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Dec 03
‘सुविधा’ के अलग-अलग पैमाने!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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इसके पहले चीनी सामानों के बहिष्कार का बड़ा 'राष्ट्रवादी' हल्ला था. लेकिन नोटबंदी के बाद 'राष्ट्रवादी सलाह' आने लगी कि 'पेटीएम' करो! पेटीएम में कितना चीनी पैसा लगा है, 'राष्ट्रहित' में यह बात याद रखना असुविधाजनक था, इसलिए 'हल्ला ब्रिगेड' इस बात पर गूँगी हो गयी! उसके पहले तीन तलाक़ और मुसलिम पर्सनल लॉ को लेकर बवाल मचा था. एक देश, एक क़ानून की दुहाई हो रही थी. लेकिन हैरानी है न कि मुसलमानों के लिए अलग से इसलामी बैंकिंग शुरू करने के सुझाव पर कोई आपत्ति सुनायी ही नहीं पड़ी! तो देखिए कि एक ही मुद्दे पर एक-दो महीनों के भीतर राय किस तरह उत्तर से दक्षिण हो गयी!


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लगता है कि देश एक टीवी चैनल के स्टूडियो में बदल गया है! जैसे टीवी चैनलों पर बहसें होती हैं, वैसे ही देश में बहसें हो रही हैं. बहसों पर बहस, और बहस, फिर और बहस! बहसें हैं, हो रही हैं, लेकिन कहीं पहुँचती नहीं. बहस शुरू तो होती है, लेकिन ख़त्म नहीं होती, बीच रास्ते लावारिस छूट जाती है, क्योंकि कोई नयी बहस, कोई नयी उत्तेजना कहीं और से प्रकट हो जाती है.

नयी 'ब्रेकिंग न्यूज़' के साथ नयी बहस!

टीवी चैनल बहस करते हैं. उनका धन्धा है. इसलिए बहस कहीं पहुँचे, न पहुँचे, उन्हें क्या? एक नयी 'ब्रेकिंग न्यूज़' आयी और चलती हुई बहस को खिलौने की तरह तोड़ कर फेंक गयी! यही टीवी बहसों की नियति है. हर नयी 'ब्रेकिंग न्यूज़' के साथ नयी बहस! जो बहस उसके पहले चल रही थी, वह कहाँ गयी, उसका क्या हुआ, किसी को याद नहीं! न किसी को यह याद रहता है कि पहले क्या मुद्दा था, अब क्या मुद्दा है, जो मुद्दा दिख रहा है या दिखाया जा रहा है, वही मुद्दा है या असली मुद्दा कुछ और है. मुद्दों की शक्ल कब बदल जाती है, और मुद्दे कब टिघल कर बह जाते हैं, न पता ही लगता है, न कोई जानना ही चाहता कि उनका क्या हुआ?

काला धन, 'कैशलेस इकॉनॉमी' और 'लेस-कैश इकॉनॉमी'

नोटबंदी को ही लीजिए. बात काला धन से शुरू हुई. लेकिन सरकार को जल्दी ही समझ में आ गया कि इससे काला धन कुछ ख़ास नहीं निकल पायेगा. तो बात 'कैशलेस इकॉनॉमी' यानी 'बिना नक़दी की अर्थव्यवस्था' की शुरू हो गयी कि नहीं, नहीं इसका असली मक़सद तो यह है कि करेन्सी में लेनदेन हो ही नहीं, जिससे काला धन बने ही नहीं. लेकिन जिस देश में नब्बे प्रतिशत लेनदेन नक़द ही होता हो, वहाँ कुछ ही महीनों में अर्थव्यवस्था को 'कैशलेस इकॉनॉमी' में कैसे बदला जा सकता है?

फिर जहाँ छब्बीस फ़ीसदी लोग आज भी निरक्षर हों, जहाँ बड़ी आबादी ने बैंकों का मुँह नहीं देखा हो, तो वहाँ महीनों क्या बरसों में भी 'कैशलेस इकॉनॉमी' लायी जा सकती है क्या? सवाल उठे, बात समझ में आयी तो अब कहा जा रहा है कि नहीं, नोटबंदी का मक़सद 'लेस-कैश इकॉनॉमी' यानी कम नक़दी की अर्थव्यवस्था लाना था! यानी काला धन से वाया 'कैशलेस इकॉनॉमी' होते हुए अब हम 'लेस-कैश इकॉनॉमी' पर आ गये हैं! बातों की यात्रा है यह.

फिर अर्थव्यवस्था को इतना बड़ा झटका क्यों?

सवाल यही है कि 'लेस-कैश इकॉनॉमी' के लिए अर्थव्यवस्था को इतना बड़ा झटका देने का कोई तुक था क्या? लेकिन बहस में यह सवाल है ही नहीं. सरकार ने कहा था कि नोटबंदी से काला धन बाहर भी आयेगा और ख़त्म भी होगा, नक़ली नोटों पर रोक लगेगी और आतंकवाद को पैसा मिलना बन्द हो जायेगा. यह तीनों ही स्थापनाएँ पूरी तरह ग़लत साबित हो चुकी हैं.

सरकार ने सोचा था कि कम से कम तीन लाख करोड़ का काला धन तो लौटेगा ही. लेकिन ख़ुद सरकारी आँकड़ों के हिसाब से अब यह तय है कि बैंकों में वापस न लौटनेवाली रक़म बहुत बड़ी नहीं होगी. फिर नये नोट भी बाज़ार में आते ही काले धन में बदले जा चुके हैं. क्योंकि नये नोटों में ही लाखों-करोड़ों का काला धन रोज़ पकड़ा जा रहा, दो हज़ार के करोड़ों रुपये के नक़ली नोट भी रोज़ ही पकड़े जा रहे हैं और आतंकवादियों तक नयी करेन्सी पहुँच ही चुकी है.

जनता 'ख़ुश' है, इसलिए सही है!

लेकिन सवाल मत पूछिए. नोटबंदी 'राष्ट्रहित' में है. नोटबंदी से भविष्य में सब अच्छा होगा! कैसे और क्यों होगा, इस पर चर्चा में किसकी दिलचस्पी है? इन्दिरा गाँधी ने राजाओं को 'प्रिवी पर्स' में मिलनेवाली मामूली रक़म बन्द कर दी थी. जनता ख़ुश हो गयी कि राजा लोग अब 'राजा' नहीं रहे! नोटबंदी से भी जनता ख़ुश बतायी जाती है कि इससे अमीरों को बड़ा झटका लगेगा! तो मुद्दा यह नहीं है कि नोटबंदी से वाक़ई कोई फ़ायदा है या नहीं, मुद्दा यह है कि नोटबंदी से जनता 'ख़ुश' है, इसलिए यह सही है.

गूँगी हो गयी 'हल्ला ब्रिगेड'

इसके पहले चीनी सामानों के बहिष्कार का बड़ा 'राष्ट्रवादी' हल्ला था. लेकिन नोटबंदी के बाद 'राष्ट्रवादी सलाह' आने लगी कि 'पेटीएम' करो! पेटीएम में कितना चीनी पैसा लगा है, 'राष्ट्रहित' में यह बात याद रखना असुविधाजनक था, इसलिए 'हल्ला ब्रिगेड' इस बात पर गूँगी हो गयी! उसके पहले तीन तलाक़ और मुसलिम पर्सनल लॉ को लेकर बवाल मचा था. एक देश, एक क़ानून की दुहाई हो रही थी. लेकिन हैरानी है न कि मुसलमानों के लिए अलग से इसलामी बैंकिंग शुरू करने के सुझाव पर कोई आपत्ति सुनायी ही नहीं पड़ी! तो देखिए कि एक ही मुद्दे पर एक-दो महीनों के भीतर राय किस तरह उत्तर से दक्षिण हो गयी! तो ये सुविधा के पैमाने हैं, जो 'राष्ट्रवाद' की सुविधा से बदलते रहते हैं. मैं तो किसी भी पर्सनल लॉ का विरोधी हूँ, इसलिए इसलामी बैंकिंग का भी विरोधी हूँ.

इसके पहले पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक, गोरक्षा, दलित उत्पीड़न, जेएनयू और भारत माता की जय आदि-आदि तरह-तरह के मुद्दे आये और गये. जितने दिन मुद्दे टीवी चैनलों पर चले, उतने दिन उन पर देश में गुत्थमगुत्था होती रही. उसके बाद? किसी मुद्दे पर लोग किसी निष्कर्ष पर पहुँचे क्या? क्या यह मुद्दे इतने ज़रूरी, इतने गम्भीर नहीं थे कि इन पर गम्भीरता से चर्चा हो. एक-दूसरे को कूटने-थूरने और लाठियाँ भाँजने के बजाय क्या यह ज़रूरी नहीं था कि लोग मुद्दों के मर्म तक, तह तक जाने की कोशिश करें. लेकिन गम्भीर कामों में किसकी दिलचस्पी?

दूसरी 'अगस्त क्रान्ति'

पाँच साल पहले देश में दूसरी 'अगस्त क्रान्ति' हुई थी. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अन्ना हज़ारे के साथ करोड़ों की भीड़ थी. लेकिन आज कोई पूछनेवाला नहीं कि भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए नोटबंदी को लानेवाले नरेन्द्र मोदी आख़िर ढाई साल में लोकपाल की नियुक्ति क्यों नहीं कर सके? वह तो बड़ी तेज़ी से काम करनेवाले नेता हैं, फिर इस मामले में इतनी सुस्ती क्यों? सुप्रीम कोर्ट तक को कहना पड़ गया कि क्या मोदी सरकार अगले ढाई साल भी इसे ऐसे ही लटकाये रहेगी?

राष्ट्रगान का मुद्दा

अब सिनेमाघरों में राष्ट्रगान का मुद्दा गरमाया है. ज़माने पहले कभी सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजा करता था. तब हम यह देख-देख कर कुढ़ते थे कि लोग राष्ट्रगान की परवाह किये बिना सिनेमाघर से बाहर निकलने की जल्दी में रहते हैं. अब सिनेमाघरों में फिर राष्ट्रगान बजेगा. हाँ, इस बार अन्तर यह होगा कि यह फ़िल्म के अन्त में नहीं, बल्कि पहले बजेगा. और अन्तर यह भी होगा कि अबकी बार लोग सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के 'सम्मान' में खड़े मिलेंगे!

आप कह सकते हैं कि तब के मुक़ाबले आज लोगों 'राष्ट्रवाद' ज़्यादा है और अगर नहीं भी है तो 'राष्ट्रवादियों' के डर के मारे वह राष्ट्रगान का सम्मान करेंगे. तो यह थोपा गया 'राष्ट्रवाद' ज़्यादा डरावना नहीं है क्या? और अगर थोपना ही है, तो सिर्फ़ सिनेमा पर ही क्यों? स्कूल-कॉलेज से लेकर सभा-संगोष्ठियों तक, और अश्लील नृत्यों से शुरू होनेवाली राजनीतिक रैलियों, निजी और सरकारी दफ़्तरों, कारख़ानों और अदालतों में हर दिन राष्ट्रगान क्यों न गाया जाये? तब थोपे गये राष्ट्रवाद का अर्थ पता चलेगा! हालाँकि माननीय सुप्रीम कोर्ट को अदालत में राष्ट्रगान की बात पसन्द नहीं आयी. पता नहीं क्यों? फिर वही अलग-अलग पैमाने!
© 2016 http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi

mailto: qwnaqvi@raagdesh.com

'राग देश' के इस लेख को कोई भी कहीं छाप सकता है. कृपया लेख के अन्त में raagdesh.com का लिंक लगा दें.


यह भी पढ़ें:

चुपचाप 'राष्ट्रवाद' की धूप सेंकिए!

Published on 22 Oct. 2016
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  • Abhijit Ray

    Without undermining agony of common people in line, without minimising many discomfort of many average Indians, i think demonetisation is good for the country. In India, on 2 percent people pay tax. How do you bring them on board? Black money is a parallel economy. Many property dealers can take out one crore rupee at the drop of a hat. If there are at least 50000 such people, that amount of unaccounted money becomes 50000 crore. Money that is coming to jan dhan account, the zero balance account, what can we call, other than black money. 13000 crore and 2 lakh crore declared by two individuals, what can we call other than unaccounted money? We jump to say PayTm is Chinese company. Actually, Alibaba has invested in PayTm as Soft Bank of Japan has invested in Alibaba. By that extension, PayTm is a Japanese company too. I do not thing the matter is that simple. India if needs transition to a modern economy, someday bitter pill has to be given. We have lost seventy years. So someone had to do it now.

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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