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उम्र 19 नहीं, बन गये सम्पादक!

लिखने का शौक़ तो 13-14 साल की उम्र से ही लग गया था. वाराणसी के अख़बारों में रविवार को बच्चों के पृष्ठ पर कविताएँ छपने से इस सिलसिले की शुरुआत हुई. कई कविताएँ छपीं और जब बच्चों के पन्ने के लिए हुई कुछ लेख प्रतियोगिताओं में पहला स्थान पा लिया, तो हौसला बढ़ा. फिर ‘सम्पादक … Continue reading उम्र 19 नहीं, बन गये सम्पादक!

‘टाइम्स समूह’ तक कैसे पहुँचा मैं?

अगर उस दिन विजय ने मुझे बुला कर वह विज्ञापन न दिखाया होता तो मैं आज वह न होता, जो हूँ! विजय ने ज़्यादा पढ़ाई-लिखाई नहीं की थी. हाईस्कूल से पहले ही पढ़ाई छोड़ दी थी. मेरे ही मुहल्ले में रहता था. उन दिनों आज की तरह कालोनियों का ज़माना नहीं था. मुहल्ले में सब … Continue reading ‘टाइम्स समूह’ तक कैसे पहुँचा मैं?

कैसे नाम पड़ा ‘आज तक’

‘आज तक’ का नाम कैसे पड़ा ‘आज तक?’ बड़ी दिलचस्प कहानी है. बात मई 1995 की है. उन दिनों मैं ‘नवभारत टाइम्स,’ जयपुर का उप-स्थानीय सम्पादक था. पदनाम ज़रूर उप-स्थानीय सम्पादक था, लेकिन 1993 के आख़िर से मैं सम्पादक के तौर पर ही अख़बार का काम देख रहा था. एक दिन एस. पी. सिंह का … Continue reading कैसे नाम पड़ा ‘आज तक’

मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
त्वरित टिप्पणी
तीन तलाक़ और नयी सोशल इंजीनियरिंग तीन तलाक़ पर फ़ैसले के बाद क्या अब एक नयी सोशल इंजीनियरिंग की शुरुआत होगी? और अगर ऐसा हुआ तो क्या देश की राजनीति में हम एक नया मोड़ देखेंगे? ठीक वैसे ही जैसे मंडल के बाद दलित-पिछड़ा राजनीति के बिलकुल नये समीकरण देखे गये थे. हालाँकि पिछले तीन साल में [..] Read More
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