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May 13
उम्र 19 नहीं, बन गये सम्पादक!
 | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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लिखने का शौक़ तो 13-14 साल की उम्र से ही लग गया था. वाराणसी के अख़बारों में रविवार को बच्चों के पृष्ठ पर कविताएँ छपने से इस सिलसिले की शुरुआत हुई. कई कविताएँ छपीं और जब बच्चों के पन्ने के लिए हुई कुछ लेख प्रतियोगिताओं में पहला स्थान पा लिया, तो हौसला बढ़ा. फिर 'सम्पादक के नाम पत्र' लिखने की शुरुआत हुई. धीरे-धीरे उम्र बढ़ती गयी और समझ भी. 1971 में जब अपनी उम्र सत्रह पार कर चुकी थी, बांग्लादेश की मुक्ति का आन्दोलन शुरू हुआ तो उस पर एक कविता दैनिक 'आज' को भेजी, जो उन्होंने अपने मुख्य परिशिष्ट में छापी, बच्चों के पेज पर नहीं. बड़ी ख़ुशी हुई. लगा कि अब बड़े हो रहे हैं. और कुछ दिन बाद जब उस कविता के लिए 'आज' अख़बार से मनीआर्डर से पाँच रुपये का पारिश्रमिक आया, तब तो दिल बल्लियों उछलने लगा.

फिर अगले एक साल में बहुत लिखा, शहर के उभरते कवियों में नाम दर्ज होने लगा था. इसी बीच, जून 1972 में हमारे मुहल्ले के पास से ही एक साप्ताहिक अख़बार 'वेदना' की शुरुआत हुई. रामलखन सेठ 'शास्त्री' नाम के एक वकील उसे निकाल रहे थे. उन्होंने आसपास पोस्टर लगवाये कि अख़बार को 'अवैतनिक' संवाददाता चाहिए. अपनी उम्र कुछ दिन पहले ही अठारह पार हुई थी. पहुँच गये उनके पास. और बस बन गये 'अवैतनिक' संवाददाता यानी बिना पैसे के काम करो. वह तो ख़ैर अख़बार ही बहुत छोटा था और पैसे दे सकने की ही हालत में नहीं था, यहाँ तो आजकल कई कम्पनियाँ शुरू में कुछ महीने मुफ़्त में ही काम कराती हैं (इंटर्नशिप की बात नहीं कर रहा हूँ मैं).

बहरहाल, काम शुरू हो गया. रिपोर्टरी भी चलती रही और कविताएँ भी लिखी जाती रहीं. कुछ महीने बीते. दीपावली आने वाली थी. संयोग से ईद भी एक-दो दिन के अन्तर से पड़ रही थी. शास्त्री जी को लगा कि दीपावली और ईद का संयुक्त विशेषांक बीस पेज का निकाला जाये. वैसे नियमित अख़बार आठ पेज का था. शास्त्री जी वैसे मालिक भी थे और सम्पादक भी थे. नाम उन्हीं का छपता था, लेकिन अख़बार की सामग्री जुटाने और समय पर उसे प्रेस भेजने की ज़िम्मेदारी उन्होंने शहर के एक वरिष्ठ पत्रकार को दे रखी थी. जाने क्या बात हुई कि अख़बार प्रेस में जाने के चार दिन पहले उनका शास्त्री जी से बड़ा विवाद हो गया. जो कुछ मैटर प्रेस में जाने को तैयार था, सब उन्होंने नष्ट करा दिया. उन दिनों हैंड कम्पोज़िंग का ज़माना था और आज की पीढ़ी के लोग अन्दाज़ नहीं लगा सकते कि तब कम्पोज़िंग कितनी दुरूह चीज़ हुआ करती थी और कितना ज़्यादा समय लेती थी.

The event which made QW Naqvi Editor before he turned 19

इस झगड़े से गम्भीर संकट खड़ा हो गया. अगले दिन सुबह छह बजे ही शास्त्री जी ने मेरे घर हाँक लगायी, मैं सो ही रहा था. उठ कर बाहर पहुँचा तो शास्त्री जी बड़े घबराये, परेशान-से नज़र आये. बोले, अपनी तो नाक कट जायेगी. सिर्फ़ तीन दिन हैं. बीस पेज का अख़बार निकलना है. प्रेस में एक इंच मैटर नहीं है. अगर टाइम पर अख़बार नहीं निकला तो अमुकवा (नाम जानबूझ कर नहीं दे रहा हूँ) पूरे शहर में घूम-घूम कर बोलेगा कि शास्त्री जी हमारे बिना अख़बार नहीं निकाल पाये! मैंने कहा कि आप चिन्ता न करें, अख़बार समय पर निकल जायेगा, बस आप काग़ज़ वग़ैरह का इन्तज़ाम रखें. मैटर और कम्पोज़िंग की वजह से देरी नहीं होगी?

तुरन्त नहा-धो कर एक बैग में दो-तीन जोड़े कपड़े ठूँसे, टूथपेस्ट-ब्रश रखा और माँ को बोला कि अब तीन दिन बाद घर लौटूँगा, प्रेस में ही रहूँगा, अख़बार निकालना है. और साइकिल उठायी, घर से निकल पड़ा. रास्ते में कई मित्र-परिचित कवियों, कहानीकारों, लेखकों को खटखटाया, जिनके पास जो कुछ रचनाएँ तैयार थीं, वह झपटीं, कुछ को कुछ घंटों का अल्टीमेटम दिया कि बस इतनी देर में लिख दीजिए, आज ही इतने घंटे बाद लौट कर लूँगा. बहरहाल, जो हाथ लगा, जा कर फ़ौरन प्रेस को दिया और कम्पोज़िंग शुरू हो गयी. दीपावली पर तो बहुत-से लोगों से कह दिया लिखने को, लेकिन समस्या थी कि ईद पर किससे कहूँ. कम से कम एक कहानी, एक लेख और दो-तीन कविताएँ तो होनी चाहिए. कहानी मैंने कभी लिखी नहीं थी. आज भी नहीं लिख सकता. लेकिन उस दिन जाने क्या हुआ कि प्रेस में बैठे-बैठे ही काग़ज़ उठाया और जीवन की पहली कहानी लिख दी---'ईदो बुआ.' अब याद नहीं कि कहानी में क्या लिखा था. लेख और कविताएँ लिखना तो कोई मुश्किल काम नहीं था. ईद पर तो सारा मैटर ख़ुद ही अलग-अलग नामों से लिख कर प्रेस को दिया.

शाम तक दीपावली पर भी काफ़ी मैटर आ गया. अब समस्या कम्पोज़िंग की थी. प्रेसवाले से कहा कि चौबीसो घंटे कम्पोज़िंग होगी, चार कम्पोज़िटरों में से दो-दो बस छह-छह घंटे की नींद लेंगे, सब यहीं प्रेस में रहेंगे, घर नहीं जायेंगे. सब लोग इसके लिए तैयार हो गये. आख़िर नाक का सवाल जो बन गया था.

और फिर वही हुआ, जो तय किया था. अख़बार अपने नियत कार्यक्रम के अनुसार बिना किसी देरी के छप गया. असम्भव लगने वाला काम तीन दिन में बस हो गया. और उसके बाद वही हुआ, जो होना चाहिए था. शास्त्री जी ने अख़बार की पूरी सम्पादकीय कमान मुझे सौंप दी. उस समय मेरी उम्र 18 साल 5 महीने के क़रीब रही होगी. अख़बार की सारी सामग्री जुटाना, तय करना कि किस अंक में क्या लिया जाये और अकसर सम्पादकीय लिखना, सब मेरे ज़िम्मे था. ढाई साल ऐसे ही बीते. हाँ, ज़्यादातर मैं 'अवैतनिक' ही रहा. कभी-कभार बड़ी ज़रूरत पड़ने पर शास्त्री जी कुछ सत्तर-पचहत्तर रुपये दे दिया करते थे. 1975 में आपातकाल लगने के कुछ दिन बाद अख़बार बन्द हो गया.

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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