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Dec 28
पाकिस्तान: एक अटका हुआ सवाल
त्वरित टिप्पणी  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अचानक लाहौर यात्रा वाक़ई उनकी एक बड़ी कूटनीतिक और तारीफ़ के क़ाबिल पहल है. लेकिन इतिहास बताता है कि भारत-पाक रिश्तों को भावनाओं की कोंपलों के बजाय पथरीली सच्चाइयों की ज़मीन पर देखना चाहिए. कुछ समय पहले 1965 के भारत-पाक युद्ध की पचासवीं वर्षगाँठ पर 'कादम्बिनी' के लिए लिखा गया मेरा यह लेख आज और प्रासंगिक लगता है!


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India-Pakistan Relations | पाकिस्तान एक अटका हुआ सवाल है. वह इतिहास की एक विचित्र गाँठ है. न खुलती है, न बाँधती है, न टूटती है, न जोड़ती है. रिश्तों का अजीब सफ़रनामा है यह! एक युद्ध, जो कहीं और कभी रुकता नहीं. एक युद्ध जो सरकारों के बीच है, और एक युद्ध जो जाने कितने रूपों में, कितने आकारों में, कितने प्रकारों में, कितने मैदानों में, कितने स्थानों में दोनों ओर के एक अरब चालीस करोड़ मनों में, दिलों में, दिमाग़ों में सतत, निरन्तर जारी रहता है! यह युद्ध भी विचित्र है. कभी युद्ध करने के लिए युद्ध, तो कभी युद्ध के ख़िलाफ़ युद्ध! हाकी, क्रिकेट में एक-दूसरे को हारता देखने की जंग, तो ज़रा-सा मौक़ा दिखते ही दिलों को जोड़ने की जंग भी!

Can India-Pakistan Relations ever improve?

पाकिस्तान की अबूझ पहेली

यही पाकिस्तान की अबूझ पहेली है. आपस में गुत्थमगुत्था गुत्थियों का तिलिस्म! राजनीति, कूटनीति, नेता, सेना, सरकार, हाकी, क्रिकेट, सिनेमा, टीवी, संगीत, ग़ज़ल और जाने क्या-क्या, यहाँ से वहाँ तक, ज़हरबुझे तीरों और मुहब्बत के तरानों, बारूदी नारों और अमन के गीतों, ख़ूँरेज़ दास्तानों और अपनापे के अफ़सानों, नफ़रतों के पहाड़ों और फिर गले मिल सकने की हसरतों की जाने ही कितनी विरोधी, विरोधाभासी धाराओं और भावनाओं के अनन्त अन्तर्द्वन्द्वों को एक साथ जीता यह रिश्ता क्या कहलाता है, कहा नहीं जा सकता!

पाकिस्तान के साथ ही ऐसा क्यों होता है?

कभी सोचा आपने? पाकिस्तान को सोचते ही इतने तरह के भावों का ज्वार एक साथ क्यों फूटता है? हमारे बहुत सारे पड़ोसी हैं. लेकिन मन में जैसा 'कुछ-कुछ' या 'कुछ न कुछ' पाकिस्तान को लेकर होता है, वैसा किसी और के साथ क्यों नहीं? चीन 1962 में हम पर धोखे से हमला कर चुका है, उसके घाव अब तक भरे नहीं हैं, उससे सीमा-विवाद अब भी जारी है, लेकिन आम हिन्दुस्तानी के मन के नक़्शे में चीन को लेकर बस इतना है कि उससे रिश्ते और न बिगड़ें, किसी और लड़ाई की नौबत न आये. चीन से दोस्ती बढ़ने की किसी सम्भावना पर उसका दिल बल्लियों नहीं उछलता! बांग्लादेश जब तक पूर्व पाकिस्तान था, तब तक वह पाकिस्तान ही था. हम उसे उसी नज़र से देखते थे. हमने बांग्लादेश बनवाने में बड़ी भूमिका निभायी, शुरू में रिश्तों में वह गरमाहट रही भी, लेकिन शेख़ मुजीब की हत्या के बाद रिश्ते कड़ुवे हो गये, अब हसीना वाजेद की वजह से माहौल फिर से दोस्ताना हुआ है. लेकिन बांग्लादेश देश को लेकर हमारे यहाँ किसी के मन में कोई सुरसुरी तो होती नहीं, कोई हुड़क भी नहीं उठती. उससे आप क्रिकेट में हार जायें तो शर्म आती है, लेकिन वैसा मलाल तो नहीं होता, जैसा पाकिस्तान से हारने पर होता है! क्यों? पाकिस्तान की तरह आज का बांग्लादेश भी तो कभी हमारा ही हिस्सा था, रवीन्द्र संगीत और नज़रुल के गीत आज भी दोनों बंगाल की झंकार हैं, फिर भी बांग्लादेश महज़ आपका एक पड़ोसी भर है, शायद दूसरे बाक़ी पड़ोसियों से चुटकी-भर ज़्यादा. बस और कुछ नहीं. श्रीलंका से आप कुछ क्रिकेट खेल लेते हैं, थोड़ा तमिल कनेक्शन है, कभी-कभार मछुआरों की पकड़-धकड़ को लेकर चर्चा में आ जाता है, बस. बाक़ी के पड़ोसियों को बस हम जानते हैं कि हमारे पड़ोसी हैं.

दुश्मनी भी, प्यार की पींगें भी!

लेकिन पाकिस्तान के साथ आप खेल में हार जाओ तो मातम ही मातम. दुश्मनी की बात हो तो उससे बड़ा दुश्मन कोई नहीं. और ऐसा मानना ग़लत भी नहीं. चार-चार लड़ाइयाँ लड़ चुका है. सीमा पर गोलीबारी रुकती नहीं. भारत के दुश्मन अपराधियों को वहाँ पनाह मिली हुई है. लाहौर, कराची, पेशावर और पाकिस्तान में जाने कहाँ-कहाँ बसे दहशत के कारख़ानों में दिन-रात चौबीसो घंटे साज़िशों के बंडल बनते रहते हैं और आतंक फैलाने भारत 'डिस्पैच' कर दिये जाते हैं. और मानों इतना काफ़ी न हो, इसलिए जाली नोटों की खेप पर खेप भारत में लगातार झोंकी जाती है. लेकिन इस सबके बावजूद जब हिन्दुस्तानी पाकिस्तान जाते हैं, और पाकिस्तानी भारत आते हैं तो दोनों तरफ़ लोग बड़े प्यार से मिलते हैं. क्यों? भारतीय फ़िल्में पाकिस्तान में छायी रहती हैं, तो पाकिस्तानी कलाकार यहाँ सिनेमा और टीवी में हाथोंहाथ लिये जाते हैं. मेंहदी हसन और अदनान सामी किसी को पराये नहीं लगते! और जब दोनों देशों के नेताओं के कभी मिलने-जुलने, बातचीत करने के मौक़े बनते हैं तो दोनों तरफ़ आम लोगों में उम्मीदें हिलोरें लेने लगती हैं, और राजनीतिक दल भी और मीडिया भी 'गा-गा' करने लगते हैं, मानों आज से ही दोस्ती का नया इतिहास रच दिया जाने वाला हो! हालाँकि सबको मालूम है कि ऐसा होगा नहीं! कभी हुआ ही नहीं. इधर कुछ महीनों में बातचीत की फुरेरी सूखी, उधर सम्भावनाओं का गर्भपात हुआ और भारत किसी न किसी नये हमले का निशाना बना! फिर भी हर नयी बातचीत के वक़्त लोग उम्मीद से होते हैं कि शायद इस बार वह नामुमकिन मुमकिन हो जाये!

पाकिस्तान की उलझी-गुलझी जन्म-नाल!

आख़िर वह नामुमकिन हर बार नामुमकिन ही क्यों रह जाता है. वजह एक ही. हालाँकि मुहम्मद अली जिन्ना कभी सोचते थे कि भारत और पाकिस्तान को अमेरिका और कनाडा की तरह एक-दूसरे का पड़ोसी रहना चाहिए, लेकिन वह ख़याल कभी ख़याल से आगे न बढ़ सका! वजह यह कि पाकिस्तान अपने शरीर से चिपकी ऐसी उलझी-गुलझी जन्म-नाल के साथ पैदा हुआ, जिसे उससे अलग किया जाना सम्भव न हो. इसलिए उसकी यह नाल अब तक भारत से जुड़ी भी हुई है, और वक़्त पर काटी न जा सकने के कारण ज़हरीली भी हो चुकी है. पाकिस्तान इस एकमात्र विचार के साथ ही पैदा हुआ कि उसका निर्माण भारत से अलग हो कर हुआ है, और हर तरीक़े से भारत से अलग दिखने के लिए हुआ है, उसे भारत की 'एंटी-इमेज' होना चाहिए, जो हर मामले में भारत की बराबरी करे, लेकिन हो उसके ठीक विपरीत! 'हिन्दूबहुल' भारत के मुक़ाबल पाकिस्तान 'इसलाम के क़िले' के रूप में देखा जाये, जो अपने पड़ोस में बसी दुनिया की सबसे बड़ी हिन्दू आबादी को चुनौती देता रहे!

The Real Obstacle in India-Pakistan Relations

इसलामीकरण का दबाव

यही पाकिस्तान की मूल समस्या है और इसी ने पाकिस्तान को गढ़ा है. पाकिस्तान बनते ही वहाँ संविधान को लेकर उठा-पटक शुरू हो गयी थी और 1950 में ही जमात- ए-इसलामी के संस्थापक मौलाना मौदूदी ने खुल कर संविधान-सभा के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया था कि उसमें सब 'नाक़ाबिल' लोग घुस गये हैं, जो इसलामी संविधान बना ही नहीं सकते! अन्तत: यह संविधान सभा भंग करनी पड़ी. 'इसलामीकरण' के इस घटाटोप दबाव का ही नतीजा रहा कि पाकिस्तान में आधुनिक, सेकुलर और बहुलतावादी समाज के पक्षधरों को हमेशा 'ग़द्दार' या 'पाकिस्तान की अवधारणा का विरोधी' कह कर ख़ारिज किया जाता रहा. (ठीक वैसे ही, जैसे आजकल हमारे देश में हिन्दुत्ववादी ताक़तें सेकुलर लोगों और संगठनों को 'भारत-विरोधी' और 'देशद्रोही' घोषित करने में लगी हुई हैं). जनरल ज़िया की मौत के बाद जब 1988 में पाकिस्तान में चुनाव हो रहे थे, तब पाकिस्तान के मानस पर इसलाम के इस दबाव को इस लेखक ने ख़ुद अपनी आँखों से देखा था कि आॅक्सफ़ोर्ड की पढ़ी-लिखी, विचारों से अत्यन्त आधुनिक और प्रगतिशील बेनज़ीर भुट्टो कैसे अपनी हर चुनावी सभा में तसबीह लेकर आतीं, सभा के पहले और बाद में 'नारा-ए-तकबीर' लगवातीं और अपने को 'कट्टर मुसलमान' साबित करने की पुरज़ोर कोशिश करतीं! पाकिस्तान आज इसलामीकरण के उसी जुनून का नतीजा भुगत रहा है, वरना वह आज इसलामी आतंकवाद और तालिबान का गढ़ न बना होता, उसकी सेना ने ख़ुद अपनी छावनी के भीतर उसामा बिन लादेन को छिपा कर न रखा होता और अब वहाँ आइएसआइएस का नया ख़तरा न मँडरा रहा होता!

क्या वाक़ई झगड़े की जड़ कश्मीर है?

पाकिस्तान की तरफ़ से बार-बार कहा जाता है कि झगड़े की जड़ कश्मीर विवाद है और जब तक यह मसला हल नहीं होता, तब तक बाक़ी सारी समस्याएँ बनी रहेंगी. लेकिन क्या सचमुच यह बात सही है? क्या सचमुच कश्मीर समस्या हल हो जाने से दोनों देशों के रिश्ते सुधर जायेंगे? और क्या पाकिस्तान के राजकाज के असली संचालक कश्मीर का हल बातचीत से चाहते भी हैं या नहीं? इन सवालों का जवाब टटोलने से पहले यह देखते हैं कि कश्मीर समस्या पाकिस्तान के किन मक़सदों को पूरा करती है? पहला यह कि कश्मीर में अशान्ति बनाये रख कर भारत को लगातार उलझाये रखना. दूसरा यह कि कश्मीर विवाद, पाकिस्तान की जेनेसिस में शामिल 'भारत-विरोध' के तत्व को जनता में जीवित रखने के लिए एक बहुत पुख़्ता कारण प्रदान करता है. और तीसरा यह कि कश्मीर के बहाने इसलामी आतंकवाद को आसानी से जिलाये रख कर उसे 'हिन्दू भारत' के ख़िलाफ़ जिहाद चलाते रहने के लिए उत्प्रेरित रखा जा सकता है. और यह बात 'इसलाम का ध्वजवाहक' होने की पाकिस्तान की पहचान को भी अर्थ देती है. यानी कश्मीर विवाद पाकिस्तान के जन्म की दोनों मूल आकाँक्षाओं को पोषित करता है, पहला भारत के विरुद्ध होना और दूसरा इसलाम का ध्वजाधारी होना!

सेना, आइएसआइ और मुल्ला गँठजोड़!

और पाकिस्तानी सेना, उसकी पिट्ठू ख़ुफ़िया एजेन्सी आइएसआइ और मौलवी, इन तीनों के काकस की प्राणवायु यही है. सेना 'इसलाम की तलवार' कहे जाने में फ़ख्र महसूस करती है, आइएसआइ तालिबान से लेकर समूचे आतंकी तंत्र का रिंगमास्टर है. और मौलवी दीन की मुहर हैं! और इसलिए यही काकस पाकिस्तान का असली संचालक है. अब अगर कश्मीर समस्या हल हो गयी तो इस काकस की जीवनी-शक्ति ही सूख जायेगी, उसे 'इसलाम की रक्षा' और भारत-विरोध के नये कारण ढूँढने पड़ेंगे, वरना पाकिस्तान में इन तीनों की ही प्रासंगिकता ख़त्म हो जायेगी!

Benazir Bhutto blamed ISI for sabotaging talks with Rajiv Gandhi

अभी हाल में पकड़े गये पाकिस्तानी आतंकी नावेद ने ख़ुद यह ख़ुलासा किया कि वह तो जुए की लत में फँसा था और एक मौलवी की नज़र उस पर पड़ी, जिसने उसे तथाकथित जिहाद के लिए 'तैयार' किया. और याद कीजिए कि जब राजीव गाँधी और बेनज़ीर भुट्टो जैसे दो युवा नेता दोनों देशों में रिश्ते सुधारने की ईमानदार कोशिश में लगे थे, तो आइएसआइ ने कैसे खेल बिगाड़ दिया था! आइएसआइ ने राजीव-बेनज़ीर बातचीत ख़ुफ़िया तौर पर रिकार्ड कर ली और एक अख़बार को लीक कर दी! बेनज़ीर ने ख़ुद अपनी किताब 'बेनज़ीर भुट्टो: रिकन्सिलिएशन, इसलाम, डेमोक्रेसी ऐंड द वेस्ट' में लिखा है कि किस तरह आइएसआइ ने उन्हें 'भारत के एजेंट' के रूप में बदनाम करने की कोशिश की. दूसरी घटना नवाज़ शरीफ़ के साथ हुई, जब उन्होंने प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी का लाहौर में दिल खोल कर स्वागत किया. लेकिन इस गर्मजोशी के तीन महीनों के भीतर ही सेना ने खेल कर दिया और करगिल में घुसपैठ हो गयी. नवाज़ शरीफ़ को इस साज़िश के बारे में वाजपेयी जी के फ़ोन से पता चला! सेना-आइएसआइ-मौलवी काकस का अन्दाज़ा इन तीन उदाहरणों से आसानी से लगाया जा सकता है.

पाकिस्तान में असली सरकार किसकी?

इन उदाहरणों से यह भी साफ़ है कि पाकिस्तान में चुनी हुई सरकारें चाह कर भी न सार्थक बात कर सकती हैं और न भारत से रिश्ते सुधार सकतीं हैं, क्योंकि ऐसा हो गया तो सेना और आइएसआइ की भूमिका और सत्ता भी लगभग ख़त्म हो जायेगी. बहरहाल, इस साल उफ़ा में नरेन्द्र मोदी से हुई बातचीत के बाद हुई लानत-मलामत से घबराये नवाज़ ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की वार्ता के ठीक पहले सेना और आइएसआइ दोनों से पूछ लिया है कि क्या बातचीत करनी है! यानी अब बातचीत पर सीधे सेना का नियंत्रण होगा! सेना भी जानती है कि दुनिया को दिखाने के लिए बातचीत करते रहना ज़रूरी है. लेकिन शायद ही वह चाहेगी कि बातचीत रिश्ते सुधारने की तरफ़ बढ़े.

पंजाब और कश्मीर में आतंकवाद का खेल!

1971 की करारी हार के बाद जब बांग्लादेश अलग हो गया और पाकिस्तान को मजबूरन 1972 में इन्दिरा गाँधी की शर्तों पर शिमला समझौता करना पड़ा, तो मामला कुछ दिन शान्त रहा. तब कश्मीर को भड़का पाने की गुंजाइश नहीं थी, इसलिए कुछ साल बाद आइएसआइ ने पंजाब में आतंकवाद का घिनौना खेल खेला. और जब वहाँ आतंक का दौर ख़त्म हो गया तो 90 के दशक से आइएसआइ ने कश्मीर और भारत के दूसरे हिस्सों की तरफ़ रुख़ किया. ज़ाहिर-सी बात है कि उसकी पूरी कोशिश दुश्मनी, नफ़रत और युद्ध की भट्टियों को दहकाये रखने की ही है. 1971 ऐसे ही वहाँ सबके गले में फाँस की तरह चुभता रहता है. उसका बदला लेना काकस के एजेंडे से ख़त्म नहीं हुआ है. तो बदला युद्ध किये और जीते बिना तो लिया नहीं जा सकता.

Not Emotional hype, but hard realities should be kept in mind while dealing with India-Pakistan Relations

तो क्या काकस युद्ध करने और जीत पाने की स्थिति में है? क़तई नहीं! लेकिन 1965 और 1999 को याद कीजिए. 65 में अयूब ख़ाँ को लगा था कि कश्मीर में जनता ग़ुस्से में है, और अगर गड़बड़ी फैलाने के लिए घुसपैठिये भेज दिये जायें तो जनता उनका साथ देगी. यही सोच कर उन्होंने तीस हज़ार घुसपैठिये झोंक दिये, लेकिन यह दाँव नहीं चला. इसी तरह, मुशर्रफ़ ने 1999 में मौक़ा पा कर करगिल का दाँव चला, वह भी फ़ेल हो गया. यक़ीनन काकस किसी अगले मौक़े के इन्तज़ार में और किसी 'ताक़तवर' मददगार के सहारे की तलाश में होगा. मौक़ा कब मिलेगा, जल्दी या देर में, या नहीं ही मिलेगा, कहा नहीं जा सकता. इसलिए फ़िलहाल मौजूदा छाया युद्ध जारी रहेगा, बदस्तूर. और तब तक नहीं रुकेगा, जब तक एक अन्तिम निर्णायक युद्ध न हो जाये या फिर कुछ ऐसा हो जाये कि पाकिस्तान में बना सत्ता का नापाक काकस ही ध्वस्त हो जाये.

लेकिन इस पथरीली सच्चाई के बावजूद हमारे दिल पाकिस्तान के लिए पसीजते और पिघलते रहते हैं. क्योंकि वह जन्म-नाल कट नहीं पायी है! इसलिए और रास्ता भी क्या है, सिवा इसके कि समय को अपना काम करने दें!

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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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