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Oct 15
इतिहास की दो ‘केस स्टडी’!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 16 

"यह बात आज के मुसलिम युवाओं को जाननी चाहिए कि देश के साठ से ज़्यादा मुल्ला-मौलवियों ने क्यों सर सैयद अहमद ख़ान के ख़िलाफ़ फ़तवे जारी किये थे? क्यों उन्हें 'धर्म से बाहर' घोषित कर दिया गया था? और जब इससे भी बात नहीं बनी तो मौलवी अली बक्श क्यों मक्का जा कर सर सैयद का 'सिर क़लम कर दिये जाने' का फ़तवा ले कर आये थे?"


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अगर मुल्लाओं की चली होती तो पिछले डेढ़ सौ सालों में देश में न कोई मुसलमान बच्चा स्कूल गया होता, न कालेज और न यूनिवर्सिटी! आज न अलीगढ़ मुसलिम विश्विद्यालय होता और न ही हिन्दुस्तान के किसी मुसलमान ने 'अँगरेज़ ईसाइयों वाली' आधुनिक शिक्षा ली होती! ज़रा सोच कर देखिए कि तब कैसा होता आज का हिन्दुस्तानी मुसलमान!

सर सैयद का 'सिर क़लम करने' का फ़तवा!

कुछ साल पहले आरिफ़ मुहम्मद ख़ान का एक लेख पढ़ा था. अगर आप शाहबानो मामले को जानते होंगे तो आरिफ़ मुहम्मद ख़ान को भी जानते ही होंगे! उनका लेख पढ़ कर अचम्भा हुआ कि ऐसा भी हुआ होगा क्या? हुआ तो था जनाब! लेकिन वह सब बातें अब इतिहास बन गयीं, जिनसे किसी ने कुछ नहीं सीखा. यह बात आज के मुसलिम युवाओं को जाननी चाहिए कि देश के साठ से ज़्यादा मुल्ला-मौलवियों ने क्यों सर सैयद अहमद ख़ान के ख़िलाफ़ फ़तवे जारी किये थे? क्यों उन्हें 'धर्म से बाहर' घोषित कर दिया गया था? और जब इससे भी बात नहीं बनी तो मौलवी अली बक्श क्यों मक्का जा कर सर सैयद का 'सिर क़लम कर दिये जाने' का फ़तवा ले कर आये थे?

सर सैयद का 'गुनाह' क्या था?

ऐसा क्यों? बक़ौल आरिफ़ ऐसा इसलिए कि सर सैयद अहमद भारतीय मुसलमानों की हालत सुधारना चाहते थे, उन्हें तरक़्क़ी और ख़ुशहाली के रास्ते पर ले जाना चाहते थे, एक ऐसा कालेज खोलना चाहते थे, जिसमें मुसलमान बच्चों को आधुनिक शिक्षा मिल सके, ताकि वह विज्ञान पढ़ सकें, दुनिया के बड़े-बड़े दार्शनिकों-चिन्तकों के विचार जान सकें और उनके लिए ज्ञान की नयी खिड़कियाँ खुल सकें!

आधुनिक शिक्षा का 'कुफ़्र'!

लेकिन आपको जान कर हैरानी होगी कि तब के कठमुल्लों को यह काम 'इसलाम-विरोधी' लगा. उन्होंने उसका पूरी ताक़त से विरोध किया. क्योंकि उनकी नज़र में अँगरेज़ी और पश्चिमी शिक्षा 'इसलामी मान्यताओं' के ख़िलाफ़ थी, ऐसी पढ़ाई करना 'कुफ़्र' था, ईसाइयत पर चलने जैसा था और इसलिए हिन्दुस्तानी मुल्लाओं का बहुत बड़ा तबक़ा सर सैयद अहमद के ख़ून का प्यासा था, उन्हें मुसलमान मानने को ही तैयार नहीं था.

पढ़ें: आरिफ़ मुहम्मद ख़ान का लेख, 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' में Click to Read.

सर सैयद ने ख़ुद लिखा है, 'मुसलिम समाज की अधोगति पर मैंने ख़ूब सोचा और पाया कि उनकी सारी समस्याओं का एक ही इलाज है कि उन्हें आधुनिक शिक्षा मिले. मैंने तय किया कि उनके दिमाग़ से यह बात निकाली जाय कि विज्ञान और यूरोपीय साहित्य पढ़ना धर्म-विरुद्ध है.' सर सैयद आगे लिखते हैं, 'समस्या यह है कि हमारा (मुसलमानों का) सोचना-समझना, सामाजिक प्रथाएँ और धार्मिक आस्था सब आपस में इतना गड्डमड्ड है कि धार्मिक टंटा खड़ा किये बिना सामाजिक सुधारों पर कोई बातचीत ही सम्भव नहीं.'

मुसलमानों ने इतिहास से क्या सीखा?

देखा आपने! मुसलमानों ने इतिहास से क्या सीखा? किसी सामाजिक सुधार की बात तब जितनी 'ग़ैर-इसलामी' हुआ करती थी, आज भी ऐसी हर कोशिश वैसे ही 'ग़ैर-इसलामी' क़रार देकर ख़ारिज कर दी जाती है. कम से कम पढ़े-लिखे मुसलमानों को आज दिल पर हाथ रख कर सोचना चाहिए कि अगर सर सैयद तब मुल्लाओं के आगे झुक गये होते, थक-हार कर बैठ गये होते, तो मुसलमान आज कहाँ होते, किस हाल में होते? और क्या वाक़ई वह शिक्षा 'इसलाम-विरुद्ध' थी या है? उलेमा सही थे या ग़लत?

सुधार की हर कोशिश इसलाम-विरोधी क्यों?

सोचने की बात यह है कि मुसलिम समाज में रत्ती भर भी सुधार की कोशिश को 'आनन-फ़ानन' क्यों 'इसलाम-विरोधी' मान लिया जाता है? और सोचने की बात यह भी है कि मुसलिम समाज के सुधार के लिए मुल्ला-मौलवियों-उलेमाओं ने ख़ुद कितने क़दम उठाये हैं? सोचने की बात है कि इमराना बलात्कार कांड और आरिफ़-गुड़िया-तौफ़ीक़ जैसे मामलों में जिस तरह के फ़तवे आते हैं, वह लोगों के बीच किस तरह के इसलाम की छवि गढ़ते हैं? और सोचने की बात है कि मुसलिम समाज में इस तरह के मुद्दों पर गहराई से विचार-विमर्श क्यों नहीं होता है? और जब कोई विमर्श होता भी है, तो उसमें आम मुसलमानों की, पढ़े-लिखे मुसलमानों की, मुसलिम बुद्धिजीवियों की, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मुसलिम महिलाओं की भागीदारी क्यों नहीं होती? सारे फ़ैसले मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड या ऐसे ही दूसरे स्वयंभू मुसलिम संगठन क्यों ले लेते हैं? और मुसलिम समाज की हर समस्या को धर्म से क्यों जोड़ कर देखा जाता है?

Law Commission Questionnaire on Muslim Personal Law

पर्सनल लॉ पर विधि आयोग की प्रशनावली

अब तीन तलाक़ और यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड के मुद्दे को ही लीजिए. तीन तलाक़ का मामला तो ख़ैर सुप्रीम कोर्ट में है, लेकिन पर्सनल लॉ में सुधारों, बदलावों और यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड पर लोगों की राय जानने के लिए विधि आयोग ने एक प्रशनावली जारी की. समझ में नहीं आता कि इस पर मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड और तमाम दूसरे मुसलिम धार्मिक संगठनों में इतनी तिलमिलाहट और बिलबिलाहट क्यों है? भई, राय ही तो माँगी गयी है. कोई ऐसा तो नहीं कि यूनिफ़ार्म सिविल कोड बस उन पर थोप दिया जानेवाला है! अजीब बात है कि इस मुद्दे के गुण-दोष पर आप न कुछ सोचना चाहते हैं, न सुनना, न यह परखना चाहते हैं कि भविष्य में मुसलिम समाज को उसके क्या फ़ायदे मिल सकते हैं?

देखिए: विधि आयोग की प्रश्नावली Click to Read.

 

प्रश्नावली में क्या आपत्तिजनक है?

और मुझे तो लगता नहीं कि इस प्रशनावली के 'बहिष्कार' का एलान करनेवाले लोगों ने इसे पढ़ा भी है. सच यह है कि इसमें आपत्तिजनक कुछ है ही नहीं, न कोई बात, न कोई सवाल. उसके सोलह सवालों में एक सवाल यह है कि क्या यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड 'वैकल्पिक' होना चाहिए, यानी जिसे मंज़ूर हो, वह अपना ले और जो उसे न मानना चाहे, वह अपने पर्सनल लॉ पर चले? इसमें क्या आपत्ति की बात है भई? एक सवाल यह पूछा गया कि तमाम तरह के पर्सनल लॉ को क्या लिखित रूप में कर दिया जाये? इसमें क्या 'इसलाम-विरोधी' बात हुई? क़ानूनों को लिखित क्यों नहीं होना चाहिए? एक सवाल यह भी पूछा गया है कि तीन तलाक़ को पूरी तरह रद्द कर दिया जाये या फिर जस का तस रहने दिया जाये? इस पर भी कोई कोहराम खड़ा होने जैसी बात क्यों? आपको जो चुनना है, बता दीजिए. क्या दिक़्क़त है?

पहले बहस मुसलिम समाज के भीतर होती

दूसरी बात, यह मुद्दा उठा है तो इस पर बात करने, चर्चा करने और बहस करने की ज़रूरत क्यों नहीं है? और प्रशनावली का 'बहिष्कार करने' के एलान के पहले यह बहस मुसलिम समाज के भीतर क्यों नहीं होनी चाहिए थी? मुसलिम पर्सनल बोर्ड को तमाम मुसलमानों से राय क्यों नहीं माँगनी चाहिए थी, मुसलमानों के अलग-अलग तबक़ों से, महिलाओं से बात कर उनके हालात, उनके ख़याल, उनकी समस्याएँ और उनके सुझाव क्यों नहीं लेने चाहिए थे? मुसलमानों में बहुत-से समुदाय हैं, जो एक बार में तीन तलाक़ को बिलकुल ग़लत मानते हैं. तो ऐसे मुद्दों पर समाज के भीतर मंथन तेज़ होना चाहिए या नहीं?

शरीअत का मामला कहाँ उठे, कहाँ नहीं?

और मुसलमानों को समय के साथ क्यों नहीं चलना चाहिए? क्यों नहीं बदलना चाहिए? एक तरफ़ तो नौकरी में मुसलमानों को आरक्षण दिये जाने की माँग होती है और दूसरी तरफ़ ऐसे फ़तवे भी आते हैं कि शरीअत के मुताबिक़ मुसलिम महिला की कमाई स्वीकार करना किसी परिवार के लिए हराम है और महिलाएँ ऐसी जगह काम नहीं कर सकतीं, जहाँ स्त्री-पुरुष साथ काम करते हों और उन्हें परदे के बिना पुरुषों से बात करनी पड़े! लेकिन शरीअत में तो ब्याज लेना-देना भी हराम है. तो मुसलिम पुरुषों को भी नौकरी नहीं ही करनी चाहिए क्योंकि उनका प्राविडेंट फ़ंड कटता है, जिस पर उन्हें ब्याज मिलता है! बैंक खाता भी नहीं खोलना चाहिए, उस पर ब्याज मिलता है! फिर कार, मकान, कारोबार के लिए मुसलमानों को क़र्ज़ भी नहीं लेना चाहिए क्योंकि बैंक उन्हें ब्याजरहित क़र्ज़ तो देंगे नहीं! तो शरीअत का मामला कहाँ उठाया जायगा, कहाँ नहीं, यह अपनी सुविधा से तय होगा! है न!

उलेमाओं को नयी दृष्टि विकसित करनी होगी

तो ऐसे आग्रहों से मुसलिम समाज कैसे आगे बढ़ेगा? ख़ास कर तब, जबकि देश के बाक़ी सारे समाजों और तबक़ों में आगे बढ़ने और हर स्तर पर सामाजिक बराबरी हासिल करने की होड़ लगी हो. कुल मिला कर मूल बात यह है कि मुसलमानों में सामाजिक सुधारों के मुद्दे पर उलेमाओं को नयी दृष्टि विकसित करनी होगी, नये ज़माने की ज़रूरतों और सच्चाइयों के साथ अपना नज़रिया बदलना होगा.

'हिन्दू राष्ट्र' की आशंकाएँ

हाँ, 'हिन्दू राष्ट्र' की आशंकाओं को लेकर मुसलिम उलेमाओं की चिन्ता समझ में आती है. उसके ख़िलाफ़ संघर्ष करना एक बिलकुल अलग मुद्दा है. लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि अपने ऐसे आधारहीन दकियानूसी रवैयों और अड़ियल ज़िदों से वह मुसलमानों का तो कोई भला करते नहीं, उलटे हिन्दुत्ववादी तर्कों को ज़मीन ज़रूर दे देते हैं. शाहबानो मामले के पहले संघ परिवार क्या था और उसके बाद वह कहाँ तक और क्यों बढ़ा और बढ़ता गया, कैसे उसने शाहबानो मामले का हवाला दे-देकर उन हिन्दुओं के बीच अपनी जगह बनायी, जो कभी संघ के विचारों से सहमत नहीं थे, इतिहास की यह 'केस स्टडी' हमारे सामने है. और एक 'केस स्टडी' सर सैयद अहमद की है, जिससे यह लेख शुरू हुआ था. इन दोनों से कुछ सीखना हो, तो सीख लीजिए. वरना ज़माना तो आगे बढ़ जायेगा, आप पीछे रहना चाहें, चुनाव आपका है!
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http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi

इसी विषय पर पिछला लेख: कॉमन सिविल कोड से क्यों डरें? Click to Read.

Published on 17 Oct 2015

इसे भी पढ़ें: Why I Support the Uniform Civil Code? By Tariq Ansari Click to Read.

Published on 29 Jul 2003
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  • जितेन्द्र कुमार

    ये दौर अवलोकन का दौर है…जो इस बात को नही समझा वो वक़्त से पीछे रह जायेगा…
    आपका ये लेख हक़ीक़त से रूबरू करता है… साधुवाद

    • qwn

      धन्यवाद जितेंद्र जी.

  • Siddhnath Dubey

    आपने बिल्कुल सही लिखा है ! नई चीज़ों को सीखना परखना ज़रूरी है , यदि प्रगती करनी है ! बिना गुणवता शिक्षा के भी जीवन बेकार है ! धर्म को मानिए, उन्हें आत्मबल के रूप मे लेना चाहिए ना कि जीवन की बंदिशों के रूप मे !

    • qwn

      सिद्धाँत जी धन्यवाद.
      मेरे विचार में सामाजिक सवालों को पुराने समय में इसलिए धार्मिक दायरे में लाया गया होगा, क्योंकि तब राज्य और धर्म की कोई अलग-अलग कल्पना नहीं थी. बल्कि राज्य और धर्म एक-दूसरे के एक प्रकार से पूरक थे. या यों भी कह सकते हैं कि एक सिक्के के दो पहलू थे. धर्म के आधार पर ही राज्य गठित हुए, धर्म के आधार पर लड़ाइयाँ लड़ी गयीं और राज्य पर विजय प्राप्त करने के बाद वहाँ ‘विजयी’ धर्म ही राज्य का धर्म बना. इसलिए परिवार, समाज आदि को व्यवस्थित करने के लिए जो नियम बने, वह धर्माधिकारियों ने बनाये.
      लेकिन आज स्थिति अलग है. सेकुलर राज्य की अवधारणा में धर्म को आस्था, पूजा पद्धति आदि तक ही सीमित होना चाहिए और पारिवारिक-सामाजिक मामलों के लिए नागरिक संहिता होनी चाहिए.

  • Harish

    Sir the problem arise after education also. During my graduation which I have completed just three years ago many Muslim boys and girls make a separate group. and making such group on the basis of Caste and religion also creates feeling of insecurity among others. And My college was a well reputed Engineering college where every scholar student would try to get admission. so sir what is the use of education if u cant mix up with others. And this excuse that Muslims are minority is fail because in India Christians, Budhdhists, Sikhs, Jains are also minority but no one of them feels insecurity. I dont know what is the problem of Muslims?

    • qwn

      हरीश जी, टिप्पणियों के लिए धन्यवाद. जैन, बौद्ध और सिख समुदाय तो ख़ैर वृहत हिन्दू समुदाय का ही हिस्सा माने जाते हैं. इसलिए उनकी स्थिति बिलकुल अलग है. ईसाई और मुसलिम ही उस प्रकार से ‘अल्पसंख्यक’ समुदाय हैं, जिनको लेकर अकसर बात होती है. समस्या यहीं है. और इसका कारण है हमारी सामाजिक कंडीशनिंग, जो कि बहुत बचपन से हम सबके मन में हमारे घरों में बैठा दी जाती है. अपने धर्म का श्रेष्ठ होना, दूसरे सभी धर्म के लोगों का ‘विधर्मी’ होना, अपने समुदाय की हर प्रथा को उच्चतम मानना, दूसरे समुदायों की हर बात को हेय मानना और उनसे दूर रहना– ये बातें जो बचपन में दिमाग़ में भर दी जाती हैं, वह एक-दूसरे के प्रति सन्देह, अविश्वास और फिर अनकही घृणा को जन्म देती हैं. चूँकि मुसलमानों पर धर्म का शिकंजा कहीं ज़्यादा कसा हुआ है, और दूसरी बात यह कि पिछले पैंतीस सालों में हिन्दू-मुसलिम खाई बहुत बढ़ी है. इसके दो बड़े कारण हैं. एक तो शाहबानो विवाद में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को पलटने के लिए नया क़ानून लाया जाना और अस्सी के दशक से संघ परिवार की ओर से राम जन्मभूमि को लेकर उग्र आन्दोलन चलाया जाना. फिर इसकी एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी है, जो भारत-पाक विभाजन के रूप में सामने आयी. तो ये दरार बहुत पुरानी और बहुत गहरी है, इसे पाटने के लिए लम्बी कोशिश करनी होगी. यह बात हमें समझनी चाहिए.

      • Harish

        Sir, Its time for educated youth from Muslim Community to come forward and start opposing those rituals which are outdated. We being non Muslims cant interfere in such matters unless everyone will feel that we are trying to interfere in Islam. But when you ask the educated youth, they too are not interested in changing this. No Non Muslims can interfere in matters of Muslims, thats the fact. we can just support the initiative taken by Educated Muslims.

        • qwn

          आप से सहमत हूँ, लेकिन इसके लिए हम सबको प्रयास करना होगा. मुसलिम समाज में विश्वास और सुरक्षा और बराबरी की भावना आये, उनके विरुद्ध घृणा का प्रचार न हो, तब यह सम्भव हो सकेगा. वैसे भी सामाजिक परिवर्तनों की गति बहुत धीमी होती है, लेकिन समाज तो बदलता ही है, सुधार तो होता ही है.

  • Harish

    If you see maximum of educated Muslim youth oppose any ammendment in personal law. They usually run away or abuse when I ask them why they only want Sharia in Personal Law, let’s execute them if they commit any crime. Means no one want to face the fact. Muslims oppose Vande Mataram, Bharat Mata Ki Jai, etc. then what the hell do they Love? The Arab Countries ? If you even don’t respent ur own civilization then how can u expect others to believe them?

  • J.A Nasib

    Yeh bhi ajeb Katha likhi apne shayad apko Pata nahi ke dunya ki 1st University Saudi Arabia me hai

    • qwn

      आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद नसीब जी.
      मुझे लगता है कि आपने मेरे लेख के साथ दिये गये आरिफ़ मुहम्मद ख़ान के लेख के लिंक को नहीं देखा. उसे पढ़ेंगे तो आपका भ्रम दूर हो जायेगा. वैसे मैं आरिफ साहब के लेख से एक अंश यहाँ दे रहा हूँ. उन्होंने मौलाना अबुल हसन अली नदवी (उनको तो आप जानते ही होंगे) की किताब “इसलामियत और मग़रीबियत की कश्मकश” का हवाला दिया है, जिसमें मौलाना नदवी ने लिखा है, ”The education mission of Sir Syed and his advocacy of Western civilization became correlatives and caused apprehensions and doubts in the minds of people. A wave of opposition took hold of the religious circles and his movement met with a simultaneous call for its boycott.”
      साफ़ है कि सर सैयद के निधन के साठ साल बाद लिखी अपनी किताब में मौलाना नदवी ने माना कि सर सैयद के शिक्षा अभियान का उलेमा ने ज़बर्दस्त विरोध किया था. इस बारे में मौलाना अल्ताफ़ हुसैन हाली ने सर सैयद की जीवनी “हयात-ए-जावेद” में विस्तार से लिखा है कि कैसे उन्हें ‘काफ़िर’ घोषित कर दिया गया.
      और आपको बता दें कि पश्चिमी शिक्षा और साहित्य को लेकर मुसलिम जगत का विरोध बहुत पुराना है. इसी वजह से मुसलिम जगत में प्रिंटिंग प्रेस का शुरू में भारी विरोध हुआ क्योंकि उन्हें डर था कि इससे ईसाइयत का प्रचार होगा.

  • Aazam khan

    Samantha uniformity…acha lgta h sunne m. Bank loan ni denge..govt job ni degi ..apne karobar krne ni Doge TB Kha Chli jati h uniformity.. Lao brabar kro reserve 14% resources Muslims k liy TB bat krna.. Aazadi ki bad 35% Muslim govt job m tha..1 Sochi samajhi sajish k tahat lga Dali wat in becharo ki 2% pr simat gye..yha Kha gayab ho jati h uniformity. Jailo m bina vjh katte h zindagiya log TB Kha Chli jati uniformity. Ghr dukane jla diy jate h gay k name pr Mar diya jata h TB Kha Chli jati h uniformity

    • Faiza Parvez

      Sir, u r reaction evn is those times in dat age grp is a testimony of a sane human mind who cares abt equal rights to all human beings irrespective of religion & sex. Accept my salutations as sch ppl r few…may your tribe increase

      • tarun

        very good dr. Faiza. Good reply to these saitanic people..

  • Faiza Parvez

    Sir, hearty wishes for sch a hard hitting article dat i m coming across little later though. I m a doctor by profession & recently aghast over d reaction of fellow Muslim(male) doctors on Wats App grp majorly in favour of 3 Talaq…why? Why dey were trying tooth & nail to defend dis vry law dat hs many minute terms & conditions whch if nt known to Muslim women(dats in most of d cases) cn easily deceive dem & a comfort zone for escapists.Ws already into a winning debate bt failed to recall Imrana case whch is a glaring example of Injustice by male domonant Law Boards. U r article is a respite dat progressive literate males do exist in my community…

    • qwn

      Thank you Dr. Faiza for reading my article and appreciating it. It is really heartening to note that muslim women and girls are coming out in the open to push for reforms in muslim society. And equally shocking to note that well qualified muslim males even doctors are favouring Triple Talaq, which has already been discarded in more than 20 muslim countries.

      But it is time for all liberal minded people to spread the message and create awareness about it. Organisations like Bhartiya Muslim Mahila Andolan https://bmmaindia.com/ and few others are running effective campaigns among muslim women and encouraging them to fight such regressive customes.

      My first article on this subject appeared way back in 1985 in famous Hindi weekly “Ravivar” (closed now) on Shahbano Case where I vehementally argued that post divorce maintenance should be given by the husband to muslim woman for her entire lifetime or till such time she marries again. At that time I was 31 years old and thought that with the spread of education muslim mindset will also change in coming years. Now I am 62 years old and unfortunately nothing much has changed in last 31 years. Muslim clerics and muslim males have been speaking the same language, which they were speaking in 1985.

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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