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Oct 22
चुपचाप ‘राष्ट्रवाद’ की धूप सेंकिए!
राग देश  | क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
Comments: 4 

और मीडिया पर क्या कहा जाये? उसे तो अमित शाह से 'देशभक्ति' का प्रमाणपत्र मिल ही चुका है! है न बड़ी उपलब्धि! इसके पहले करगिल युद्ध हुआ, उससे पहले 1971, 1965 और 1962 के बड़े-बड़े युद्ध हुए. देश के मीडिया को न किसी ने देशभक्ति का कोई सर्टिफ़िकेट दिया, न उसे लेने की ज़रूरत पड़ी. लेकिन एक छोटी-सी सर्जिकल स्ट्राइक मीडिया को 'देशभक्त' बना देती है! अभी तक सरकारी मीडिया होता था, अब मीडिया की नयी नस्ल हमारे सामने है, 'राष्ट्रवादी' मीडिया.


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विकलांग हैं. खड़े नहीं हो सकते. तो फिर या तो सिनेमा देखने मत जाइए और अगर बहुत ही शौक़ हो, जाना ही हो तो साथ में बड़ा-सा साइनबोर्ड लेकर जाइए. सारी दुनिया को बताइए कि आप विकलांग हैं, इसलिए राष्ट्रगान के समय उठ कर खड़े नहीं हो सकते! वरना कोई पढ़ा-लिखा, सभ्य-सुसंस्कृत, 'राष्ट्रवादी' दम्पति आपको पीट देगा. और भीड़ बड़ी हो गयी तो मार भी डाले, तो हैरानी क्या? यह घटना पणजी में हुई. वैसे कहीं भी हो सकती थी. कहीं भी हो सकती है. देश का ताज़ा समाचार यही है!

गढ़ा जा रहा है देश का एक नया चेहरा

कहनेवाले जैसे हमेशा कहते हैं, इसे भी कह देंगे कि 'छोटी-सी' बात है. लेकिन ऐसी 'छोटी-मोटी' बातों का कितना बड़ा, कितना लम्बा सिलसिला है? कितनी बड़ी डिज़ाइन है? ध्यान से देखिए. देश का एक नया चेहरा गढ़ा जा रहा है, पिछले अट्ठाईस महीनों से रच-रच कर, सोच-समझ कर. एक उन्मादी 'हिन्दू राष्ट्र' तैयार हो रहा है. छेनियाँ-हथौड़ियाँ चल रही हैं, छिजाई-घिसाई हो रही है, कटाव-छँटाव हो रहा है, कुछ-कुछ शक्ल उभरने भी लगी है, एक ऐसे राष्ट्र की जहाँ प्रश्न न हों, तर्क न हों, विचार न हों, बहस न हो, बाक़ी सब हो. और जो हो, वह बस उस 'राष्ट्रवादी' लकीर पर हो, जो नागपुर से तय होती हो! नागरिक हों, लेकिन सब 'राष्ट्रवादी' हों, सारे वोटर 'राष्ट्रवादी' हों, राजनीतिक पार्टी 'राष्ट्रवादी' हो! और आप जानते हैं कि देश में तो सिर्फ़ एक ही 'राष्ट्रवादी' पार्टी है! और इस 'राष्ट्रवाद' की परिभाषा क्या है, एक राष्ट्र, एक सम्प्रदाय, एक देवता, एक भाषा और अन्त में इसमें जोड़ दीजिए एक पार्टी!

'मोहिन्दुत्व' यानी विकास के शीरे में घुला हिन्दुत्व का रसायन!

आज जो हो रहा है, उस पर मुझे तो कोई हैरानी नहीं. यह 'मोहिन्दुत्व' है, जिस पर मैंने साढ़े तीन साल पहले लिखा था.(Click to Read) लोकसभा चुनावों के भी क़रीब सवा साल पहले. जब तीर्थराज प्रयाग में साधु-सन्तों के जमावड़े के बीच नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का संकल्प लिया गया था. तब 'मोहिन्दुत्व' संघ का नया धाँसू काकटेल था, यानी मोदीत्व के विकास के शीरे में घुला हिन्दुत्व का रसायन! इसकी मार्केटिंग आसान थी. बाज़ार में विकास के बहुत ख़रीदार थे. लक्ष्य साधने के लिए यह हथियार कारगर माना गया था. और समय ने साबित कर दिया कि संघ ने ग़लत नहीं सोचा था.

RSS Agenda is not 'Hindutva' but 'Hindu Rashtra'

'आठ सौ साल बाद देश में हिन्दुओं का शासन!'

लेकिन संघ का एजेंडा 'हिन्दुत्व' नहीं, बल्कि 'हिन्दू राष्ट्र के निर्माण' का है. इसीलिए मोदी सरकार बनते ही एलान हुआ कि आठ सौ साल बाद देश में हिन्दुओं का शासन लौटा है. अशोक सिंहल का बयान याद कीजिए. और फिर देश में 'सर्जिकल स्ट्राइक' शुरू हो गयी. चुन-चुन कर 'दुश्मन' गढ़े गये. निशाने तय किये गये. ईसाई, मुसलमान, दलित, सेकुलर, एनजीओ जो सरकार के अनुकूल न हों! गिनते जाइए. देश में कितने 'छोटे-छोटे' मामले हुए. पहले चर्चों पर हमले हुए, फिर रहस्यमय तरीक़े से अचानक रुक गये. अब बहुत दिनों से किसी चर्च पर हमले की कोई ख़बर क्यों नहीं आती? कुछ दिनों पहले कुछ ईसाई एनजीओ के विदेशी चन्दे रोक दिये गये गये थे, यह कह कर कि वे धर्मान्तरण कराते हैं. अभी अमेरिकी विदेश मंत्री जान केरी के हस्तक्षेप के बाद रोक हट गयी!

'लव जिहाद' से मुसलमानों के 'परिष्कार' तक!

लेखकों की हत्याएँ और उन पर हमले शुरू हुए, हंगामा मचा, पुरस्कार वापसी हुई, पूरी दुनिया में छवि बिगड़ने लगी, तो हमले रुक गये! फिर घर-वापसी, फिर 'लव-जिहाद' का शोर मचा, फिर थम गया. ऐसा अभियान चलानेवाले एक नेता को संघ ने निकाल भी दिया. बात दब गयी. लेकिन बात दबी कहाँ? 'स्थगित' कर दी गयी थी. अभी इसी हफ़्ते महाराष्ट्र के रत्नागिरी में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने फिर 'घर वापसी' की पैरवी की है! फिर रामज़ादे-हरामज़ादे हुआ, 'पाकिस्तान भेजो' मुहिम चली, फिर मुसलमानों की आबादी का सवाल उठाया गया. सरकार संघ की अपनी है, सबको मालूम है कि मुसलमानों की आबादी को लेकर कहीं कोई तथाकथित 'ख़तरा' नहीं है, लेकिन योजना बना कर हौवा खड़ा किया गया. संघ ने बाक़ायदा हिन्दू महिलाओं को सलाह दी कि वे ज़्यादा बच्चे पैदा करें. और फिर मुसलमानों के 'परिष्कार' के एजेंडा क़रीब पचास साल बाद फिर सामने लाया गया. परिष्कार कैसे होगा? संघ प्रमुख ख़ुद ही पहले साफ़-साफ़ कह चुके हैं कि मुसलमानों को 'हिन्दू तरीक़े' से रहना होगा!

अचानक क्यों बढ़ गयी दलितों के खिलाफ हिंसा और विद्वेष?

गो-रक्षा के बहाने दादरी से ऊना और हरियाणा के शर्मनाक सरकारी बिरयानी अभियान को इसी डिज़ाइन के तहत चलाया गया. उधर दलित निशाने पर आये. पहले आम्बेडकर को हथियाने की गोटी चली गयी, और बात फैलायी गयी कि दलित तो मुग़लों की देन हैं, वरना उसके पहले तो भारत में कोई भेदभाव था ही नहीं. लेकिन इस कहानी पर दलितों ने यक़ीन ही नहीं किया. फिर आरक्षण की समीक्षा का शिगूफ़ा छेड़ा गया. कुछ जातियों को दलितों के ख़िलाफ़ उकसाया गया. यह क्या अकारण है कि देश भर में दलितों के ख़िलाफ़ विद्वेष और हिंसा अचानक और लगातार बढ़ी और बढ़ते-बढ़ते अब स्कूली बच्चों तक पहुँच चुकी है.

'राष्ट्रवाद' का मुलम्मा!

फिर इस सब पर चढ़ा 'राष्ट्रवाद' का मुलम्मा! रोहित वेमुला और उसके आम्बेडकरवादी साथियों से लेकर जेएनयू तक हर उदारवादी सेकुलर विचार और संस्था को 'राष्ट्रद्रोही' घोषित करने का अभियान चला. क्यों? क्योंकि 'हिन्दू राष्ट्र के निर्माण' में सेकुलरिज़्म ही एकमात्र सबसे बड़ी बाधा है. इसलिए सेकुलर भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरू का छवि-भंजन अभियान पूरा दम लगा कर चलाया जा रहा है. गोडसे को पूजा जा सकता है, लेकिन चार नास्तिक बन्द कमरे में बैठ कर अपना सम्मेलन नहीं कर सकते! देश बदल रहा है.

वजह-वजह का फेर!

और ज़रा सोचिए कि वे नौ लड़के आज तक क्यों नहीं पकड़े गये, जिन्होंने जेएनयू में कथित देशद्रोही नारे लगाये थे. केजरीवाल के मंत्रियों से लेकर विधायकों तक की बेबात गिरफ़्तारी का रिकार्ड बना देनेवाली दिल्ली पुलिस क्यों उनका कोई सुराग़ नहीं लगा पायी? कुछ तो वजह होगी न! सब वजह-वजह का फेर है. जैसे किसी की पढ़ाई-लिखाई के रिकॉर्ड किसी वजह से किसी विश्वविद्यालय से ग़ायब हो जायें. वजह पता न चले, फिर भी वजह तो होती है न!

'राष्ट्रवादी' शिक्षा, वेद आधारित क़ानून का सुझाव

उधर, सरकार के हर विभाग पर संघ की पैनी नज़र है. हर जगह 'मार्गदर्शक' तैनात हो चुके हैं, काम मनमाफ़िक़ हो रहा है. संघ प्रमुख पिछले दो साल की उपलब्धियों से बहुत सन्तुष्ट हैं, यह बात वह अपने विजयदशमी भाषण में बोल ही चुके हैं! सन्तुष्ट होना भी चाहिए अगर देश का रक्षामंत्री पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक की प्रेरणा 'संघ की शिक्षा' से पाता हो! देश की पूरी शिक्षा को 'राष्ट्रवादी' बनाने की लम्बी-चौड़ी सिफ़ारिशें संघ की तरफ़ से मानव संसाधन मंत्रालय को भेजी जा चुकी हैं. विधि आयोग को उसके एक नये मनोनीत सदस्य अभय भारद्वाज जी ने सुझाव दिया है कि भारतीय साक्ष्य क़ानून को प्राचीन वेदों, उपनिषदों और शास्त्रों के आधार पर बदला जाना चाहिए. भारद्वाज जी का एक परिचय यह है कि वह गुजरात दंगों के आरोपियों के वकील रह चुके हैं! काम तेज़ी से हो रहा है.

मीडिया की नयी नस्ल 'राष्ट्रवादी' मीडिया!

और मीडिया पर क्या कहा जाये? उसे तो अमित शाह से 'देशभक्ति' का प्रमाणपत्र मिल ही चुका है! है न बड़ी उपलब्धि! इसके पहले करगिल युद्ध हुआ, उससे पहले 1971, 1965 और 1962 के बड़े-बड़े युद्ध हुए. देश के मीडिया को न किसी ने देशभक्ति का कोई सर्टिफ़िकेट दिया, न उसे लेने की ज़रूरत पड़ी. लेकिन एक छोटी-सी सर्जिकल स्ट्राइक मीडिया को 'देशभक्त' बना देती है! अभी तक सरकारी मीडिया होता था, अब मीडिया की नयी नस्ल हमारे सामने है, 'राष्ट्रवादी' मीडिया.

'हिन्दुत्व' + 'राष्ट्रवाद' = 'हिन्दू राष्ट्र'

ज़ाहिर है कि 'हिन्दुत्व' और  ज़ाहिर है कि 'हिन्दुत्व' और 'राष्ट्रवाद' के 'कन्वर्जेन्स' के बिना 'हिन्दू राष्ट्र' बन ही नहीं सकता! तो संघ को अब बिलकुल सही दिशा मिल चुकी है. अस्सी के दशक में राम मन्दिर आन्दोलन हिन्दुत्व का लाँचिंग पैड था, 2014 में नये 'ऑर्बिट' के लिए विकास का रॉकेट दाग़ा गया, अब तीसरे 'ऑर्बिट' के लिए 'राष्ट्रवाद' के रॉकेट की बत्ती सुलगायी गयी है. अब सवाल मत कीजिए. आख़िर राष्ट्रवाद का मामला है. अगर 'राष्ट्रवादी' हैं तो पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक पर प्रधानमंत्री के गुण गाइए! क्योंकि एक 'राष्ट्रवादी' देश में न कोई फ़िल्मवाला प्रधानमंत्री पर सवाल उठाते हुए ट्वीट कर सकता है और न जेएनयू में प्रधानमंत्री का पुतला जल सकता है. बस चुपचाप 'राष्ट्रवाद' की धूप सेंकिए! और शारीरिक अक्षमता के कारण राष्ट्रगान के समय खड़े नहीं हो सकते, तो सिनेमा देखने मत जाइए!
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http:raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi

इसी विषय पर पहले:

तब बहुत बदल चुका होगा देश! Click to Read.

Published on Oct 03, 2015

अब ताप में हाथ मत तापिए! Click to Read.

Published on Oct 24, 2015
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  • Abhijit Ray

    India will never become a Hindu nation. India is a secular state. Those who beat up a disabled person for not standing up during national anthem are not nationalists they are bigots. Hinduism is a philosophy while Hindutva is a political agenda. Indians who voted for Modi and BJP, did so for development agenda and not Hindutva agenda. At the same time, if opposition parties do not play dirty politics all the time, then reactionaries Hindutwavadis will not get space.

    • qwn

      I completely agree with you Abhijit ji that people have voted for Modi for development and not for Hindutva. But Unfortunately we are seeing hyperactive RSS in every sphere of public life, propagating its own brand of ‘Nationalism’ and thus vitiating the atmosphere.
      Yes, it is correct that vast majority of Hindus are truly secular and will not buy the idea of Hindu Rashtra but on the other hand this is also true that RSS has significantly expanded its reach and dominance in the country and that is really a cause for concern.

  • ektakhetan

    This is not shocking that some people have beaten up a disabled person for a nation anthem that is not national per se. It is not about hindutva or Islam but the poor mentality of so called human beings who do not treat human, a human but fight wars for idols who are suppose to be their creators.

    Talking about Modi and Sangh, a lot of malice is doing the rounds which is not true. There are cultural bigots [as they are in any religion] but they are not running government, nor they can. Trust me it is more of political bonfire that is created for the lust of power and position. When a political party or a government is formed, there would be different kinds of people. It is a new team and everyone is learning. Judging them on basis of what is heard in media would be unfair.

    • qwn

      Thank you Ekta for reading this article.
      Few stray incidents of bigotry doesn’t matter in a vast country like India but when a continuous trend starts emerging at the horizon, then it becomes a warning signal to take notice of.

      There is no denying that Modi Government is largely driven by RSS on its core agenda and major policies. Even RSS itself doesn’t deny it. All BJP ruled governments, be it central government or state governments, are vigorously following RSS agenda. It is glaringly visible everywhere.

      Last year we saw the entire central cabinet presented its “report card” before RSS top leadership and an appraisal was done on the work each key minister had done and ‘instructions” were issued for course correction “desired” by RSS. How this can happen if RSS is not “guiding” the government?

      Even recently, when PM spoke on Gau Rakshaks, he had to backtrack from his stand next day. And Mohan Bhagwat “corrected” him by saying that Gau Rakshaks are not doing any wrong. There are several such instances widely reported in the media and never denied.

      One may agree or disagree on my analysis, or One may find nothing wrong in RSS ideology, that is different thing. But facts are facts. Analysis and opinions may vary from individual to individual and that should be in a democracy.

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मेरे बारे में….
स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही. Read more
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राहुल जी, डरो मत, कुछ करो! काँग्रेस का 'जन वेदना सम्मेलन' देखा. समझ में नहीं आया कि यह किसकी वेदना की बात हो रही है? जनता की वेदना या काँग्रेस की? जनता अगर इतनी ही वेदना में है तो हाल-फ़िलहाल के छोटे-मोटे चुनावों में लगातार बीजेपी को वोट दे कर वह अपनी 'वेदना' बढ़ा क्यों रही है?

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