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Mar 16
फ़ुटबाल, फ़तवा और ममता!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
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मौलवियों और कुछ दकियानूसी मुसलमानों ने माल्दा में महिलाओं का फ़ुटबाल मैच नहीं होने दिया. आपत्ति थी कि महिलाएँ छोटे कपड़े पहन कर खेलेंगी, इससे इलाक़े की लड़कियों पर बुरा असर पड़ेगा और ऐसा खेल शरीअत के ख़िलाफ़ है! शर्म की बात है कि पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार और उनके प्रशासन ने चन्द मुट्ठी भर कूढ़मग़ज़ दिमाग़ों के सामने घुटने टेक दिये. वोटपरस्ती की ऐसी ही घटिया सोच ने सेकुलरिज़्म को बजबजा दिया है.


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फ़ुटबाल और फ़तवे का भला क्या रिश्ता? और कहीं हो न हो, लेकिन शासन अगर ममता बनर्जी का हो तो फ़ुटबाल से फ़तवे का भी रिश्ता निकल आता है! अजब देश है, अजब राजनीति है यहाँ की और अजब राजनेता हैं यहाँ! वोटपरस्ती की ऐसी ही घटिया सोच ने समाज में ज़हर घोल रखा है.

शरीअत के ख़िलाफ़!

बात पश्चिम बंगाल के माल्दा ज़िले की है. वहाँ हरिश्चन्द्रपुर के प्रोग्रेसिव फ़ुटबाल क्लब ने अपने स्वर्ण जयन्ती समारोह के मौक़े पर महिलाओं का एक प्रदर्शन फ़ुटबाल मैच रखा था. मैच लड़कियों के एक स्कूल में खेला जाना था. सारी तैयारी हो चुकी थी. मैच में राष्ट्रीय स्तर की कुछ महिला खिलाड़ी भी खेलने वाली थीं. लेकिन अचानक इलाक़े के मौलवियों और कुछ लोगों ने विरोध शुरू कर दिया कि इस तरह का मैच नहीं हो सकता, क्योंकि महिला खिलाड़ी छोटे कपड़े पहन कर खेलेंगी और इससे स्थानीय लड़कियों पर बुरा असर पड़ेगा. कुछ लोगों का कहना था कि इस तरह का खेल शरीअत के ख़िलाफ़ है. प्रोग्रेसिव फ़ुटबाल क्लब के काफ़ी सदस्य मुसलिम हैं. क्लब के अध्यक्ष रज़ा रज़ी ने मौलवियों और लोगों को समझाने-बुझाने की भरपूर कोशिश की और स्थानीय प्रशासन से भी मदद माँगी. लेकिन मदद करने के बजाय स्थानीय प्रशासन ने क़ानून-व्यवस्था का हवाला देकर मैच पर ही रोक लगा दी!

ममता छाप सेकुलरिज़्म!

यह है ममता बनर्जी छाप सेकुलरिज़्म का घटिया नमूना. कोई भी सरकार जब ऐसी ऊँटपटाँग और बेहूदा ज़िदों के आगे घुटने टेकती है, तो वह साम्प्रदायिकता के नागों को ही दूध पिला रही होती है. सेकुलर होने का यह मतलब नहीं कि नागरिक मुद्दों और मामलों पर धर्म की अनाप-शनाप व्याख्या से फ़ैसले लिये जायें. फ़ुटबाल मैच का किसी धर्म से क्या लेना-देना? और महिला खिलाड़ी तो अपनी सामान्य जर्सियाँ ही पहन कर वहाँ खेलनेवाली थीं. इस पर किसी को क्यों और किस अधिकार से आपत्ति होनी चाहिए थी? और अगर कुछ कूढ़मग़ज़ों को आपत्ति थी भी तो प्रशासन उसके आगे झुका क्यों? जिन्हें आपत्ति थी, वे यह मैच देखने न आते, अपने घरों में बैठे रहते, लेकिन वे ऐसा मैच न होने दें, यह कैसे हो सकता है. सरकार संविधान से चलती है, शरीअत से नहीं. हाँ, राजनीति ज़रूर वोटों से चलती है, वरना ऐसा क़तई नहीं होता! मदरसा बम कांड में भी ममता सरकार ने बेशर्मी से मामले को रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश की थी. कुछ राजनेताओं और राजनीतिक दलों की ऐसी ही घटिया हरकतों के कारण देश में सेकुलरिज़्म को गहरा धक्का पहुँचा है. यह कड़ुवा सच है. देश में साम्प्रदायिक ताक़तों और हिन्दुत्ववादी संगठनों का जो असर बढ़ा है, उसके पीछे यह एक बड़ा कारण है कि सरकारों और राजनीतिक दलों ने अपने वोटों के लिए इस तरह के नाजायज़ सवालों और ज़िदों के सामने घुटने टेके और उन्हें पाला-पोसा और अपनी ऐसी हरकतों से सेकुलरिज़्म के ख़िलाफ़ लोगों को भड़काया.

फ़तवे का खेल हर जगह नहीं चलता!

सेकुलरिज़्म का मतलब यह है कि राज्य स्वयं किसी धर्म से किसी प्रकार का जुड़ाव नहीं रखेगा, किसी धर्म को आगे नहीं बढ़ायेगा और सभी मामलों में सभी धर्मों से समान व्यवहार करेगा. सभी को अपने धर्म को मानने या न मानने, उसका प्रचार-प्रसार करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, धर्म का दायरा केवल धार्मिक मामलों तक ही सीमित होना चाहिए और बाक़ी सभी दूसरे मामले देश के सामान्य क़ानूनों से तय होने चाहिए, जो सभी नागरिकों के लिए समान रूप से लागू हों. इस हिसाब से तो समान नागरिक क़ानून को देश में काफ़ी पहले ही अपना लिया जाना चाहिए था, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पाया क्योंकि देश के राजनीतिक नेतृत्व ने इसके लिए अनुकूल माहौल बनाने की दिशा में कभी कोई पहल ही नहीं की. उलटे शाहबानो मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को निष्प्रभावी करने के लिए क़ानून ज़रूर बदल दिया गया. समान नागरिक क़ानून और शाहबानो मामले तो ख़ैर बहुत गम्भीर मुद्दे थे, लेकिन माल्दा का फ़ुटबाल मैच तो बहुत छोटी और स्थानीय घटना है. सरकार और स्थानीय प्रशासन ने शायद ज़रा-सी कड़ाई से काम लिया होता, तो यह नौबत नहीं आती. यह फ़तवे का खेल इसीलिए खेला गया कि वहाँ के लोगों को यक़ीन था कि वह सरकार को झुका लेंगे. इन मौलवियों को जहाँ ज़रा-सा भी एहसास होता है कि वहाँ उनकी बात कोई नहीं सुनेगा, वहाँ वे चूँ भी नहीं करते! मुझे याद है कि अस्सी के दशक की शुरुआत में जिन दिनों मैं नवभारत टाइम्स, मुम्बई में शहर की रिपोर्टिंग किया करता था, जलगाँव इलाक़े में एक फ़तवा जारी हुआ कि मुसलिम महिलाओं को सिनेमा नहीं देखना चाहिए, क्योंकि इससे उन पर बुरा असर पड़ सकता है. वहाँ की एक मुसलिम लड़की रज़िया पटेल ने इसके ख़िलाफ़ बड़ी मज़बूती से संघर्ष किया और जीती भी. जिन दिनों जलगाँव में यह विवाद चल रहा था, मैं मुम्बई में कई मौलवियों, मुफ़्तियों से मिला और पूछा कि उनकी राय क्या है. क़रीब-क़रीब सभी जलगाँव के फ़तवे से सहमत थे. मेरा सवाल था कि फिर आप मुम्बई में यही फ़तवा क्यों नहीं देते? जवाब था कि यहाँ हमारी बात कौन सुनेगा? ज़ाहिर है कि तब उन मौलवियों को मालूम था कि अगर वे मुम्बई में ऐसा कोई फ़तवा देते भी हैं तो न तो मुम्बई के मुसलिम परिवार और उनकी महिलाएँ फ़िल्में देखना बन्द करेंगे और न वे अपने फ़तवे को लागू करा पायेंगे.

थोड़ा दबाव तो बनाइए

इसलिए राजनेता, राजनीतिक दल और सरकारों ने अगर सच में थोड़ा भी दबाव बना कर सेकुलरिज़्म को आगे बढ़ाया होता, तो आज देश कहीं अच्छी हालत में होता. भारत जैसे देश के लिए सेकुलरिज़्म का कोई विकल्प नहीं है. और लोगों को यह बात भी समझनी पड़ेगी कि सेकुलर हुए बिना लोकतंत्र भी सम्भव नहीं है. लोकतंत्र और सेकुलरिज़्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. लोकतंत्र के बिना दुनिया में कहीं सेकुलरिज़्म सम्भव नहीं और सेकुलरिज़्म के बिना लोकतंत्र सम्भव नहीं. हम सेकुलरिज़्म के प्रयोग को ठीक तरीक़े से कर नहीं पाये, इसका यह अर्थ नहीं कि हम हिन्दू राष्ट्र जैसी किसी अवधारणा में विकल्प तलाशें. धर्म पर आधारित कोई राज्य-व्यवस्था कभी लोकतांत्रिक नहीं हो सकती. तो क्या हमारे पास लोकतंत्र के अलावा भी कोई और विकल्प है? विकल्प एक ही है. सेकुलरिज़्म को फ़ुटबाल न बनने दिया जाये. ममता बनर्जी और उनके जैसे तमाम राजनेताओं को सख़्ती से यह सन्देश देने की ज़रूरत है कि सेकुलरिज़्म के साथ खिलवाड़ बन्द कीजिए. सेकुलरिज़्म से खिलवाड़ देश से खिलवाड़ है!
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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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