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Mar 28
‘आप’ का क्या होगा जनाब-ए-आली?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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'आप' के मौजूदा संकट में पहली बात तो पार्टी में 'आदर्श' और 'व्यावहारिक' राजनीति के टकराव की है. दूसरी बात केजरीवाल के अधिकारों और वर्चस्व को सीमित करने को लेकर है. आम आदमी पार्टी के नाम वाली पार्टी एक नेता के एकछत्र राज वाली पार्टी बने या सामूहिक नेतृत्व पर चलनेवाली पार्टी? और तीसरी बात महत्त्वाकाँक्षाओं की! केजरीवाल सीढ़ी बने रहें और लोग उससे सत्ता की कुर्सियाँ चढ़ते रहें! तो केजरीवाल क्यों सीढ़ी बनें, ख़ास कर उसके लिए जो उन्हें पार्टी के भीतर चुनौती दे रहा हो! अगर यह तीसरी बात न होती तो पार्टी शायद पहली दो बातों का समाधान ढूँढ चुकी होती. लेकिन शक-शुबहे-षड्यंत्र का जन्म इस तीसरी बात के बीज से ही पड़ता है, जो पड़ चुका है!


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‘आप’ बड़े ताप में है! पारा गरम है. पार्टी तप रही है. तलवारें फिर तनी हैं. मुद्दे हैं, महत्त्वाकाँक्षाएँ हैं, विवाद हैं, झगड़े हैं, रगड़े हैं, डंक हैं, चुभन है, रोना है, धोना है, षड्यंत्र की कथाएँ हैं, ईमान के दावे हैं, सवाल हैं और केजरीवाल हैं! पार्टी रहेगी या दो-फाड़ हो जायेगी? सबकी निगाहें इसी पर हैं कि ‘आप’ का क्या होगा जनाब-ए-आली?

क्यों केजरीवाल से फिरंट होते हैं लोग?

वैसे ‘आप’ के लिए यह सब कुछ नया कहाँ है. होता ही रहता है! कोई न कोई लगातार फिरंटियाता ही रहता है! बिन्नी से इल्मी तक और ‘बाप’ से ‘अवाम’ तक चलते हुए योगेन्द्र-प्रशान्त तक लम्बा सिलसिला है. शिकायत कमोबेश सबकी एक रहती है. यही कि केजरीवाल मनमानी करते हैं! किसी की नहीं सुनते! केजरीवाल पर भले आरोप लगते रहे हों कि वह किसी की नहीं सुनते, लेकिन जनता तो अब तक केजरीवाल की सुनती रही है. इसलिए पार्टी अब तक ठाठ से चलती रही है. लेकिन इस बार मामला ज़रा ज़्यादा संगीन लगता है. अब तक जो लोग केजरीवाल से फिरंट होते रहे, वह अकेले ही पार्टी से निकलते रहे और बाद में बीजेपी के तम्बू में जाते रहे! इस बार एक बड़ा गुट है, जो पार्टी में अपनी हिस्सेदारी माँग रहा है, एक व्यक्ति-एक पद के सवाल उठा रहा है और अब तो पूरी ज़ोर-आज़माइश के मूड में है! अब अगर पार्टी टूटी तो यह गुट क्या करेगा, अलग पार्टी बनायेगा या किसी के तम्बू में जायेगा, यह सवाल रोचक है!

योगेन्द्र-प्रशान्त क्या पार्टी तोड़ेंगे?

अब योगेन्द्र यादव और प्रशान्त भूषण इतने नासमझ भी नहीं कि यह न समझते हों कि वह ‘आप’ से अलग हो कर कोई पार्टी बना लेंगे, तो वह खड़ी भी हो पायेगी या नहीं! जनता उनके साथ आयेगी या नहीं! तो फिर दस दिन से चल रही मान-मनुहार के बाद भी बात बन क्यों नहीं पायी? मामला क्या है? झगड़ा क्यों नहीं सुलझ रहा है? योगेन्द्र गुट कह रहा है कि हम केजरीवाल को हटाना नहीं चाहते, पार्टी तोड़ना भी नहीं चाहते, बस चाहते हैं कि पार्टी जिन नीतियों और आदर्शों को लेकर बनी थी, उन पर कड़ाई से चले, फ़ैसले सामूहिक पारदर्शिता से हों और पूरे देश में पार्टी का विस्तार हो, बिहार से लेकर जहाँ-जहाँ सम्भव हो, पार्टी चुनाव मैदान में उतरे. और इसी के साथ सवाल एक व्यक्ति-एक पद का भी उठ जाता है. फिर अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री और पार्टी के संयोजक कैसे रह सकते हैं? वह एक पद छोड़ें! तो केजरीवाल क्यों कोई एक पद छोड़ें? और छोड़ कर वह राजनीतिक हाराकिरी क्यों करें? सवाल यह है कि जिस केजरीवाल के बूते पार्टी ने दिल्ली में इतनी धमाकेदार जीत दर्ज की, पार्टी में उन्हीं के ख़िलाफ़ यह लामबन्दी क्यों? यह भी सब जानते हैं कि पार्टी में केजरीवाल के सिवा कोई ऐसा नेता नहीं, जिसके नाम पर दो-चार हज़ार वोट भी मिल जायें! केजरीवाल के बिना पार्टी खड़ी ही नहीं रह सकती. तो ऐसा क्यों कि दिल्ली में इतनी ज़बरदस्त जीत के बाद पार्टी में केजरीवाल की ताक़त बढ़ने के बजाय घट जाये, उन्हें आरोपों और सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया जाये?

ग़लत नहीं केजरीवाल विरोधियों के सवाल

वैसे यह सच है कि केजरीवाल विरोधी जो सवाल उठा रहे हैं, वह ग़लत नहीं हैं. पार्टी ने ‘साफ़-सुथरी’ राजनीति के लिए जो लक्ष्मण रेखाएँ अपने लिए खींची थीं, उनमें से कुछ उसने ‘व्यावहारिक राजनीति’ के नाम पर तोड़ दी हैं. चन्दे के चक्कर से लेकर सत्ता पाने की जोड़-तोड़ तक, दूसरी पार्टियों से ‘जिताऊ’ उम्मीदवारों के दलबदल से लेकर वोट बैंक की गणित तक, चुनाव में शराब की बोतलों से लेकर मंत्री की विवादास्पद डिग्री तक तमाम सवालों में पार्टी घिरती और उलझती रही. और इसने ‘साफ़-सुथरी’ राजनीति के पार्टी के दावे पर गम्भीर सवाल भी उठाये, लेकिन दिक़्क़त यह है कि सत्ता की सीढ़ियों पर चढ़ने की शुरुआत ही आदर्शों के धरातल को छोड़ने से होती है! एक साथ आप दोनों जगह हो नहीं सकते. ज़मीन से पैर उठेगा तभी तो सीढ़ी पर रखा जायेगा! और अगर एक पैर ज़मीन पर, एक पैर सीढ़ी पर रखा रहे, तो वहीं के वहीं ही खड़े रहेंगे, कहीं आगे ही नहीं बढ़ेंगे! तो पहली बात तो पार्टी में ‘आदर्श’ और ‘व्यावहारिक’ राजनीति के टकराव की है. केजरीवाल ख़ेमा कहता है कि योगेन्द्र-प्रशान्त की राजनीतिक सोच उनके पुस्तकालयों की मोटी-मोटी पोथियों के पन्नों से बाहर ही नहीं निकलती! ज़मीनी राजनीति किताबी पैंतरों से नहीं हो सकती. दूसरी बात पार्टी में केजरीवाल के अधिकारों और वर्चस्व को सीमित करने को लेकर है. पार्टी में शक्तियों का बँटवारा कैसे हो? आम आदमी पार्टी के नाम वाली पार्टी एक नेता के एकछत्र राज वाली पार्टी बने या सामूहिक नेतृत्व पर चलनेवाली पार्टी? यह सवाल पार्टी में बिन्नी के ज़माने से उठता रहा है और अभी तक उठ ही रहा है! योगेन्द्र-प्रशान्त ख़ेमे को मालूम है कि अगर अभी केजरीवाल को पगहा नहीं बाँधा गया, तो वे बिलकुल किनारे लगा दिये जायेंगे और केजरीवाल के लिए दूर-दूर तक कोई चुनौती नहीं रह जायेगी. और तीसरी बात महत्त्वाकाँक्षाओं की! केजरीवाल सीढ़ी बने रहें और लोग उससे सत्ता की कुर्सियाँ चढ़ते रहें! तो केजरीवाल क्यों सीढ़ी बनें, ख़ास कर उसके लिए जो उन्हें पार्टी के भीतर चुनौती दे रहा हो! अगर यह तीसरी बात न होती तो पार्टी शायद पहली दो बातों का समाधान ढूँढ चुकी होती. लेकिन शक-शुबहे-षड्यंत्र का जन्म इस तीसरी बात के बीज से ही पड़ता है, जो पड़ चुका है! दिल्ली से बाहर पार्टी के विस्तार को लेकर भी केजरीवाल को यही दुविधा है! कि ‘विस्तार’ के नाम पर पार्टी में ऐसे लोग मज़बूत हो जायें जो कल को केजरीवाल को कठपुतली की तरह न नचाने लग जायें!

वर्चस्व और अस्तित्व की लड़ाई

तो कुल मिला कर पार्टी में अब वर्चस्व, अस्तित्व और शक्ति-सन्तुलन की लड़ाई हो रही है! वैसे जब भी कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा ले कर कुनबा जोड़ा जाता है तो हमेशा ही ऐसी स्थितियाँ बनती हैं और जल्दी बनती हैं. कुनबा बड़े जोशो-ख़रोश से शुरू होता है, आमतौर पर बड़ी हड़बड़ी में ही शुरू होता है, अपनी स्थितियों से परेशान जनता भी फटाफट उनमें उम्मीद देखने लगती है, बदलाव के, कमिटमेंट के, क्रान्ति के भावावेशी संकल्पों में लोग बहे चले आते हैं, अकसर कोई सुविचारित चार्टर होता नहीं, क्योंकि एक तो उसे तैयार करने का समय नहीं होता और दूसरे डर यह होता है कि चार्टर को लेकर ही कहीं बहुत-से लोग या तो बिदक गये या उनमें मतभेद हो गये तो मिशन पहले दिन से ही फुस्स हो जायेगा, इसलिए ऐसे कुनबे अकसर बिना किसी वैचारिक ढाँचे के खड़े होते हैं या फिर रूई के फाहों जैसे ऐसे स्वप्नजीवी धरातल पर खड़े होते हैं, जो असली दुनिया में होते ही नहीं. 1977 में जेपी ने नौ पार्टियों को जोड़ कर ‘जनता प्रयोग’ किया था, जो ढाई साल बीतते-बीतते छितर कर धूल में मिल गया. फिर 1989 में बरास्ता ‘जन मोर्चा’ वीपी सिंह ने जनता दल का कुनबा जोड़ा, जो वीपी, चन्द्रशेखर और चौधरी देवीलाल की महत्त्वाकाँक्षाओं की रस्साकशी में जूझते-जूझते ही टें हो गया! और लगभग इतनी ही अवधि के भीतर ‘आप’ का कुनबा भी चरमराने लगा है. हालाँकि पहले के दो कुनबों के मुक़ाबले अरविन्द केजरीवाल बड़ी मज़बूत स्थिति में हैं. उनकी सरकार को कोई ख़तरा नहीं है. इसलिए अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अगले कुछ दिनों में ‘आप’ किस रास्ते जायेगी? रास्ता चाहे अलग होने का हो या फिर से मनजोड़ का हो, ‘आप’ को कुनबे से निकल कर पार्टी बनना ही पड़ेगा, अगर वह राजनीति में लम्बे समय तक चलना चाहती है.
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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