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Sep 30
‘लौहपुरुष’ को ज़ंग लगा कबाड़ क्यों बनाया?
त्वरित टिप्पणी  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 2 

एक वह जन्मदिन था दीनदयाल उपाध्याय का, आज से पच्चीस साल पहले का. जब 1990 में 25 सितम्बर के दिन सोमनाथ मन्दिर से लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी 'राम रथ यात्रा' शुरू की थी और समूची बीजेपी, समूचे संघ परिवार के लिए आडवाणी हिन्दुत्व के उद्धारक प्राणवाहक भगवा भगवान के रूप में अवतरित हुए थे!

और एक इस 25 सितम्बर का दिन था, जब बीजेपी ने दीनदयाल उपाध्याय के जन्मशती वर्ष के समारोहों का श्रीगणेश किया, तो आडवाणी को इस लायक़ भी नहीं समझा गया कि उन्हें समारोह में कम से कम बुला ही लिया जाये!


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कभी-कभी सोचता हूँ कि आडवाणी जी आजकल क्या सोचते होंगे? वह अतीत और यह वर्तमान! क्या किया और क्या पाया?

और अगर यात्रा के अन्त में यहीं पहुँचना था कि हार्डलाइन हिन्दुत्व के लौहपुरुष को ज़ंग लगा कबाड़ बना कर फेंक दिया जाये, तो देश की छाती चीर देनेवाली विषबुझी भगवा हुँकारों और उन्मत्त कोलाहलों वाली उन रथयात्राओं का महारथी बनना व्यर्थ ही नहीं चला गया क्या? एक वह जन्मदिन था दीनदयाल उपाध्याय का, आज से पच्चीस साल पहले का. जब 1990 में 25 सितम्बर के दिन सोमनाथ मन्दिर से लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी 'राम रथ यात्रा' शुरू की थी और समूची बीजेपी, समूचे संघ परिवार के लिए आडवाणी हिन्दुत्व के उद्धारक प्राणवाहक भगवा भगवान के रूप में अवतरित हुए थे!

Lal Krishna Advani: Then and Now!

आडवाणी: तब और अब

और एक इस 25 सितम्बर का दिन था, जब बीजेपी ने दीनदयाल उपाध्याय के जन्मशती वर्ष के समारोहों का श्रीगणेश किया, तो आडवाणी को इस लायक़ भी नहीं समझा गया कि उन्हें समारोह में कम से कम बुला ही लिया जाये!

तो जब आडवाणी बुलाने लायक़ भी नहीं समझे गये तो बीजेपी में आज भला किसकी हिम्मत कि उनकी रथयात्रा के पच्चीस साल पूरे होने को कोई याद भी कर ले! बीजेपी वाले अच्छी तरह जानते हैं कि संघ इस मामले में कितनी निष्ठुरता से अपनी परम्परा का निर्वाह करता है कि तम्बू से किसी का अँगूठा भी बाहर निकलता दिखे, तो उसे ही बाहर फेंक दो, चाहे वह कोई हो!

जाने कैसी होती आडवाणी बिन बीजेपी

आडवाणी न होते तो बीजेपी आज जाने कहाँ होती, कैसी होती और देश की राजनीति में उसकी कोई जगह होती भी या नहीं, कौन कह सकता है?

लेकिन यह कहा जा सकता है कि आडवाणी न होते तो बीजेपी और आरएसएस को शायद वह दिशा भी नहीं मिली होती, जिसने बीजेपी और संघ दोनों को आज इस मुक़ाम पर पहुँचा दिया है कि आज बीजेपी समूचे भारत पर भगवा फहराने, और संघ अगले पच्चीस-तीस वर्षों में वैदिक राज्य और हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करने का सपना देख पा रहे हैं! और आडवाणी की वह रथयात्राएँ न होतीं, तो संघ परिवार के उग्र हिन्दुत्व को न नेतृत्व मिला होता, न भाषा मिली होती और न अपील!

अटल का 'गाँधीवाद समाजवाद!'

याद कीजिए, समाजवादियों से पटी पड़ी जनता पार्टी से बाहर निकल कर जनसंघ घटक ने 1980 में जब बीजेपी का चोला ओढ़ा था, तो अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी ने 'गाँधीवादी समाजवाद' की माला जप कर सबको चौंका दिया था. कारण यह कि समाजवाद उन दिनों 'लेटेस्ट फ़ैशन' था.

इन्दिरा गाँधी 'ग़रीबी हटाओ' और समाजवाद के नारे पर देश और काँग्रेस दोनों पर पकड़ बनाये रखने का सफल प्रयोग इसके पहले कर चुकी थीं. और जनता पार्टी के बिखराव के बाद सत्ता फिर से इन्दिरा गाँधी के पास पहुँच गयी थी. इसलिए बीजेपी ने इन्दिरा के समाजवाद के मुक़ाबले 'गाँधीवादी समाजवाद' को उतारने की चाल चली. लेकिन जनता पर बीजेपी के 'समाजवाद का छद्म' बिलकुल चला नहीं. यह ठीक है कि आज यह कह सकते हैं कि इन्दिरा की हत्या से उपजी सहानुभूति लहर की वजह से ही 1984 के चुनाव में बीजेपी सिर्फ़ दो सीटें जीत सकी थी, लेकिन सच यह है कि ऐसी कोई घटना न भी होती तो भी बीजेपी कोई चमत्कारिक प्रदर्शन कर पाने की स्थिति में नहीं थी.

Advani's Hardline Hindutva gave new lease of Life to BJP

संघ, बीजेपी दोनों को दिशा दी आडवाणी ने!

यह आडवाणी थे, जिन्होंने 1984 की हार के बाद जब बीजेपी अध्यक्ष की कुर्सी सम्भाली, तो बीजेपी को 'समाजवाद के गड्ढे' से निकाल कर हार्डलाइन हिन्दुत्व की तरफ़ मोड़ा.

1985 में इधर शाहबानो का मामला हुआ, जिससे हिन्दू सामान्य तौर पर उत्तेजित थे, उधर 1986 में फ़ैज़ाबाद की एक अदालत ने 'राम जन्मभूमि' का ताला खोलने का आदेश दे दिया, संघ परिवार की तरफ़ से गाँव-गाँव रामशिला पूजन शुरू हुआ और आडवाणी ने बीजेपी को पूरी तरह इस आन्दोलन में झोंक दिया.

Advani was 'Blue-Eyed' boy of RSS

फिर 1990 की रथयात्रा और 1992 में बाबरी मसजिद के ध्वंस तक की यात्रा का वह दौर था, जब संघ में आडवाणी की तूती बोल रही थी, उनकी मर्ज़ी के बिना संघ में कोई फ़ैसले नहीं होते थे!

अटलबिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री इसलिए नहीं बने कि संघ उन्हें बनाना चाहता था! वह इसलिए प्रधानमंत्री बने कि आडवाणी के नाम पर बहुत-से सहयोगी दल समर्थन देने के लिए तैयार नहीं थे.

मुखौटा थे वाजपेयी: गोविन्दाचार्य

वाजपेयी चाहे जितने बड़े नेता रहे हों, संघ ने मजबूरी में बस उन्हें बर्दाश्त किया और हमेशा आडवाणी के ज़रिये उन पर लगाम लगाये रखी. बीच-बीच में नियोजित तौर पर वाजपेयी के 'रिटायरमेंट' तक की चर्चाएँ हवा में उछाली जाती रहीं और आख़िर थक-हार कर वाजपेयी को कहना पड़ा, 'न टायर्ड, न रिटायर्ड, अब आडवाणी जी के नेतृत्व में विजय प्रस्थान!'

अटलबिहारी वाजपेयी जैसे क़द्दावर नेता की उपयोगिता संघ में क्या थी, इसकी पोल गोविन्दाचार्य उन्हें 'मुखौटा' कह कर खोल ही चुके थे.

Praising Jinnah was biggest mistake of Advani

ले डूबा जिन्ना का जिन्न!

लेकिन शायद आडवाणी ने गोविन्दाचार्य की बात पर ध्यान नहीं दिया और यहीं ग़लती कर बैठे! उन्हें लगा कि गठबन्धन की राजनीति के कारण 'हार्डलाइनर' बने रह कर उनका प्रधानमंत्री बन पाना मुश्किल है, तो उन्होंने वाजपेयी बनने की कोशिश की!

और आडवाणी जी उत्साह में कुछ ज़्यादा ही आगे बढ़ गये और जिन्ना को सेकुलर बता देना उन्हें महँगा पड़ गया. वहीं से संघ में उनका इंडेक्स गिरने की शुरुआत हुई. आडवाणी को उसके बाद से हिन्दुत्व की बात करते सुना भी नहीं गया. वह राजनीति में अपनी जगह तलाशने का संघर्ष करते रहे.

न मुख रह गये, न मुखौटा!

वह इस स्थिति में कभी आ नहीं पाये कि बीजेपी को अपने नेतृत्व से सत्ता दिला पाते, नरेन्द्र मोदी के राज्याभिषेक का विफल विरोध कर वह संघ के कोपभाजन और बन गये. संघ के लिए अब उनकी कोई उपयोगिता बची ही नहीं, न मुख की और न मुखौटे की! फिर वह आडवाणी को चिपकाये-चिपकाये क्यों घूमे?

और संघ की लिस्ट में आडवाणी न पहले हैं, न आख़िरी! किसी ज़माने में जनसंघ का मतलब था बलराज मधोक. संघ के बिदकते ही वह निठल्ले हो गये. संघ के लिए राजनेता कारतूस हैं, दाग़ दीजिये! फिर ख़ाली खोखे का क्या काम?

--- क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi

 
बीबीसी हिन्दी डाॅट काम के लिए www.bbc.com/hindi पर 29 सितम्बर 2015 को प्रकाशित
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  • UPENDRA SWAMI

    लेकिन नकवी जी, कट्टरवाद की फ़ितरत भी तो यही है, उसे हमेशा नया और ज्यादा आक्रामक चेहरा चाहिए। वाजपेयी से ज्यादा आक्रामक आडवाणी और आडवाणी से कहीं ज्यादा आक्रामक मोदी। उसके पास पुराने की कहीं कोई जगह नहीं। आब पिछले दस सालों में भारत रत्न से नवाजे जाने के राग के अलावा क्या भला भाजपा को वाजपेयी की किसी नीति या विचार की याद आई? ऐसे में आडवाणी को भुलाए जाने का कैसा अफसोस!

    • qwn

      उपेन्द्र जी, आपसे पूरी तरह सहमत हूँ.
      अफ़सोस नहीं, बल्कि यह विश्लेषण की कोशिश है कि संघ कैसे काम करता है और कैसे उसकी सत्ता के सामने हर नेता बिलकुल बौना है, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न दिखता हो.
      बहुत-से राजनीतिक विश्लेषकों को उम्मीद है कि नरेन्द्र मोदी संघ को हावी नहीं होने देंगे. मैं इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हूँ. लेख में मधोक, अटल और आडवाणी के ज़रिये इसी ओर इशारा किया गया है और लेख लिखे जाने का कारण भी यही है.

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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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