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Nov 10
मोदी के कौशल की पहली परीक्षा!
त्वरित टिप्पणी  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 5 

मोदी अहंकारी तो हैं, लेकिन उनसे ऐसी मूर्खता की उम्मीद नहीं कि उन्हें राजनीति की ज़मीनी सच्चाइयाँ दिखना बन्द हो जायें! वैसे उन्हें शायद अब एहसास हो रहा हो कि दिल्ली में 'रामज़ादे बनाम हरामज़ादे' का नतीजा देख लेने के बाद अगर उन्होंने चाबुक कस दी होती तो शायद बिहार में नीतीश और लालू यादव के ऐसे अच्छे दिन न आये होते!

तो अब बिहार की हार के बाद मोदी की सबसे पहली चुनौती यही है कि क्या वह घृणा-भोंपुओं को बन्द करा पायेंगे? संघ और 'परिवार' क्या अपने एजेंडे को ठंडे बस्ते में डालेगा? मुश्किल लगता है!


Narendra Modi-Challenges after Bihar Election Defeat-Raag Desh 101115.jpg
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दिल्ली में नरेन्द्र मोदी के कौशल की पहली परीक्षा अब है! उनके राजनीतिक जीवन की शायद अब तक की सबसे बड़ी चुनौती उनके सामने है! और शायद पहली भी! इस मामले में मोदी वाक़ई भाग्यशाली रहे हैं. मुझे नहीं याद पड़ता कि इससे पहले कभी उनके सामने कोई चुनौती आयी भी हो!

गुजरात दंगों को लेकर वह संकट में ज़रूर घिरे थे. लेकिन वह कोई राजनीतिक चुनौती नहीं थी, जिससे उन्हें निबटना हो. तब पार्टी के 'लौहपुरुष' ने रक्षा कवच बन कर उन्हें बचा लिया था! उसके बाद से तो कभी उनके सामने कोई मामूली-सा संकट भी नहीं आया. गुजरात में वह जब तक रहे, चक्रवर्ती सम्राट की तरह रहे. अजेय! शत्रु तो दूर, उनकी मर्ज़ी के बिना कहीं कोई पत्ता भी नहीं खड़क सकता था. तो फिर चुनौती भला कहाँ से आती? ऐसा कोई दरवाज़ा कहीं खुला छूटा ही नहीं था!

Bihar Election Defeat is First Test of Narendra Modi's Political Acumen!

अहमदाबाद और दिल्ली का फ़र्क़!

लोकसभा चुनाव भी उन्होंने आराम-से जीत लिया. जनता काँग्रेस से पक चुकी थी. मोदी के पास विकास के बड़े-बड़े आलीशान, मनोहारी प्रोजेक्ट थे, सपनों के परीलोक थे, जादुई चिराग़ों की मोहिनी दमक थी. जनता ने उन्हें चुन लिया. अब वह सारे विपक्ष को बौना और मरघिल्ला कर चुके थे. दूर-दूर तक फिर कोई चुनौती नहीं दिख रही थी! सब कुछ कंट्रोल में था! पूरी दुनिया 'नसीबवाले' का लोहा मान रही थी!

लेकिन अहमदाबाद और दिल्ली में बड़ा फ़र्क़ है, यह दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल ने नौ महीने में ही बता दिया. उस हार को किसी ने चुनौती माना ही नहीं. लेकिन उसके नौ महीने बाद अब बिहार में मिली वैसी ही करारी हार को वही अनदेखा करेगा, जो या तो मूर्ख राजनीतिक हो या अहंकार में अन्धा!

तब शायद नीतीश-लालू के 'अच्छे दिन' नहीं आये होते!

मोदी अहंकारी तो हैं, लेकिन उनसे ऐसी मूर्खता की उम्मीद नहीं कि उन्हें राजनीति की ज़मीनी सच्चाइयाँ दिखना बन्द हो जायें! वैसे उन्हें शायद अब एहसास हो रहा हो कि दिल्ली में 'रामज़ादे बनाम हरामज़ादे' का नतीजा देख लेने के बाद अगर उन्होंने चाबुक कस दी होती तो शायद बिहार में नीतीश और लालू यादव के ऐसे 'अच्छे दिन' न आये होते!

मोदी हैं तो बड़े समझदार! क़ायदे से तो उन्हें तभी पढ़ लेना चाहिए था कि देश की जनता को 'रामज़ादे' जैसे मुहावरे नहीं चाहिए. अब यह पता नहीं कि वह पढ़ नहीं पाये या पढ़ कर भी कुछ कर नहीं पाये! क्योंकि तब से लगातार वह मुहावरे जारी हैं और हर तरफ़ से बार-बार कोंचे जाने के बावजूद मोदी कभी टस से मस नहीं हुए! तो कुछ तो बात ज़रूर होगी!

मोदी क्या घृणा-भोंपुओं को बन्द करा पायेंगे?

तो अब बिहार की हार (Bihar Election 2015) के बाद मोदी की सबसे पहली चुनौती यही है कि क्या वह घृणा-भोंपुओं को बन्द करा पायेंगे? संघ और 'परिवार' क्या अपने एजेंडे को ठंडे बस्ते में डालेगा? मुश्किल लगता है! क्यों? आगे देखेंगे.

नरेन्द्र मोदी की दूसरी बड़ी चुनौती है उनकी अपनी ख़ुद की पैकेजिंग, ब्राँड मोदी, जिसने लोगों के मन में करिश्माई उम्मीदें पैदा कीं और इसीलिए लोगों को अब लगता है कि वे बुरी तरह ठगे गये हैं! मोदी अब कह रहे हैं कि विकास कोई फ़र्राटा दौड़ नहीं, बल्कि लम्बी मैराथन है. विकास धीरे-धीरे होगा, समय लगेगा. लेकिन सच यह है कि मोदी जी ने उम्मीद तो 'फ़ार्मूला वन' जैसी रफ़्तार वाले विकास की जगायी थी. विकास का चक्का तो अभी जाम है. अब मोदी कैसे इसको गति दे पाते हैं और कैसे लोगों को समझा पाते हैं कि वे बेवक़ूफ़ नहीं बनाये गये हैं, यह वाक़ई एक कठिन और गम्भीर चुनौती है. इसे तो उन्हें तुरन्त हाथ में लेना होगा!

अहंकार और अड़ियल ज़िद्दीपन

लेकिन यह होगा कैसे? बिहार के बाद विपक्ष का हौसला तो बढ़ चुका है. उसे साथ लिये बिना बहुत-से क़ानून अटके पड़े रहेंगे. नरेन्द्र मोदी को अपना अहंकार छोड़ना होगा. राहुल गाँधी उन्हें पहले ही यह नसीहत दे चुके हैं!

बात सिर्फ़ अहंकार की ही नहीं, ज़िद्दीपन की भी है. मोदी को समझना चाहिए कि कई छोटी-छोटी बातें मिल कर बहुत बड़ी हो जाती हैं. वैसे ही, जैसे बूँद-बूँद से सागर भरता है. तीस्ता सीतलवाड और ग्रीनपीस से किस तरह और क्यों खुन्दक निकाली जा रही है, यह जनता समझती है और वह यह भी समझती है कि यह वह 'गवर्नेन्स' नहीं है, जिसकी शान में मोदी रोज़ क़सीदे पढ़ते हैं. लोगों को यह बात भी चुभती है जब न्यायपालिका को सरकारी घुट्टी पिलाये जाने की कोशिशें होती हैं. पहले तो कभी न्यायपालिका से ऐसी भाषा में संवाद नहीं किया गया! तो अगली चुनौती यह है कि क्या यह अड़ियल ज़िद की संस्कृति बदलेगी?

पार्टी में भी बढ़ सकती हैं चुनौतियाँ

राजनीतिक मोर्चे पर भी चुनौतियाँ कम नहीं हैं. अब तक अमित शाह के रूप में पार्टी पर नरेन्द्र मोदी की पूरी पकड़ थी. अमित शाह को धुरन्धर चुनाव-विजेता रणनीतिकार के तौर पर पेश किया गया था. शुरू के चुनाव उन्होंने जीते भी. लेकिन दिल्ली और बिहार के दो चुनाव लगातार बुरी तरह हारने के बाद उन पर सवाल उठेंगे ही. अगले साल बीजेपी के नये अध्यक्ष का चुनाव होना है. क्या अमित शाह को दूसरी बार यह कुर्सी मिलेगी या पार्टी को कोई नया अध्यक्ष मिलेगा, यह बड़ा सवाल है.

फिर अगले साल असम और पश्चिम बंगाल में चुनाव होने हैं. असम में तो काँग्रेस की लुँजपुँज हालत के कारण बीजेपी के लिए लड़ाई शायद उतनी कठिन न हो, लेकिन अब इसकी उम्मीद कम है कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी कोई प्रभावी प्रदर्शन कर सकती है.

विकास का एजेंडा या संघ का एजेंडा?

दिक़्क़त यह है कि विकास की कोई रुपहली कहानी अभी है नहीं और शायद जल्दी हो भी न. विदेशी निवेशकों ने भी मोदी से जिस तेज़ी की उम्मीद लगायी थी, उसका कहीं अता-पता नहीं है. धार्मिक असहिष्णुता से लगातार कसैले हुए माहौल से बिदक कर कुछ निवेशक तो यहाँ से पैसा निकाल कर ही जा चुके हैं, जो आने को सोच रहे थे, वह फ़िलहाल हालात का जायज़ा ले रहे हैं. विपक्ष के असहयोग, ख़राब घरेलू हालात और दुनिया भर में डगमग अर्थव्यवस्था के कारण यहाँ विकास कैसे रफ़्तार पकड़े, यह बड़ा सवाल है.

उधर संघ के अपने लक्ष्य हैं. उसकी अपनी टाइमलाइन है. अस्सी के दशक में उसने राम जन्मभूमि आन्दोलन के ज़रिये हिन्दुत्ववाद को देश की राजनीति के केन्द्र में पहुँचाया था. संघ के हिसाब से अब समय इसे और आगे ले जाने का है. संघ की रणनीति इस बार अलग है. कोई बड़ा आन्दोलन कर पूरी ताक़त उसमें झोंकने और दुनिया का ध्यान उस ओर आकर्षित करने के बजाय संघ अब बहुत छोटे-छोटे मुद्दों से स्थानीय स्तरों पर हिन्दुत्व की चिनगारी धीरे-धीरे सुलगाये रखना चाहता है. पिछले अठारह महीनों में यही हुआ है. 'लव जिहाद' और घर-वापसी के बाद गोमांस का मुद्दा इसी रणनीति के तहत उछला है. सवाल यह है कि क्या संघ अब बिहार की हार से सबक़ लेकर अपने अभियान को रोक देगा? मुझे तो नहीं लगता!

(बिहार चुनाव के नतीजों पर बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम www.bbc.com/hindi के लिए लिखी गयी टिप्पणी, 09 Nov 2015)
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  • kushal

    नक़वीजी मुझे बिलकुल आश्चर्य नहीं हुआ के हर प्रत्येक लेख की भाँती आपने इस लेख में भी RSS का ज़िक्र किया औए मुझे पहले उम्मीद थी की किसी ना किसी बहाने आप RSS को लपेटेंगे . औए हर लेख की भांति आपने इस लेख को भी साम्प्रदायिक रंग दे दिया है जैसा कि आपने “रामजादे और हरामजादे ” शब्दों का प्रयोग किया है .

    हाँ में मानता हूँ कि अब प्रधान मंत्री की चुनौतियां और बढ़ गयी हैं क्योंकि बिहार में लालू सत्ता में आ गया है जो कि चारा चोर तो पहले ही था और वो जातिवाद और सम्प्रदावाद को और भी बढ़ावा देगा और केंद्र की सरकार से जो भी मदद मिलेगी उसे डकारने के लिये पूरी ताक़त लगा देगा और फिर नितीश कुमार भी केजरीवाल की तरह राज्य की खस्ताहालत के लिए केंद्र के माथे दोष को मढ़ते रहेंगी साथ में सारे के सारे भ्रष्टाचारी ( सोनिया ,राहुल गांधी . लालू यादव मुलायम , मायावती और अन्य ) मिलककर देश के हिट में कोई भी कानून नहीं बनने देंगे .

    वाकई बिहार में वोटतन्त्र की जीत हुयी है और लोकतंत्र की हार हुयी है . प्रसन्नता की बात ये है कि ग़रीब बिहारी ट्रेनों में भूसे की तरह भर भर कर अन्य राज्यों को पलायन करेंगे और अन्य राज्यों को सस्ते मज़दूर मिल सकेंगे .लालू वो भुजंग है जो चन्दन के पेड़ को भी ज़हरीला बनाकर उसे भी भुजंग बना डालेगा

  • shnawaz

    मोदी जी की प्रॉब्लम यह है कि वह अगर कुछ करना चाहें भी तो नहीं कर सकते हैं, ना तो वह संघ से अलग हो सकते हैं और ना ही इंडस्ट्रियलिस्ट से… उन्हें यह दोनों क़र्ज़ तो हर हाल में चुकाने ही पड़ेंगे!

  • anil

    अरे ये नकवी जी तो कांग्रेस का पक्का दल्ला है ……….. इनके कारण ही देश का कुक्सन हो रहा है|

  • kritartha srivastava

    mujhe nakwi jaise logo pr aajbhi bht taras aa rha h k jo vyakti desh kvikash k liye dino rat ek kiya h us vyakti ki ye burai kar rhe h khair inki jaati walo ko agr hum kisik marne pr RAM RAM satya hai kahe to isme bhi inko samradayikta hi najar aati h

  • vipin

    Sir thoda gyan national heraald per bheee baant dijiye

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स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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