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Sep 03
राजनीति का धर्म क्या है?
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 1 

लोकतंत्र और धर्म एक-दूसरे की विरोधी अवधारणाएँ हैं! लोकतंत्र असहमतियों के बिना हो ही नहीं सकता और धर्म में असहमति होती नहीं, वह किन्तु-परन्तु विहीन आस्था से चलता है. जो धर्म है, जो धर्म ग्रन्थों में कह दिया गया है, जो धर्मगुरू का कहना है, वह अन्तिम सत्य है, उस पर कोई सवाल नहीं. लेकिन लोकतंत्र में तो सवाल ही सवाल हैं, वह सवालों पर ही चलता है, सवालों के बिना लोकतंत्र हो ही नहीं सकता और सवाल हर कोई उठा सकता है.


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राजनीति का धर्म क्या है? संविधान का धर्म क्या है? देश की संसद का धर्म क्या है? विधानसभाओं का धर्म क्या है? न्यायपालिका का धर्म क्या है? बहस उठी है हरियाणा विधानसभा में जैन मुनि तरुण सागर जी के प्रवचन से. दो सवाल हैं. देश चाहे कोई भी हो और धर्म चाहे कोई भी हो, फ़र्क़ नहीं पड़ता. सवालों के जवाब देश और धर्म बदलने से बदल नहीं जायेंगे! वही रहेंगे.

Religion and Politics : लोकतंत्र में धर्म क्या राजनीति को 'उपदेश' सुना सकता है?

पहला सवाल यह कि लोकतंत्र में धर्म क्या राजनीति को 'उपदेश' सुना सकता है? क्या ऐसी कोई गुंजाइश किसी लोकतंत्र में हो सकती है? और दूसरा यह कि एक लोकतंत्र में राजनीति और धर्म या धर्मों के बीच रिश्ता क्या हो? राजनीति अपने धर्म पर चले या अपने देश के किसी धर्म की धारणाओं को धारण करे? और अगर राजनीति का अपना कोई धर्म है, तो वह क्या है या क्या हो?

राजा ईश्वर का अँश!

लम्बी यात्रा है. हज़ारों या शायद लाखों साल पहले, जब क़बीलों ने अपने मुखिया चुनने की शुरुआत की तो उसमें उन्होंने दैवीय शक्ति की कल्पना की. उन्हें जीवन की सुरक्षा चाहिए थी, बाहरी हमलावरों से, दैवी आपदाओं से, बूझी-अबूझी अनहोनियों से. बिना किसी दैवीय शक्ति के उनका मुखिया उनकी नज़र में अजेय कैसे बनता और उनकी रक्षा कर पाने लायक़ कैसे होता, इसलिए उन्होंने अपने मुखिया में दैवीय अँश की रचना की! फिर क़बीलों से बढ़ कर छोटे-बड़े राज्य बने, छोटे-छोटे क़बीलों से बढ़ कर प्रजा बड़ी या बहुत बड़ी हो गयी. मुखिया अब राजा कहलाने लगा. लेकिन ईश्वर का अँश उसमें अब भी देखा जाता था. उधर, धर्म भी क़बीलाई आस्थाओं और ओझाओं से विकसित हो कर 'ईश्वर के विधान' बन चुके थे! तो समीकरण पूरा हो चुका था. राजा ईश्वर का अँश, तो जहाँ ईश्वर, वहाँ धर्म! तो राजा ईश्वर का, धर्म का प्रतीक हो गया. धर्म ने राजा को शक्ति दी, राजा ने धर्म को दंडवत किया. दोनों की सत्ता बख़ूबी चल गयी! यह राजतंत्र था. अच्छा या बुरा, दुनिया का शायद ही कोई राजतंत्र रहा हो, जो धर्म के आशीष के बिना चला हो!

राजतंत्र की आदिम स्मृतियाँ

ज़माना तबसे बहुत बदल चुका है. दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में राजतंत्र अब एक दकियानूसी विचार है. लोकतंत्र अलग-अलग रूपों और संस्करणों में विस्तार पा चुका है. हालाँकि यह बात अलग है कि कुछ आधुनिक लोकतांत्रिक देशों में अब भी उन आदिम स्मृतियों को सहेज कर रखा गया है. प्रतीक रूप में ही सही, लेकिन वहाँ राजा है और उसमें ईश्वर का अँश अब भी माना जाता है!

तो हो सकता है कि ऐसे लोकतंत्रों में जो सेकुलर अवधारणाओं को अपनी जीवन शैली और राजधर्म बना चुके हैं, राजा को अब भी बनाये रखने और उसमें ईश्वर के अँश की कल्पना को सहेजे रखने का मतलब ठीक वैसा ही हो, जैसा कि संग्रहालयों में मानव विकास की ऐतिहासिक-सॉंस्कृतिक विरासत को सहेज कर रखने का होता है. लेकिन समस्या तब होती है जब आज किसी लोकतंत्र में कोई यह बात कहे कि राजनीति पर धर्म का नियंत्रण होना चाहिए, धर्म और राजनीति एक-दूसरे से अलग नहीं किये जा सकते.

लोकतंत्र और धर्म एक-दूसरे की विरोधी अवधारणाएँ हैं!

क्यों? लोकतंत्र में राजनीति पर धर्म का नियंत्रण हो तो समस्या क्या है? राजतंत्र में तो राजा पर धर्म का नियंत्रण होता था, प्रत्यक्ष या परोक्ष, तो कोई दिक़्क़त क्यों नहीं थी? इसका कोई लम्बा-चौड़ा जवाब नहीं है. बस एक लाइन का जवाब है. वह यह कि लोकतंत्र और धर्म एक-दूसरे की विरोधी अवधारणाएँ हैं! लोकतंत्र असहमतियों के बिना हो ही नहीं सकता और धर्म में असहमति होती नहीं, वह किन्तु-परन्तु विहीन आस्था से चलता है. जो धर्म है, जो धर्म ग्रन्थों में कह दिया गया है, जो धर्मगुरू का कहना है, वह अन्तिम सत्य है, उस पर कोई सवाल नहीं. लेकिन लोकतंत्र में तो सवाल ही सवाल हैं, वह सवालों पर ही चलता है, सवालों के बिना लोकतंत्र हो ही नहीं सकता और सवाल हर कोई उठा सकता है. राजतंत्र में कोई राजा पर सवाल नहीं उठा सकता था. क्योंकि राजा में 'ईश्वर का अँश' था, राजा पर सवाल उठाना यानी ईश्वर पर सवाल उठाना और धर्म पर सवाल उठाना हुआ क्योंकि धर्म भी 'ईश्वरीय' ही होता है!

धर्म और लोकतंत्र का घालमेल सम्भव नहीं

इसीलिए धर्म से नियंत्रित राजनीति में सवाल उठाने की गुंजाइश नहीं होती. और इसलिए धर्म और लोकतंत्र का घालमेल सम्भव नहीं. दुनिया के कुछ देशों ने ऐसा घालमेल करने की कोशिश ज़रूर की है, लेकिन वहाँ आधुनिक और उदार लोकतंत्र है क्या? ईरान को देखिए. राजनीति पर धर्म के नियंत्रण का मतलब पता चल जायेगा. आयरलैंड को देखिए. राजनीति पर धर्म के नियंत्रण का नमूना सामने है कि जान चली गयी लेकिन गर्भपात नहीं होने दिया गया.

Science, Religion and Politics in a Modern World

विज्ञान नयी खोजें कर रहा है. लेकिन धर्म हज़ारों साल पहले के अतीत के विश्वासों में अटका हुआ है. ऐसे विश्वास, जिनके कोई सबूत हज़ारों-हज़ार साल में कभी नहीं मिले. फिर भी हम मानते हैं कि ऐसा होता है. नाम किसी का नहीं लूँगा, लेकिन दुनिया में हर धर्म के लोग ऐसी-ऐसी पोंगापंथी मान्यताओं, कर्मकांडों को आँखें मूँद कर मानते चले आ रहे हैं, जिनसे कुछ होता है या नहीं, इसका कोई सबूत आज तक किसी को नहीं मिला! फिर भी हम-आप सब उन्हें मानते और करते चले आ रहे हैं! क्यों? इसलिए कि हमारे धर्म में तो ऐसा ही होता है जी?

क्यों आया सेकुलरिज़्म?

बिना सबूत, बिना तर्क, बिना सवाल जो है, वह धर्म है. चुपचाप उस पर चलते रहो. यही धर्म की असीम सत्ता है. और चूँकि यह आधुनिक, तार्किक और उदार लोकतंत्र के पूरी तरह विरुद्ध है, इसीलिए पश्चिम में चर्च को राजनीति से दूर रखने के लिए सेकुलरिज़्म की अवधारणा विकसित हुई. ज़ाहिर है कि पश्चिम ने इस बात को सबसे पहले समझा कि राजनीति में धर्म की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए. इसीलिए वह दुनिया में आज आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक, वैज्ञानिक हर तरीक़े से विकसित है.

कोई विधानसभा जैन मुनि तरुण सागर जी को 'उपदेश' देने के लिए बुलाती है, तो उनका क्या दोष? उन्हें बुलाया गया. वह गये और बोले. और वह जो बोले, लोकतंत्र उन्हें वह बोलने का और आपको उससे पूरी तरह असहमत होने का पूरा अधिकार देता है. कोई धर्मगुरू क्यों नहीं चाहेगा कि राजनीति पर धर्म का नियंत्रण हो, राजकाज में उसकी सुनी जाये, उसका 'मार्गदर्शन' लिया जाये!

एक बेहद ख़तरनाक शुरुआत

असल मुद्दा यह है कि विधानसभा का धार्मिक उपदेश सुनना उचित है या नहीं? कोई राष्ट्रपति, कोई प्रधानमंत्री, कोई मुख्यमंत्री, कोई न्यायाधीश अपनी व्यक्तिगत हैसियत में किसी धर्मस्थल या धर्मगुरू या साधु-सन्त, बाबा या स्वामी या पीर-फ़क़ीर के आगे मत्था टेके, यह उसकी व्यक्तिगत आस्था हो सकती है. हालाँकि तब भी ऐसे सांविधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए ऐसा करना उचित नहीं लगता. क्योंकि ऐसा भक्ति-भाव या धर्मगुरुओं से निकटता (चाहे वोट बैंक जैसे राजनीतिक कारणों से हो या विशुद्ध निजी श्रद्धावश हो) उन्हें उनके राजधर्म से भटका देने की सारी सम्भावनाएँ तो रखती ही है, जिसे हम प्रायः ही देखते हैं. लेकिन कोई सांविधानिक संस्था संविधान के अलावा किसी और का 'मार्गदर्शन' भला कैसे ले सकती है? यह एक बेहद ख़तरनाक शुरुआत है. ख़ासकर तब, जब 'धर्म-राज्य' के सेल्समैन गली-गली घूम रहे हों!

राजनीति का धर्म सिर्फ़ और सिर्फ़ राजधर्म होना चाहिए. राजधर्म का ग्रन्थ क्या है? वह है संविधान. संसद, विधानसभाएँ, न्यायपालिका सबका धर्म यही संविधान है. इसके अलावा राजनीति का न कोई धर्म है और न ही होना चाहिए.

http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi
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  • i b arora

    समस्या राजनीति नहीं है क्योंकि राजनीति तो सदा ही सत्ता का खेल रही है. समस्या धर्म की परिभाषा में है.

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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