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कौन हैं क़मर वहीद नक़वी?

QWNYouth Icon---my bio pageकुछ नया गढ़ो, जो पहले से आसान भी हो और अच्छा भी हो— क़मर वहीद नक़वी का कुल एक लाइन का ‘फंडा’ यही है! क्यों? इसलिए कि हमारी दुनिया की अब तक की तरक़्क़ी केवल इसी एक विचार के कारण हुई कि आदमी की ज़िन्दगी कैसे पहले से आसान और अच्छी बने! तो आप जब तक ऐसा कुछ नहीं करेंगे, जो पहले से अच्छा भी हो और आसान भी, तब तक बात नहीं बनेगी!

‘आज तक’ और ‘चौथी दुनिया’—एक टीवी में और दूसरा प्रिंट में— ‘आज तक’ की झन्नाटेदार भाषा और अक्खड़ तेवरों वाले ‘चौथी दुनिया’ में लेआउट के बोल्ड प्रयोग — दोनों जगह क़मर वहीद नक़वी की यही धुन्नक दिखी कि बस कुछ नया करना है, पहले से अच्छा और आसान. 1995 में डीडी मेट्रो पर शुरू हुए 20 मिनट के न्यूज़ बुलेटिन को ‘आज तक’ नाम तो नक़वी ने दिया ही, उसे ज़िन्दा भाषा भी दी, जिसने ख़बरों को यकायक सहज बना दिया, उन्हें समझना आसान बना दिया और ‘अपनी भाषा’ में आ रही ख़बरों से दर्शकों का ऐसा अपनापा जोड़ा कि तब से लेकर अब तक देश में हिन्दी न्यूज़ चैनलों की भाषा कमोबेश उसी ढर्रे पर चल रही है! एस. पी. सिंह की असाधारण पत्रकारीय प्रतिभा, ख़बरों पर उनकी पैनी नज़र, उनका आर-पार-धारदार विश्लेषण, और ख़बरों में कहीं गहरे छिपे संकेतों को मोती की तरह चुन कर बाहर निकाल ले आने की एस. पी. सिंह की नायाब क्षमता, इन सबको जब मिली एक ऐसी भाषा, जो ख़ास नहीं आम थी, जो न भारी-भरकम किताबी शब्दों के बोझ तले दबी हुई थी और न जिसे हिंग्लिश की लिपिस्टिक लगायी गयी थी, तो सोने में सुहागा हो गया और देखते ही देखते ‘आज तक’ देश के कोने-कोने तक और घर-घर पहुँच गया. यह भाषा नक़वी ने गढ़ी थी क्योंकि वह इसी एक काम के लिए लाये गये थे!

‘आज तक’ की वह भाषा मामूली नहीं थी, वह यों ही संयोग से सोते से उठ खड़ी नहीं हुई थी. वह बड़ी बातूनी थी, बिंदास बोलती थी, बेख़ौफ़ बतियाती थी, बेलाग, बेबाक, खरी-खरी कहती थी, कभी चुलबुली भी होती, कभी इतराती और अठखेलियाँ भी करती, कभी आँखें भी तरेरती, कान भी उमेठती, उदास भी होती, आँसू भी बहाती, दहाड़ें भी मारती यानी जैसे आम आदमी की ज़िन्दगी चलती है, वह भी चलती!

नक़वी ने अपने दो कार्यकाल में ‘आज तक’ के साथ साढ़े तेरह साल से कुछ ज़्यादा का वक़्त बिताया. इसमें दस साल से ज़्यादा समय तक वह ‘आज तक’ के सम्पादक रहे. पहली बार, अगस्त 1998 से अक्तूबर 2000 तक, जब वह ‘आज तक’ के ‘एक्ज़िक्यूटिव प्रोड्यूसर’ और ‘चीफ़ एक्ज़िक्यूटिव प्रोड्यूसर’ रहे. उस समय ‘आज तक’ दूरदर्शन के प्लेटफ़ार्म पर ही था और नक़वी के कार्यकाल में ही दूरदर्शन पर ‘सुबह आज तक’, ‘साप्ताहिक आज तक’, ‘गाँव आज तक’ और ‘दिल्ली आज तक’ जैसे कार्यक्रमों की शुरुआत हुई. ‘आज तक’ के साथ अपना दूसरा कार्यकाल नक़वी ने फ़रवरी 2004 में ‘न्यूज़ डायरेक्टर’ के तौर पर शुरु किया और मई 2012 तक इस पद पर रहे. इस दूसरे कार्यकाल में उन्होंने ‘हेडलाइन्स टुडे’ की ज़िम्मेदारी भी सम्भाली और दो नये चैनल ‘तेज़’ और ‘दिल्ली आज तक’ भी शुरू किये. ‘टीवी टुडे मीडिया इंस्टीट्यूट’ भी शुरू किया, जिसके ज़रिये देश के दूरदराज़ के हिस्सों से भी युवा पत्रकारों को टीवी टुडे में प्रवेश का मौक़ा मिला.

कुछ नया करने की ललक 1986 में नक़वी को दिल्ली ले कर आयी, जहाँ सन्तोष भारतीय और रामकृपाल के साथ मिल कर उन्होंने ‘चौथी दुनिया’ की बुनियाद रखी, जो हिन्दी का पहला ब्राडशीट अख़बार था और ‘रविवार’ की खोजी और आक्रामक पत्रकारिता और किसी समय के ‘दिनमान’ के गम्भीर विश्लेषण का ‘फ़्यूज़न’ था. ‘चौथी दुनिया’ में भाषा और कंटेंट को लेकर जो प्रयोग हुए, वह तो हुए ही, लेकिन उसके मास्ट हेड से लेकर एक या दो शब्दों के चुटीले शीर्षकों, बड़े-बड़े फ़ोटो, कार्टूनों और कैरीकेचरों के साथ मुखर लेआउट की नयी-नवेली शैली की शुरुआत नक़वी ने हिन्दी में की.

क़मर वहीद नक़वी का सौभाग्य था कि उन्हें हिन्दी के जाने-माने, प्रयोगधर्मी और ‘ विज़नरी’ सम्पादकों राजेन्द्र माथुर और एस. पी. सिंह की छाँव में काम सीखने का मौक़ा मिला, जो अपने आप में पत्रकारिता के दो अलग-अलग तरह के ‘विश्विद्यालय’ थे. नवम्बर 1980 में ‘टाइम्स समूह’ में ट्रेनी के तौर पर नक़वी ने अपने करियर की शुरुआत की. साल भर बाद नवभारत टाइम्स, मुम्बई में ‘सिटी रिपोर्टर’ हो गये. 1983 की पहली जनवरी—मुम्बई ने पिछली रात नया साल कैसे मनाया—-इस एक ख़बर ने राजेन्द्र माथुर से नक़वी का परिचय कराया! और ’83 ख़त्म होते-होते नक़वी को उनके अभिन्न मित्र रामकृपाल के साथ माथुर जी ने लखनऊ भेज दिया, क्योंकि वहाँ से नवभारत टाइम्स का नया संस्करण निकल रहा था और माथुर जी वहाँ युवा पत्रकारों की ऐसी टीम बनाना चाहते थे, जो किसी दिन भी ‘लकीर की फ़क़ीर’ न दिखे! हर दिन कुछ नया सोचे और नया करे. हिन्दी पत्रकारिता में रामकृपाल-नक़वी की यह जोड़ी बड़ी मशहूर हुई, जो ‘नवभारत टाइम्स,’ मुम्बई में बनी थी और अगले क़रीब ग्यारह-बारह साल तक चली. दोनों ने जहाँ नौकरियाँ कीं, साथ कीं और जहाँ छोड़ीं, साथ छोड़ीं.

उदयन शर्मा हिन्दी के बड़े दिग्गज रिपोर्टर थे. कम से कम उनके जैसा कोई रिपोर्टर हिन्दी में अब तक हुआ नहीं, जिसकी राजनीतिक पकड़ भी ज़बर्दस्त हो और जो बेहतरीन ‘स्पाॅट रिपोर्टर’ भी हो. उस ज़माने में की गयी उदयन शर्मा की ‘स्पाॅट रिपोर्टिंग’, ख़ास कर साम्प्रदायिक दंगों की कवरेज पढ़ने लायक़ है. एस. पी. सिंह ने जब कोलकाता में ‘रविवार’ के सम्पादक पद से इस्तीफ़ा दिया, तो उदयन शर्मा उसके सम्पादक बने. योजना बनी कि ‘रविवार’ के कुछ पन्ने और बढ़ा दिये जायें, कुछ नयी चीज़ें की जायें, उसे ‘नये सिरे से लाँच’ किया जाये. ‘नया’ करना था, इसलिए मार्च 1985 में उदयन ने नक़वी को अपनी टीम में बुला लिया. हालाँकि वह वहाँ डेढ़ साल ही रह पाये और ‘चौथी दुनिया’ के लिए दिल्ली चले आये.

1989 में राजेन्द्र माथुर ने फिर नक़वी को चुना लखनऊ में ‘नवभारत टाइम्स’ का ‘कायाकल्प’ करने के प्रोजेक्ट के लिए. वह चार साल वहाँ रहे. बड़े चुनौतीपूर्ण दिन थे. अख़बार का ज़बर्दस्त कायाकल्प हुआ भी, लेकिन इस बीच माथुर जी का असामयिक निधन हो गया. फिर कुछ दिनों बाद हिन्दी के मसले पर एस. पी. सिंह को भी नौकरी छोड़नी पड़ी, क्योंकि प्रबन्धन चाहता था कि सब कुछ अँगरेज़ी से अनुवाद कर छापा जाये. 1993 में ‘नवभारत टाइम्स’ का लखनऊ संस्करण बन्द हो गया तो नक़वी ने जयपुर में ‘नवभारत टाइम्स’ की कमान सम्भाली और दो साल तक वहाँ रहे.

नक़वी ने हिन्दी की टीवी पत्रकारिता को केवल भाषा ही नहीं दी, ‘आज तक’ के ‘दूरदर्शनी’ दिनों में उन्होंने हिन्दी के टीवी पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी तैयार की. हिन्दी टीवी पत्रकारिता के मौजूदा ज़्यादातर बड़े नामों ने अपने शुरुआती दिनों में उनके साथ काम किया है. ‘टीवी टुडे मीडिया इंस्टीट्यूट’ के ज़रिये सात वर्षों में उन्होंने हिन्दी-अँगरेज़ी के सौ से ज़्यादा टीवी पत्रकारों की एक और प्रतिभाशाली पौध तैयार की. सीखते रहना और सिखाते रहना उनका सबसे प्रिय शौक़ है.

उनकी टीवी पत्रकारिता में बीच में एक अनचाहा और अप्रिय दौर भी आया, उसके लिए लाँछन नक़वी पर भी लगते हैं. वह कहते हैं कि हाँ, उस दौर में बहुत कुछ ऐसा हुआ, जो नहीं होना चाहिए था. लेकिन आप भले ही परम अहिंसावादी हो, अगर युद्ध के मैदान में घिरे होगे तो कुछ हत्याएँ तो करनी ही पड़ेंगी. दूसरा विकल्प है कि आप खेत रहो!

अक्तूबर 2013 में वह इंडिया टीवी के एडिटोरियल डायरेक्टर बने, लेकिन वहाँ कुछ ही समय तक रहे. फ़िलहाल कुछ और ‘नये’ आइडिया को उलट-पुलट कर देख रहे हैं कि कुछ मामला जमता है या नहीं. तब तक ‘राग देश’ तो चल ही रहा है!

— हर्ष रंजन, प्रोफ़ेसर व विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता विभाग, शारदा विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा, उत्तर प्रदेश