धर्म और जाति के नाम पर भेद भाव करके वोटों की राजनीती करते हुए बन्दर बाँट कर दिया जाता है .आप कांग्रेस के प्रधान मंत्री का वक्तव्य ही ले सकते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि देश के संसाधनो पर सर्वप्रथम मुसलमानो का अधिकार है . अब आप ही बताइये जिस देश का प्रधान मंत्री ही भेदभाव की भावना रखता हो तो न्याय में भेदभाव क्यों नहीं होगा . राजीव गांधी ने बोफोर्से घोटाला किया फिर भी बच निकला , लालू यादव चारे घोटाले में दोषी पाया गया फिर भी मज़े ले रहा है और अपने अनपढ़ पत्नी और बच्चों के साथ मिलकर देश लूट रहा है सोनिया गांधी और राहुल गांधी घोटाले में फंसे हैं वो अभी भी ऐश कर रहे हैं . सुरेश कलमाड़ी और शीला दीक्षित {जिसकी अरविन्द केजरीवाल के पास कई घोटालो की लिस्ट थी जिसकी केजरीवाल के साथ डील फिक्स हो गयी और केजरीवाल ने शीला दीक्षित को क्लीनचिट दे दी है } को कितनी जेल हुयी ? जबकि देश में हज़ारों ऐसे केस हैं जिन पर सालों बाद भी कोई दोष सिद्ध नहीं हो पाया है और अभी भी वो लोग जेल में हैं .इस विषय के साथ में दूसरे विषय पर जाना चाहूँगा कि जिन लोगों ने इशरतजहाँ एनकाउंटर पर तरह तरह के आरोप लगाए थे जिन्होंने आतंकवादी के समर्थन में बयान दिये यानी कि आतंकवाद के समर्थन में बयान दिए क्या ऐसे नेताओं को गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए ? अब जबकि उसके साथी डेविड कोलमैन हेडली ने या बयान दिया है कि इशरतजहां एक फिदायीन हमलावार थी ? क्या देश में आतंकवाद बढ़ाने में इन कथित सेक्युलर नेताओं का हाथ नहीं है ?

  • Indian judiciary definitely needs to be revamped! And all the lapses in the cases you have mentioned suggests that our judicial system is not good and is full of flaws esp. for providing justice and relief to common man.

  • saket kalikar

    नक़वी जी, आपकी पोस्ट
    विचारों की बहुत संतुलित अभव्यक्ति है. मै सहमत हूँ.

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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