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Jan 23
विकास की बाँसुरी, फ़ासिस्ज़्म के तम्बू!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 19 

रोहित वेमुला की आत्महत्या एक निराश युवा की निजी त्रासदी नहीं है. उसकी आत्महत्या देश की त्रासदी है, जिस पर देश को चिन्तित होना चाहिए, देश को सोचना चाहिए कि हम जैसा देश गढ़ रहे हैं, उसमें ऐसी त्रासदियाँ क्यों होती हैं, क्यों होती जा रही हैं?


Rohith Vemula Suicide and Dalit Discrimination - Raag Desh 230116.jpg
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रोहित वेमुला ने आत्महत्या क्यों की? वह कायर था? अवसाद में था? ज़िन्दगी से हार गया था? उसके मित्रों ने उसकी मदद की होती, तो उसे आत्महत्या से बचाया जा सकता था? क्या उसकी आत्महत्या के ये कारण थे? नहीं, बिलकुल नहीं.

देश की त्रासदी है रोहित की आत्महत्या

रोहित वेमुला की आत्महत्या (Rohith Vemula Suicide) एक निराश युवा की निजी त्रासदी नहीं है. हाँ, निराशा थी उसमें, लेकिन यह निराशा अपनी स्थितियों को लेकर नहीं थी. यह निराशा अपने आसपास के हालात को लेकर थी, देश को लेकर थी. उसकी आत्महत्या देश की त्रासदी है, जिस पर देश को चिन्तित होना चाहिए, देश को सोचना चाहिए कि हम जैसा देश गढ़ रहे हैं, उसमें ऐसी त्रासदियाँ क्यों होती हैं, क्यों होती जा रही हैं? और उससे भी बड़ी यह त्रासदी क्यों होती है कि उस आत्महत्या पर शर्म से डूब जाने के बजाय देश दो खाँचों में बँट जाये, एक ओर निराशा, हताशा, आवेश और क्षोभ हो और दूसरी ओर हो विद्रूप प्रतिक्रियाओं का क्रूर अमानवीय अट्टहास, आत्महत्या पर उठ रहे बर्बर सवाल, उड़ायी जा रही खिल्लियाँ और झूठ के कारख़ानों के निर्लज्ज उत्पाद!

The first letter, which Rohith Vemula wrote to his VC

रोहित ने आत्महत्या इसलिए नहीं की कि वह निराश था. उसने आत्महत्या न की होती तो क्या इस सवाल पर हम बात कर रहे होते? बात आज क्यों हो रही है? हंगामा तो तभी खड़ा होना चाहिए था जब बाबासाहेब आम्बेडकर की तसवीर हाथ में लेकर हॉस्टल से बाहर निकले पाँच छात्रों की तसवीरें अख़बारों में छपी थीं. शोर तो तब भी उठना चाहिए था, जब रोहित ने अपने कुलपति को लिखा था कि विश्विद्यालय में दाख़िले के वक़्त हर दलित छात्र को सोडियम एज़ाइड की गोली और फंदा लगाने के लिए अच्छी रस्सी भी दे दी जाये! और सवाल तो तब भी उठना चाहिए था, जब एक केन्द्रीय मंत्री इन दलित छात्रों को 'राष्ट्रविरोधी' घोषित करते हुए अपनी सरकार को चिट्ठी लिख रहा था. दोष हम सबका है कि इन मुद्दों पर तब बात नहीं हुई. बात आज इसीलिए हो रही है क्योंकि रोहित ने आत्महत्या कर ली. रोहित ने आत्महत्या हमको आइना दिखाने के लिए की थी. बात समझ में आयी आपको!

रोहित ने हमें आइना दिखाया!

Rohit Vemula Suicide and mindset against Dalits, a telling Story of former Hindustan Times Journalist!

और आइने में क्या दिखता है? यही कि दलितों को लेकर कहीं कुछ नहीं बदला है. वैसा ही छुआछूत है, वैसा ही भेदभाव है, उनका वैसा ही तिरस्कार है और वैसा ही उत्पीड़न है. वरना रोहित को अपने कुलपति को यह क्यों लिखने को मजबूर होना पड़ता कि दलित छात्रों को मौत का सामान दे दिया जाना चाहिए! उसकी इस बात से देश को हिल उठना चाहिए था. लेकिन कुछ नहीं हुआ. होता भी कैसे? यह कोई नयी बात है कि देश के हज़ारों स्कूलों में दलित बच्चे अब भी कक्षा में अलग बैठाये जाते हैं, दलित दूल्हा घोड़ी नहीं चढ़ सकता, यहाँ तक कि दाह संस्कार के लिए भी अलग श्मशान हैं. प्रमुख फ़िल्मकार श्याम बेनेगल का यह कहना बिलकुल सही है कि सवर्ण हिन्दू वाक़ई नहीं जानता कि दलित होने का मतलब क्या है? बिलकुल सच है कि दलित होने का मतलब क्या है, यह सिर्फ़ दलित घर में पैदा हो कर ही जाना जा सकता है. यह बात अपनी एक मार्मिक पोस्ट में हिन्दुस्तान टाइम्स की पूर्व पत्रकार याशिका दत्त ने लिखी है, जो इन दिनों न्यूयार्क में रहती हैं. याशिका ने लिखा कि वह बचपन में कान्वेंट में पढ़ीं, उनके उपनाम से लोगों को उनकी जाति का पता नहीं चलता था, और वह बड़े जतन से क्यों अपनी दलित पहचान छिपाये रहीं. उनके ब्लॉग dalitdiscrimination.tumbler.com पर ऐसी कई कहानियाँ मिल जायेंगी. विडम्बना यह है कि दलितों से ऐसा क्रूर भेदभाव करनेवाला मध्य वर्ग साथ में यह बेहया शर्त भी रखता है कि दलित मेरिट से आगे बढ़ें, आरक्षण ख़त्म हो. इससे बढ़ कर अमानवीय माँग और क्या हो सकती है?

हैदराबाद विश्विद्यालय: दलित विरोधी चरित्र

हैदराबाद विश्विद्यालय इसका अपवाद नहीं था. उसके दलित-विरोधी चरित्र की कई कहानियाँ सामने हैं. और केवल वहीं क्यों, देश के तमाम बड़े-बड़े नामी-गिरामी उच्च शिक्षा संस्थानों से लगातार ऐसी कहानियाँ आती रहती हैं, जहाँ असहनीय तिरस्कारों के कारण सैंकड़ों दलित छात्र आत्महत्या करने पर मजबूर हुए. रोहित और उसके साथियों के मामले में जो हुआ, क्या उसके पीछे उनको 'औक़ात बता देने' की बर्बर सोच नहीं काम कर रही थी. विश्विद्यालय के पास इस बात का कोई जवाब नहीं कि उन्हें क्यों निलम्बित किया गया, हॉस्टल से क्यों बाहर निकाला गया, क्या अपराध था उनका और उस सुशील कुमार के ख़िलाफ़ अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गयी जिसका यह झूठ भी सामने आ चुका है कि उसे कोई चोट नहीं लगी थी और वह एपेंडेसाइटिस के ऑपरेशन के लिए अस्पताल में भर्ती हुआ था!

What were 'Anti-national'activities of Rohith Vemula, will anybody tell us please?

आरोप है कि रोहित वेमुला (Rohith Vemula) और उसके साथी 'राष्ट्रविरोधी गतिविधियों' में लगे थे. कोई व्यक्ति 'राष्ट्रविरोधी' गतिविधियों में लगा हो, यह तो बहुत ही संगीन आरोप है. विश्विद्यालय तो इसकी जाँच ही नहीं कर सकता. यह मामला तो सीधे पुलिस के पास जाना चाहिए था! तो इन छात्रों के ख़िलाफ़ पुलिस में 'राष्ट्रद्रोह' की शिकायत क्यों नहीं दर्ज करायी गयी? सुशील कुमार पुलिस में शिकायत दर्ज कराने के बजाय केन्द्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय के पास मानव संसाधन मंत्रालय को चिट्ठी लिखाने क्यों गये? इसीलिए न कि उन्हें पता था कि सत्ता अपने हाथ में है, सरकार अपनी है, कुलपति पर दबाव डलवा कर इन 'दलितों' को सबक़ सिखाया जा सकता है! और यह सबके सामने है कि विश्विद्यालय ने कैसे अपनी पहली जाँच बिलकुल पलट दी.

संघ से वैचारिक असहमति राष्ट्रद्रोह है क्या?

और क्या थीं इन छात्रों की तथाकथित राष्ट्रविरोधी गतिविधियाँ? 'मुज़फ़्फ़रनगर अभी बाक़ी है' फ़िल्म का प्रदर्शन, याक़ूब मेमन की फाँसी का विरोध, तीस्ता सीतलवाड और असदुद्दीन ओवैसी को छात्रों को सम्बोधित करने के लिए बुलाना-- आम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के इन छात्रों पर यही आरोप थे और बीजेपी के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) को यही बातें क़तई मंज़ूर नहीं थीं. यह वैचारिक असहमति है या राष्ट्रविरोध? अगर राष्ट्रविरोध है, राष्ट्रद्रोह है तो क़ानून की किस या किन-किन धाराओं के तहत? या आपकी नज़र में राष्ट्रविरोधी और राष्ट्रद्रोही वह सब हैं, जो आपके विचारों से सहमत नहीं हैं? यानी राष्ट्र क्या है? क्या संघ, संघ परिवार, बीजेपी और उसके संगठन ही राष्ट्र हैं, वही तय करेंगे कि राष्ट्र क्या है, उसकी परिभाषा क्या है और जो राष्ट्र और राष्ट्रवाद की उसकी परिभाषा मानने को तैयार न हो, वह राष्ट्रविरोधी है?

सिद्धार्थ वरदराजन 'साम्प्रदायिक' हैं?

इसी सोच के चलते एक बुज़ुर्ग केन्द्रीय मंत्री ने इन छात्रों को 'राष्ट्रविरोधी' घोषित कर दिया. हैदराबाद की इस घटना का दूसरा चिन्ताजनक पहलू यह है, जिसकी आहटें दिल्ली में नरेन्द्र मोदी के गद्दीनशीन होने के फ़ौरन बाद शुरू हो गयी थीं, और अब हर क़दम पर फ़ासिस्ज़्म के यह निशान दिखने लगे हैं. अभी दो दिन पहले इलाहाबाद विश्विद्यालय में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन (Siddhartha Varadarajan) को छात्रों को सम्बोधित नहीं करने दिया और उन्हें लगभग बन्धक बना कर रखा क्योंकि परिषद की राय में वरदराजन 'साम्प्रदायिक और राष्ट्रविरोधी' हैं! कुछ दिनों पहले ही मैग्सायसाय पुरस्कार विजेता सामाजिक कार्यकर्ता सन्दीप पाण्डेय (Sandeep Pandey) को 'राष्ट्रविरोधी' घोषित कर काशी हिन्दू विश्विद्यालय के विज़िटिंग फ़ैकल्टी पद से हटा दिया गया. हद है!

PM Modi's pain on Rohith Vemula Suicide should go beyond emotional talk

लखनऊ में शुक्रवार को अपने भाषण में रोहित वेमुला की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भावुक हो गये. निश्चित ही उन्हें इस हादसे से सदमा पहुँचा होगा. ऐसे हादसे से भला किसे संसदमा न पहुँचेगा. हम सबको बहुत सदमा पहुँचा है. लेकिन तसल्ली तो हमें तब होती, जब प्रधानमंत्री अपनी पार्टी के, अपने संघ परिवार के लोगों को भी कुछ नसीहत देते, उन्हें कुछ तो कहते कि वे जैसी भाषा बोल रहे हैं, उनके लोग अपने विरोधी विचार रखनेवालों पर जैसे हमले कर रहे हैं, समाज में चारों तरफ़ तनाव बढ़ाने-भड़काने की कोशिश कर रहे हैं, वह सब ठीक नहीं है, देशहित में नहीं है और उसे तुरन्त बन्द किया जाना चाहिए. पिछले बीस महीनों से बार-बार, हज़ारों बार प्रधानमंत्री मोदी से यह गुहार लगायी जा चुकी है कि वह कम से कम अपनी सरकार के मंत्रियों, अपनी पार्टी के सांसदों, विधायकों, नेताओं, कार्यकर्ताओं और संघ परिवार के संगठनों पर चाबुक चलायें, दबाव बनायें कि वे समाज में ज़हर घोलनेवाली हरकतों से बाज़ आयें. लेकिन प्रधानमंत्री का एक भी ऐसा बयान हमें कहीं देखने को नहीं मिला, उनकी तरफ़ से एक भी ऐसी कोशिश कहीं नज़र नहीं आयी. आख़िर क्या मजबूरी है उनकी?

हर घटना के पीछे एक ही वैचारिक उपकरण!

मजबूरी नहीं है, बल्कि संघ का सुविचारित एजेंडा है. कभी अटलबिहारी वाजपेयी एक 'उदार' मुखौटा हुआ करते थे, आज मोदी जी विकास का मुखौटा हैं. वह विकास की बाँसुरी बजाते रहेंगे और ऐसे ही फ़ासिस्ज़्म का तम्बू धीरे-धीरे ताना जाता रहेगा. गाँधी की हत्या, बाबरी मसजिद का ध्वंस, दादरी कांड, ईसाई चर्चों पर हमले, लेखकों की हत्याएँ और उन्हें धमकियाँ और रोहित वेमुला की आत्महत्या, इन सबके पीछे कहीं न कहीं एक ही विचार क्यों उपकरण बनता है, सोचने की बात यह है.
http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi
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  • aaku srivastava

    जब तक रोहित मरेंगे तब तक हम दरिद्र, कमजोर और तथाकथित विकसित होने का सपना छोड़ दें

  • एक आम सवर्ण आदमी सुबह जागने के बाद सबसे पहले टॉयलेट जाता है, बाहर आकर साबुन से हाथ धोता है, दाँत ब्रश करता है, नहाता है, कपड़े पहनकर तैयार होता है, अखबार पढता है, नाश्ता करता है, घर से काम के लिए निकल जाता है…..
    बाहर निकलकर रिक्शा करता है, फिर लोकल बस या ट्रेन पकड़कर ऑफिस पहुँचता है, वहाँ पूरा दिन काम करता है, साथियों के साथ चाय पीता है, शाम को वापिस घर के लिए निकलता है.
    घर के रास्ते में एक सिगरेटे फूँकता है, बच्चों के लिए टॉफी, बीवी के लिए गजरा लेता है, मोबाइल में रिचार्ज करवाता है, और अनेक छोटे मोटे काम निपटाते हुए घर पहुँचता है….
    अब आप बताओ कि उसे दिन भर में कहीं कोई दलित मिला.?? क्या उसने दिन भर में किसी दलित पर कोई अत्याचार किया.??
    उसको जो दिन भर में मिले, वो थे अख़बार वाला भैया, दूध वाला भैया, रिक्शा वाला भैया, बस कंडक्टर, ऑफिस के मित्र, आंगतुक, पान वाला भैया, चाय वाला भैया, टॉफी की दुकान वाला भैया, मिठाई की दूकान वाला भैया…….
    .
    जब ये सब लोग भैया और मित्र हैं तो इनमें दलित कहाँ है ? क्या दिन भर में उसने किसी से पूछा कि भाई, तू दलित है या सवर्ण ? अगर तू दलित है तो मैं तेरी बस में सफ़र नहीं करूँगा, तुझसे सिगरेट नहीं खरीदूंगा, तेरे हाथ की चाय नहीं पियूँगा, तेरी दुकान से टॉफी नहीं खरीदूंगा…..
    .
    क्या उसने साबुन, दूध, आटा, नमक, कपड़े, जूते, अखबार, टॉफी, गजरा खरीदते समय किसी से ये सवाल किया था कि ये सब बनाने और उगाने वाले दलित हैं या सवर्ण ?
    आम तौर पर हम सबके साथ ऐसा ही है, शायद कोई बिरला ही आजकल के युग में किसी की जाति पूछकर तय करता है कि फलां आदमी से कैसा व्यवहार करना है.
    हम सबकी फ्रेंडलिस्ट में न जाने कितने दलित होंगे….क्या आजतक किसी ने कभी भी उनकी पोस्ट लाइक करने से पहले, या उसपर कमेन्ट करने से पहले उनकी जाति पूछी….क्या किसी से कभी कहा कि तुम दलित हो इसलिए मेरी पोस्ट पर कमेन्ट मत करो ?
    जब रोजमर्रा की जिंदगी में हमसे मिलने वाले दलित नहीं होते, तो उनमें से कोई मरते ही दलित कैसे हो जाता है ??
    है कोई जवाब ? हो तो, दो ना…?

    • Rao Swan

      non sense and stupid logic, Read the Govt. report then you will know that in a year and every year, more than 30 thousand atrocities has done one the Dalits people.. and among this ratio more than 5000 thousand dalits killed by the upper caste people. So your stupid logic has no place at all. Read first then write.

      • Abeer Nayak

        ha ha ha…. If this is the case than there should have no dalits left in society, all would have been killed by upper cast people. Pity on you.

        • Rao Swan

          You should check the figure then laugh. Dalits are the 20% of the Indian Population. Dont do Ha ha. 25 crores are the dalit peoples and stupid guy. fresh your memory. Dalits are born everyday and as like Brahmin. In 1947 the Indian population was 33 crores and now it is 125 crores. So laugh on you guy.

        • Rao Swan

          This all shows your intellectual aspect, how intelligent you are? go to abroad then you will find out that what the foreigner peoples think about the India Peoples. They are saying to India “Third world country.”

  • Nonsense

  • We will always be against those people, who will support terrorists & terrorism. Here, you forgot an important point to discus. “Support For Yakub Memon: A Terrorist”. What the hell is this era of journalism, which is not sincere about the facts.

  • A farmer can’t afford the cost of higher education of his son. His son is intelligent and hard working too. He has no opportunity to get higher education. Because, he is from Upper Cast. He has no reservation. He has no government help. Bloody rascls, (pardon my language) you all journalist, no one see this tragedy with upper caste. Bahancod every people of this society(journalism), no one have rights to defame the upper caste. You wrote, what you want, but in todays situation, there is nothing like that. So, please stop doing bullshits.

    Jai Hind.
    सर्वधर्म समभाव, सर्वजन समभाव !

    • Rao Swan

      everyone has seen your qualification, Your language shows your eligibility. Who made this bloody caste system? bury this bloody caste system into the deep ground.

  • kushal

    नक़वी साहब मुझे आपके इस लेख का बेसब्री से इंतज़ार था ,मुझे पता था कि इस विषय पर आप लेख ज़रूर लिखेंगे और किसी न किसी बहाने आप संघ को कटघरे में ज़रूर खड़ा करेंगे

    मुझे बड़ा ही दुःख हो रहा है कि आपका ये लेख कुछ मौक़ा परस्त कथित धर्मनिरपेक्ष कोंग्रेसी या आम आदमी पार्टी के नेताओं के बयानों जैसा है . मेरे मन मेँ कुछ प्रश्न हैं इस घटना के सम्बन्ध मेँ —

    (१) हमारे देश के नेता और कुछ आप जैसे लेखक किसी घटना पर तभी अत्याधिक सक्रिय क्यों हो जाते हैं जब किसी मुस्लिम या दलित की हत्या या आत्महत्या की घटना होती है और मीडिया तो मानो न्यायधीश बन जाती ,दलित या मुस्लमों के अलावा हज़ारों लोग हत्या या आत्महत्या करते हैं तब ये तथाकथित सेक्युलर लोग और मीडिया अपनी छाती नहीं पीटते क्या ऐसे लोगों का व्यवहार या कार्यकलाप क्या सेक्यूलरज्म के मुहं पर तमाचा नहीं है क्या ऐसा सेक्युलरजिम देश के लिए घातक नहीं है ?

    (२) क्या रोहित वेमुला वही छात्र नहीं था जिसने याकूब मेमन जैसे शातिर आतंकवादी की फांसी का विरोध करके देश कि न्यायपालिका का मज़ाक उड़ाया था और दावा किया था कि हज़ारों याकूब मेमन या उसके जैसी आतंकवादी को उनका संगठन पैदा करेगा हर घर मेँ पैदा करेगा .क्या ये देश विरोधी कार्य नहीं है ? क्या उनका संगठन वामपंथी विचारधारा से नहीं जुड़ा है ? क्या किसी संगठन द्वारा अपने कैंपस मेँ गाय की मीट का आयोजन करना और ऐसे कार्य करना जिससे हिन्दू धर्म कि भावनाएं आहत हो क्या ये सही है ? क्या इन आहत करने वाले भावनाओं के विरोध मेँ दूसरे छात्रों का विरोध क्या ग़लत था ? क्या किसी जनप्रतिनिधि द्वारा याकूब मेमन जैसे आतंकवादी के समर्थन , हिन्दू विरोधी कृत्यों की सूचना केंद्र सरकार को देना क्या उस जनप्रतिनिधि का कर्त्तव्य नहीं ? क्या उस जनप्रतिनिधि ने रोहित वेमुला का नाम अपनी लिखित शिकायत मेँ लिया ?

    (३) क्या रोहित वेमुला ने अपनी आत्महत्या के समय जो पत्र लिखा क्या उसमें किसी मंत्री या स्कूल प्रशासन को ज़िम्मेदार ठहराया गया ? बल्कि उसने लिखा है कि वो स्वयं मानसिक अवसाद से ग्रस्त था और हिन्दुस्तान मेँ इस अवस्था मेँ कई हिन्दू और स्वर्ण आत्महत्या कर चुके है लेकिन कोई मीडिया और फ़र्ज़ी सेक्युलर पहले क्यों नहीं बोले ?

    क्या हिन्दुस्तान मेँ किसी हिन्दू या स्वर्ण कि हत्या या आत्महत्या पर इतना हंगामा क्यों नहीं होता क्यों आप जैसे लेखक अलीगढ मेँ मुस्लिमो द्वारा हिन्दू लड़के को क़त्ल करने पर कोई लेख नहीं लिखते आप क्यों नहीं लिखते कि कितने लोग सिर्फ इस वजह से आत्महत्या कर लेते हैं क्योंकि उन्हें आरक्षण कि वजह से वो ज़िंदगी की दौड़ मेँ पीछे छूट गए , आप क्यों नहीं लिखते कि प्रतिभा पलायन मेँ आरक्षण का कितना योगदान है ?

    (४) दलित शब्द को कुछ सेक्युअलर सिर्फ कुछ जातियों तक ही क्यों सीमित किया है ? जब “दलित” शब्द का मतलब हर वो व्यक्ति है जो समाज मेँ हाशिये पर हो ,इसमें सिर्फ कुछ ही जातियों को क्यों रखा गया ? क्या ये देश को प्रगति के पथ पर दौड़ने से रोकना नहीं है ?

    जय हिन्द

    • Abeer Nayak

      संघ के उपर भौंकने वाले लोग अचानक ही पूना में शांतिदूतों द्वारा जलाए गये दलित, 2014 के पहले मरे हुए दलित तथा पूर्णिया और मालदा जैसी घटनाओं पर चुप्पी धारण कर लेते हैं.

  • Rao Swan

    Thank you Naqvi Sahib, I am your great admirer because you touched the subject deeply and analyzed well.

    • qwn

      Thank you Rao Swan ji for your appreciation.

  • Naqvi ji, what can be done to stop the politics of hate? Will the public speak up in one voice and tell our politicians that we WILL NOT listen to any talk of religion, communalism, bigotry etc. and only want them to tell us how they are solving issues of food, water, clothing, housing, employment and health care. You are right in that instead of talking about how the country can prevent youth from ending their life, there is the usual mud slinging going on.

    • With the mud slinging that goes on, instead of developing a progressive mindset we as a country are more likely to slip on to a regressive path.

      • qwn

        Every state which propagate religion and try to build its identity on the basis of religious identity has one thing in common— orthodox thinking, illiberal and regressive outlook. That is why we are seeing exactly the same thing around us.

    • qwn

      People has already started realising what is happening around and why. Now voices are coming out in the open.

  • shnawaz

    और हद यह है कि रोहित वेमुले की हत्या करने के बाद अब सारा ज़ोर उसको ओबीसी बनाने पर लगाया जा रहा है, जैसे देश में ओबीसी कैटेगरी के लोगों के साथ कुछ भी करने की आज़ादी हो?

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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