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Nov 15
महज़ खिलौने नहीं हैं नेहरू और गाँधी
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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नेहरू-गाँधी महज़ खिलौने नहीं हैं. वे विचार हैं. काँग्रेस या तो उन्हें विचार की तरह जिये या अपने लिए कोई नया विचार चुने. तभी उसका कोई भविष्य है.

नेहरू और गाँधी के नाम पर आज आँसू बहा रही काँग्रेस को अपने गिरेबान में झाँक कर देखना चाहिए और अपने आपसे सवाल पूछना चाहिए कि नेहरू-गाँधी को महज़ प्रतीकात्मक खिलौनों में बदल देने के लिए आख़िर ज़िम्मेदार कौन है? क्या वाक़ई काँग्रेस ने ख़ुद इनकी विरासत पर कभी यक़ीन किया? काँग्रेस ने कब उन्हें देश के वैचारिक-राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाने की कोई भी कोशिश की?

हाल के बरसों में 'साम्प्रदायिक शक्तियों को रोकना है' जैसे बाज़ारू मुहावरों को छोड़ कर किसी वैचारिक लक्ष्य पर काँग्रेस की निगाह कभी रही नहीं. विचारहीनता के इसी दौर और बदली सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक प्राथमिकताओं में गाँधी और नेहरू लगातार अप्रासंगिक होकर काँग्रेस से छूटते गये. दूसरी तरफ़, संघ अपनी वैचारिक रणनीति पर तमाम असफलताओं के बावजूद लगातार बिना फ़ोकस छोड़े, बिना डिगे, बिना हटे चलता रहा और आज मोदी सरकार के रूप में उसने अपना पहला बड़ा राजनीतिक लक्ष्य पा भी लिया.

--- क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi राजनीति में बड़ा झमेला है भई! अब नया बखेड़ा खड़ा हुआ है! तेरे चाचा कि मेरे चाचा कि सबके चाचा? 'चाचा नेहरू' किसके हैं? तलवारें खिंची हैं. कौन मनाये उनके जन्म के सवा सौ साल का जश्न! और कैसे मनाये? किसे बुलाये, किसे न बुलाये? सवा सौ साल का जश्न मनाने के लिए बनी सरकारी कमेटी में नेहरू-गाँधी परिवार से कोई शामिल नहीं है. और काँग्रेस के जश्न में प्रधानमंत्री मोदी को न्योता नहीं दिया गया. क्या नेहरू को इसी तरह याद किया जाना चाहिए था? और फिर नेहरू इतनी शिद्दत के साथ याद ही क्यों किये जा रहे हैं?दरअसल, नेहरू की याद प्रतीकों की राजनीति में आज अचानक raagdesh nehru gandhiबड़ी ज़रूरी हो गयी है. मोदी सरकार और बीजेपी के लिए भी और काँग्रेस के लिए भी! इसीलिए नेहरू और गाँधी को लेकर नयी जंग खड़ी हो गयी है. वरना आज से पहले रस्मी समारोहों के अलावा न कहीं नेहरू की प्रासंगिकता थी और न गाँधी की.

आज क्यों गाँधी और नेहरू?

फिर आज नेहरू भी क्यों ज़रूरी हो गये और गाँधी भी क्यों? और क्यों इनकी विरासत पर दावेदारी ठोकी जा रही है? पता नहीं आपको याद हो कि न याद हो. पिछले साल की बात है. नेता जी सुभाषचन्द्र बोस का जन्मदिन था. संसद परिसर में नेता जी की तस्वीर पर फूल चढ़ाने सिर्फ़ एक सांसद पहुँचे, लालकृष्ण आडवाणी. उनके अलावा बस तीन पूर्व सांसद और पहुँचे थे. लोकसभा और राज्यसभा के मौजूदा क़रीब पौने आठ सौ सांसदों में से केवल एक आडवाणी जी को ही नेता जी का जन्मदिन मनाना याद रहा! बाक़ी किसी को उनकी याद क्यों नहीं आयी? इसलिए कि नेता जी आज किसी को वोट नहीं दिला सकते! नेता जी फ़िलहाल किसी के राजनीतिक खाँचे में फ़िट नहीं होते, इसलिए किसी को याद नहीं. जिस दिन राजनीति में किसी भी कारण से उनकी अगर उपयोगिता बनी, उस दिन उनके लिए भी लोग बिछने लगेंगे!

बीजेपी का 'शो-केस' और नेहरू-गाँधी!

आज गाँधी और नेहरू की एक नयी राजनीतिक उपयोगिता है. यह सही है कि संघ परिवार को न कभी गाँधी सुहाये और न नेहरू. गाँधी और नेहरू के बारे में आज भी जितना झूठा कुप्रचार तमाम जगह लगातार किया जा रहा है, फ़ोटोशाप से फ़र्ज़ी तसवीरें बना कर पूरे सोशल मीडिया पर उनके बारे में ज़हर फैलाने की जो संगठित मुहिम चलायी जा रही है, जैसी अनर्गल, गन्दी और घिनौनी बातें लिखी जा रही हैं, उसके पीछे कौन है? क्या कांग्रेसी ऐसा कर रहे हैं? क्या कम्युनिस्ट ऐसी मुहिम चला रहे हैं? क्या उसके पीछे समाजवादी है? बसपाई हैं? नहीं. इनमें से तो कोई नहीं है. तो फिर कौन है? आप ख़ुद समझ लीजिए! लेकिन इन अश्लील साज़िशों के बावजूद आज नरेन्द्र मोदी के लिए नेहरू-गाँधी से लेकर ऐसे तमाम प्रतीक ज़रूरी हो गये हैं, जिनकी विचारधारा और विरासत में उनकी कभी कोई आस्था नहीं रही. कारण यह है कि आज यह कौन पूछता है कि आपकी किसमें कितनी आस्था है? यह कौन जानना चाहता है कि गाँधी को सफ़ाई के लिए तो आप इस्तेमाल करते हैं, लेकिन क्या 'ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सम्मति दे भगवान' के प्रति भी मन में वैसी ही श्रद्धा है? सेकुलरिज़्म और सहजीविता के नेहरू के दृढ़ संकल्पों पर चलना भी पसन्द करेंगे? दरअसल, ये सवाल बेकार हैं. नरेन्द्र मोदी तो इन प्रतीकों को सिर्फ़ बीजेपी के शो केस में सजाना भर चाहते हैं. गाँधी-नेहरू को स्वच्छता अभियान से जोड़ दीजिए और उनके बाक़ी विचारों और जीवन दर्शन को 'साफ़' कर दीजिए. इससे कई फ़ायदे होंगे. एक तो यह कि समय बीतने के साथ उनकी पहचान सिकुड़ कर सिर्फ़ 'स्वच्छता' तक सिमट जायेगी. 'स्वच्छता' की उनकी मूर्ति इतनी विराट खड़ी कर दीजिए कि उसकी महिमा की चकाचौंध में सब छिप जाये, गुम हो जाये, दिखे ही नहीं. फिर धीरे से इतिहास में उनकी जगह बदल दीजिए. इतिहास पुनर्लेखन वैसे ही संघ के लोगों का सबसे बड़ा शौक़ है!

मोदी और संघ की अद्भुत रणनीति

दूसरा फ़ायदा यह कि इन प्रतीकों को हड़प कर बीजेपी अपनी एक नयी छवि बना सकती है, जो ऊपर से बड़ी समावेशी दिखे, भीतर चाहे जो भी हो. और तीसरा लाभ यह कि राजनीतिक रूप से कमज़ोर पड़ती जा रही काँग्रेस से उसकी पुश्तैनी विरासतें भी छीन कर उसे ख़ाली हाथ कर दिया जाये तो वह बिलकुल बे-चेहरा हो जायेगी. देश पर अगले कई वर्षों तक एकछत्र राज्य करने की संघ की योजना के लिए काँग्रेस ही भविष्य में कभी ख़तरा बन सकती है, इसलिए उसे पूरी तरह निहत्था, निशक्त और कंगाल करके यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है. तारीफ़ करनी पड़ेगी कि मोदी और संघ की यह रणनीति अद्भुत है. और तारीफ़ इस बात की भी करनी पड़ेगी कि संघ का 'थिंक टैंक' कितनी दूर तक और किस गहराई तक जा कर सोचता है!

काँग्रेस अपने गिरेबान में झाँक कर देखे

लेकिन नेहरू और गाँधी के नाम पर आज आँसू बहा रही काँग्रेस को अपने गिरेबान में झाँक कर देखना चाहिए और अपने आपसे सवाल पूछना चाहिए कि नेहरू-गाँधी को महज़ प्रतीकात्मक खिलौनों में बदल देने के लिए आख़िर ज़िम्मेदार कौन है? क्या वाक़ई काँग्रेस ने ख़ुद इनकी विरासत पर कभी यक़ीन किया? कम से कम पिछले तीस-चालीस सालों में कब काँग्रेस ने ऐसी कोई गम्भीर कोशिश की कि वह ख़ुद नेहरू-गाँधी की विरासत पर चले और देश को भी बताये और चलाये? सच तो यह है कि इन बरसों में काँग्रेस ने भी इन्हें महज़ राजनीतिक प्रतीकों के तौर पर इस्तेमाल किया, रस्मी जयन्तियाँ और पुण्य तिथियाँ मनाती रही, नाम कहीं न कहीं चलता रहे, इसके लिए सरकारी योजनाओं के नाम उनके नाम पर रखे जाते रहे, बस! काँग्रेस ने कब उन्हें देश के वैचारिक-राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाने की कोई भी कोशिश की? दरअसल, यह स्थिति इसलिए आयी कि नेहरू के निधन के बाद काँग्रेस के पास ऐसा कोई द्रष्टा नहीं हुआ, जो उसकी और देश की कोई बड़ी तसवीर, दस-बीस-पच्चीस-तीस-पचास बरस का कोई राजनीतिक ख़ाका, कोई राजनीतिक-रणनीतिक दर्शन ले कर पार्टी को बढ़ा और चला सके. लाल बहादुर शास्त्री तो बहुत कम दिन काँग्रेस को नेतृत्व दे पाये, लेकिन उनके बाद लम्बे समय तक काँग्रेस की कमान सम्भालने वाली इन्दिरा गाँधी 'विज़न' और दृष्टि के मामले में नेहरू से आगे नहीं तो बहुत पीछे भी नहीं थीं, लेकिन वह एक तो ख़ुद लगातार विकट राजनीतिक संघर्षों में उलझी रहीं और दूसरे यह कि निरंकुश सत्ता की उनकी नीति के चलते पार्टी में उनके बाद कोई दूसरा ऐसा नेता नहीं बचा, जो सोच के स्तर पर अपना कोई नज़रिया रखता हो. इसलिए इन्दिरा के बाद बची काँग्रेस राजनीतिक रूप से भले अब तक सफल होती रही हो, लेकिन वैचारिक-दार्शनिक पटल पर पार्टी लगातार सिकुड़ती चली गयी. उसका पूरा कौशल और ध्यान तात्कालिक राजनीतिक जोड़-तोड़ और सफलताओं पर ही लगा रहा. उसमें वह कुछेक विफलताओं के बावजूद सफल होती गयी, लेकिन 'साम्प्रदायिक शक्तियों को रोकना है' जैसे बाज़ारू मुहावरों को छोड़ कर किसी वैचारिक लक्ष्य पर उसकी निगाह कभी रही नहीं. विचारहीनता के इसी दौर और बदली सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक प्राथमिकताओं में गाँधी और नेहरू लगातार अप्रासंगिक होकर काँग्रेस से छूटते गये. दूसरी तरफ़, संघ अपनी वैचारिक रणनीति पर तमाम असफलताओं के बावजूद लगातार बिना फ़ोकस छोड़े, बिना डिगे, बिना हटे चलता रहा और आज मोदी सरकार के रूप में उसने अपना पहला बड़ा राजनीतिक लक्ष्य पा भी लिया.

विचार की ज़मीन नहीं, तो पार्टी नहीं

इसलिए, यह बात साफ़ है कि किसी ठोस राजनीतिक दृष्टि और योजना के बिना, किसी स्पष्ट और बड़ी राजनीतिक-वैचारिक तस्वीर के बिना, किसी सुविचारित रोडमैप के बिना अब देश की राजनीति में किसी भी पार्टी के लिए बीजेपी को टक्कर दे पाना मुश्किल होगा. इसीलिए, कुछ दिनों पहले मैंने लिखा था कि मुझे क्षेत्रीय दलों का भविष्य ज़्यादा नहीं दिख रहा है, क्योंकि उनका वैचारिक धरातल तात्कालिक समीकरणों पर ही टिका है, जिनकी आयु कभी लम्बी नहीं हो सकती! उधर, एक 'आउटडेटेड' वैचारिक धरातल की बेड़ियों में जकड़ी कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी अपनी 'कूपमंडूक' प्रवृत्ति और जड़ता के कारण पहले ही विलुप्तप्राय: हो चुकी हैं. अब काँग्रेस भी अगर तात्कालिक चुनौतियों के साथ-साथ भविष्य की वैचारिक लम्बी लड़ाई के लिए अपने को तैयार नहीं करेगी, तो ग़ायब हो जायेगी, इसमें मुझे ज़्यादा सन्देह नहीं! नेहरू-गाँधी महज़ खिलौने नहीं हैं. वे विचार हैं. काँग्रेस या तो उन्हें विचार की तरह जिये या अपने लिए कोई नया विचार चुने. तभी उसका कोई भविष्य है.
(लोकमत समाचार, 15 नवम्बर 2014) http://raagdesh.com
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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