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Nov 16
काला जादू और भेड़ बनीं सरकारें!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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करोड़ों का चन्दा उगाहने वाली ये तमाम पार्टियाँ आरटीआइ का विरोध करती हैं, ताकि किसी को पता न चले कि इन्हें पैसा कहाँ से मिलता है? एक क़ानून और बना दिया है. बीस हज़ार से कम के चन्दे का कोई ब्यौरा रखने की ज़रूरत नहीं! काले को सफ़ेद करने का भला इससे आसान रास्ता क्या हो सकता है? तो जब ये तमाम पार्टियाँ ही बेशर्मी से काले धन की उगाही में जुटी हैं तो ये काले धन को भला क्यों ख़त्म करना चाहेंगी?


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Black Money | क़मर वहीद नक़वी | Only Noise, No Sincere Action |
पैसा रे पैसा, तेरा रंग कैसा? आये चाहे जहाँ से, लगे न बिलकुल खोटा! एक पुराना गाना था, सत्तर के दशक की फ़िल्म 'शोर' का, पानी रे पानी तेरा रंग कैसा, जिसमें मिला दो, लगे उस जैसा. सचमुच पानी का कोई रंग नहीं होता. जिस रंग को पानी में डाल दीजिए, वह उसी रंग का हो जाता है. लेकिन पैसे के कम से कम दो रंग तो होते हैं, यह बात तो पूरी दुनिया जानती है. एक सफ़ेद और दूसरा काला. और आजकल तो बच्चों तक को पता है बन्धु कि Black Money यानी काला पैसा कितने तरह का होता है, जैसे टैक्स चोरी का पैसा, अंडरवर्ल्ड और आतंक का पैसा, ब्लैकमेलिंग का पैसा, विदेशी पैसा वग़ैरह-वग़ैरह.

Why Political Parties not serious to tackle Black Money Problem?

सब ढूँढ रहे हैं काला धन!

और आजकल काले धन को वापस लाने को लेकर ख़ूब हल्ला मचा है. एक योगी बाबा योग छोड़ कर काले धन की थाह पाने ऐसे आसन पर बैठे कि पुरुष से महिला वेशधारी हो गये और तीन दिन के अनशन में ही चूँ बोल गये! अपनी राजनीतिक पार्टी बनाते-बनाते अब वह मोदी जी के जयकारे लगा रहे हैं. रालेगण सिद्धि से चला एक और उत्साही सदा उपवासी जत्था था. देखते ही देखते वह कुछ इधर बँटा, कुछ उधर बँटा, कुछ कहीं टूटा, कुछ कहीं बिखरा, और आख़िर में 'आप' और 'बाप' बच गया. 'आप' वाले फ़िलहाल दिल्ली में चुनाव लड़ रहे हैं, 'बाप' लापता है! जिन्हें 'बाप' न समझ आया हो, वे गूगल सर्च कर लें!

Only Noise and No Action on Black Money!

काले जादू से भेड़ बन जाती हैं सरकारें!

इन सबको विदेशों से काला धन वापस लाना था. कहते हैं वहाँ के बैंकों में हज़ारों या कौन जाने लाखों भारतीयों का हज़ारों हज़ार करोड़ का काला धन जमा है. उसे वापस लाना है, कैसे आयेगा, किसी को पता नहीं. तेरी-मेरी-इसकी-उसकी हर छाप की सरकारें आती रहीं, जाती रहीं, लेकिन काले धन के काले जादू से सब सरकारें भेड़ बन जाती हैं! वैसे भी अपने लोकतंत्र की महान परम्परा है, जब आप सरकार बहादुर हो तो बयानबहादुर बनो! बयान दो, देते रहो, देते रहो और जब विपक्ष में हो तो नारों के फुफकारे मारो, मारते रहो!

How many White Papers on Black Money needed?

काले धन पर कितने श्वेत पत्र?

जैसा कि आजकल अपने नमो जी कर रहे हैं. इधर वह इतने फुफकारे मार रहे हैं कि उन्हें स्मृति लोप होने लगा है. वह अपने ही नेताओं के नाम भूलने लग गये! ऐसे ही एक दिन उन्होंने बड़े ज़ोर की हुँकार लगायी कि सरकार काले धन पर श्वेत पत्र क्यों नहीं लाती? कुछ ही घंटों बाद मीडिया ने उन्हें बता दिया कि अभी साल भर पहले ही सरकार काले धन पर श्वेत पत्र ला चुकी है. अब क्या वह हर महीने श्वेत पत्र लाये? वैसे कहते हैं कि झूठ सफ़ेद होता है. श्वेत पत्र सुन कर पता नहीं क्यों यह सफ़ेद झूठ वाला मुहावरा याद आ गया!बहरहाल, इस कथा का मर्म यह है कि जो जब तक सरकार में नहीं रहता, वह काले धन को वापस लाने के लिए ख़ूब मचलता है, क्योंकि उसे मालूम है कि वह सिर्फ़ हल्ला मचाने का नाटक ही करता है. और सरकार तो कुछ करेगी ही नहीं. अब आप इतने भोले तो नहीं ही होंगे कि आपको बताना पड़े कि क्यों सरकार कुछ करना नहीं चाहती!

'आप' को विदेशी चन्दे का मामला

वैसे इधर काले धन का मामला ज़रा ठंडा पड़ा था. 'आप' यानी आम आदमी पार्टी (AAP) को मिलने वाले विदेशी चन्दे का मामला न उठा होता, तो शायद हम यह चर्चा न कर रहे होते. आरोप लगा कि 'आप' को विदेश से बेनामी चन्दे मिल रहे हैं. 'आप' ने कहा कि उसकी वेबसाइट पर हर चन्दे का पूरा ब्यौरा मौजूद है. लेकिन सरकार ने कहा कि वह 'आप' को मिल रहे पैसे की जाँच करायेगी. क्या मज़ाक़ है? 'आप' का मामला तो कुछ लाख रुपयों का ही है, काँग्रेस, बीजेपी और तमाम दूसरी पार्टियों के तो हज़ारों करोड़ के चन्दे का कहीं कोई हिसाब नहीं है, कहाँ से आया, किसने दिया, देशी पैसा है कि विदेशी, किस काम से कमाया काला धन है, कोई ब्यौरा नहीं.

Why Political Parties Oppose RTI?

आरटीआइ का विरोध क्यों?

  और करोड़ों का चन्दा उगाहने वाली ये तमाम पार्टियाँ आरटीआइ (RTI) का विरोध करती हैं, ताकि किसी को पता न चले कि इन्हें पैसा कहाँ से मिलता है? एक क़ानून और बना दिया है. बीस हज़ार से कम के चन्दे का कोई ब्यौरा रखने की ज़रूरत नहीं! काले को सफ़ेद करने का भला इससे आसान रास्ता क्या हो सकता है? तो जब ये तमाम पार्टियाँ ही बेशर्मी से काले धन की उगाही में जुटी हैं तो ये काले धन को भला क्यों ख़त्म करना चाहेंगी? आप अब भी न समझें और बेवक़ूफ़ बनते रहें तो बेचारी इन पार्टियों का क्या दोष?
(लोकमत समाचार, 16 नवम्बर 2013)
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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