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May 13
‘टाइम्स समूह’ तक कैसे पहुँचा मैं?
 | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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अगर उस दिन विजय ने मुझे बुला कर वह विज्ञापन न दिखाया होता तो मैं आज वह न होता, जो हूँ! विजय ने ज़्यादा पढ़ाई-लिखाई नहीं की थी. हाईस्कूल से पहले ही पढ़ाई छोड़ दी थी. मेरे ही मुहल्ले में रहता था. उन दिनों आज की तरह कालोनियों का ज़माना नहीं था. मुहल्ले में सब एक-दूसरे को बहुत अच्छी तरह जानते थे, एक परिवार का हिस्सा होते थे.


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अगर उस दिन विजय ने मुझे बुला कर वह विज्ञापन न दिखाया होता तो मैं आज वह न होता, जो हूँ! विजय ने ज़्यादा पढ़ाई-लिखाई नहीं की थी. हाईस्कूल से पहले ही पढ़ाई छोड़ दी थी. मेरे ही मुहल्ले में रहता था. उन दिनों आज की तरह कालोनियों का ज़माना नहीं था. मुहल्ले में सब एक-दूसरे को बहुत अच्छी तरह जानते थे, एक परिवार का हिस्सा होते थे. और विजय के साथ तो कुछ ज़्यादा नज़दीकी थी क्योंकि वह जिज्ञासु लड़का था, उसके परिवार के कुछ बच्चों को मैं ट्यूशन भी पढ़ाता था.

बात 1980 के शुरू की है. विजय उन दिनों होज़री की एक छोटी-सी दुकान चलाता था. एक दिन मैं उधर से गुज़रा तो उसने आवाज़ दी. मैं रुका तो कहने लगा कि 'पत्रकार टाइप' एक नौकरी का विज्ञापन निकला है. आपके लिए वह अख़बार सम्भाल कर रखा है, देख लीजिए. मुझे थोड़ी हैरानी हुई, भला किस अख़बार में निकला ऐसा विज्ञापन? उसने बताया कि 'आज' अख़बार में. अब और भी हैरानी हुई! 'आज' तो मैं रोज़ ही पढ़ता था, तो विज्ञापन पर मेरी नज़र क्यों नहीं पड़ी? ख़ैर, उसने होज़री के पुराने डिब्बों के बीच से चार दिन पुराने अख़बार के उस पन्ने को निकाला. वह 'आज' अख़बार ही था. उस दिन उसे मैंने पढ़ा भी था, लेकिन विज्ञापन पर मेरी नज़र नहीं पड़ी थी. विज्ञापन था 'टाइम्स आॅफ़ इंडिया' समूह के 'प्रशिक्षु पत्रकार कार्यक्रम' (Trainee Journalist Scheme) का. हिन्दी और अंगरेज़ी में किसी भी विषय में डिग्री हो और पत्रकारिता में रुचि हो तो आवेदन किया जा सकता था. चुन लिये गये तो कम्पनी साल भर प्रशिक्षण देगी, सात सौ रुपये मासिक भत्ता भी देगी और साल भर बाद नौकरी भी पक्की हो जायेगी!

Who helped QW Naqvi getting First Job in The Times of India Group?

मैंने विजय से कहा, यह है तो बढ़िया. लेकिन 'टाइम्स आॅफ़ इंडिया' तो बहुत बड़ा और नामी-गिरामी समूह है. उसने देश भर में यह विज्ञापन निकाला होगा. इसमें भला मैं कहाँ चुना जा पाऊँगा? बहरहाल, फिर यह तय पाया गया कि विजय ने विज्ञापन दिखाया है, इसलिए अर्ज़ी तो भेज ही देते हैं. दो या तीन फ़ोटो भेजनी थी, एक बायोडाटा और किसी भी विषय पर अपनी हैंडराइटिंग में एक हज़ार शब्दों का एक लेख. यह सब कुछ भारतीय डाक के 30 पैसे के लिफ़ाफ़े में भेजा जा सकता था. तो अर्ज़ी भेज दी गयी.

कुछ दिन बाद दिल्ली में लिखित परीक्षा के लिए बुलाया गया. तो पहली बार दिल्ली देखी. लिखित परीक्षा के बाद सबको एक दिन रुकने के लिए कहा गया था. कल नतीजा बतायेंगे, जो पास होंगे, अगले दिन वह इंटरव्यू के लिए बुलाये जायेंगे. नतीजा आया, पता चला कि इंटरव्यू की लिस्ट में नाम है. अगले दिन इंटरव्यू हो गया. कई महीनों बाद फिर एक दिन चिट्ठी आयी कि फ़ाइनल इंटरव्यू के लिए बम्बई (तब मुम्बई को बम्बई ही कहते थे) आइए. इसी बहाने बम्बई देखना भी हो गया.

बड़ा घनघोर इंटरव्यू हुआ. टाइम्स समूह के मैनेजिंग डायरेक्टर राम तरनेजा और 'धर्मयुग' के सम्पादक धर्मवीर भारती जैसे दिग्गजों से भरे आठ लोगों के बोर्ड ने सवालों की झड़ी लगा दी. कुछ दिनों बाद चिट्ठी आ गयी कि आप चुन लिये गये हैं, अमुक तारीख़ को आ कर ज्वाइन कीजिए.

ज्वाइनिंग के बाद पता चला कि हमारा बैच टाइम्स के इतिहास का सबसे छोटा बैच था. कुल पाँच लोग चुने गये थे. अंगरेज़ी में चार और हिन्दी में अकेला मैं!

कहते हैं कि क़िस्मत भी कभी-कभी साथ देती है. शायद देती है! कह सकते हैं कि यह शायद क़िस्मत से ही हुआ कि विजय ने विज्ञापन देखा और मुझे बुला कर दिखाया भी. क्योंकि मैंने तो उस विज्ञापन को देखा नहीं था. लेकिन अर्ज़ी के टाइम्स हाउस पहुँच जाने के बाद की कहानी क़िस्मत की नहीं है, बल्कि वह कहानी शायद अख़बार पढ़ने और समाचारों में शौक़ रखने की उस आदत के कारण रंग लायी, जो क़रीब 13 साल की उम्र में ही लग गयी थी. घर में उर्दू का अख़बार 'आज़ाद' आता था. उससे शुरुआत हुई. फिर मुहल्ले की पान की दुकान पर जा कर 'आज' पढ़ने लगे. मुहल्ले में ही हमारे एक पड़ोसी की पेंट (रंगों) की दुकान थी. वह शाम को 'गांडीव' अख़बार मँगाते थे. इसलिए शाम छह बजे के आसपास हम उनकी दुकान के इर्द-गिर्द मँडराते दिख जाते थे. यह सिलसिला कई साल चला. (अख़बार पढ़ने के चक्कर में पान खाने की भी लत लग गयी थी जो 27-28 साल बाद बड़ी मुश्किल से छूटी). उम्र बढ़ती गयी तो कुछ साप्ताहिक पत्र-पत्रकाओं की तरफ़ भी रुख़ किया. फिर तो यह हुआ कि जो पैसे मिलते थे, सारे शौक़ काट कर वह 'दिनमान', 'रविवार', 'माया', 'प्रोब', 'ब्लिट्ज़' वग़ैरह पर ख़र्च कर दिये जाते थे. ख़बरों के विश्लेषण के लिए इन पत्र-पत्रिकाओं का उस समय बड़ा नाम था. आज भी हर दिन सात-आठ अख़बार पढ़े बिना मेरा काम नहीं चलता.

तो यह थी कहानी मेरे 'टाइम्स हाउस' पहुँचने की. विजय न होता तो मैं टाइम्स हाउस न पहुँचा होता और 'टाइम्स समूह' अगर वह 'प्रशिक्षु पत्रकार कार्यक्रम' न चला रहा होता तो भी आज मैं वह नहीं होता, जो हूँ. 'टाइम्स' ने बाद में यह कार्यक्रम बन्द कर दिया, हालाँकि इस कार्यक्रम ने देश को कई बड़े पत्रकार दिये.

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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