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Aug 22
मुसलिम हलचल के चार कोण!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 7 

संघ के एजेंडे के ख़िलाफ़ मुसलिम पर्सनल लाॅ बोर्ड ने जिस तरह का आन्दोलन छेड़ने की घोषणा की है, उससे ध्रुवीकरण और तेज़ ही होगा और इससे संघ के ही मंसूबे पूरे होंगे. यक़ीनन यह अच्छा संकेत नहीं है.


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अल्पसंख्यक राजनीति में नयी खदबदाहट शुरू हो गयी है! एक तरफ़ हैं संघ, बीजेपी और एनडीए सरकार, दूसरी तरफ़ है मुसलिम पर्सनल लाॅ बोर्ड (Muslim Personal Law Board), तीसरा कोण है मजलिस इत्तेहादुल मुसलिमीन के असदुद्दीन ओवैसी का और चौथा कोण है मुसलिम महिलाओं की एक संस्था भारतीय मुसलिम महिला आन्दोलन.

सच हुई ध्रुवीकरण की आशंकाएँ

खदबदाहट तो शुरू होगी, इसकी चर्चा तो केन्द्र में नरेन्द्र मोदी सरकार आने के पहले ही शुरू हो गयी थी. और सरकार आने के कुछ ही दिनों बाद ओवैसी ने महाराष्ट्र की राजनीति में प्रवेश कर साबित कर दिया कि लोगों को जिस तरह के ध्रुवीकरण की आशंकाएँ थीं, उसकी शुरुआत हो चुकी है. ओवैसी अब बिहार में भी 'सेकुलर' वोटों के दावेदारों के दम फुला रहे हैं, हालाँकि अभी उन्होंने ख़ुलासा नहीं किया है कि वह बिहार के चुनावों में उतरेंगे भी या नहीं! ओवैसी की सभाओं में भीड़ तो हो रही है और हाल के दिनों में मुसलमानों के बीच उनकी स्वीकार्यता भी काफ़ी बढ़ी है, जो देश के लिए शुभ संकेत क़तई नहीं है. यह तो हुई राजनीति की बात. इसे अभी एक तरफ़ रखते हैं. फ़िलहाल बात दो सम्मेलनों की जो अगले कुछ महीनों में अल्पसंख्यक या यों कहें कि मुसलिम राजनीति को गरमाने वाले हैं. आमने-सामने हैं बीजेपी व एनडीए सरकार और मुसलिम पर्सनल लाॅ बोर्ड!

Muslim Personal Law Board announces "Save Religion" Movement

दीन और दस्तूर बचाओ तहरीक

मुसलिम पर्सनल लाॅ बोर्ड ने 'दीन और दस्तूर बचाओ तहरीक' चलाने का एलान किया है. बोर्ड का आरोप है कि केन्द्र में एनडीए सरकार बनने के बाद योग, सूर्य नमस्कार, वैदिक संस्कृति और ऐसी कई अन्य बातों को मुसलमानों पर ज़बर्दस्ती थोपा जा रहा है, जो ब्राह्मणवादी हैं और इसलामी आस्थाओं के विरुद्ध हैं. बोर्ड अगले महीने उत्तर प्रदेश के अमरोहा में मौलानाओं और इमामों का एक बड़ा सम्मेलन बुलाने जा रहा है, जिसमें इमामों से कहा जायेगा कि वह हर हफ़्ते जुमे की नमाज़ के बाद लोगों को 'इसलामी आस्थाओं पर किये जा रहे इस हमले' के बारे में सचेत करें और बतायें कि मुसलमान इसका प्रतिरोध किस प्रकार कर सकते हैं. हालाँकि बोर्ड का कहना है कि योग के तीन आसन इसलाम-विरुद्ध हैं, उन्हें छोड़ कर उसे योग से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन फिर भी वह इसे स्कूलों में अनिवार्य किये जाने के विरुद्ध है. बोर्ड का यह भी कहना है कि संघ और एनडीए सरकार स्कूली पाठ्यक्रमों में और इतिहास में मनमाने तरीक़े से छेड़छाड़ कर ब्राह्मणवादी वर्चस्व स्थापित करना चाहती है, जो मुसलमानों के अलावा तमाम दलितों, पिछड़ों व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के हितों के ख़िलाफ़ है, इसलिए बोर्ड उन सबके साथ मिल कर अपना 'दीन और दस्तूर बचाओ' आन्दोलन चलायेगा. इसी सिलसिले में बोर्ड ने इसी हफ़्ते भोपाल में एक जलसा किया था, जिसमें थोड़ी देर के लिए मध्य प्रदेश काँग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश पचौरी भी पहुँचे थे. इसके अलग राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं.

एनडीए का सशक्तीकरण समागम

उधर, एनडीए सरकार भी नवम्बर में अल्पसंख्यकों का एक विशाल 'सशक्तीकरण समागम' कराने जा रही है. ज़ाहिर है कि बीजेपी अकेले केवल मुसलमानों की बात नहीं करना चाहती, लेकिन अपनी 'समावेशी छवि' पेश करना चाहती है. कहा जा रहा है कि यह देश में अल्पसंख़्कों का अब तक का सबसे बड़ा और सबसे भव्य सम्मेलन होगा और तमाम सेलिब्रिटी चेहरे भी होंगे. इस लेखक को पता है कि इस सम्मेलन की तैयारी महीनों पहले से की जा रही थी. सम्मेलन में सशक्तीकरण और विकास पर ही चर्चा होगी. उधर, प्रधानमंत्री के विश्वस्त ज़फ़र सरेशवाला मुसलमानों के बीच 'तालीम की ताक़त' नाम की मुहिम शुरू करने की तैयारी में हैं.

योग काँग्रेस शासित कर्नाटक में भी!

वैसे योग को तो कर्नाटक सरकार ने भी अपने स्कूलों में लागू करने का एलान किया है, जहाँ काँग्रेस की सरकार है. और 2005 में एनसीइआरटी के राष्ट्रीय पाठ्यक्रम फ़्रेमवर्क में भी योग को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने की बात कही गयी थी. तब केन्द्र में यूपीए की सरकार थी. इसलिए उसे संघ के एजेंडे से जोड़ा जाना उचित नहीं, लेकिन जिन आसनों को लेकर आपत्ति है, उन्हें हटा कर आसानी से इस विवाद को सुलझाया जा सकता है. लेकिन दिक़्क़त तब खड़ी होती है, जब सरकारें सूर्य नमस्कार जैसे मुद्दों पर टस से मस होने को तैयार नहीं होतीं.

Muslim Women demand abolishment of Triple Talaq

तीन तलाक़ के ख़ात्मे की माँग

बहरहाल, मुसलिम राजनीति में हलचल भरे दिनों की आहट साफ़ नज़र आ रही है. और इस हलचल में जो चौथा कोण है, वह भारतीय मुसलिम महिला आन्दोलन (Bhartiya Muslim Mahila Andolan) का है, जिसने माँग की है कि मुसलमानों में बहुविवाह और तीन तलाक़ की मौखिक परम्परा ख़त्म की जाये. संस्था का कहना है कि उसने पिछले चार बरसों में क़रीब पचास हज़ार से ज़्यादा मुसलिम महिलाओं से बात की और उनमें से 92 फ़ीसदी मौखिक तलाक़ के विरुद्ध हैं. ऐसी तलाक़ तो आजकल इमेल, स्काइप या एसएमएस पर होने लगी है. संस्था की ओर से ज़किया सोमान और नूरजहाँ सफ़िया नियाज़ ने क़ुरान-आधारित मुसलिम पारिवारिक क़ानूनों का मसौदा भी तैयार किया है और उनकी सरकार से माँग है कि मुसलमानों के पारिवारिक मामलों के लिए कु़रान-आधारित स्पष्ट और लिखित क़ानून बनाये जायें, ताकि उसकी मनमानी व्याख्या न की जा सके. बहुत-से मुसलिम देशों में ऐसे ही क़ानून हैं तो यहाँ इस पर विचार क्यों नहीं होता? भारतीय मुसलिम महिला आन्दोलन का आरोप है कि मुसलिम पर्सनल बोर्ड ने मुसलिम महिलाओं की दयनीय हालत और मुसलिम पारिवारिक क़ानूनों के व्यापक दुरुपयोग पर न कभी कोई ध्यान िदया और न ही किसी सुधारवादी सुझावों पर कभी विचार किया. लेकिन शायद इस बार कुछ बदलाव दिखे. बोर्ड के सूत्रों की तरफ़ से संकेत मिल रहे हैं कि शायद अमरोहा सम्मेलन में तीन तलाक़ को हतोत्साहित करने के उपायों पर विचार किया जा सकता है. अगर ऐसा हुआ तो शायद पहली बार मुसलिम पर्सनल लाॅ बोर्ड कोई अच्छा सुधारात्मक क़दम उठायेगा. लेकिन संघ के एजेंडे के ख़िलाफ़ बोर्ड ने जिस तरह का आन्दोलन छेड़ने की घोषणा की है, उससे ध्रुवीकरण और तेज़ ही होगा और इससे संघ के ही मंसूबे पूरे होंगे. यक़ीनन यह अच्छा संकेत नहीं है.
http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi
 

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  • MKS

    ‘खदबदाहट’ शब्द को पुनर्जीवित करने के लिए नक़वी जी को साधुवाद!
    भाषा में समय के साथ तमाम नये शब्द जुड़ते रहते हैं जो ज़रूरी भी हैं और सुखद भी। लेकिन पुराने और खोए हुए इस शब्द का जैसा संयोजन नक़वी जी ने किया है, उसने तबीयत हरी कर दी! वल्लाह!

    एक और बात भी दिल को छू लेने वाली है जब नक़वी जी कहते हैं “…जो देश के लिए शुभ संकेत क़तई नहीं है.”
    आज की पत्रकारिता में बिरले ही हैं जो ऐसी दूर दृष्टि रखते हो और सबसे साझा करने का कौशल जानते हों।

    सर, आपसे हमेशा ही सीखने को मिलता है। परमात्मा हमेशा आपका हाथ हमारे सिर पर बनाये रखे। यही स्वार्थी कामना है!
    आपको नमन! हमेशा और सदैव! काश, मैं आपका एकलव्य बन पाता! द्रोण तो आप हैं हीं!!

    • qwn

      प्रिय MKS जी, आपके इन स्नेहपूर्ण शब्दों के लिए दिल से आभार, आभार और आभार. आप मेरे एकलव्य क्यों बनें? द्रोण हो कर अगूंठा कटवा लेने की बात में मैं विश्वास नहीं करता. क्यों न इस यात्रा में आप और हम सब साथी बनें, एक-दूसरे से सीखें.

      • MKS

        एकलव्य ने द्रोण को उनकी इच्छा के विरुद्ध गुरु मानकर अमरता पायी। सदियों से उसे निष्ठा और समर्पण का याद रखा गया।
        द्रोण ने तो अँगूठा माँगकर गुरु-दक्षिणा के भाव को ही कलंकित किया। उनके ऐसे व्यवहार की कभी किसी काल में प्रशंसा नहीं हुई। मेरी आशय एकलव्य के गुणों से था, वर्ना, आज कौन अँगूठा माँगता है और कौन देता है…!
        मर्म सिर्फ़ इतना है कि जैसे द्रोण के परोक्ष आशीष से एकलव्य बन सकता है वैसे ही आपके आशीर्वाद भी भाग्य सँवर जाएगा…!!

        • qwn

          प्रिय मुकेश जी, मेरा आशय यह था कि सीखने-सिखाने के बीच किसी विशेषाधिकार की दीवार नहीं होनी चाहिए, जैसी दीवार द्रोण ने खड़ी की. आज के समय में हम हर एक से सीखते हैं, चाहे वह पद, अनुभव, उम्र में बड़ा हो, बराबर हो या छोटा हो. ज्ञान, कौशल और जानकारी जिसके पास हो, वह दे और जहाँ से मिले, वहां से ले ली जाये. निर्बाध!

          • MKS

            आपने निरुत्तर कर दिया। हमेशा की तरह। बस आपकी स्नेहधारा बहती रहे, यही कामना है। आपके लेख और ये लघु चर्चाएँ भी तो उसी का अभिरूप हैं।
            बहुत-बहुत आभार!

  • i b arora

    हमारी सभ्यता और हमारे समाज का दुर्भाग्य है कि “हम सब” अपने विकास और उत्थान के लिए राजनेताओं पर निर्भर हैं. राजनेता सिर्फ अपना सोचते हैं, कितने लोग हैं जो एक अनुशासनबद जीवन जीने को तैयार हैं, हम तो ट्रैफिक कानून भी मानने को तैयार नहीं हैं यह जानते हुए भी कि हर चार मिनट में एक आदमी सड़क दुर्घटना में मारा जाता है.

    • qwn

      आपने सही मर्म पकड़ा. हम तो ट्रैफ़िक नियम भी नहीं मान सकते, यही प्रवृत्ति हमारी सारी समस्याओं की जड़ है. राजनेता सभी जगह हैं और कोई न कोई तंत्र देश को चलाता है. लेकिन हमारी राजनीति इतनी गन्दी है, हमारे राजनेता नीयत के इतने खोटे हैं और हमारा तंत्र इतना भ्रष्ट है, तो इसके दोषी हम ही हैं. जब हम रोज़मर्रा के जीवन में और मामूली-मामूली बातों में किसी मर्यादा को नहीं मानते तो फिर बाक़ी सब जगह मर्यादाएँ कहाँ से मानी जायेंगी?

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बस एक महीने पहले ही मैंने 'राग देश' में लिखा था कि कुछ...
Posted On 12th Nov 2016 12:35 hrs
मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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