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Jun 06
जागिए, मैगी ने झिंझोड़ कर जगाया है!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 4 

ब्राँडेड उत्पादों पर नियमों की कुल्हाड़ी चले, अच्छा भी है और ज़रूरी भी, लेकिन वह तो पूरे ख़तरे का एक बहुत छोटा-सा हिस्सा भर हैं. बड़ा ख़तरा तो उस हवा, पानी, अनाज, फल-सब्ज़ी से है, जो हम हर पल इस्तेमाल करते हैं. लेकिन उनकी गुणवत्ता के बारे में कुछ करते नहीं. बाज़ार में तेल, मसाले, चाय की पत्ती, दूध, खोया, मिठाई, दवाई किसी चीज़ की बात कीजिए, कहाँ मिलावट नहीं है. धड़ल्ले से है. न कोई पकड़, न धकड़! फलों में रंग और मिठास के इंजेक्शन, सब्ज़ियों पर रंग-रोग़न, सब खुलेआम बेधड़क. और चलिए, दिल्ली में अभी कुछ चाटवालों के सैम्पल की जाँच एक अख़बार ने करायी, पता चला कि ज़्यादातर में टट्टी में पाये जानेवाले बैक्टीरिया पाये गये!


maggi-ban
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मैगी रे मैगी, तेरी गत ऐसी! क्या कहें? सौ साल से नेस्ले कम्पनी देश में कारोबार कर रही थी! दुनिया की जानी-मानी कम्पनी है. उसकी 'दो मिनट' की मैगी की देश भर में घर-घर पहुँच थी. सोचा भी नहीं था कि उसमें भी ऐसी गड़बड़ निकलेगी कि आख़िर मैगी की नौ क़िस्मों को बाज़ार से पूरी तरह उठा लेने का फ़रमान सुना दिया जाये! चलिए, मैगी पर तो कार्रवाई हुई और इस बहाने देश में कुछ तो जगार हुई! लेकिन न समस्या मैगी है और न समाधान यह कि मैगी को कुछ दिनों के लिए बाज़ार से बाहर कर ज़िम्मेदारी पूरी कर ली जाये! असली समस्या तो कहीं और है और समाधान भी कहीं और है! मैगी अब बाज़ार में नहीं है, तो दूसरे और ब्राँड तो बाज़ार में हैं! और उन ब्राँडों में सीसा और मोनोसोडियम ग्लूटामेट यानी एमएसजी या अजीनोमोतो नहीं है, इसकी क्या गारंटी? मैगी का हल्ला उठने के बाद तमिलनाडु ने जब नूडल्स के तीन और बड़े ब्राँडों की जाँच की तो उनमें भी सीसे की मात्रा ख़तरनाक स्तर पर पायी गयी! फ़िलहाल, तमिलनाडु ने इन तीनों ब्राँडों 'वाय वाय एक्सप्रेस,' 'रिलायन्स सेलेक्ट इंस्टेंट' और 'स्मिथ ऐंड जोन्स चिकन मसाला' की बिक्री पर रोक लगा दी है!

मैगी समेत चार ब्राँड में सीसा क्यों?

नेस्ले का कहना है कि वह मैगी में ऊपर से एमएसजी नहीं मिलाते. वह प्राकृतिक तौर पर मैगी की उत्पाद सामग्री में होता है. तो फिर पैकेट पर 'नो एमएसजी' क्यों लिखा जाता रहा? एमएसजी की ख़ासियत है कि एक बार यह मुँह को लग जाये तो फिर आदमी उसी स्वाद के लिए लपकता है. नेस्ले ने यह तथ्य छिपाया. क्यों? इसकी क्या गारंटी है कि मैगी में इसका जानबूझकर इस्तेमाल नहीं किया जा रहा था? कौन जाने, मुँहलगी मैगी के पीछे कहीं एमएसजी का ही तड़का तो नहीं था? और फिर इतना अधिक सीसा कहाँ से आ गया? और सीसा नेस्ले के अलावा तीन और बड़े ब्राँडों में क्यों निकला? लापरवाही से सीसा आ गया या इस बात की निश्चिन्तता से कि सब चलता है! कौन पकड़ेगा? कौन जांँचेगा? किसे सुरक्षा मानकों की फ़िक्र है? लापरवाही से होता तो किसी एक जगह होता, किसी एक ब्राँड में होता. चार-चार ब्राँडों में कैसे हो गया? इसलिए हो गया कि सब आश्वस्त हैं, बिलकुल निछद्दम बेफ़िक्री है, जो मन आये करो, जैसे मन आये करो! (बनारसी जानते हैं कि निछद्दम का मतलब क्या है). न कोई देखनेवाला, न रोकनेवाला, न टोकनेवाला! खानेवाले बेफ़िक्री से खाते रहेंगे, जिन्हें गुणवत्ता जाँचनी है, वह बेफ़िक्री से बैठे अलसाते रहेंगे, धन्धा चलता रहेगा. तो सुरक्षा मानकों के लिए झंझट कौन करे, उस पर फ़ालतू में पैसे क्यों ख़र्च किये जायें? अब यूपी में संयोग से कुछ सैम्पल पकड़ जायें, और फिर बात आगे बढ़ती चली जाये, ऐसी 'दुर्घटनाएँ' कभी हो गयीं, तो हो गयीं!

असली समस्या मैगी से कहीं आगे की!

नेस्ले जैसी कम्पनियाँ अब तक हमारे निगरानी तंत्र की इसी ढिलाई का फ़ायदा उठा कर बेफ़िक्री से कुछ भी करती रही हैं. बहरहाल, अच्छी बात यह है कि फ़ूड सेफ़्टी ऐंड स्टैंडर्ड्स अथारिटी ने अब नेस्ले से सबक़ सीख कर तमाम ऐसी कम्पनियों के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ने का फ़ैसला किया है, जो भ्रामक विज्ञापनों और लेबेलिंग कर अपने उत्पादों के बारे में तथ्य छुपा रही हैं और लोगों को मूर्ख बना रही हैं. लेकिन क्या इतना ही काफ़ी है? समस्या तो इससे कहीं आगे की है. और वह है जनस्वास्थ्य और पर्यावरण को लेकर हमारी अपनी घनघोर उदासीनता. ब्राँडेड उत्पादों पर नियमों की कुल्हाड़ी चले, अच्छा भी है और ज़रूरी भी, लेकिन वह तो पूरे ख़तरे का एक बहुत छोटा-सा हिस्सा भर हैं. बड़ा ख़तरा तो उस हवा, पानी, अनाज, फल-सब्ज़ी से है, जो हम हर पल इस्तेमाल करते हैं. लेकिन उनकी गुणवत्ता के बारे में कुछ करते नहीं. बाज़ार में तेल, मसाले, चाय की पत्ती, दूध, खोया, मिठाई, दवाई किसी चीज़ की बात कीजिए, कहाँ मिलावट नहीं है. धड़ल्ले से है. न कोई पकड़, न धकड़! फलों में रंग और मिठास के इंजेक्शन, सब्ज़ियों पर रंग-रोग़न, सब खुलेआम बेधड़क. और चलिए, दिल्ली में अभी कुछ चाटवालों के सैम्पल की जाँच एक अख़बार ने करायी, पता चला कि ज़्यादातर में टट्टी में पाये जानेवाले बैक्टीरिया पाये गये! बोतलबन्द पानी के नाम पर कैसा भी पानी बेचा जा रहा है. बड़े-बड़े रेस्तराओं के किचन में झाँक लें तो उलटी आ जाये. इनमें से किसी को न क़ानून का डर है, न पकड़े जाने की फ़िक्र. क्योंकि ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं है कि नमूनों की लगातार जाँच होती रहे, लगातार कार्रवाई होती रहे. जांंच कभी-कभार रस्म-अदायगी की तरह होती है. कारण, भ्रष्टाचार तो अपनी जगह है ही, ये निगरानी वाले विभाग भी बस नाम भर के लिए चलते हैं, न इनके पास अफ़सर होते हैं, न कर्मचारी, और न साधन. फिर क़ानून इतना लचर कि सज़ा भी बेहद मामूली होती है, इसलिए मिलावट का खेल बेख़ौफ़ बदस्तूर जारी रहता है. न सरकार को फ़िक्र, न जनता को.

हम सबकी घनघोर उदासीनता

स्वस्थ जीवन के लिए अच्छा खाना भी चाहिए और अच्छी हवा भी. दिल्ली आज दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बन चुका है. और केवल दिल्ली ही नहीं, देश के तमाम बड़े शहर बरसों से यह समस्या झेल रहे हैं. सरकारें आती रहीं, जाती रहीं, प्रदूषण लगातार बढ़ता गया. कैसे रुके? क्योंकि समस्या को टरकाते रहने के लिए बड़े बहाने हैं. पर सवाल यह है कि क्या वाक़ई हम कुछ करना भी चाहते हैं. ध्वनि प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद कहीं भी रात में लाउडस्पीकरों का बजना नहीं रोका जा सका! जो एक काम बहुत आसानी से हो सकता है, वह भी नहीं होता! क्यों? इसलिए कि हमारा तंत्र और हम इसे 'फ़ालतू' की बात मानते हैं. तो जब इतना छोटा-सा अनुशासन हम नहीं मान सकते, तो वायु-प्रदूषण जैसी गम्भीर समस्या के बारे में तो कभी कुछ हो ही नहीं सकता! शहरों के एक-तिहाई बच्चों के फेफड़े कमज़ोर हो चुके हों, तो हों! किसे फ़िक्र है? गंगा को ले लीजिए. मुझे अपने बचपन के दिनों की याद है, गंगा की सफ़ाई का अभियान वाराणसी में तब कभी शुरू हुआ था बड़ी धूमधाम से, शायद चालीस-पैंतालीस साल पहले. तब से अब तक अरबों-ख़रबों रुपये अब तक फूँके जा चुके हैं. तब से इन सवालों पर चर्चा हो रही है कि गंगा में जो सीवर लाइनें खुलती हैं, जो नाले आ कर मिलते हैं, कारखानों का जो रासायनिक कचरा गिरता है, उसे कैसे रोका जाये. सैकड़ों योजनाएँ बनीं, लेकिन गंगा लगातार और ज़्यादा प्रदूषित होती गयी! जिस गंगा से लोगों की इतनी आस्थाएँ जुड़ी हों, उसे इतने बरसों के अभियान के बावजूद स्वच्छ नहीं किया जा सका. क्यों? सारा दोष सरकारों का ही नहीं है. हमारा भी है. गंगा किनारे बसे लोगों ने, कारख़ानों ने थोड़े पैसे ख़र्च किये होते कि उनकी गन्दगी गंगा में न जाये, तो आज समस्या इतनी गम्भीर न होती. देश की दूसरी नदियों का भी यही हाल है. हमें एहसास ही नहीं है कि इन नदियों को मार कर हम अपना कितना नुक़सान कर रहे हैं. श्रीनगर की झेलम को लीजिए. इतनी सुन्दर नदी है, दोनों किनारों पर दूर तक ऐसी सुन्दर बसावट है कि टूरिस्ट बस देखते रह जायें. लेकिन इन बस्तियों ने अपने घरों का कचरा फेंक-फेंक कर झेलम को बड़े बदबूदार नाले में बदल दिया. यही नदी अगर दुनिया के किसी और देश में होती तो पर्यटन से सोना उगल रही होती! लेकिन फिर वही सवाल, किसे फ़िक्र है?

तमिलनाडु से सीखिए

खेती में कीटनाशकों का अन्धाधुन्ध इस्तेमाल हो रहा है. कहीं कोई निगरानी नहीं. कहीं कोई चेतना नहीं. अनाज, दालों और सब्ज़ियों को तो इसने ज़हरीला बना ही दिया, भूगर्भ जल में भी काफ़ी मात्रा में ये कीटनाशक पहुँच गये हैं. यह ज़हरीला पानी पीने से तमाम तरह की जानलेवा बीमारियाँ हो रही हैं. तमिलनाडु ने पिछले पन्द्रह बरसों में एक छोटा-सा प्रयोग किया. भूगर्भ जल के नीचे जाते स्तर को रोकने के लिए 'रेन वाटर हार्वेस्टिंग' शुरू की. जनता अनमनी थी. जेब से पैसे जो लगने थे. लेकिन सरकार ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया तो बात बन गयी. भूगर्भ जल का स्तर भी ऊपर आ गया और पानी में कीटनाशक की समस्या भी काफ़ी हद तक दूर हो गयी. तो ऐसा नहीं है कि हालात बदल नहीं सकते. बिलकुल बदल सकते हैं. सरकारें अगर इन बुनियादी मुद्दों को प्राथमिकता पर लें, ख़ुद भी इनमें जुटें और जनता को भी जोड़ें और उसकी ज़िम्मेदारी का एहसास करायें, तो देश की सूरत ज़रूर बदलेगी! मैगी ने हमें झिंझोड़ कर जगाया है. इस पर गम्भीरता से विचार होना चाहिए कि जनस्वास्थ्य से होनेवाले खिलवाड़ को रोकने के लिए क़ानून कैसे कड़े बनाये जायें, निगरानी का सक्षम तंत्र कैसे खड़ा किया जाये और जनता को यह बात कैसे समझायी जाये कि आज चार पैसे बचाने के बजाय कल अपने बच्चों की जान बचाना ज़्यादा ज़रूरी है. http://raagdesh.com

UPDATE ON THIS POST

June 8, 2015, 13:41 hrs

दूध, सब्ज़ी की भी जाँच होगी!

मैगी पर मचे हंगामे से सरकार जागी तो है! उपभोक्ता मामलों का विभाग अब दिल्ली में दूध व दूध के उत्पाद और सब्ज़ियों की जाँच के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए भारतीय खाद्य संरक्षा व मानक प्राधिकरण (FSSAI) से बात करने पर विचार कर रहा है. 'बिज़नेस स्टैंडर्ड' की ख़बर के मुताबिक़ अगर यह पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है तो इसे देश भर में चलाया जा सकता है. पिछले वर्षों में आयी कई रिसर्च रिपोर्टों में दूध में डिटर्जेंट व ख़तरनाक रसायनों की मिलावट पायी गयी और अनाज, दाल, फल व सब्ज़ियों में आर्सेनिक व कैडमियम भी ख़तरनाक स्तर पर पाये गये.

खाद्य प्राधिकरण भी शक के दायरे में!

'दैनिक जागरण' ने सनसनीख़ेज़ ख़ुलासा किया है कि भारतीय खाद्य संरक्षा व मानक प्राधिकरण (FSSAI) के तीन पूर्व निदेशकों ने प्राधिकरण पर उत्पादों को मंज़ूरी देने में धाँधली व भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगाये हैं. इन निदेशकों असीम चौधरी, प्रदीप चक्रवर्ती व एस. एस. घनक्रोक्ता ने केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा को भेजी शिकायत में गड़बड़ियों के कई मामले गिनाये हैं और कहा है कि वह सारे सबूत पेश करने को भी तैयार हैं.
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  • mahendra gupta

    यदि इच्छा शक्ति हो , सरकारी कर्मचारियों में ईमानदारी व कार्य निष्ठां हो तो क्या सम्भव नहीं है , लेकिन हमारे शासन तंत्र में इन्ही चीजों का अभाव है

  • Abhijit Ray

    Maggi is responsible for certain aspects. At the same time what our regulators were doing? Why did they not pick random samples and test them. Also the assay method, sachet vs. whole noodle must be harmonised. Raw materials should be analysed for lead content and source must the identified that offers cleanest material. That is practice of GMP. I think government should fine Maggi heavily for harm to public health. I do not think ban should be enforced after some time.

  • Ravish Mani

    Same thing happened with cold drinks a few years ago. But now they are in market without any penalty. It’s happen only in India.

  • abhi_bangal

    Even the food served to kids in schools is dangerous as there have been news regarding unfortunate incidents in the past. And even with cold drinks too, as Ravish mentioned. I guess, India is a very easy market for a lot of foreign companies and we have always been very bearing with all the foreign people – like Britishers who ruled us, and now such companies.

    When will India wake up, for God’s sake?

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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